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  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन की रिपोर्टिंग में पत्रकारों की हिरासत पर CPI सांसद पी. संदोष कुमार ने अमित शाह को लिखा पत्र

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन की रिपोर्टिंग में पत्रकारों की हिरासत पर CPI सांसद पी. संदोष कुमार ने अमित शाह को लिखा पत्र

    नई दिल्ली ।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हो रहे विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लेने, नजरबंद करने और उनके काम में बाधा डालने का मामला सामने आया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्यसभा सांसद पी. संदोष कुमार ने इस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने मांग की है कि पत्रकारों को परेशान करने और मनमाने तरीके से हिरासत में लेने की घटनाओं पर रोक लगाई जाए। साथ ही, उन्होंने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से जुड़े मामलों की जांच कराने और जिम्मेदारी तय करने का आग्रह किया है।

    सांसद ने अपने पत्र में कहा कि राजधानी के अलग-अलग हिस्सों से मिल रही जानकारी के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को कवर करने पहुंचे पत्रकारों को उनके पेशेवर दायित्व निभाने से रोका जा रहा है। उन्होंने कई समाचार संस्थानों के पत्रकारों के साथ हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि रिपोर्टिंग के दौरान हिरासत और प्रतिबंधों का सामना करना प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर विषय है।

    पत्र में दावा किया गया है कि एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र के संवाददाता को पिछली शाम नजरबंद कर दिया गया, जबकि एक अन्य राष्ट्रीय दैनिक के संवाददाताओं को रिपोर्टिंग करने से रोका गया। इसके अलावा, एक समाचार एजेंसी के संवाददाता को हिरासत में लिए जाने का भी उल्लेख किया गया है। सांसद के अनुसार, मलयालम भाषा के विभिन्न समाचार माध्यमों के पत्रकारों और कैमरा कर्मियों को भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इन पत्रकारों ने पुलिस के सामने अपनी शिकायतें रखीं, लेकिन इसके बावजूद उनकी रिपोर्टिंग में बाधाएं बनी रहीं।

    पत्र में हिंदी पत्रकार अजीत अंजुम और श्याम मीरा सिंह का भी जिक्र किया गया है। सांसद के मुताबिक, श्याम मीरा सिंह को पिछली शाम हिरासत में लिया गया था। इसके अलावा, एक डिजिटल समाचार मंच की महिला संवाददाता को कथित तौर पर घसीटकर हिरासत में लेने की घटना पर भी आपत्ति जताई गई है। उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए गए कुछ पत्रकारों के वीडियो में उन्हें पुलिस की बस के भीतर अपने पहचान पत्र दिखाते हुए देखा जा सकता है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाएं पत्रकारों के कामकाज और जनता तक सूचना पहुंचाने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

    पी. संदोष कुमार ने पत्र में पत्रकारों से प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की मान्यता दिखाने की मांग पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि किसी विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के लिए PIB मान्यता को अनिवार्य शर्त बनाना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा मान्यता संबंधी दिशानिर्देश बदलते मीडिया परिदृश्य के अनुरूप नहीं हैं। पत्र में डिजिटल समाचार मंचों और स्वतंत्र पत्रकारों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कई विश्वसनीय डिजिटल संस्थान पत्रकारिता कर रहे हैं, जबकि उनके पत्रकारों के पास जरूरी नहीं कि PIB मान्यता हो।

    सांसद ने यह भी कहा कि स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल मीडिया मंच और यूट्यूब, फेसबुक तथा इंस्टाग्राम के माध्यम से समाचार प्रस्तुत करने वाले लोग भी पत्रकारिता के काम में लगे हैं। इसके अलावा, नागरिक मोबाइल फोन से घटनाओं को रिकॉर्ड करके साझा करते हैं। उनके अनुसार, केवल PIB मान्यता के आधार पर किसी पत्रकार को सार्वजनिक स्थान पर रिपोर्टिंग से रोकना प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना पाने के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

    पत्र में सांसद ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया हस्तक्षेप और संयुक्त राष्ट्र में व्यक्त चिंताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने गृह मंत्री से दिल्ली पुलिस को स्पष्ट निर्देश देने की मांग की कि पत्रकारों को उनके कानूनी दायरे में काम करने से न रोका जाए और केवल मान्यता नहीं होने के आधार पर उनके साथ भेदभाव न किया जाए। उन्होंने कथित अवैध हिरासत, डराने-धमकाने और मारपीट की घटनाओं की जांच कराने तथा दोषी पाए जाने वालों की जवाबदेही तय करने का आग्रह किया। सांसद ने कहा कि सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि पत्रकार स्वतंत्र रूप से अपना काम कर सकें और जनता तक जानकारी पहुंचाने में बाधा न आए।

  • आरबीआई ने महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा, खाद्य और ईंधन कीमतों के दबाव के बीच रेपो रेट में भी 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी

    आरबीआई ने महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा, खाद्य और ईंधन कीमतों के दबाव के बीच रेपो रेट में भी 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि महंगाई का परिदृश्य पिछले वर्ष की तुलना में अब उतना अनुकूल नहीं है। खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के साथ आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिम भी बढ़े हैं। मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की घोषणा करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई के ताजा अनुमान और उससे जुड़े जोखिमों की जानकारी दी।

    आरबीआई के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में CPI महंगाई 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। तीसरी तिमाही में इसके बढ़कर 6 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। वहीं, वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान 5.6 प्रतिशत रखा गया है। चालू वित्त वर्ष के लिए कोर मुद्रास्फीति का अनुमान 4.4 प्रतिशत है।

    गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि अगस्त में CPI महंगाई बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई, जबकि इससे पहले यह 4.5 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी में खाद्य और ईंधन कीमतों में तेजी की अहम भूमिका रही। उन्होंने कहा कि कोर मुद्रास्फीति में भी वृद्धि हुई है। इससे संकेत मिलता है कि कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव अब अर्थव्यवस्था के अधिक क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है।

    केंद्रीय बैंक के मुताबिक खाद्य महंगाई अब केवल कुछ चुनिंदा वस्तुओं तक सीमित नहीं रही है। चीनी और प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। अगस्त में ईंधन महंगाई बढ़ने के पीछे प्रतिकूल आधार प्रभाव भी एक कारण रहा। आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में कोर मुद्रास्फीति 4.2 प्रतिशत रही। वहीं, कीमती धातुओं को अलग रखने पर कोर मुद्रास्फीति 2.9 प्रतिशत दर्ज की गई।

    आरबीआई ने आने वाले महीनों में आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिमों के बने रहने की आशंका जताई है। कमजोर मानसून, जारी अल नीनो परिस्थितियां, ऊंची ऊर्जा कीमतें और अन्य कमोडिटी की मजबूत कीमतें महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। केंद्रीय बैंक ने इस स्थिति को महंगाई के मौजूदा परिदृश्य के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है।

    आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि CPI बास्केट में शामिल उन वस्तुओं का हिस्सा, जिनकी महंगाई दर 4 प्रतिशत से अधिक है, अगस्त में बढ़कर करीब 37 प्रतिशत हो गया। इससे यह संकेत मिलता है कि कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव अधिक वस्तुओं तक फैल रहा है। केंद्रीय बैंक ने इसी व्यापक दबाव को महंगाई के बदलते परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है।

    संजय मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई और उसका आउटलुक पिछले वर्ष की तुलना में अब उतना अनुकूल नहीं है। अगले तीन तिमाहियों में औसत CPI मुद्रास्फीति करीब 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि कोर मुद्रास्फीति लगभग 4.4 प्रतिशत रह सकती है। इस आकलन के बीच मौद्रिक नीति को लेकर भी बदलाव किया गया है।

    आरबीआई ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। गवर्नर के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में नीतिगत ब्याज दरों का पुनर्संतुलन आवश्यक हो गया था। महंगाई के बढ़ते दबाव, खाद्य और ऊर्जा कीमतों में तेजी तथा आपूर्ति संबंधी जोखिमों को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने मुद्रास्फीति अनुमान को 5.2 प्रतिशत पर रखा है।

  • दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल

    दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में दिमागी नक्सल शब्द के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में समाज को गलत दिशा में ले जाने वाले तत्वों को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया था। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस और वाम दलों के नेताओं ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। चिदंबरम की इस प्रतिक्रिया के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई। कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री के बयान को विपक्ष और सरकार से असहमति रखने वाले लोगों के संदर्भ में देखा और इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए अर्बन नक्सल शब्द के पुराने इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री की ओर से अर्बन नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन संसद में इसकी परिभाषा को लेकर सवाल पूछे जाने पर स्पष्ट परिभाषा सामने नहीं आई थी।

    जयराम रमेश ने जाति जनगणना के मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले तक जाति जनगणना की मांग को अर्बन नक्सल सोच से जोड़कर देखा जाता था, जबकि बाद में सरकार ने जाति जनगणना कराने का निर्णय लिया। उनके अनुसार, सरकार की ओर से पहले किसी मांग या विचार को एक विशेष राजनीतिक शब्दावली से जोड़ना और बाद में उसी दिशा में कदम उठाना सवाल खड़े करता है।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने या उनसे असहमति जताने वालों को इस तरह के विशेषणों से संबोधित करना उचित नहीं है।

    वाम दलों ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी को गंभीरता से लिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के महासचिव एमए बेबी ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। वाम नेताओं ने दिमागी नक्सल जैसे शब्द के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक विमर्श के लिए गंभीर विषय बताया।

    इस पूरे विवाद की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से हुई। लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सामने मौजूद चुनौतियों और समाज को प्रभावित करने वाली विचारधाराओं का उल्लेख किया। इसी दौरान उन्होंने दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया और ऐसे तत्वों को पहचानने की आवश्यकता बताई, जो उनके अनुसार समाज को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं।

    प्रधानमंत्री की टिप्पणी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद अब सार्वजनिक बहस का रूप ले चुके हैं। कांग्रेस और वाम दल जहां इस शब्दावली को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री के बयान का संदर्भ सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों से जुड़ा बताया जा रहा है।

    दिमागी नक्सल शब्द पर शुरू हुआ यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राजनीतिक दल स्वतंत्रता दिवस के संदेशों और देश की दिशा से जुड़े मुद्दों पर अपनी-अपनी विचारधारा के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। चिदंबरम की टिप्पणी और विपक्षी नेताओं की आपत्तियों ने इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस शब्द को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच और बयानबाजी देखने को मिल सकती है।

  • महंगाई में मामूली बढ़ोतरी के बीच खाद्य कीमतों का दबाव कायम, तेलंगाना सबसे महंगा राज्य, मध्य प्रदेश भी ऊंचे स्तर पर

    महंगाई में मामूली बढ़ोतरी के बीच खाद्य कीमतों का दबाव कायम, तेलंगाना सबसे महंगा राज्य, मध्य प्रदेश भी ऊंचे स्तर पर

    नई दिल्ली । भारत में खुदरा महंगाई दर जुलाई 2026 में मामूली बढ़ोतरी के साथ 4.45 प्रतिशत पर पहुंच गई। जून में यह दर 4.38 प्रतिशत थी। बुधवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, महंगाई में बढ़ोतरी के बावजूद कुछ जरूरी सब्जियों की कीमतों में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सोना, चांदी, अदरक और लहसुन जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि ने घरेलू बजट पर दबाव बनाए रखा।

    जुलाई में ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई 4.84 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.96 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे साफ है कि महंगाई का असर ग्रामीण उपभोक्ताओं पर अपेक्षाकृत अधिक रहा। खाद्य महंगाई दर भी जुलाई में 5.52 प्रतिशत रही। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.79 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.05 प्रतिशत दर्ज की गई।

    खाद्य वस्तुओं में कुछ उत्पादों की कीमतों में उपभोक्ताओं को राहत मिली। जुलाई में आलू के दाम सालाना आधार पर 16.56 प्रतिशत घटे। इसी तरह भिंडी की कीमत में 5.52 प्रतिशत, मटर में 5.27 प्रतिशत और टमाटर में 4.59 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे सब्जियों की कुछ श्रेणियों में कीमतों का दबाव कम हुआ है।

    हालांकि दूसरी ओर कई वस्तुओं ने महंगाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। जुलाई में चांदी की ज्वेलरी की कीमतों में सालाना आधार पर 109.84 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज हुई। अदरक की कीमत 83.62 प्रतिशत और लहसुन की कीमत 35.36 प्रतिशत बढ़ी। सोना, हीरा और प्लैटीनम ज्वेलरी की कीमतों में भी 32.98 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। प्याज की कीमत में 22.54 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    अन्य क्षेत्रों में फूड एंड बेवरेज श्रेणी की महंगाई 5.24 प्रतिशत रही। पान, तंबाकू और संबंधित उत्पादों में 4.79 प्रतिशत, परिवहन में 4.43 प्रतिशत, कपड़े और जूते में 3.38 प्रतिशत तथा शैक्षणिक सेवाओं में 3.64 प्रतिशत महंगाई दर्ज हुई। स्वास्थ्य क्षेत्र में महंगाई अपेक्षाकृत कम 1.34 प्रतिशत रही।

    राज्यों के स्तर पर तेलंगाना में जुलाई के दौरान सबसे अधिक 6.32 प्रतिशत खुदरा महंगाई दर्ज की गई। आंध्र प्रदेश में यह 5.72 प्रतिशत, तमिलनाडु में 5.44 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.91 प्रतिशत और कर्नाटक में 4.89 प्रतिशत रही। इससे अलग-अलग राज्यों में कीमतों के दबाव में अंतर भी सामने आया।

    महंगाई के मौजूदा रुझान पर भारतीय रिजर्व बैंक की नजर बनी हुई है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 5 प्रतिशत रखा है। आरबीआई ने यह भी संकेत दिया है कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के कारण निकट अवधि में महंगाई के दबाव में वृद्धि हो सकती है।

    जून में महंगाई दर बढ़ने के बाद जुलाई के आंकड़े भी यह संकेत देते हैं कि कीमतों का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हालांकि सब्जियों जैसी कुछ जरूरी वस्तुओं में गिरावट से आम उपभोक्ताओं को राहत मिली है, लेकिन खाद्य पदार्थों, कीमती धातुओं और कुछ मसालों की तेजी चिंता का विषय बनी हुई है। आने वाले महीनों में मानसून, खाद्य आपूर्ति, वैश्विक बाजार और ऊर्जा कीमतें महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

  • मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    नई दिल्ली । देश में खुदरा महंगाई दर ने मई 2026 में एक बार फिर बढ़ोतरी का संकेत दिया है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर मई में 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य वस्तुओं की कीमतों में दबाव बढ़ रहा है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है।

    मई के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई का असर अलग-अलग स्तर पर देखने को मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 4.25 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.53 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीण उपभोक्ताओं पर मूल्य वृद्धि का दबाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है।

    खाद्य महंगाई भी मई में बढ़ी है। अप्रैल में जहां खाद्य महंगाई दर 4.20 प्रतिशत थी, वहीं मई में यह बढ़कर 4.78 प्रतिशत तक पहुंच गई। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 4.85 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.66 प्रतिशत दर्ज की गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है, इसलिए इस श्रेणी के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

    हालांकि कुछ प्रमुख वस्तुओं की कीमतों में राहत भी देखने को मिली। सालाना आधार पर आलू की कीमतों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मटर, जीरा तथा मोटर वाहन श्रेणी की कुछ वस्तुओं के दाम भी कम हुए हैं। वाहन बाजार में मोटर कार, जीप, मोटरसाइकिल और स्कूटर की कीमतों में आई गिरावट ने उपभोक्ताओं को कुछ राहत प्रदान की है।

    इसके विपरीत कई वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। चांदी के आभूषणों की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई। इसके अलावा टमाटर, सोना-हीरा-प्लेटिनम आभूषण, अदरक और किशमिश जैसी वस्तुओं के दाम भी उल्लेखनीय रूप से बढ़े हैं। खाद्य और कीमती धातुओं से जुड़े उत्पादों की कीमतों में यह वृद्धि महंगाई के समग्र स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रही।

    राज्यों के स्तर पर देखें तो अधिक आबादी वाले राज्यों में तेलंगाना सबसे अधिक खुदरा महंगाई वाला राज्य रहा। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा का स्थान रहा। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में महंगाई का दबाव अधिक दर्ज किया गया, जिससे स्थानीय उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा कई बाहरी और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ा रही हैं। यदि ऊर्जा लागत में और वृद्धि होती है तो परिवहन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ी लागतें भी बढ़ सकती हैं।

    इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी आगामी वित्त वर्ष के लिए महंगाई अनुमान को ऊपर संशोधित किया है। कमजोर मानसून की आशंका, अल-नीनो का संभावित प्रभाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को प्रमुख जोखिम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बना रहा तो महंगाई दर आने वाले महीनों में आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

  • कृषि व ग्रामीण श्रमिकों के लिए राहत: दिसंबर में खाद्य महंगाई दर नकारात्मक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में गिरावट

    कृषि व ग्रामीण श्रमिकों के लिए राहत: दिसंबर में खाद्य महंगाई दर नकारात्मक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में गिरावट


    नई दिल्ली। दिसंबर 2025 में कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खाद्य महंगाई दर नकारात्मक रही जिससे इन वर्गों के लिए महंगाई के बोझ में राहत मिली है। श्रम और रोजगार मंत्रालय ने बुधवार को जारी आंकड़ों के अनुसार कृषि श्रमिकों के लिए अखिल भारत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सीपीआई-एल 0.04 प्रतिशत और ग्रामीण श्रमिकों के लिए (सीपीआई-आरएल) 0.11 प्रतिशत सालाना आधार पर दर्ज किया गया।

    मंत्रालय ने बताया कि खाद्य महंगाई इस दौरान कृषि श्रमिकों के लिए -1.8 प्रतिशत और ग्रामीण श्रमिकों के लिए -1.73 प्रतिशत रही। इस नकारात्मक महंगाई का मुख्य कारण खाद्य उत्पादन में वृद्धि के साथ कीमतों में गिरावट है। हाल के महीनों में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में आई यह कमी विशेष रूप से कमजोर वर्गों के लिए राहत का संदेश लेकर आई है। इससे उनके पास खर्च करने के लिए अधिक धन उपलब्ध होता है और जीवन स्तर में सुधार की संभावना बढ़ती है।

    श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन श्रम ब्यूरो ने जून 2025 से कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2019=100 निर्धारित किया है। इस नए आधार वर्ष में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 787 गांवों से आंकड़े एकत्रित किए गए। पुराने 1986-87=100 सीरीज को बदलकर सीपीआई-एएल और सीपीआई-आरएल की नई सीरीज लाई गई है। नई सीरीज में सूचकांक की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए दायरा और कवरेज काफी हद तक बढ़ाया गया और इसमें कार्यप्रणालीगत सुधार भी किए गए।

    इस बीच सामान्य खुदरा महंगाई दर दिसंबर 2025 में 1.33 प्रतिशत रही जो नवंबर में 0.71 प्रतिशत थी। वहीं थोक कीमतों पर आधारित महंगाई दर दिसंबर में 0.83 प्रतिशत दर्ज की गई जबकि नवंबर में यह -0.32 प्रतिशत थी। थोक महंगाई में वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्मित वस्तुओं और खनिजों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई है।

    आरबीआई का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 में खुदरा महंगाई दर करीब 2 प्रतिशत रह सकती है। इसकी वजह जीएसटी में कटौती और खाद्य उत्पादों की कीमतों में गिरावट को बताया गया है।
    विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खाद्य महंगाई में आई यह कमी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे उनकी खरीद क्षमता बढ़ती है और जीवन यापन में आसानी होती है। सरकार की नीतियों और उत्पादन में बढ़ोतरी के कारण आने वाले महीनों में यह रुझान जारी रहने की उम्मीद है।