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  • स्कूल क्विज में सावरकर का जिक्र बना सियासी मुद्दा, केरल में कांग्रेस और माकपा के बीच बढ़ी तकरार

    स्कूल क्विज में सावरकर का जिक्र बना सियासी मुद्दा, केरल में कांग्रेस और माकपा के बीच बढ़ी तकरार

    नई दिल्ली । केरल में एक स्कूल क्विज प्रतियोगिता के दौरान स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर से जुड़ा सवाल पूछे जाने के बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया है। कासरगोड जिले के कुम्बला और मंजेश्वर क्षेत्र के तीन स्कूलों के बच्चों के बीच आयोजित फ्रीडम क्विज में सावरकर से संबंधित सवाल शामिल किए जाने पर विपक्षी दलों और वामपंथी संगठनों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। मामला बढ़ने के बाद केरल के राज्य शिक्षा मंत्री एन शमसुद्दीन ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। शिक्षा मंत्री के कार्यालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक सामान्य शिक्षा निदेशक को यह पता लगाने का निर्देश दिया गया है कि क्विज के सवाल किसने तैयार किए थे और कार्यक्रम का आयोजन किस स्तर पर किया गया था।

    विवाद की शुरुआत उस सवाल को लेकर हुई जिसमें पूछा गया था कि वह स्वतंत्रता सेनानी कौन हैं जिन्हें अंग्रेजों ने सबसे कठोर सजा दी थी। इस सवाल के जवाब के तौर पर सावरकर का नाम दिया गया था। स्कूल स्तर के इस क्विज में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विभिन्न विषयों पर सवाल पूछे जा रहे थे लेकिन सावरकर से जुड़े सवाल के सामने आने के बाद मामला शिक्षा के दायरे से निकलकर सीधे राजनीति के केंद्र में पहुंच गया। विपक्षी माकपा और वामपंथी छात्र संगठनों ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए कांग्रेस सरकार पर संघ परिवार के एजेंडे के साथ खड़े होने का आरोप लगाया।

    शिक्षा मंत्री की ओर से जारी बयान में यह स्पष्ट किया गया कि संबंधित क्विज सामान्य शिक्षा विभाग या समाज विज्ञान क्लब की आधिकारिक गतिविधियों का हिस्सा नहीं था। बयान में कहा गया कि विभाग ने किसी व्यक्ति को इस तरह के सवाल तैयार करने या स्वतंत्र रूप से ऐसी प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए अधिकृत नहीं किया था। मंत्री ने पूरे मामले की जांच कराने के निर्देश देते हुए यह भी कहा कि ऐतिहासिक रूप से गलत सवाल को शामिल करने वाले व्यक्ति की सोच पक्षपातपूर्ण हो सकती है। अब जांच के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि क्विज तैयार करने और आयोजित करने की जिम्मेदारी किसकी थी और विवादित सवाल किस आधार पर शामिल किया गया।

    मामले ने केरल की राजनीति में भी नया विवाद खड़ा कर दिया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि राज्य में संघ परिवार के विचारों को जगह देने की कोशिश की जा रही है। केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और माकपा के वरिष्ठ नेता पिनराई विजयन ने यूडीएफ सरकार पर आरएसएस के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सावरकर के वास्तविक इतिहास को छिपाने और उनका महिमामंडन करने की कोशिश हो रही है। विजयन ने केंद्र सरकार और संघ पर इतिहास को नए तरीके से पेश करने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए इस पूरे विवाद को राष्ट्रीय शिक्षा नीति से जोड़कर भी देखा।

    पूर्व सामान्य शिक्षा मंत्री वी शिवनकुट्टी ने भी इस मामले को लेकर कांग्रेस सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि क्विज में सावरकर से संबंधित सवाल शामिल करना राज्य के सामान्य शिक्षा क्षेत्र के भगवाकरण और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को विकृत करने की कोशिश का हिस्सा है। वामपंथी छात्र संगठनों ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि स्कूल स्तर की प्रतियोगिता में ऐतिहासिक तथ्यों को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।

    फिलहाल सरकार ने जांच के आदेश देकर विवाद को शांत करने की कोशिश की है लेकिन सावरकर से जुड़ा यह सवाल केरल में एक बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप ले चुका है। एक ओर माकपा इसे इतिहास और शिक्षा के भगवाकरण से जोड़ रही है तो दूसरी ओर सरकार यह पता लगाने में जुटी है कि विवादित सवाल आखिर क्विज में कैसे शामिल हुआ। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सवाल तैयार करने के पीछे जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था कौन थी और कार्यक्रम किस प्रक्रिया के तहत आयोजित किया गया था।

  • ‘राहुल को बलि का बकरा बना रही CPI(M)’: गले लगाने वाले बयान पर बढ़ी सियासी तकरार, कांग्रेस ने किया पलटवार

    ‘राहुल को बलि का बकरा बना रही CPI(M)’: गले लगाने वाले बयान पर बढ़ी सियासी तकरार, कांग्रेस ने किया पलटवार

    नई दिल्ली । विपक्षी राजनीति के केंद्र में एक बार फिर कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक कथित वायरल ऑडियो को लेकर दोनों दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। इस विवाद ने न केवल केरल की राजनीति को गरमा दिया है, बल्कि विपक्षी एकता को लेकर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    विवाद की शुरुआत उस कथित ऑडियो क्लिप से हुई, जिसमें राहुल गांधी यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि वह केरल के वरिष्ठ वामपंथी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को गले नहीं लगाएंगे क्योंकि उनके साथ उनकी राजनीतिक लड़ाई जारी है। ऑडियो सामने आने के बाद इस पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं आने लगीं, जिसके बाद मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया।

    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनकी राजनीति व्यक्तिगत संबंधों या प्रतीकात्मक प्रदर्शनों पर आधारित नहीं है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राजनीतिक विमर्श विचारधारा और नीतियों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि विपक्षी नेताओं के बीच सम्मानजनक संबंध बनाए रखना लोकतांत्रिक राजनीति की आवश्यक शर्त है।

    दूसरी ओर कांग्रेस ने इस पूरे विवाद को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए CPI(M) पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि हालिया चुनावी पराजय के बाद वाम दल अपनी राजनीतिक चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए राहुल गांधी को निशाना बना रहे हैं। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि वास्तविक मुद्दों पर आत्ममंथन करने के बजाय राहुल गांधी के बयान को विवाद का रूप दिया जा रहा है।

    कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राहुल गांधी को अनावश्यक रूप से विवाद के केंद्र में लाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि विपक्षी राजनीति में राहुल गांधी की बढ़ती भूमिका से कुछ राजनीतिक दल असहज महसूस कर रहे हैं। उनके अनुसार, व्यक्तिगत हमलों से राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं बदला जा सकता और जनता के बीच स्वीकार्यता ही किसी भी नेता की सबसे बड़ी ताकत होती है।

    इस पूरे विवाद के दौरान दोनों दलों ने अपने-अपने राजनीतिक तर्कों को सामने रखा है। कांग्रेस का कहना है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, जबकि CPI(M) नेताओं ने सम्मानजनक राजनीतिक व्यवहार और वैचारिक स्पष्टता पर जोर दिया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी सहयोग और राज्य स्तरीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल जैसे राज्यों में कांग्रेस और CPI(M) सीधे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कई मुद्दों पर दोनों दल एक साझा मंच पर दिखाई देते रहे हैं। ऐसे में नेताओं के बयानों को लेकर पैदा होने वाले विवाद अक्सर व्यापक राजनीतिक संदेश भी देते हैं और गठबंधन राजनीति की जटिलताओं को उजागर करते हैं।

    फिलहाल यह विवाद राजनीतिक बयानबाजी के दौर में बदल चुका है। आने वाले दिनों में दोनों दलों के रुख और प्रतिक्रियाओं पर नजर रहेगी, क्योंकि इसका असर केवल केरल की राजनीति तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि व्यापक विपक्षी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।