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  • मध्य प्रदेश में वित्तीय गड़बड़ियों पर बड़ी कार्रवाई, 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में, सात बर्खास्त

    मध्य प्रदेश में वित्तीय गड़बड़ियों पर बड़ी कार्रवाई, 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में, सात बर्खास्त


    मध्य प्रदेश: में नगरीय निकायों के भीतर वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही के मामलों में अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के मुताबिक, अब तक विभिन्न स्तरों के 392 अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई हो चुकी है। इनमें करीब 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी यानी सीएमओ स्तर के अधिकारी शामिल हैं। कार्रवाई के तहत सात अधिकारियों-कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है। संबंधित मामलों में लगभग 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली भी की गई है।

    विभाग के अनुसार, नगरीय निकायों में सामने आई वित्तीय गड़बड़ियों को गंभीरता से लेते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अलग-अलग स्तर पर कदम उठाए गए हैं। जांच में अनियमितता या लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से वसूली के साथ वेतन वृद्धि रोकने, पदावनति और बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई की गई है। कार्रवाई का स्वरूप मामले की गंभीरता और जिम्मेदारी के स्तर के आधार पर तय किया गया।

    अधिकारियों के अलावा गलत दरों पर सामान उपलब्ध कराने वाले 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायर्स के खिलाफ भी कदम उठाए गए हैं। विभाग का कहना है कि सरकारी खरीद और खर्च में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अनियमितताओं पर निगरानी की जा रही है। वित्तीय गड़बड़ियों से जुड़े मामलों में जिम्मेदारी तय करने और सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकने पर जोर दिया जा रहा है।

    नगरीय प्रशासन विभाग निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का भी इस्तेमाल कर रहा है। इसका उद्देश्य वित्तीय अनियमितताओं की पहचान करना, सरकारी खर्च पर नजर रखना और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में जवाबदेही बढ़ाना है। तकनीक की मदद से विभाग सरकारी संसाधनों के उपयोग की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

    विभाग के मुताबिक, सरकारी धन का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से होना और योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचना प्राथमिकता है। नगरीय निकाय नागरिकों को स्थानीय स्तर पर कई जरूरी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में वित्तीय प्रबंधन में अनियमितता और प्रशासनिक लापरवाही का असर सरकारी कामकाज तथा नागरिक सुविधाओं पर पड़ सकता है। इसी कारण विभाग ने जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया जारी रखने की बात कही है।

    मध्य प्रदेश सरकार सुशासन, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रही है। विभाग का कहना है कि नागरिक सेवाओं को बेहतर बनाने, जनसमस्याओं का समय पर समाधान करने और सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।

    संजय दुबे के अनुसार, नगरीय निकायों में वित्तीय अनियमितताओं और लापरवाही के मामलों में कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी। विभाग का लक्ष्य सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को रोकना, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करना और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। अब तक की कार्रवाई में 392 अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ कदम उठाए गए हैं, सात लोगों को बर्खास्त किया गया है और संबंधित मामलों में करोड़ों रुपये की वसूली की गई है।

  • महंगाई, महंगे किराए और भ्रष्टाचार के खिलाफ यूरोप में उग्र प्रदर्शन, फ्रांस से बाल्कन तक बढ़ा जनाक्रोश

    महंगाई, महंगे किराए और भ्रष्टाचार के खिलाफ यूरोप में उग्र प्रदर्शन, फ्रांस से बाल्कन तक बढ़ा जनाक्रोश


    नई दिल्ली ।
    यूरोप के कई देशों में बढ़ती महंगाई, महंगे आवास, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश तेज हो गया है। फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल और बाल्कन क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में लोग सड़कों पर उतरकर सरकारों की नीतियों के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। कई स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक झड़पों, तोड़फोड़ और आगजनी में बदल गए हैं। युवाओं, छात्रों और कामगारों की भागीदारी ने इन आंदोलनों को व्यापक रूप दे दिया है।

    फ्रांस में आंदोलन की शुरुआत माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों और शैक्षणिक संसाधनों की कमी के विरोध से हुई। छात्र तीन सप्ताह से अधिक समय तक स्कूलों की नाकेबंदी कर रहे थे। बाद में श्रमिक संगठन सीजीटी और आम नागरिक भी इसमें शामिल हो गए। इसके बाद प्रदर्शन महंगाई और पेंशन नीतियों के विरोध तक फैल गया। पेरिस, मार्सिले, ल्योन और बोर्डो में झड़पों तथा लूटपाट की घटनाएं हुईं। लिमोज में 19वीं सदी के ऐतिहासिक सिटी हॉल को आग लगाए जाने से भारी नुकसान हुआ। देशभर में अब तक 2,400 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि गणराज्य और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से नुकसान की भरपाई कराई जाएगी।

    इटली में महंगाई और घटती क्रय शक्ति के खिलाफ ‘इटालिया इन पियाजा’ आंदोलन के तहत हजारों लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। मिलान, ट्यूरिन और बोलोन्या में निकाले गए मार्च के दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा भड़क गई। दुकानों में लूटपाट और वाहनों में आग लगाने की घटनाएं हुईं, जबकि सुरक्षा बलों के 14 जवान घायल हो गए। मिलान में दो दिनों के दौरान 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें अधिकांश नाबालिग बताए गए हैं। प्रदर्शनकारी रोजगार की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिक बजट की मांग कर रहे हैं।

    स्पेन और पुर्तगाल में आवास संकट विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख कारण बन गया है। स्पेन में न्यूनतम मासिक वेतन 1,221 यूरो बताया गया है, जबकि 80 वर्ग मीटर के सामान्य अपार्टमेंट का औसत किराया 1,130 यूरो तक पहुंच गया है। इस अंतर के कारण कई लोगों के लिए भोजन, परिवहन और अन्य जरूरतों पर खर्च करना मुश्किल हो रहा है। बार्सिलोना और मैड्रिड के पुएर्ता डेल सोल चौक पर प्रदर्शनकारियों ने कई सप्ताह से तंबू लगा रखे हैं। 87 वर्षीय मारिकारमेन को घर से बेदखल किए जाने और बाद में अस्पताल में उनकी मृत्यु की घटना ने भी आक्रोश बढ़ाया है। मैड्रिड में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों ने वेतन वृद्धि की मांग पर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की है। लिस्बन और पोर्टो में भी विरोध जारी है।

    बाल्कन क्षेत्र में अल्बानिया और सर्बिया में सरकारों के खिलाफ असंतोष प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। अल्बानिया की राजधानी तिराना में लगातार छठे दिन विरोध प्रदर्शन हिंसक रहे। छात्रों और युवाओं के ‘फ्लेमिंगो’ आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्रालय के बाहर बैरिकेड्स में आग लगाई और प्रधानमंत्री एदि रामा के इस्तीफे की मांग की। रामा ने आरोप लगाया कि अति-वामपंथी एंटीफा समूह प्रदर्शनकारियों को भड़का रहे हैं। सर्बिया में विश्वविद्यालय के छात्र पिछले दो वर्षों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। वे 25 अक्टूबर 2026 को होने वाले आम चुनावों से पहले राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक की सत्ता में वापसी की संभावनाओं को चुनौती दे रहे हैं।

    इन घटनाओं ने यूरोप में राजनीतिक अस्थिरता और आगामी चुनावों को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। कई देशों में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दल आर्थिक असंतोष को राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराते हुए सीमाएं पूरी तरह बंद करने की मांग की है। हालांकि, फ्रांस के स्थानीय प्रशासन ने विरोध के पीछे आम नागरिकों की आर्थिक परेशानियों और जीवन स्तर में गिरावट को प्रमुख कारण बताया है। महंगाई, आवास और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी समस्याओं पर सरकारें कितनी प्रभावी राहत देती हैं, इसका असर आने वाले महीनों में यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है।

  • मध्य प्रदेश में दो साल में 32 पटवारी रिश्वत लेते पकड़े गए, इंदौर-उज्जैन संभाग में जमीन संबंधी मामलों में कार्रवाई

    मध्य प्रदेश में दो साल में 32 पटवारी रिश्वत लेते पकड़े गए, इंदौर-उज्जैन संभाग में जमीन संबंधी मामलों में कार्रवाई


    मध्य प्रदेश:
    में जमीन से जुड़े कामकाज में रिश्वतखोरी के मामलों और स्वामित्व योजना के तहत मुफ्त रजिस्ट्री कराने में आ रही दिक्कतों को लेकर प्रशासन के सामने चुनौती बनी हुई है। पिछले दो वर्षों में इंदौर और उज्जैन संभाग के 16 जिलों में 32 पटवारी रिश्वत लेते हुए पकड़े गए हैं। इन मामलों में जमीन का नामांतरण, सीमांकन, ऋण पुस्तिका तैयार करने और सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने जैसे काम शामिल हैं। दूसरी ओर, स्वामित्व योजना के तहत शिविर लगाकर मुफ्त रजिस्ट्री कराने के निर्देशों पर भी पटवारियों की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।

    स्वामित्व योजना के अंतर्गत मुफ्त रजिस्ट्री कराने को लेकर पटवारियों की अनिच्छा प्रशासन के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। संबंधित पटवारियों का कहना है कि रजिस्ट्री की प्रक्रिया में यदि कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो उनकी नौकरी पर भी संकट आ सकता है। उन्हें आशंका है कि भविष्य में जिले के अधिकारियों के बदलने पर उन्हें किसी तरह का संरक्षण नहीं मिलेगा। इसी वजह से वे इस काम को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं और निर्देशों के बावजूद प्रक्रिया में शामिल होने से बच रहे हैं।

    इस स्थिति को लेकर जिलों के कलेक्टर कई बार पटवारियों को फटकार लगा चुके हैं। उन्हें काम में सहयोग नहीं करने पर नौकरी से बर्खास्त करने की चेतावनी भी दी गई है। प्रदेश के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने भी कलेक्टरों के सामने इस मामले पर नाराजगी जाहिर की है। इसके बावजूद पटवारियों के रवैये में बदलाव नहीं आने की बात सामने आई है। प्रशासन की ओर से निर्देश दिए जाने के बाद भी योजना के तहत मुफ्त रजिस्ट्री कराने की प्रक्रिया में बाधाएं बनी हुई हैं।

    इसी बीच लोकायुक्त की कार्रवाई ने जमीन से जुड़े कामों में रिश्वत मांगने के मामलों को सामने रखा है। पिछले दो साल में इंदौर और उज्जैन संभाग के 16 जिलों में 32 पटवारी रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े गए। इन मामलों में रिश्वत की रकम दो हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक बताई गई। अलग-अलग मामलों में पटवारियों पर जमीन का नामांतरण करने, ऋण पुस्तिका बनवाने और सरकारी अभिलेखों में नाम दर्ज करने के बदले पैसे मांगने के आरोप सामने आए। सभी मामले जमीन से संबंधित कामकाज से जुड़े थे।

    इंदौर संभाग में अकेले 15 मामले दर्ज किए गए। लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. राजेश सहाय के अनुसार, इन मामलों में शिकायत करने वाले लोग गरीब किसान और आदिवासी थे। उनसे जमीन का बंटान कराने, सीमांकन करवाने, ऋण पुस्तिका बनवाने और सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने के बदले रिश्वत मांगी गई थी। शिकायत मिलने के बाद संबंधित मामलों की जांच और सत्यापन किया गया। इसके बाद कार्रवाई करते हुए आरोपित पटवारियों को पकड़ा गया।

    कुछ मामलों में रिश्वत की रकम और काम की प्रकृति भी सामने आई। 29 सितंबर को पटवारी खूबसिंह धारवे और कुलदीप यादव को दो लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने का मामला सामने आया। आरोप के मुताबिक, वे पट्टेदारों को रजिस्ट्री कराने से मना कर रहे थे और किसान का नामांतरण करने के लिए दो लाख रुपये मांग रहे थे। पैसे के बिना काम नहीं करने पर किसान ने शिकायत की थी।

    एक अन्य मामले में पटवारी दिनेश जगताप ने 450 वर्ग फीट के प्लॉट का नामांतरण करने के लिए तीन हजार रुपये मांगे थे। कार्रवाई के बाद उसे पकड़ा गया। अदालत से सजा मिलने पर उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। वहीं पटवारी कला भट्ट पर जमीन के कांकड़ का सीमांकन करने के लिए किसान से दस हजार रुपये मांगने का आरोप लगा। किसान के पैसे देने से इनकार करने पर काम रोक दिया गया था। बाद में लोकायुक्त की कार्रवाई में उसे दस हजार रुपये लेते हुए पकड़ा गया।

  • मध्य प्रदेश में एक करोड़ रुपये के कथित शराब रिश्वत मामले में घिरे डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा के ओएसडी दीपम रायचूरा पद से हटाए गए

    मध्य प्रदेश में एक करोड़ रुपये के कथित शराब रिश्वत मामले में घिरे डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा के ओएसडी दीपम रायचूरा पद से हटाए गए

    मध्य प्रदेश। के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने अपने विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) दीपम रायचूरा को पद से हटा दिया है। रायचूरा पर वर्ष 2024-25 में शराब ठेके दिलाने के बदले एक करोड़ रुपये की कथित रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं। मामला सामने आने के बाद देवड़ा ने संबंधित वाणिज्यिक कर विभाग को जल्द जांच करने के निर्देश दिए हैं। आरोपों का आधार करीब 930 करोड़ रुपये की ठगी के मामले में आरोपी मोहित गोगिया का कथित बयान बताया जा रहा है। हालांकि, इस बयान में किए गए दावों की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। रायचूरा ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को गलत और मनगढ़ंत बताया है।

    उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने इस मामले में कहा कि दीपम रायचूरा वर्तमान में उनके ओएसडी हैं, लेकिन वर्ष 2024-25 में वे भोपाल में सहायक आबकारी अधिकारी के पद पर तैनात थे। उस समय रायचूरा उनके ओएसडी नहीं थे। देवड़ा के अनुसार, शराब ठेकों में कथित गड़बड़ियों की जानकारी उन्हें अखबारों के माध्यम से मिली। इसके बाद उन्होंने संबंधित विभाग को मामले की जल्द जांच करने के निर्देश दिए और रायचूरा को ओएसडी के पद से हटा दिया। अब मामले में विभागीय जांच के जरिए आरोपों की पड़ताल की जानी है।

    मोहित गोगिया के नाम से सामने आए कथित बयान में भोपाल के टीटी नगर क्षेत्र की दो शराब दुकानों का उल्लेख है। आरोप है कि वर्ष 2024-25 में इन दुकानों के ठेके दिलाने के बदले कुल एक करोड़ रुपये लिए गए। कथित बयान के मुताबिक, इसमें 50 लाख रुपये नकद और बाकी 50 लाख रुपये बैंक खाते के माध्यम से दिए जाने की बात कही गई है। इसके अलावा शराब ठेकों के लिए आवश्यक बैंक गारंटी से संबंधित फर्जी सावधि जमा रसीद यानी एफडीआर के इस्तेमाल का भी दावा किया गया है। आरोपों में फर्जी एफडीआर को मंजूरी दिलाने में मदद करने और बिना लाइसेंस शराब उपलब्ध कराने में सहयोग की बात भी शामिल है। कथित बयान में बिचौलियों की भूमिका और एक मोबाइल नंबर पर बातचीत होने का दावा भी किया गया है। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में सत्यापित कॉल रिकॉर्ड या चैट की जानकारी उपलब्ध नहीं है और दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी सामने नहीं आई है।

    दीपम रायचूरा ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि मोहित गोगिया से उनका नाम जोड़कर जो बातें कही जा रही हैं, वे पूरी तरह मनगढ़ंत हैं। रायचूरा के मुताबिक, भोपाल में सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर रहते हुए गोगिया से लाइसेंसधारी के तौर पर मुलाकात हुई होगी, लेकिन उन्होंने उससे किसी अन्य संबंध की बात स्वीकार नहीं की है। उन्होंने रिश्वत लेने के आरोपों को भी झूठा बताया है। ऐसे में मामले में एक ओर कथित बयान के आधार पर आरोप लगाए गए हैं, जबकि दूसरी ओर रायचूरा ने उन्हें गलत बताते हुए अपना पक्ष रखा है।

    इस मामले में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। पटवारी ने मामले की जांच के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग रखी है। उनकी मांगों में शराब ठेकों के आवंटन, बैंक एफडीआर और कथित लेन-देन की जांच शामिल है। उन्होंने 50-50 लाख रुपये के बताए गए भुगतानों और संबंधित बैंक खातों की पड़ताल के साथ जांच के लिए समय-सीमा निर्धारित करने की मांग भी की है। पटवारी ने जांच और कार्रवाई की जानकारी जनता के सामने रखने तथा आरोप सिद्ध होने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। ये कांग्रेस की ओर से रखी गई मांगें हैं, सरकार का घोषित निर्णय नहीं।

    फिलहाल वाणिज्यिक कर विभाग को जांच के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी में जांच पूरी करने की निश्चित समय-सीमा या विस्तृत जांच प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है। कथित बयान में किए गए दावों की सत्यता, बैंक लेन-देन और एफडीआर से जुड़े आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। एसआईटी गठित करने की मांग पर सरकार का निर्णय भी सामने नहीं आया है। ओएसडी को पद से हटाने की कार्रवाई हो चुकी है, जबकि आरोपों की वास्तविकता और आगे की संभावित कानूनी कार्रवाई जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी।

  • पंजाब सरकार ने सीबीआई जांच के हाईकोर्ट आदेश को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, चुनाव से पहले राजनीतिक प्रेरणा का लगाया आरोप

    पंजाब सरकार ने सीबीआई जांच के हाईकोर्ट आदेश को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, चुनाव से पहले राजनीतिक प्रेरणा का लगाया आरोप

    नई दिल्ली । पंजाब की भगवंत मान सरकार ने पंजाब हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार, धांधली और लेनदेन के मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया गया था। यह मामला प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पंजाब के पुलिस महानिदेशक को भेजी गई चिट्ठी और उसमें लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। मामले में मुख्यमंत्री भगवंत मान के ओएसडी राजबीर सिंह घुमन और उनके सहयोगियों नितिन गोहल तथा बीर देविंदर के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं। हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जरूरत बताई थी और पंजाब पुलिस के रवैये से संतुष्ट नहीं होने के बाद जांच सीबीआई को सौंप दी थी।

    पंजाब सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि कुछ दिनों में इस मामले पर विचार किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से कहा गया कि पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और चुनाव से पहले लगाए जा रहे ऐसे आरोप राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं। विकास सिंह ने कहा कि ये आरोप राज्य में अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग से संबंधित हैं और चुनाव से पहले ऐसे मामले गढ़े जा रहे हैं। सरकार ने हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश को इसी आधार पर चुनौती दी है।

    मामले की शुरुआत ईडी की गोपनीय जांच से जुड़ी है। ईडी ने अपनी जांच के दौरान आरोपों से संबंधित सामग्री जुटाई थी। इसमें अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग करवाने, सरकारी नीतियों और मंजूरियों को प्रभावित करने, निविदाओं तथा अन्य सरकारी कामों में कथित आर्थिक लेनदेन से जुड़े आरोपों का उल्लेख था। ईडी ने 30 जुलाई 2026 को यह सामग्री पंजाब के पुलिस महानिदेशक को भेजी थी और मामले में केस दर्ज करने का अनुरोध किया था। इसके बाद इस मामले को लेकर जांच और कार्रवाई का मुद्दा अदालत तक पहुंचा।

    पंजाब हाईकोर्ट ने अधिवक्ता निखिल सराफ की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सीएमओ से जुड़े लोगों पर लगाए गए कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने ईडी की ओर से पंजाब डीजीपी को भेजे गए पत्रों के आधार पर सीबीआई को केस दर्ज करने के निर्देश दिए। अदालत ने संबंधित जांच एजेंसी को दो महीने के भीतर जांच रिपोर्ट दाखिल करने के लिए भी कहा था। हाईकोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ अब पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

    मामले में सरकार का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पहले अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग से जुड़े आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित तरीके से उठाया जा रहा है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए इस मामले पर जल्द सुनवाई की मांग की है। दूसरी ओर, हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की आवश्यकता को देखते हुए सीबीआई को जांच सौंपने का फैसला किया था। अदालत ने जांच को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने के लिए दो महीने में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश भी दिया था।

    अब सुप्रीम कोर्ट में पंजाब सरकार की चुनौती पर सुनवाई के बाद मामले की आगे की दिशा तय होगी। इस मामले में ईडी की ओर से जुटाई गई सामग्री में ट्रांसफर-पोस्टिंग, सरकारी नीतियों और मंजूरियों को प्रभावित करने, निविदाओं तथा अन्य सरकारी कार्यों में कथित आर्थिक लेनदेन से जुड़े आरोप शामिल हैं। पंजाब सरकार ने इन आरोपों और जांच की प्रक्रिया को विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। हाईकोर्ट पहले ही सीबीआई को केस दर्ज कर जांच करने और निर्धारित समय में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दे चुका है।

  • तृषा कृष्णन पर टिप्पणी को लेकर सीएम विजय का DMK पर हमला, मदुरंतकम उपचुनाव में भ्रष्टाचार पर भी साधा निशाना

    तृषा कृष्णन पर टिप्पणी को लेकर सीएम विजय का DMK पर हमला, मदुरंतकम उपचुनाव में भ्रष्टाचार पर भी साधा निशाना


    नई दिल्ली ।
    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने मदुरंतकम विधानसभा उपचुनाव के प्रचार के दौरान डीएमके पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। तृषा कृष्णन से जुड़ी विवादित टिप्पणी के संदर्भ में उन्होंने डीएमके नेताओं पर निशाना साधते हुए पार्टी को चुनावी मुकाबले में अपनी मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताया। इस दौरान उन्होंने एमके स्टालिन के लिए ‘स्वीट अंकल’ शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि राजनीतिक लड़ाई उनकी पार्टी टीवीके और डीएमके के बीच है।

    मदुरंतकम में होने वाला विधानसभा उपचुनाव 6 अक्टूबर को प्रस्तावित है। इस सीट से मारगाथम कुमारवेल को टीवीके ने उम्मीदवार बनाया है। वह इससे पहले एआईएडीएमके के टिकट पर विधायक चुनी गई थीं, लेकिन बाद में विधायक पद से इस्तीफा देकर टीवीके में शामिल हो गईं। इसी घटनाक्रम के बाद मदुरंतकम सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनी है।

    प्रचार के दौरान विजय ने आरोप लगाया कि डीएमके के नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की थीं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का काम जनता की सेवा करना है और सरकार को चुनावी वादों तथा कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार से जुड़े लोगों को नहीं छोड़ेगी।

    विजय ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर डीएमके को घेरते हुए कहा कि जब वह विधानसभा में भ्रष्टाचार के बारे में बात करते हैं तो विपक्ष उनसे सबूत मांगता है। उनके मुताबिक, भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाए जाने पर उन्हें विधानसभा में बोलने से रोकने और बदनाम करने की कोशिश की जाती है। उन्होंने पुराने मामलों का उल्लेख किए जाने पर डीएमके की आपत्ति का भी जिक्र किया।

    मुख्यमंत्री ने चुनावी मुकाबले को दो राजनीतिक ताकतों के बीच बताया। उन्होंने अपनी पार्टी टीवीके को ‘अच्छी ताकत’ और डीएमके को ‘बुरी ताकत’ के रूप में पेश किया। यह उनके चुनावी भाषण का राजनीतिक दावा था, जबकि उपचुनाव में कई दल अपने-अपने उम्मीदवारों के साथ मैदान में हैं।

    विजय ने एआईएडीएमके पर भी टिप्पणी करते हुए दावा किया कि वह अब डीएमके की एक शाखा जैसी हो गई है। उन्होंने कहा कि डीएमके के लिए उनका विरोध नया नहीं है और इसकी तुलना उन्होंने एमजीआर तथा जयललिता के दौर की राजनीतिक लड़ाई से की।

    तृषा कृष्णन से जुड़े विवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने डीएमके के नेताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया। इससे पहले इस मामले को लेकर टीवीके कार्यकर्ताओं और महिला विंग की ओर से शिकायत किए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि इस पूरे विवाद में लगाए गए आरोपों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

    विजय सरकार द्वारा 24 अगस्त को परंदूर एयरपोर्ट परियोजना को रद्द किए जाने का मुद्दा भी उनके भाषण में सामने आया। सरकार ने इस फैसले के पीछे कृषि भूमि, किसानों की आजीविका और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को आधार बताया था। परियोजना रद्द किए जाने के बाद डीएमके और सरकार के बीच राजनीतिक टकराव भी सामने आया।

    मदुरंतकम उपचुनाव के बीच विजय का यह अभियान टीवीके और डीएमके के बीच बढ़ती राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की ओर से चुनावी मुद्दों और सरकार के कामकाज को लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज होने की संभावना है।

  • अंत्येष्टि सहायता के 23 फर्जी प्रकरणों में 50.25 लाख का गबन, सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन न्यूनतम

    अंत्येष्टि सहायता के 23 फर्जी प्रकरणों में 50.25 लाख का गबन, सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन न्यूनतम

    मध्य प्रदेश: सरकार ने शासकीय धन के गबन और भ्रष्टाचार से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों के खिलाफ पेंशन संबंधी कड़ी कार्रवाई की है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े मामले में तत्कालीन पंचायत समन्वय अधिकारी की पेंशन न्यूनतम करते हुए 7,750 रुपये प्रतिमाह कर दी गई है। वहीं, जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत पदस्थ रहीं एक प्राचार्य की देय पेंशन स्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया गया है।

    पहले मामले में जनपद पंचायत छिन्दवाड़ा में तत्कालीन पंचायत समन्वय अधिकारी के पद पर पदस्थ रहे सुनील कुमार अंधवान के खिलाफ अंत्येष्टि और अनुग्रह सहायता से संबंधित अनियमितताओं की जांच की गई थी। जांच में उनके द्वारा 23 फर्जी प्रकरण तैयार किए जाने और इनके माध्यम से 50.25 लाख रुपये के शासकीय धन के गबन का आरोप सही पाया गया।

    प्रकरण में कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार ने सुनील कुमार अंधवान को दंडित किया है। उनकी पेंशन राशि को न्यूनतम स्तर पर निर्धारित करते हुए अब 7,750 रुपये कर दिया गया है। अंधवान 30 जून 2025 को शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी मामले में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उनके खिलाफ पेंशन नियमों के तहत कार्रवाई की गई।

    अंत्येष्टि और अनुग्रह सहायता जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक मदद उपलब्ध कराने से जुड़ी सरकारी व्यवस्था है। ऐसे मामलों में फर्जी प्रकरण तैयार कर शासकीय राशि का इस्तेमाल किए जाने को गंभीर वित्तीय अनियमितता माना गया है। इसी आधार पर सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन पर दंडात्मक कार्रवाई की गई।

    दूसरे मामले में जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत झाबुआ जिले के पेटलावद तहसील स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झकनावदा में प्राचार्य और प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी के पद पर रहीं शकुंतला शंखवार की देय पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई है।

    शकुंतला शंखवार के खिलाफ लोकायुक्त विशेष पुलिस स्थापना इंदौर से जुड़े एक आपराधिक प्रकरण में विशेष न्यायालय झाबुआ ने 4 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया था। न्यायालय ने उन्हें अलग-अलग मामलों में चार-चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही उन पर पांच-पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया था।

    न्यायालय से सजा मिलने के बाद राज्य सरकार ने पेंशन संबंधी प्रावधानों के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की। इसके परिणामस्वरूप उनकी देय पेंशन को स्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया गया।

    दोनों मामलों में सरकार की कार्रवाई से स्पष्ट है कि शासकीय सेवा के दौरान वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सेवानिवृत्ति के बाद भी पेंशन संबंधी प्रावधानों के तहत दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। एक मामले में सरकारी धन के गबन से जुड़े आरोप सही पाए जाने के बाद पेंशन न्यूनतम की गई, जबकि दूसरे मामले में न्यायालय से दोषसिद्धि के बाद पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई।

  • गत वर्ष सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार की 70 हजार शिकायतें… बैंक-रेलवे सबसे आगे: CVC

    गत वर्ष सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार की 70 हजार शिकायतें… बैंक-रेलवे सबसे आगे: CVC


    नई दिल्ली।
    केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) (Central Vigilance Commission – CVC) की वार्षिक रिपोर्ट 2025 (Report 2025) के अनुसार, पिछले साल सरकारी विभागों के खिलाफ कुल 70,584 भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं। शिकायतों के मामले में बैंक और रेलवे (Banks and Railways) शीर्ष पर रहे। मुख्य सतर्कता अधिकारियों (सीवीओ) ने इनमें से 64,905 शिकायतों का निपटारा 31 दिसंबर 2025 तक कर दिया था।

    रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक 5,679 शिकायतें प्रक्रिया में थीं। इनमें से 2,002 मामले तीन महीने से अधिक समय से लंबित थे। नियमों के तहत, सीवीओ को तीन महीने के अंदर जांच पूरी करनी होती है। आयोग इनकी त्वरित निपटारे के लिए नियमित समीक्षा करता है। सर्वाधिक 9,933 शिकायतें बैंकों से मिलीं, जिनमें 9,520 निस्तारित कर दी गईं। वहीं रेलवे से जुड़ी 9,381 शिकायतें दर्ज हुईं, 8,754 को निस्तारित किया गया है।

    आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की 6,531 शिकायतें हैं। स्थानीय निकाय (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार यानी जीएनसीटीडी को छोड़कर) में 4,834 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इसमें दिल्ली जल बोर्ड, एमसीडी, एनडीएमसी और डीएसआईआईडीसी शामिल हैं।

    इन विभागों में शिकायतें
    मानव संसाधन विकास में 2,030, श्रम मंत्रालय में 1,894 बीमा कंपनियां की 1,536 दूरसंचार की 1,469, रक्षा मंत्रालय में 1,410, उपभोक्ता मामले में 1,123, इस्पात मंत्रालय में 1,023 और डाक विभाग में 1,003 शिकायतें दर्ज की गईं हैं।

  • खंडवा कलेक्ट्रेट में डॉग मास्क पहनकर प्रदर्शन करने वाले युवक को सता रहा अपनी जान का खतरा

    खंडवा कलेक्ट्रेट में डॉग मास्क पहनकर प्रदर्शन करने वाले युवक को सता रहा अपनी जान का खतरा

    मध्य प्रदेश: के खंडवा जिले में नगर निगम द्वारा संचालित श्वान बधियाकरण कार्यक्रम में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर अनोखा प्रदर्शन करने वाले एक युवक ने अब अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित जनसुनवाई के दौरान डॉग मास्क पहनकर पहुंचे इस युवक का वीडियो इंटरनेट और सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुआ था। प्रदर्शन के इस चर्चित तरीके के बाद अब पीड़ित युवक अपनी और अपने परिवार की जान को खतरा होने की बात कह रहा है।

    पूरा मामला खंडवा नगर निगम में कथित तौर पर हुए लाखों रुपये के भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा है। आरोप है कि श्वान बधियाकरण केंद्र के संचालन और आवारा कुत्तों की नसबंदी प्रक्रिया में भारी वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। इसी मुद्दे की ओर प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए विपक्षी जनप्रतिनिधि उस युवक को कलेक्ट्रेट में अधिकारियों की टेबल तक ले गए थे। हालांकि इस मामले पर नगर निगम प्रशासन ने अपना स्पष्टीकरण जारी करते हुए सभी आरोपों को खारिज किया है और ई-टेंडरिंग के जरिए पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होने का दावा किया है।

    प्रदर्शन के बाद से युवक इस कदर भयभीत है कि वह अपना चेहरा और पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहता। युवक का मानना है कि जिन लोगों के खिलाफ यह आवाज उठाई गई है, वे उसे या उसके परिवार को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि उसे इस बात का भरोसा भी है कि इस अनोखे कदम के बाद संबंधित अधिकारियों द्वारा मामले का संज्ञान लिया जाएगा, निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ उचित दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

    इस अनूठे प्रदर्शन को लेकर स्थानीय राजनीति भी गरमा गई है। सत्ता पक्ष ने इसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का जरिया करार दिया है, जबकि अन्य जनप्रतिनिधियों ने इसे आधुनिक दौर यानी ‘जेन-जी’ शैली का विरोध प्रदर्शन बताते हुए इसका बचाव किया है। राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह मामला पूरे देश में चर्चा और बहस का केंद्र बन गया है, जिसमें आवारा कुत्तों की समस्या और पशु अधिकारों को लेकर लोग अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

    स्वास्थ्य विभाग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार जिले में आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। खंडवा के शासकीय अस्पताल के रेबीज नियंत्रण विभाग के मुताबिक बीते महीनों में सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं, हालांकि सरकारी रेबीज नियंत्रण कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन के चलते पिछले कुछ वर्षों में किसी भी मरीज की जान जाने की खबर नहीं है और पीड़ितों को समय पर इलाज उपलब्ध कराया गया है।

    खंडवा में हुए इस घटनाक्रम ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नागरिकों की सुरक्षा के सवाल को एक बार फिर सामने ला खड़ा किया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने और प्रदर्शनकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है।

  • मध्य प्रदेश में सिंहस्थ परियोजनाओं की लेटलतीफी पर शिकायतें तेज, MPIDC की कार्यप्रणाली को लेकर उठे गंभीर सवाल

    मध्य प्रदेश में सिंहस्थ परियोजनाओं की लेटलतीफी पर शिकायतें तेज, MPIDC की कार्यप्रणाली को लेकर उठे गंभीर सवाल

    मध्य प्रदेश: में वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ की तैयारियों के बीच उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी विकास परियोजनाओं में कथित प्रशासनिक देरी का मामला सामने आया है। आरोप है कि मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम से जुड़ी कुछ परियोजनाओं में टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद तकनीकी स्वीकृति, सीमांकन और भुगतान जैसी प्रक्रियाएं लंबे समय तक अटकी रहीं। इस देरी को लेकर निर्माण एजेंसियों ने उच्च स्तर पर शिकायत की है।

    बताया गया है कि नीमच के चीताखेड़ा औद्योगिक पार्क और मंदसौर के बसई औद्योगिक पार्क से संबंधित परियोजनाओं में टेंडर आवंटन के बाद भी काम आगे बढ़ाने की जरूरी प्रक्रियाओं में देरी हुई। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई मामलों में छह महीने से एक वर्ष तक सीमांकन और अन्य स्वीकृतियां लंबित रहीं। इसके चलते निर्माण एजेंसियों के काम की गति प्रभावित हुई और साइट पर गतिविधियां रुकने की स्थिति बनी।

    मामले में विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में कार्यकारी निदेशक राजेश राठौर समेत संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोपों में यह भी कहा गया है कि कथित अवैध राशि या कमीशन की मांग पूरी नहीं होने के कारण कुछ फाइलों को आगे बढ़ाने में देरी की गई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच के स्तर पर होना बाकी है।

    निर्माण एजेंसियों की ओर से यह मामला मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव कार्यालय तक पहुंचाया गया है। शिकायत में टेंडर आवंटन के बाद काम से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को रोके जाने और रनिंग बिलों के भुगतान में देरी का मुद्दा भी उठाया गया है। एजेंसियों का कहना है कि भुगतान अटकने से उनकी कार्यशील पूंजी प्रभावित हुई और परियोजनाओं की प्रगति पर सीधा असर पड़ा।

    मामला सामने आने के बाद MPIDC के प्रबंध निदेशक चंद्रमौली शुक्ला की ओर से दो अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है, लेकिन पहले हो चुकी देरी के कारण निर्धारित समयसीमा पर सवाल बने हुए हैं।

    सिंहस्थ 2028 के लिए उज्जैन में बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास से जुड़े काम किए जा रहे हैं। ऐसे में किसी भी परियोजना में लंबे समय तक देरी होने का असर आगे की समयसीमा पर पड़ सकता है। निर्माण कार्यों में देरी के कारण लागत बढ़ने की आशंका भी रहती है, जिसका प्रभाव अंततः परियोजना के बजट पर पड़ सकता है।

    शिकायत में पर्यावरण से जुड़े पहलुओं का भी उल्लेख किया गया है। निर्माण और पौधरोपण जैसे कार्यों के लिए उपयुक्त मौसम निकल जाने की स्थिति में संबंधित गतिविधियों की समयसीमा प्रभावित हो सकती है। मानसून के दौरान किए जाने वाले कार्यों में देरी होने पर आगे की योजना और संसाधन प्रबंधन पर भी दबाव बढ़ सकता है।

    अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल शिकायतों में लगाए गए आरोपों की जांच को लेकर है। यदि जांच में प्रशासनिक स्तर पर जानबूझकर देरी, नियमों की अनदेखी या किसी प्रकार की अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। दूसरी ओर, यदि देरी प्रक्रिया संबंधी कारणों से हुई है तो विभाग को उसका स्पष्ट कारण सामने रखना होगा।

    सिंहस्थ 2028 मध्य प्रदेश के लिए धार्मिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से बड़ा आयोजन है। इसलिए इससे जुड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता, समयबद्धता और जवाबदेही महत्वपूर्ण है। फिलहाल शिकायतों के बाद अटकी परियोजनाओं को गति देने के प्रयास शुरू हुए हैं और आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि जांच में आरोपों को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं।