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  • बारिश से पहले नगर निगम सख्त इंदौर में उद्यान की जमीन कराई कब्जामुक्त जर्जर भवन भी तोड़ा

    बारिश से पहले नगर निगम सख्त इंदौर में उद्यान की जमीन कराई कब्जामुक्त जर्जर भवन भी तोड़ा


    इंदौर इंदौर में बारिश के मौसम से पहले नगर निगम ने अतिक्रमण और जर्जर भवनों के खिलाफ अभियान तेज कर दिया है। मंगलवार को निगम की टीम ने शहर के दो अलग-अलग इलाकों में कार्रवाई करते हुए एक ओर नगर निगम की बगीचे की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया तो दूसरी ओर लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक जर्जर मकान के खतरनाक हिस्से को हटाया। दोनों स्थानों पर पुलिस बल की मौजूदगी में कार्रवाई शांतिपूर्वक संपन्न हुई।

    पहली कार्रवाई जोन क्रमांक 16 के छोटा बांगड़दा क्षेत्र में की गई। नगर निगम को शिकायत मिली थी कि उद्यान के लिए आरक्षित सरकारी जमीन पर कुछ लोगों ने अवैध कब्जा कर निर्माण कर लिया है। शिकायत की जांच के बाद निगम ने कार्रवाई का निर्णय लिया। मंगलवार सुबह नगर निगम की टीम जेसीबी मशीनों और पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंची और अवैध निर्माण को हटाकर जमीन को कब्जामुक्त कराया।

    रिमूवल अधिकारी अंकेश बिरथरिया ने बताया कि नगर निगम की भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जांच में अतिक्रमण की पुष्टि होने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की गई और सरकारी जमीन को मुक्त कराया गया।

    इसके बाद नगर निगम का अमला छोटी ग्वालटोली इलाके में पहुंचा जहां एक मकान का ऊपरी हिस्सा काफी जर्जर हो चुका था। भवन की स्थिति को देखते हुए उसके गिरने का खतरा बना हुआ था जिससे आसपास रहने वाले लोगों और राहगीरों की सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा रहा था। इसी कारण निगम ने एहतियात के तौर पर भवन के ऊपरी हिस्से में बने दो कमरों और छज्जे को हटाने की कार्रवाई की।

    अधिकारियों ने बताया कि इस स्थान पर मशीनों की बजाय मैन्युअल तरीके से तोड़फोड़ की गई ताकि आसपास की इमारतों और दुकानों को कोई नुकसान न पहुंचे। कार्रवाई शुरू करने से पहले सुरक्षा के मद्देनजर नीचे संचालित दुकानों को अस्थायी रूप से बंद कराया गया और पूरे क्षेत्र को सुरक्षित कर लिया गया।

    नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार दोनों स्थानों पर कार्रवाई के दौरान किसी प्रकार का विरोध सामने नहीं आया। पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से पूरी की गई। निगम का कहना है कि मानसून के दौरान जर्जर भवनों के गिरने और अतिक्रमण से होने वाली समस्याओं को रोकने के लिए शहरभर में लगातार सर्वे किया जा रहा है। जहां भी अवैध कब्जे या खतरनाक भवन चिन्हित किए जा रहे हैं वहां नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है।

    नगर निगम ने नागरिकों से भी अपील की है कि यदि उनके आसपास कोई जर्जर भवन या सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा दिखाई दे तो इसकी सूचना प्रशासन को दें ताकि समय रहते आवश्यक कार्रवाई कर जनहानि और दुर्घटनाओं को रोका जा सके।

  • भ्रष्टाचार का खेल दिव्यांग से भी नहीं छोड़ा 65 हजार लेकर बना दिया गार्ड और अधिकारी बने दर्शक

    भ्रष्टाचार का खेल दिव्यांग से भी नहीं छोड़ा 65 हजार लेकर बना दिया गार्ड और अधिकारी बने दर्शक

    नई दिल्ली । बिहार के मुजफ्फरपुर नगर निगम में सामने आया ताजा मामला सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को उजागर करता है जहां नौकरी देने के नाम पर न सिर्फ भारी भरकम अवैध वसूली की गई बल्कि एक दिव्यांग व्यक्ति तक को नहीं बख्शा गया। आउटसोर्सिंग एजेंसी मेसर्स गोस्वामी सिक्यूरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड पर आरोप है कि उसने गार्ड और सफाईकर्मी की नौकरी दिलाने के बदले लोगों से मोटी रकम वसूली और नियमों को खुली चुनौती देते हुए 65 हजार रुपये लेकर एक दिव्यांग व्यक्ति को गार्ड की नौकरी पर लगा दिया जबकि उसकी शारीरिक स्थिति इस काम के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं थी।

    स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए हो जाती है क्योंकि इस पूरे मामले के दौरान नगर निगम के अधिकारी सब कुछ देखते रहे लेकिन किसी ने भी हस्तक्षेप करने या कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। यह केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का उदाहरण है जहां गरीब और जरूरतमंद लोगों को रोजगार के नाम पर ठगा जा रहा है। एजेंसी ने कर्मचारियों से न केवल नौकरी के लिए पैसे लिए बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया और विरोध करने पर धमकाकर चुप रहने के लिए मजबूर किया।

    वेतन और अन्य सुविधाओं के मामले में भी भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। कर्मचारियों को उनके ईपीएफ और अन्य कटौतियों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई जिससे उनके भविष्य की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इतना ही नहीं हर गार्ड से एक सेट वर्दी के नाम पर 5600 रुपये वसूले गए जबकि बाजार में इसकी वास्तविक कीमत दो से ढाई हजार रुपये के बीच होती है। यह सीधे तौर पर कर्मचारियों के शोषण और धोखाधड़ी का मामला है।

    इस एजेंसी का विवादों से पुराना नाता भी रहा है। लगभग नौ साल पहले भी नगर निगम में ईपीएफ और ईएसआईसी घोटाले में इसका नाम सामने आया था जब कर्मचारियों के खाते में जमा की जाने वाली राशि का भुगतान नहीं किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2014 में सारण जिले में इस एजेंसी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इन तथ्यों को छिपाकर एजेंसी ने लाइसेंस हासिल किया था जिसे बाद में नवंबर 2025 में गृह विभाग द्वारा निरस्त कर दिया गया।

    अब जब यह मामला सामने आया है तो नगर निगम प्रशासन ने जांच और कार्रवाई की बात जरूर कही है लेकिन सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी अनियमितताएं लंबे समय से चल रही थीं तब तक जिम्मेदार अधिकारी चुप क्यों बैठे रहे। क्या यह लापरवाही थी या फिर मिलीभगत इसका जवाब मिलना अभी बाकी है। फिलहाल दो आउटसोर्सिंग एजेंसियों पर वित्तीय अनियमितताओं के चलते कार्रवाई की तलवार लटक रही है और उनसे वेतन भुगतान में देरी सहित अन्य मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

    यह घटना केवल एक शहर या एक एजेंसी तक सीमित नहीं है बल्कि यह देशभर में फैल रही उस व्यवस्था की तस्वीर है जहां आउटसोर्सिंग के नाम पर पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही का अभाव आम लोगों के शोषण का कारण बन रहा है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई भी एजेंसी गरीब और मजबूर लोगों के अधिकारों का इस तरह दुरुपयोग करने की हिम्मत न कर सके।

  • सागर में निगमायुक्त ने जलस्रोतों की गुणवत्ता जांच करवाई कुएं और हैंडपंप का जल पीने योग्य नहीं

    सागर में निगमायुक्त ने जलस्रोतों की गुणवत्ता जांच करवाई कुएं और हैंडपंप का जल पीने योग्य नहीं


    सागर । सागर नगर निगम आयुक्त राजकुमार खत्री ने सोमवार को नगर निगम टाटा प्रोजेक्ट लिमिटेड सीवर प्रोजेक्ट और एमपीयूडीसी के अधिकारियों के साथ नगर के जलस्रोतों की जांच की। इस दौरान वे जवाहरगंज भीतर बाजार स्थित शीतला माता मंदिर के पास पहुंचे जहां पानी की गुणवत्ता की जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि इन जलस्रोतों में बड़ी मात्रा में अम्लीय गंदा पानी मिल चुका था जो पीने के लिए सुरक्षित नहीं है।

    अधिकांश नागरिक इन कुओं और हैंडपंप का पानी पीने के लिए उपयोग कर रहे थे। इसलिए निगमायुक्त ने तत्काल कदम उठाते हुए इन कुओं और हैंडपंपों पर लाल रंग से यह चेतावनी लिखवाने का आदेश दिया कि इस जल का उपयोग न करें यह पीने योग्य नहीं है। निगमायुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जो भी जलस्रोत गुणवत्ता में सही न पाए जाएं उन पर इस तरह की चेतावनी तत्काल लिखवाई जाए। उन्होंने कहा जब तक इन जलस्रोतों का पानी वैज्ञानिक तरीके से टेस्ट न हो जाए तब तक इन्हें पीने योग्य नहीं माना जाएगा।

    स्वास्थ्य सुरक्षा को प्राथमिकता

    राजकुमार खत्री ने स्पष्ट किया कि नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वर्तमान में टाटा प्रोजेक्ट लिमिटेड द्वारा राजघाट जलप्रदाय योजना के तहत प्रत्येक घर तक शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। इस जल की नियमित गुणवत्ता जांच कराई जा रही है और मानकों के अनुरूप पाए जाने पर ही इसकी आपूर्ति की जा रही है।

    नागरिकों से अपील

    नगर निगम आयुक्त ने नागरिकों से अपील की है कि वे तब तक कुओं और हैंडपंप के पानी का उपयोग पेयजल के रूप में न करें जब तक उसकी गुणवत्ता जांच पूरी न हो जाए।

  • जबलपुर में नालियों से गुजर रहीं पेयजल आपूर्ति की लाइनों से बढ़ रही चिंता इंदौर जैसी घटना का खतरा

    जबलपुर में नालियों से गुजर रहीं पेयजल आपूर्ति की लाइनों से बढ़ रही चिंता इंदौर जैसी घटना का खतरा


    जबलपुर । हाल ही में इंदौर में दूषित पानी पीने से हुई 15 लोगों की मौत ने प्रदेशभर में चिंता की लहर दौड़ा दी है और अब जबलपुर के नागरिकों में भी जल आपूर्ति व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। जबलपुर में जल वितरण पाइपलाइनों की हालत बेहद खराब है क्योंकि शहर की करीब 80 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति लाइनें नाली-नालियों के नीचे से होकर गुजर रही हैं।

    इन पाइपलाइनों का निर्माण आमतौर पर 20 साल पहले किया गया था लेकिन कई लाइनें 40 से 50 साल पुरानी हो चुकी हैं। समय के साथ इन पाइपलाइनों में क्षरण हो चुका है और इनसे लगातार नाली के पानी धूल और मिट्टी का संपर्क होता है। इस कारण पाइपलाइनों में लीकेज हो रहा है जिससे गंदगी और दूषित पानी वितरण के दौरान पेयजल में घुलने की संभावना बढ़ गई है।

    इंदौर में हुई घटना के बाद जबलपुर नगर निगम ने इस गंभीर समस्या को लेकर सक्रियता दिखाई और जल विभाग तथा स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीमों का गठन किया। ये टीमें शहर के विभिन्न हिस्सों से पेयजल के सैंपल लेकर उसकी गुणवत्ता जांचने में जुट गईं। हालांकि एक दिन सैंपल लेने के बाद विभागीय टीम की गतिविधियां सुस्त पड़ गईं जिससे इस मुद्दे को लेकर नागरिकों के बीच और भी चिंता बढ़ गई है।

    विभागीय अधिकारियों का कहना है कि शहर में जल वितरण की पाइपलाइनों के रखरखाव और सही तरीके से मरम्मत की आवश्यकता है ताकि पानी की गुणवत्ता पर कोई असर न पड़े। यह समस्या इंदौर जैसी बड़ी घटनाओं को टालने के लिए जल्द सुलझाई जानी चाहिए।नागरिकों ने इस विषय पर नगर निगम और प्रशासन से जल्द ठोस कदम उठाने की अपील की है ताकि भविष्य में दूषित पानी से कोई स्वास्थ्य संकट उत्पन्न न हो।