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  • जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति

    जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में नई दिशा देने के उद्देश्य से व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग से जुड़े अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक मॉस्को में हुई। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने बैठक की सह-अध्यक्षता की। इस दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग से जुड़े अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए और कई प्रमुख क्षेत्रों में व्यावहारिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

    दो दिवसीय रूस यात्रा पर पहुंचे जयशंकर ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव से मुलाकात की। बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद भारत और रूस के संबंधों में लगातार मजबूती और अनुकूलन क्षमता दिखाई दी है। दोनों देशों के बीच आपसी हित और विश्वास को रणनीतिक साझेदारी का आधार बताया गया।

    जयशंकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2021-22 में करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार 2025-26 में बढ़कर लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। व्यापार में यह वृद्धि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की क्षमता को दर्शाती है, लेकिन इसके साथ व्यापार असंतुलन भी काफी बढ़ा है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि व्यापार घाटे का अंतर करीब 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। उन्होंने इस असंतुलन को दूर करना भारत और रूस के बीच आर्थिक संबंधों की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताया। दोनों पक्षों के बीच व्यापार को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने के लिए नए अवसर तलाशने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

    बैठक में ऊर्जा, उर्वरक, परमाणु सहयोग, कनेक्टिविटी, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और मानव संसाधन की आवाजाही जैसे क्षेत्रों को विशेष महत्व दिया गया। जयशंकर ने कहा कि बदलते वैश्विक आर्थिक और तकनीकी माहौल में दोनों देशों को नए क्षेत्रों की संभावनाओं की पहचान करते हुए सहयोग का दायरा बढ़ाना होगा।

    उन्होंने भारत और रूस के बीच आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने में उद्योग जगत की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार सरकारें व्यापार और निवेश के लिए आवश्यक ढांचा तैयार कर सकती हैं, लेकिन वास्तविक निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन में कारोबारी क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका रहती है। इसलिए संस्थागत तंत्र को उद्योग की प्राथमिकताओं के साथ लगातार जोड़े रखने की आवश्यकता है।

    जयशंकर ने कहा कि अंतर-सरकारी आयोग के विभिन्न कार्य समूहों और उप-समूहों को केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि तय लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने समस्या समाधान और व्यावहारिक परिणामों को भविष्य की बैठकों की सफलता का प्रमुख आधार बताया।

    बैठक के बाद जयशंकर ने मंटुरोव को आयोग की सह-अध्यक्षता के लिए धन्यवाद दिया और चर्चा को उत्पादक बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बैठक उपयोगी रही। भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों में आर्थिक सहयोग को और व्यापक बनाने तथा नई तकनीकी और रणनीतिक जरूरतों के अनुरूप साझेदारी विकसित करने पर दोनों पक्षों का जोर रहा।

  • टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री एस. जयशंकर 23 अगस्त से दो दिन के रूस दौरे पर जा रहे हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और रूस के संबंधों के साथ-साथ भारत के ऊर्जा हित भी अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच चर्चा में हैं। यात्रा के दौरान जयशंकर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करेंगे।

    जयशंकर व्यापार, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति से जुड़े भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता भी करेंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और कारोबारी सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न क्षेत्रों में चल रही साझेदारी की समीक्षा किए जाने की उम्मीद है।

    जयशंकर का रूस दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूस से तेल, गैस और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी के बीच हो रहा है। ऐसे में भारत-रूस ऊर्जा कारोबार इस यात्रा के महत्वपूर्ण संदर्भों में शामिल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और रूस पिछले कुछ समय में उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है।

    यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलाव के बीच भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी थी। हालांकि अमेरिकी दबाव और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच रूसी तेल आयात में बदलाव की स्थिति बनी रही। इसके बाद पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और भारत के लिए रूसी तेल का महत्व फिर बढ़ गया।

    जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक पहुंचने की बात सामने आई। यह आंकड़ा बताता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा में रूसी आपूर्ति कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग और व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत को विशेष महत्व मिल सकता है।

    दौरे का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रक्षा और सैन्य तकनीकी सहयोग है। भारत और रूस लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में साझेदार रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों के अंतर-सरकारी आयोग के सैन्य और सैन्य-तकनीकी सहयोग से जुड़े कार्य समूह की बैठक भी हुई थी। इसमें दोनों पक्षों ने सशस्त्र बलों के बीच सहयोग बढ़ाने और आगामी गतिविधियों की योजना पर चर्चा की थी।

    इस पृष्ठभूमि में जयशंकर की रूस यात्रा दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रक्षा उपकरणों की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और सैन्य साझेदारी से जुड़े विषय भी द्विपक्षीय बातचीत के एजेंडे में रह सकते हैं, हालांकि किसी विशेष नई रक्षा डील की पुष्टि अभी नहीं हुई है।

    भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा और ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश व्यापार, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अंतर-सरकारी आयोग की बैठक इसी व्यापक सहयोग को संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है।

    रूसी नेतृत्व भी हाल के समय में भारत के आर्थिक और तकनीकी विकास की सराहना करता रहा है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा को दोनों देशों के बीच पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। अमेरिकी टैरिफ दबाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत के लिए रूस के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की तीन यूरोपीय देशों की राजकीय यात्रा संपन्न, भारत के कूटनीतिक रिश्तों को मिला नया विस्तार

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की तीन यूरोपीय देशों की राजकीय यात्रा संपन्न, भारत के कूटनीतिक रिश्तों को मिला नया विस्तार

    नई दिल्ली । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु मोल्दोवा, उत्तरी मैसेडोनिया और रोमानिया की अपनी तीन देशों की राजकीय यात्रा सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद रविवार को नई दिल्ली लौट आईं। यह यात्रा भारत और यूरोप के उभरते साझेदार देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विभिन्न स्तरों पर हुई बैठकों और समझौतों ने यह संकेत दिया कि भारत शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को और व्यापक बनाने की दिशा में सक्रिय है।

    यात्रा का अंतिम पड़ाव रोमानिया रहा, जहां राष्ट्रपति मुर्मु का राजधानी बुखारेस्ट में पूरे राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया गया। उन्हें औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया और इसके बाद रोमानिया के राष्ट्रपति निकुसोर डैन के साथ द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विचार साझा किए गए।

    रोमानिया प्रवास के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, खेल सहयोग और उच्च शिक्षा से जुड़े तीन महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन की चेयर स्थापित करने का निर्णय भी शामिल रहा। इसे दोनों देशों के बीच शैक्षणिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। लगभग तीन दशक बाद किसी भारतीय राष्ट्रपति की यह पहली राजकीय यात्रा भी रही, जिससे इस दौरे का महत्व और बढ़ गया।

    रोमानिया से पहले राष्ट्रपति मुर्मु ने उत्तरी मैसेडोनिया का दौरा किया। राजधानी स्कोप्जे में उनका औपचारिक स्वागत किया गया, जहां उन्होंने राष्ट्रपति गोर्दाना सिलजानोव्स्का-दावकोवा और प्रधानमंत्री ह्रिस्टिजान मिकोस्की से अलग-अलग मुलाकात की। दोनों देशों के नेताओं ने आर्थिक सहयोग, शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। दोनों पक्षों ने आपसी विश्वास और साझा हितों के आधार पर दीर्घकालिक सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।

    इस राजकीय यात्रा की शुरुआत मोल्दोवा से हुई, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु इस देश का दौरा करने वाली पहली भारतीय राष्ट्रपति बनीं। राजधानी चिसीनाउ में उन्होंने संसद का दौरा किया और संसदीय मैत्री समूह के सदस्यों के साथ बैठक की। इस दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय सहयोग, आर्थिक साझेदारी और जन-से-जन संपर्क को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया। दोनों देशों ने भविष्य में सहयोग के नए अवसर तलाशने और पारस्परिक हितों पर आधारित संबंधों को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की।

    पूरी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहा, जिसने विभिन्न बैठकों और आधिकारिक कार्यक्रमों में भाग लिया। प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा, कृषि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार और सांस्कृतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में संवाद को आगे बढ़ाने के प्रयास किए। इससे भारत और इन तीनों देशों के बीच संस्थागत सहयोग के नए अवसर विकसित होने की संभावना बढ़ी है।

    यह यात्रा ऐसे समय में संपन्न हुई है जब भारत यूरोप के विभिन्न देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को लगातार विस्तार दे रहा है। मोल्दोवा, उत्तरी मैसेडोनिया और रोमानिया के साथ हुए संवाद तथा समझौते भविष्य में शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति, व्यापार और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग को नई गति देने में सहायक माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह राजकीय यात्रा भारत की संतुलित और सक्रिय विदेश नीति को और मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ यूरोप में उसकी कूटनीतिक उपस्थिति को भी नया आयाम देगी।

  • भारत-ऑस्ट्रेलिया रिश्तों को नई ऊर्जा, प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा में यूरेनियम निर्यात समझौते पर बनी सहमति, रणनीतिक साझेदारी हुई और मजबूत

    भारत-ऑस्ट्रेलिया रिश्तों को नई ऊर्जा, प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा में यूरेनियम निर्यात समझौते पर बनी सहमति, रणनीतिक साझेदारी हुई और मजबूत

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों को नई मजबूती देने वाले कई महत्वपूर्ण फैसलों पर सहमति बनी। दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग, स्वच्छ ऊर्जा, निवेश, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। इस दौरान शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के लिए भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम निर्यात की व्यवस्था की पुष्टि भी की गई, जिसे दोनों देशों के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने प्रधानमंत्री मोदी का औपचारिक स्वागत किया और दोनों नेताओं के बीच उच्चस्तरीय वार्ता हुई। बैठक में ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, स्वच्छ ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, निवेश और व्यापारिक सहयोग जैसे कई विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता और वैश्विक आर्थिक सहयोग पर भी पड़ेगा।

    संयुक्त बयान में दोनों देशों ने वर्ष 2015 के परमाणु सहयोग समझौते के तहत भारत को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम निर्यात की व्यवस्था को आगे बढ़ाने की पुष्टि की। इस निर्णय को भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा आवश्यकताओं और स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही दोनों देशों ने स्वच्छ ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा और भविष्य की ऊर्जा तकनीकों में संयुक्त सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की।

    दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख दोहराते हुए हर प्रकार के आतंकवाद और हिंसक चरमपंथ की कड़ी निंदा की। उन्होंने वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों, उनके समर्थकों, वित्तपोषकों और सहयोगियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। दोनों देशों ने आतंकवाद से जुड़े खतरों, ऑनलाइन कट्टरपंथ, नई तकनीकों के दुरुपयोग, आतंकी वित्तपोषण और समुद्री सुरक्षा जैसे विषयों पर सहयोग बढ़ाने का संकल्प भी व्यक्त किया।

    हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर दोनों नेताओं ने नियम-आधारित व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान की आवश्यकता दोहराई। उन्होंने समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता, हवाई आवाजाही और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के महत्व पर बल देते हुए क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए साझा प्रयास जारी रखने की बात कही।

    यात्रा के दौरान आयोजित भारत-ऑस्ट्रेलिया सीईओ फोरम में दोनों देशों के उद्योगपतियों और निवेशकों ने भी भाग लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ऊर्जा, विनिर्माण, बुनियादी ढांचा और निवेश से जुड़ी योजनाओं को साझा करते हुए ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया। वहीं ऑस्ट्रेलियाई नेतृत्व ने भी व्यापारिक सहयोग बढ़ाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूरेनियम आपूर्ति, स्वच्छ ऊर्जा सहयोग, निवेश और व्यापारिक साझेदारी से दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई गति मिलेगी। साथ ही रक्षा, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच विश्वास और समन्वय पहले की तुलना में अधिक मजबूत होने की संभावना है। यह यात्रा भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को व्यापक और दीर्घकालिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है।

  • भारत और केन्या ने मजबूत आर्थिक सहयोग का खाका तैयार किया, व्यापार, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष फोकस

    भारत और केन्या ने मजबूत आर्थिक सहयोग का खाका तैयार किया, व्यापार, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष फोकस

    नई दिल्ली । भारत और केन्या के बीच आर्थिक, व्यापारिक और विकास सहयोग को नई दिशा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली है। दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच हालिया बैठकों में कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल, ऊर्जा और निवेश जैसे प्रमुख क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाने पर व्यापक चर्चा की गई। इस दौरान भविष्य में सहयोग के नए अवसरों की पहचान करने और निवेश को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।

    भारत और केन्या के बीच लंबे समय से मजबूत राजनयिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। हाल के संवादों में दोनों देशों ने इस संबंध को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। विशेष रूप से कृषि और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्र को सहयोग का प्रमुख आधार माना गया, जहां भारतीय तकनीक, विशेषज्ञता और निवेश के माध्यम से स्थानीय उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

    स्वास्थ्य क्षेत्र भी चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। दोनों पक्षों ने गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, चिकित्सा अवसंरचना के विकास और स्वास्थ्य तकनीकों के आदान-प्रदान की संभावनाओं पर विचार किया। भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र की विशेषज्ञता और दवा उद्योग की वैश्विक पहचान को देखते हुए इस क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं काफी व्यापक मानी जा रही हैं।

    शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने साझेदारी को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की। आधुनिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। दोनों देशों का मानना है कि मानव संसाधन विकास भविष्य की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    खेल क्षेत्र में भी सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। खेल प्रशिक्षण, खेल अवसंरचना और प्रतिभा विकास कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देशों के बीच अनुभवों और संसाधनों के आदान-प्रदान की संभावनाएं तलाशने पर सहमति बनी। इससे युवाओं के लिए नए अवसर तैयार हो सकते हैं और खेल संबंधों को भी मजबूती मिल सकती है।

    इस बीच, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के प्रयास भी जारी हैं। व्यापारिक बैठकों के दौरान बाजार पहुंच को बेहतर बनाने, व्यापारिक बाधाओं को कम करने और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक संबंधों को अधिक संतुलित, विविधतापूर्ण और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए।

    ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल रहा। स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं, तकनीकी सहयोग और निवेश के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इसके अलावा डिजिटल अवसंरचना, फिनटेक, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण और बुनियादी ढांचा विकास जैसे क्षेत्रों को भी भविष्य की साझेदारी के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में देखा जा रहा है।

    दोनों देशों ने व्यापार को सुगम बनाने और संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी सकारात्मक कदम उठाए हैं। सीमा शुल्क और व्यापारिक सूचनाओं के आदान-प्रदान से जुड़े समझौतों को द्विपक्षीय व्यापार की पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और केन्या के बीच बढ़ता सहयोग न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचाएगा, बल्कि अफ्रीका और एशिया के बीच आर्थिक संपर्क को भी नई मजबूती देगा। आने वाले वर्षों में निवेश, व्यापार और विकास साझेदारी के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध और अधिक गहरे होने की संभावना है।

  • वैश्विक नेताओं की शुभकामनाओं पर पीएम मोदी का आभार, भारत-मालदीव समेत कई देशों के साथ संबंध मजबूत करने की दोहराई प्रतिबद्धता

    वैश्विक नेताओं की शुभकामनाओं पर पीएम मोदी का आभार, भारत-मालदीव समेत कई देशों के साथ संबंध मजबूत करने की दोहराई प्रतिबद्धता

    नई दिल्ली । भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें मिल रही शुभकामनाओं का सिलसिला लगातार जारी है। विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर उन्हें बधाई संदेश भेजे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इन संदेशों का जवाब देते हुए वैश्विक साझेदारी, आपसी सहयोग और मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया है।

    प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद का धन्यवाद करते हुए कहा कि भारत और मालदीव के बीच संबंध केवल कूटनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, समृद्धि और सतत विकास को लेकर साझा दृष्टिकोण भी मौजूद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत भविष्य में भी दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।

    भारत और मालदीव के संबंध पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय रणनीतिक महत्व के कारण लगातार चर्चा में रहे हैं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी दोनों देशों के बीच सहयोग और विश्वास को आगे बढ़ाने के संकेत के रूप में देखी जा रही है। हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और विकास को लेकर भारत की नीति में मालदीव महत्वपूर्ण भागीदार माना जाता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने ऑस्ट्रिया के फेडरल चांसलर क्रिश्चन स्टॉकर की शुभकामनाओं का भी आभार व्यक्त किया। उन्होंने हाल में हुई मुलाकातों और संवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और ऑस्ट्रिया के बीच सहयोग के नए अवसरों पर मिलकर काम करने की दिशा में दोनों देश आगे बढ़ेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि द्विपक्षीय संबंधों को और सुदृढ़ करने की संभावनाएं मौजूद हैं।

    फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब को धन्यवाद देते हुए प्रधानमंत्री ने हालिया कूटनीतिक संपर्कों और रायसीना डायलॉग में उनकी भागीदारी को याद किया। उन्होंने कहा कि भारत और फिनलैंड के बीच सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए दोनों देश प्रतिबद्ध हैं। प्रौद्योगिकी, नवाचार और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने भी प्रधानमंत्री मोदी को बधाई देते हुए दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को मजबूत बनाने की इच्छा व्यक्त की। विशेष रूप से मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में जारी प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भविष्य में संबंधों के और विस्तार की उम्मीद जताई। इसे भारत और न्यूजीलैंड के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धि को भारतीय लोकतंत्र में जनता के विश्वास का प्रतीक बताया। उन्होंने भारत के साथ साझेदारी को और मजबूत करने की इच्छा व्यक्त की। वहीं जापान के पूर्व प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने भी प्रधानमंत्री मोदी को लंबे और सफल कार्यकाल के लिए बधाई देते हुए भविष्य में फिर मुलाकात की उम्मीद जताई।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक नेताओं की ओर से मिल रही ये शुभकामनाएं केवल व्यक्तिगत सम्मान का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और प्रभाव को भी दर्शाती हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए जवाबों में भी यही संदेश दिखाई देता है कि भारत आने वाले समय में अपने रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक साझेदारों के साथ सहयोग को और गहरा करने की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ता रहेगा।

  • वैश्विक सहयोग की दिशा में बड़ा कदम: भारत–नीदरलैंड ने बढ़ाई रणनीतिक साझेदारी और किए कई MoU

    वैश्विक सहयोग की दिशा में बड़ा कदम: भारत–नीदरलैंड ने बढ़ाई रणनीतिक साझेदारी और किए कई MoU

    नई दिल्ली । भारत और यूरोप के बीच कूटनीतिक संबंधों में एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है, जब भारत और नीदरलैंड ने अपने द्विपक्षीय रिश्तों को और अधिक मजबूत और संरचनात्मक बनाने की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय लिया। इस उच्च स्तरीय बैठक के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा देने पर सहमति व्यक्त की, जिससे भविष्य में सहयोग के नए आयाम खुलने की उम्मीद जताई जा रही है। इस अवसर पर दोनों पक्षों ने संयुक्त बयान जारी करते हुए व्यापार, रक्षा, तकनीक, शिक्षा, जल प्रबंधन, ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। यह दौरा दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास और आपसी समझ का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है, जिसमें वैश्विक चुनौतियों से मिलकर निपटने की रणनीति भी शामिल है।

    इस बैठक के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन के बीच व्यापक स्तर पर वार्ता हुई, जिसमें दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही नीदरलैंड के शाही परिवार के साथ हुई मुलाकातों ने इस दौरे को और भी विशेष बना दिया, जहां आपसी संबंधों को सांस्कृतिक और कूटनीतिक स्तर पर भी मजबूती देने पर जोर दिया गया। इस बातचीत में दोनों देशों ने स्वीकार किया कि वैश्विक परिस्थितियों में तेजी से बदलाव हो रहा है और ऐसे समय में मजबूत साझेदारी अत्यंत आवश्यक है।

    इस अवसर पर कई महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों और आशय पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए, जिनका दायरा काफी व्यापक रहा। इनमें सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम तकनीक, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष जैसे उभरते क्षेत्रों में सहयोग शामिल है। इसके अलावा रक्षा और सुरक्षा सहयोग को लेकर भी दोनों देशों ने अपनी साझेदारी को मजबूत करने का निर्णय लिया है, जिससे समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों को मजबूती मिलेगी। जल प्रबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने संयुक्त रूप से काम करने की योजना बनाई है, जिसमें ग्रीन हाइड्रोजन और ऊर्जा परिवर्तन जैसे विषय प्रमुख हैं।

    कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में भी सहयोग को एक नई दिशा दी गई है, जिसमें प्रशिक्षण और तकनीकी आदान-प्रदान के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में भी कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों के बीच समझौते हुए हैं, जिससे छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे। इसके साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दोनों देशों ने मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई है, विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान और चिकित्सा नवाचार के क्षेत्र में।

    कुल मिलाकर यह दौरा और उसके दौरान हुए समझौते भारत और नीदरलैंड के बीच संबंधों को एक नई दिशा और गति देने वाले साबित हो सकते हैं। यह साझेदारी न केवल दोनों देशों के लिए बल्कि वैश्विक स्थिरता और विकास के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें सहयोग, नवाचार और साझा जिम्मेदारी की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

  • असम की जीत पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन: सिंगापुर ने सरमा को दी शुभकामनाएं, सहयोग बढ़ाने पर जोर

    असम की जीत पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन: सिंगापुर ने सरमा को दी शुभकामनाएं, सहयोग बढ़ाने पर जोर


    नई दिल्ली । असम में हाल ही में हुए राजनीतिक घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। राज्य में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने जा रहे हिमंता बिस्वा सरमा को सिंगापुर की ओर से बधाई संदेश प्राप्त हुआ है। इस संदेश में न केवल उनकी जीत की सराहना की गई, बल्कि असम के विकास में सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई है। यह घटनाक्रम भारत और सिंगापुर के बीच बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी उजागर करता है।

    सिंगापुर के प्रतिनिधि ने अपने संदेश में कहा कि असम के नए कार्यकाल की शुरुआत राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसमें विकास और प्रगति की गति को और तेज किया जा सकता है। उन्होंने सरमा को शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में असम नई ऊंचाइयों को छुएगा और क्षेत्रीय विकास का एक मजबूत केंद्र बनेगा।

    यह समर्थन केवल औपचारिक बधाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें दीर्घकालिक साझेदारी का स्पष्ट संकेत भी शामिल था। सिंगापुर ने असम को एक भरोसेमंद सहयोगी बताते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच पहले से जारी सहयोग को और अधिक विस्तार दिया जाएगा। खासकर औद्योगिक निवेश, तकनीकी विकास, बुनियादी ढांचे और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

    पिछले कुछ वर्षों में असम और सिंगापुर के बीच संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। राज्य में निवेश आकर्षित करने और आधुनिक उद्योगों को विकसित करने के लिए कई पहल की गई हैं, जिनमें सेमीकंडक्टर निर्माण, हरित ऊर्जा और शहरी विकास जैसे क्षेत्र प्रमुख हैं। इन प्रयासों ने असम को एक उभरते हुए निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करने में मदद की है।

    विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दोनों पक्षों के बीच सहयोग को रणनीतिक माना जा रहा है। असम में विकसित हो रहे औद्योगिक क्षेत्रों और टेक्नोलॉजी आधारित परियोजनाओं में विदेशी भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य और कौशल विकास के क्षेत्रों में भी संयुक्त कार्यक्रमों पर काम आगे बढ़ रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक कूटनीतिक संदेश के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे असम की बढ़ती वैश्विक पहचान का संकेत भी माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निवेश की यह दिशा राज्य की आर्थिक संरचना को नई मजबूती देने में सहायक हो सकती है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में असम अब क्षेत्रीय विकास से आगे बढ़कर वैश्विक साझेदारियों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इस प्रकार के समर्थन संदेश यह दर्शाते हैं कि राज्य अब अंतरराष्ट्रीय निवेश और सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है।

    आने वाले समय में असम और सिंगापुर के बीच सहयोग के और गहरे होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे न केवल आर्थिक विकास को गति मिलेगी बल्कि रोजगार और तकनीकी उन्नति के नए अवसर भी पैदा होंगे।

  • पाकिस्तान के समर्थन में चीन, कहा- व्यापार और निवेश में जारी रहेगा सहयोग

    पाकिस्तान के समर्थन में चीन, कहा- व्यापार और निवेश में जारी रहेगा सहयोग

    इस्लामाबाद। चीन ने एक बार फिर पाकिस्तान के प्रति अपने समर्थन को दोहराया है। पाकिस्तान में चीन के राजदूत जियांग जेदोंग ने गुरुवार को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात कर भरोसा दिलाया कि चीन पाकिस्तान में व्यापार और निवेश के लिए लगातार सहयोग करता रहेगा।
    पाक प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान के अनुसार बैठक में उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। इस दौरान चीनी राजदूत ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता और सुधार प्रयासों की सराहना की।

    प्रधानमंत्री शरीफ ने चीन के निरंतर आर्थिक सहयोग के लिए आभार जताते हुए कहा कि पाकिस्तान, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा के दूसरे चरण को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि इस चरण में कृषि, औद्योगिक सहयोग और प्राथमिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

    बैठक के दौरान जियांग जेदोंग ने व्यापार और निवेश के क्षेत्र में चीन के निरंतर समर्थन की पुष्टि की। दोनों पक्षों ने कूटनीतिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर उच्च स्तरीय संपर्क बढ़ाने की उम्मीद भी जताई।

    प्रधानमंत्री शरीफ ने क्षेत्रीय स्थिति पर चर्चा करते हुए पश्चिम एशिया में तनाव कम करने में पाकिस्तान की भूमिका को रेखांकित किया और आपसी हितों के मुद्दों पर सभी स्तरों पर करीबी समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया।

  • तुर्किए ने तोड़ा पाकिस्तान का इस्लामिक नाटो सपना, द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित रह गया रक्षा समझौता

    तुर्किए ने तोड़ा पाकिस्तान का इस्लामिक नाटो सपना, द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित रह गया रक्षा समझौता

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के करीबी साथी तुर्किए ने इस्लामाबाद की महत्वाकांक्षा,मध्य-पूर्व में इस्लामिक नाटो बनाने की योजना, को झटका दे दिया है। अंकारा ने स्पष्ट किया है कि वह सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ किसी बहुपक्षीय रक्षा गठबंधन में शामिल नहीं होगा। पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया था, और उस समय यह उम्मीद जताई जा रही थी कि इसमें जल्द ही तुर्किए और अजरबैजान जैसे देश भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन तुर्किए ने साफ कर दिया कि फिलहाल सभी चर्चाएँ केवल रणनीतिक और द्विपक्षीय सहयोग तक ही सीमित हैं।

    एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्किए के रक्षा अधिकारी स्पष्ट हैं कि राष्ट्रपति एर्दोगान की सरकार न तो बहुपक्षीय समझौते में शामिल है और न ही इस पर विचार कर रही है। उनका कहना है कि वर्तमान में पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ संबंध केवल रणनीतिक उद्देश्यों तक ही सीमित हैं। सऊदी अरब भी किसी बहुपक्षीय रक्षा ढांचे के पक्ष में नहीं है और केवल द्विपक्षीय समझौतों को ही प्राथमिकता देती है।

    पाकिस्तानी सेना की चुनौतियां
    तुर्किए के सुरक्षा सूत्रों ने पाकिस्तान की सेना की सीमित संसाधन क्षमता पर चिंता व्यक्त की है।

    पाकिस्तान पहले से ही तीन सीमाओं, भारत, अफगानिस्तान और ईरान—पर सक्रिय है और आंतरिक स्तर पर भी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। तुर्किए के अधिकारियों के अनुसार, हाल ही में सऊदी अरब के साथ समझौता पाकिस्तानी सेना को और भी अधिक बंटवारा कर रहा है, जिससे बहुपक्षीय रक्षा जिम्मेदारियों को निभाना कठिन हो जाएगा।

    तकनीकी निर्भरता और आर्थिक सीमाएं
    पाकिस्तान की अधिकांश सैन्य तकनीक चीन पर निर्भर है, विशेष रूप से एयर डिफेंस और एयरफोर्स क्षेत्र में। तुर्किए के अनुसार, पाकिस्तान की एकमात्र प्रमुख रणनीतिक ताकत उसकी परमाणु क्षमता है। इसके अलावा आर्थिक दबाव और सीमित वित्तीय संसाधन भी बहुपक्षीय गठबंधन की संभावना को चुनौती देते हैं।

    तुर्किए ने जोर दिया कि पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय रक्षा सहयोग मजबूत है। अंकारा पहले से ही पाकिस्तान को सैन्य उपकरण, ड्रोन तकनीक और वायु रक्षा प्रणाली उपलब्ध करा रहा है। दोनों देश साझा रणनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और क्षमता निर्माण पर काम कर रहे हैं, लेकिन कोई बहुपक्षीय समझौता नहीं हुआ।

    इस्लामिक नाटो का सपना अधर में
    पाकिस्तान के पीएम और सेना प्रमुख मुनीर ने मध्य-पूर्व में इस्लामिक नाटो बनाने का प्रयास किया था, जिसमें सऊदी अरब के साथ हालिया रक्षा समझौते ने संभावनाओं को बढ़ाया। 30 जनवरी को तुर्किए के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ सेल्चुक बायरक्तारओग्लू की पाकिस्तान यात्रा के दौरान यह प्रचार हुआ कि जल्द ही बहुपक्षीय समझौते की घोषणा होगी। लेकिन यात्रा के बाद केवल द्विपक्षीय रणनीतिक सहयोग पर सहमति बनी, कोई बहुपक्षीय रक्षा गठबंधन नहीं बनाया गया।