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  • सरस्वती विहार हत्याकांड में दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार ने सफदरजंग अस्पताल में ली अंतिम सांस, लंबे समय से जेल में थे बंद

    सरस्वती विहार हत्याकांड में दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार ने सफदरजंग अस्पताल में ली अंतिम सांस, लंबे समय से जेल में थे बंद

    नई दिल्ली ।1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए गए पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का गुरुवार को निधन हो गया। वह तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे सज्जन कुमार की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके निधन के बाद परिवार के सदस्य अस्पताल पहुंचे।

    जानकारी के अनुसार, जेल में सज्जन कुमार के शरीर में कोई हलचल नहीं मिलने के बाद उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया था। अस्पताल में डॉक्टरों ने उनकी जांच की और उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके बेटे जग प्रवेश कुमार भी निधन की जानकारी मिलने के बाद सफदरजंग अस्पताल पहुंचे।

    सज्जन कुमार 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े कई मामलों में लंबे समय तक कानूनी कार्रवाई का सामना करते रहे। दिल्ली के सरस्वती विहार इलाके में 1 नवंबर 1984 को हुए पिता-पुत्र की हत्या के मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया था। इस घटना में जसवंत सिंह और उनके बेटे तरनदीप सिंह की हत्या हुई थी।

    इस मामले में सज्जन कुमार पर हिंसा के दौरान भीड़ को उकसाने का आरोप था। अदालत ने उन्हें दंगा करने, गैरकानूनी तरीके से एकत्र होने, हत्या और अन्य संबंधित अपराधों की धाराओं के तहत दोषी माना था। मामले की सुनवाई के दौरान घटना से जुड़े कई पहलुओं पर विचार किया गया और इसके बाद उन्हें दोषी करार दिया गया।

    फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने सज्जन कुमार को इस मामले में दोषी ठहराया था। इसके बाद अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। सजा के बाद उन्हें तिहाड़ जेल में रखा गया, जहां वह अपनी सजा काट रहे थे। 1984 के दंगों से जुड़े मामलों में यह उनके खिलाफ सुनाई गई महत्वपूर्ण सजा में शामिल थी।

    इससे पहले भी सज्जन कुमार को 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में दोषी ठहराया जा चुका था। वर्ष 2018 में उन्हें पांच सिखों की हत्या और एक धार्मिक स्थल को आग लगाए जाने से जुड़े मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस दोषसिद्धि के बाद उनके राजनीतिक जीवन को भी बड़ा झटका लगा था।

    सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को दिल्ली में हुआ था। उन्होंने 1970 के दशक में राजनीति की शुरुआत की। शुरुआती दौर में वह दिल्ली नगर निगम के पार्षद बने और बाद में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव की जिम्मेदारी संभाली। धीरे-धीरे दिल्ली की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ता गया और वह कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए।

    सज्जन कुमार वर्ष 1980, 1991 और 2004 में लोकसभा सांसद चुने गए। वह संजय गांधी के करीबी नेताओं में माने जाते थे। कई वर्षों तक उन्होंने दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और कांग्रेस के भीतर महत्वपूर्ण राजनीतिक पहचान बनाई।

    वर्ष 2018 में 1984 के सिख विरोधी दंगों में दोषसिद्धि के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उनका सार्वजनिक जीवन मुख्य रूप से दंगा मामलों में चल रही न्यायिक प्रक्रिया और सजा से जुड़ा रहा।

    सज्जन कुमार के निधन के साथ उनके लंबे राजनीतिक सफर और 1984 के दंगा मामलों से जुड़े कानूनी घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया। उनके निधन की खबर के बाद परिवार और समर्थकों के बीच शोक का माहौल है।

  • पति के दबाव में मायके की संपत्ति मांगना भी माना जाएगा दहेज की मांग, कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट की कानून की अहम व्याख्या

    पति के दबाव में मायके की संपत्ति मांगना भी माना जाएगा दहेज की मांग, कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट की कानून की अहम व्याख्या

    नई दिल्ली । दहेज से जुड़े मामलों की कानूनी व्याख्या को और स्पष्ट करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि किसी महिला का अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना उसका वैधानिक अधिकार है, लेकिन यदि यह मांग पति या ससुराल पक्ष के दबाव, उत्पीड़न या मजबूरी के कारण की जाती है तो इसे दहेज की मांग माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की दहेज हत्या से संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं।

    यह फैसला वर्ष 2014 में हुई एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की मौत से जुड़े मामले में सुनाया गया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि महिला अपने वैवाहिक जीवन के दौरान लगातार मानसिक दबाव और आर्थिक उत्पीड़न का सामना कर रही थी। जांच और गवाहों के आधार पर यह भी सामने आया कि महिला पर मायके से धन और पैतृक संपत्ति में हिस्से की राशि लाने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था।

    अदालत ने कहा कि महिला को अपने पैतृक अधिकार का दावा करने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि यह उसका कानूनी अधिकार है। हालांकि यदि पति इस अधिकार का इस्तेमाल अपने आर्थिक लाभ के लिए करवाने का दबाव बनाता है और महिला को मजबूर करता है कि वह मायके से संपत्ति या धन लेकर आए, तो ऐसी स्थिति सामान्य संपत्ति विवाद नहीं रह जाती, बल्कि दहेज की मांग की श्रेणी में आती है। अदालत ने माना कि कानून की व्यापक भावना भी इसी सिद्धांत का समर्थन करती है।

    सुनवाई के दौरान पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी केवल अपने वैधानिक हिस्से की मांग कर रही थी, इसलिए इसे दहेज की मांग नहीं कहा जा सकता। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि महिला के भाई ने पहले ही पैतृक संपत्ति का एक हिस्सा बेचकर उसे धनराशि दी थी, लेकिन इसके बावजूद पति लगातार शेष संपत्ति से भी पैसा लाने के लिए दबाव बना रहा था। अदालत ने माना कि यही दबाव महिला की मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालने वाला महत्वपूर्ण कारण बना।

    मामले में प्राथमिकी दर्ज होने में हुई देरी को लेकर भी पति की ओर से सवाल उठाए गए। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि किसी परिवार में अचानक हुई दुखद मृत्यु के बाद परिजन स्वाभाविक रूप से मानसिक आघात की स्थिति में होते हैं। ऐसे समय कानूनी सलाह लेकर शिकायत दर्ज कराना असामान्य नहीं माना जा सकता। केवल देरी के आधार पर शिकायत की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

    साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि सास-ससुर के विरुद्ध पर्याप्त और ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं थे। गवाहों के बयानों में भी उनकी प्रत्यक्ष भूमिका सिद्ध नहीं हो सकी। इसी आधार पर उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। वहीं पति के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।

    हालांकि अदालत ने सजा के प्रश्न पर विचार करते हुए आजीवन कारावास को संशोधित कर दस वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। अदालत ने कहा कि दहेज हत्या के मामलों में आजीवन कारावास का प्रावधान अत्यंत गंभीर और दुर्लभ परिस्थितियों में लागू किया जाना चाहिए। इस निर्णय के साथ अदालत ने यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि महिलाओं के पैतृक संपत्ति संबंधी अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन यदि उन अधिकारों का उपयोग ससुराल पक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए दबाव बनाकर कराता है, तो कानून उसे दहेज की मांग के रूप में देखेगा और उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

  • पाकिस्तान में फ्रांसीसी महिला से दरिंदगी के दोषियों को होगी फांसी: उच्च न्यायालय ने खारिज की अपील, वैश्विक स्तर पर न्यायिक कड़ेपन का समर्थन

    पाकिस्तान में फ्रांसीसी महिला से दरिंदगी के दोषियों को होगी फांसी: उच्च न्यायालय ने खारिज की अपील, वैश्विक स्तर पर न्यायिक कड़ेपन का समर्थन

    नई दिल्ली। पाकिस्तान की न्यायपालिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और संवेदनशील ‘लाहौर मोटरवे सामूहिक दुष्कर्म मामले’ में एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। लाहौर उच्च न्यायालय (LHC) ने इस बर्बर कांड के दो मुख्य दोषियों, आबिद अली और शफकत अली की फांसी की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। दोनों दोषियों ने साल 2021 में आतंकवाद निरोधी अदालत (ATC) द्वारा दी गई मौत की सजा के खिलाफ उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने अभियोजन पक्ष के पुख्ता सबूतों के आलोक में सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब दोनों अपराधियों की मौत की सजा का क्रियान्वयन तय माना जा रहा है, जिसने वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकारों और महिला सुरक्षा से जुड़े संगठनों का ध्यान आकर्षित किया है।

    यह अत्यंत क्रूर और खौफनाक घटना 9 सितंबर 2020 की है, जब पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला अपने तीन मासूम बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे पर कार से यात्रा कर रही थी। देर रात अचानक कार का ईंधन समाप्त हो जाने के कारण उनका परिवार सुनसान सड़क के किनारे असहाय स्थिति में फंस गया था। महिला अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार के दरवाजे बंद कर भीतर ही मदद की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी दौरान हथियारों से लैस हमलावरों ने वाहन की खिड़की का शीशा तोड़कर महिला को जबरन बाहर घसीट लिया और उसके ही रोते-बिलखते बच्चों के सामने बंदूक की नोक पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य वारदात को अंजाम दिया। अपराधी वहां से भागने से पहले पीड़ित परिवार से नकदी, आभूषण और बैंक कार्ड भी लूट ले गए थे।

    इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद पूरे पाकिस्तान में जनाक्रोश भड़क उठा था और कार्यस्थलों तथा सार्वजनिक मार्गों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानूनों की मांग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे। जनभावनाएं उस समय और अधिक उग्र हो गई थीं, जब तत्कालीन लाहौर पुलिस प्रमुख उमर शेख ने प्रशासनिक विफलता को छुपाने के लिए उल्टा पीड़िता के समय और मार्ग चयन पर ही अनुचित सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि, बढ़ते दबाव के बीच पुलिस प्रशासन ने अपराधियों को पकड़ने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अभियान चलाया। जांचकर्ताओं ने अत्याधुनिक मोबाइल फोन डेटा विश्लेषण और घटनास्थल से एकत्र किए गए डीएनए नमूनों की सहायता से आरोपियों को दबोचा था। बाद में न्यायिक कार्यवाही के दौरान पीड़िता ने भी दोनों की पहचान की थी और एक आरोपी ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।

    उच्च न्यायालय में अपील की सुनवाई के दौरान दोषियों के विधिक सलाहकारों ने दलील दी थी कि जांच एजेंसी की प्रक्रिया में कई तकनीकी कमियां हैं और साक्ष्य पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं। इसके विपरीत, सरकारी वकीलों ने अदालत के समक्ष अकाट्य वैज्ञानिक (डीएनए) और तकनीकी (सेलुलर लोकेशन) प्रमाण प्रस्तुत किए, जो सीधे तौर पर अपराधियों की अपराध स्थल पर उपस्थिति और संलिप्तता को प्रमाणित करते थे। उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को वैध मानते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत का फैसला पूर्णतः न्यायसंगत था। इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध वैश्विक उद्यमी और टेस्ला प्रमुख एलन मस्क ने भी सोशल मीडिया पर ‘शाबाश पाकिस्तान’ लिखते हुए न्यायिक कड़ेपन की सराहना की और कहा कि पश्चिमी देशों को भी हिंसक अपराधों के खिलाफ ऐसे ही कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है।