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  • दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल

    दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में दिमागी नक्सल शब्द के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में समाज को गलत दिशा में ले जाने वाले तत्वों को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया था। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस और वाम दलों के नेताओं ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। चिदंबरम की इस प्रतिक्रिया के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई। कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री के बयान को विपक्ष और सरकार से असहमति रखने वाले लोगों के संदर्भ में देखा और इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए अर्बन नक्सल शब्द के पुराने इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री की ओर से अर्बन नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन संसद में इसकी परिभाषा को लेकर सवाल पूछे जाने पर स्पष्ट परिभाषा सामने नहीं आई थी।

    जयराम रमेश ने जाति जनगणना के मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले तक जाति जनगणना की मांग को अर्बन नक्सल सोच से जोड़कर देखा जाता था, जबकि बाद में सरकार ने जाति जनगणना कराने का निर्णय लिया। उनके अनुसार, सरकार की ओर से पहले किसी मांग या विचार को एक विशेष राजनीतिक शब्दावली से जोड़ना और बाद में उसी दिशा में कदम उठाना सवाल खड़े करता है।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने या उनसे असहमति जताने वालों को इस तरह के विशेषणों से संबोधित करना उचित नहीं है।

    वाम दलों ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी को गंभीरता से लिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के महासचिव एमए बेबी ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। वाम नेताओं ने दिमागी नक्सल जैसे शब्द के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक विमर्श के लिए गंभीर विषय बताया।

    इस पूरे विवाद की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से हुई। लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सामने मौजूद चुनौतियों और समाज को प्रभावित करने वाली विचारधाराओं का उल्लेख किया। इसी दौरान उन्होंने दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया और ऐसे तत्वों को पहचानने की आवश्यकता बताई, जो उनके अनुसार समाज को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं।

    प्रधानमंत्री की टिप्पणी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद अब सार्वजनिक बहस का रूप ले चुके हैं। कांग्रेस और वाम दल जहां इस शब्दावली को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री के बयान का संदर्भ सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों से जुड़ा बताया जा रहा है।

    दिमागी नक्सल शब्द पर शुरू हुआ यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राजनीतिक दल स्वतंत्रता दिवस के संदेशों और देश की दिशा से जुड़े मुद्दों पर अपनी-अपनी विचारधारा के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। चिदंबरम की टिप्पणी और विपक्षी नेताओं की आपत्तियों ने इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस शब्द को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच और बयानबाजी देखने को मिल सकती है।

  • महंगाई में मामूली बढ़ोतरी के बीच खाद्य कीमतों का दबाव कायम, तेलंगाना सबसे महंगा राज्य, मध्य प्रदेश भी ऊंचे स्तर पर

    महंगाई में मामूली बढ़ोतरी के बीच खाद्य कीमतों का दबाव कायम, तेलंगाना सबसे महंगा राज्य, मध्य प्रदेश भी ऊंचे स्तर पर

    नई दिल्ली । भारत में खुदरा महंगाई दर जुलाई 2026 में मामूली बढ़ोतरी के साथ 4.45 प्रतिशत पर पहुंच गई। जून में यह दर 4.38 प्रतिशत थी। बुधवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, महंगाई में बढ़ोतरी के बावजूद कुछ जरूरी सब्जियों की कीमतों में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सोना, चांदी, अदरक और लहसुन जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि ने घरेलू बजट पर दबाव बनाए रखा।

    जुलाई में ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई 4.84 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.96 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे साफ है कि महंगाई का असर ग्रामीण उपभोक्ताओं पर अपेक्षाकृत अधिक रहा। खाद्य महंगाई दर भी जुलाई में 5.52 प्रतिशत रही। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.79 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.05 प्रतिशत दर्ज की गई।

    खाद्य वस्तुओं में कुछ उत्पादों की कीमतों में उपभोक्ताओं को राहत मिली। जुलाई में आलू के दाम सालाना आधार पर 16.56 प्रतिशत घटे। इसी तरह भिंडी की कीमत में 5.52 प्रतिशत, मटर में 5.27 प्रतिशत और टमाटर में 4.59 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे सब्जियों की कुछ श्रेणियों में कीमतों का दबाव कम हुआ है।

    हालांकि दूसरी ओर कई वस्तुओं ने महंगाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। जुलाई में चांदी की ज्वेलरी की कीमतों में सालाना आधार पर 109.84 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज हुई। अदरक की कीमत 83.62 प्रतिशत और लहसुन की कीमत 35.36 प्रतिशत बढ़ी। सोना, हीरा और प्लैटीनम ज्वेलरी की कीमतों में भी 32.98 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। प्याज की कीमत में 22.54 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    अन्य क्षेत्रों में फूड एंड बेवरेज श्रेणी की महंगाई 5.24 प्रतिशत रही। पान, तंबाकू और संबंधित उत्पादों में 4.79 प्रतिशत, परिवहन में 4.43 प्रतिशत, कपड़े और जूते में 3.38 प्रतिशत तथा शैक्षणिक सेवाओं में 3.64 प्रतिशत महंगाई दर्ज हुई। स्वास्थ्य क्षेत्र में महंगाई अपेक्षाकृत कम 1.34 प्रतिशत रही।

    राज्यों के स्तर पर तेलंगाना में जुलाई के दौरान सबसे अधिक 6.32 प्रतिशत खुदरा महंगाई दर्ज की गई। आंध्र प्रदेश में यह 5.72 प्रतिशत, तमिलनाडु में 5.44 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.91 प्रतिशत और कर्नाटक में 4.89 प्रतिशत रही। इससे अलग-अलग राज्यों में कीमतों के दबाव में अंतर भी सामने आया।

    महंगाई के मौजूदा रुझान पर भारतीय रिजर्व बैंक की नजर बनी हुई है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 5 प्रतिशत रखा है। आरबीआई ने यह भी संकेत दिया है कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के कारण निकट अवधि में महंगाई के दबाव में वृद्धि हो सकती है।

    जून में महंगाई दर बढ़ने के बाद जुलाई के आंकड़े भी यह संकेत देते हैं कि कीमतों का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हालांकि सब्जियों जैसी कुछ जरूरी वस्तुओं में गिरावट से आम उपभोक्ताओं को राहत मिली है, लेकिन खाद्य पदार्थों, कीमती धातुओं और कुछ मसालों की तेजी चिंता का विषय बनी हुई है। आने वाले महीनों में मानसून, खाद्य आपूर्ति, वैश्विक बाजार और ऊर्जा कीमतें महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

  • मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    नई दिल्ली । देश में खुदरा महंगाई दर ने मई 2026 में एक बार फिर बढ़ोतरी का संकेत दिया है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर मई में 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य वस्तुओं की कीमतों में दबाव बढ़ रहा है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है।

    मई के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई का असर अलग-अलग स्तर पर देखने को मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 4.25 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.53 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीण उपभोक्ताओं पर मूल्य वृद्धि का दबाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है।

    खाद्य महंगाई भी मई में बढ़ी है। अप्रैल में जहां खाद्य महंगाई दर 4.20 प्रतिशत थी, वहीं मई में यह बढ़कर 4.78 प्रतिशत तक पहुंच गई। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 4.85 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.66 प्रतिशत दर्ज की गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है, इसलिए इस श्रेणी के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

    हालांकि कुछ प्रमुख वस्तुओं की कीमतों में राहत भी देखने को मिली। सालाना आधार पर आलू की कीमतों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मटर, जीरा तथा मोटर वाहन श्रेणी की कुछ वस्तुओं के दाम भी कम हुए हैं। वाहन बाजार में मोटर कार, जीप, मोटरसाइकिल और स्कूटर की कीमतों में आई गिरावट ने उपभोक्ताओं को कुछ राहत प्रदान की है।

    इसके विपरीत कई वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। चांदी के आभूषणों की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई। इसके अलावा टमाटर, सोना-हीरा-प्लेटिनम आभूषण, अदरक और किशमिश जैसी वस्तुओं के दाम भी उल्लेखनीय रूप से बढ़े हैं। खाद्य और कीमती धातुओं से जुड़े उत्पादों की कीमतों में यह वृद्धि महंगाई के समग्र स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रही।

    राज्यों के स्तर पर देखें तो अधिक आबादी वाले राज्यों में तेलंगाना सबसे अधिक खुदरा महंगाई वाला राज्य रहा। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा का स्थान रहा। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में महंगाई का दबाव अधिक दर्ज किया गया, जिससे स्थानीय उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा कई बाहरी और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ा रही हैं। यदि ऊर्जा लागत में और वृद्धि होती है तो परिवहन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ी लागतें भी बढ़ सकती हैं।

    इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी आगामी वित्त वर्ष के लिए महंगाई अनुमान को ऊपर संशोधित किया है। कमजोर मानसून की आशंका, अल-नीनो का संभावित प्रभाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को प्रमुख जोखिम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बना रहा तो महंगाई दर आने वाले महीनों में आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

  • कृषि व ग्रामीण श्रमिकों के लिए राहत: दिसंबर में खाद्य महंगाई दर नकारात्मक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में गिरावट

    कृषि व ग्रामीण श्रमिकों के लिए राहत: दिसंबर में खाद्य महंगाई दर नकारात्मक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में गिरावट


    नई दिल्ली। दिसंबर 2025 में कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खाद्य महंगाई दर नकारात्मक रही जिससे इन वर्गों के लिए महंगाई के बोझ में राहत मिली है। श्रम और रोजगार मंत्रालय ने बुधवार को जारी आंकड़ों के अनुसार कृषि श्रमिकों के लिए अखिल भारत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सीपीआई-एल 0.04 प्रतिशत और ग्रामीण श्रमिकों के लिए (सीपीआई-आरएल) 0.11 प्रतिशत सालाना आधार पर दर्ज किया गया।

    मंत्रालय ने बताया कि खाद्य महंगाई इस दौरान कृषि श्रमिकों के लिए -1.8 प्रतिशत और ग्रामीण श्रमिकों के लिए -1.73 प्रतिशत रही। इस नकारात्मक महंगाई का मुख्य कारण खाद्य उत्पादन में वृद्धि के साथ कीमतों में गिरावट है। हाल के महीनों में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में आई यह कमी विशेष रूप से कमजोर वर्गों के लिए राहत का संदेश लेकर आई है। इससे उनके पास खर्च करने के लिए अधिक धन उपलब्ध होता है और जीवन स्तर में सुधार की संभावना बढ़ती है।

    श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन श्रम ब्यूरो ने जून 2025 से कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2019=100 निर्धारित किया है। इस नए आधार वर्ष में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 787 गांवों से आंकड़े एकत्रित किए गए। पुराने 1986-87=100 सीरीज को बदलकर सीपीआई-एएल और सीपीआई-आरएल की नई सीरीज लाई गई है। नई सीरीज में सूचकांक की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए दायरा और कवरेज काफी हद तक बढ़ाया गया और इसमें कार्यप्रणालीगत सुधार भी किए गए।

    इस बीच सामान्य खुदरा महंगाई दर दिसंबर 2025 में 1.33 प्रतिशत रही जो नवंबर में 0.71 प्रतिशत थी। वहीं थोक कीमतों पर आधारित महंगाई दर दिसंबर में 0.83 प्रतिशत दर्ज की गई जबकि नवंबर में यह -0.32 प्रतिशत थी। थोक महंगाई में वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्मित वस्तुओं और खनिजों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई है।

    आरबीआई का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 में खुदरा महंगाई दर करीब 2 प्रतिशत रह सकती है। इसकी वजह जीएसटी में कटौती और खाद्य उत्पादों की कीमतों में गिरावट को बताया गया है।
    विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खाद्य महंगाई में आई यह कमी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे उनकी खरीद क्षमता बढ़ती है और जीवन यापन में आसानी होती है। सरकार की नीतियों और उत्पादन में बढ़ोतरी के कारण आने वाले महीनों में यह रुझान जारी रहने की उम्मीद है।