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  • लगातार दूसरे दिन फिसले सोने-चांदी के भाव, घरेलू और वैश्विक बाजारों में बिकवाली से निवेशकों की बढ़ी सतर्कता

    लगातार दूसरे दिन फिसले सोने-चांदी के भाव, घरेलू और वैश्विक बाजारों में बिकवाली से निवेशकों की बढ़ी सतर्कता

    नई दिल्ली । घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। कारोबारी सत्र की शुरुआत से ही दोनों कीमती धातुओं पर बिकवाली का दबाव दिखाई दिया, जिसके कारण इनके दाम में लगभग 1.20 प्रतिशत तक की कमजोरी देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी नरमी का असर भारतीय बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिससे निवेशकों और कारोबारियों ने सतर्क रुख अपनाया।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में सोने के अगस्त 2026 डिलीवरी वाले वायदा अनुबंध की शुरुआत पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले हल्की कमजोरी के साथ हुई। शुरुआती कारोबार के दौरान कीमतों में लगातार गिरावट बनी रही और सोना दिन के शुरुआती घंटों में एक हजार रुपये से अधिक सस्ता होकर कारोबार करता दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सोने ने दिन का निचला स्तर भी छुआ, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि बाजार में खरीदारी की तुलना में बिकवाली का दबाव अधिक बना हुआ है।

    चांदी के वायदा कारोबार में भी इसी तरह का रुख देखने को मिला। सितंबर 2026 डिलीवरी वाले अनुबंध की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती कारोबार के दौरान इसमें और अधिक कमजोरी दर्ज की गई। कारोबार के पहले कुछ घंटों में चांदी एक प्रतिशत से अधिक टूट गई। दिन के दौरान इसके भाव लगातार दबाव में बने रहे, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों का झुकाव फिलहाल सुरक्षित मुनाफावसूली की ओर है।

    अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों में भी सोना और चांदी दोनों दबाव में रहे। वैश्विक स्तर पर कीमती धातुओं में आई बिकवाली का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता में बदलाव और डॉलर से जुड़े संकेतों का प्रभाव कीमती धातुओं की कीमतों पर लगातार बना हुआ है। ऐसे माहौल में निवेशक नए आर्थिक संकेतों और केंद्रीय बैंकों की आगामी नीतियों पर भी नजर बनाए हुए हैं।

    हालांकि कीमतों में गिरावट के बावजूद सोने की मांग से जुड़ा एक अलग रुझान भी सामने आया है। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से जून तिमाही के दौरान गोल्ड लोन का दायरा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। हालिया आकलनों के अनुसार, गोल्ड लोन अब सुरक्षित ऋण श्रेणी में सबसे बड़ा एसेट क्लास बनकर उभरा है और इसने वाहन ऋण को भी पीछे छोड़ दिया है। यह संकेत देता है कि आर्थिक जरूरतों के समय लोग सोने को वित्तीय सुरक्षा के प्रभावी साधन के रूप में अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि कीमती धातुओं में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। निवेशकों को केवल दैनिक मूल्य परिवर्तन के आधार पर निर्णय लेने के बजाय वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, ब्याज दरों के रुझान, मुद्रा बाजार की चाल और घरेलू मांग जैसे व्यापक कारकों पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दबाव बना रहता है तो निकट भविष्य में सोने और चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। वहीं, घरेलू मांग और निवेशकों की खरीदारी की रणनीति आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • वित्त वर्ष 2027 में विकास की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेत, जीडीपी वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान; महंगाई और तेल कीमतें बढ़ाएंगी दबाव

    वित्त वर्ष 2027 में विकास की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेत, जीडीपी वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान; महंगाई और तेल कीमतें बढ़ाएंगी दबाव


    नई दिल्ली ।
    वित्त वर्ष 2026 में अपेक्षा से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन दर्ज करने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था अगले वित्त वर्ष में नई चुनौतियों का सामना कर सकती है। ताजा आर्थिक आकलनों के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह दर वैश्विक स्तर पर अब भी मजबूत मानी जाएगी, लेकिन पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले इसमें कुछ नरमी देखने को मिल सकती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर उभरती परिस्थितियां विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं।

    वित्त वर्ष 2026 में अर्थव्यवस्था को कई सकारात्मक कारकों का लाभ मिला। घरेलू खपत को प्रोत्साहन देने वाले उपाय, अपेक्षाकृत कम महंगाई, अनुकूल मौसम की स्थिति, ब्याज दरों में राहत और वैश्विक आर्थिक स्थिरता ने विकास को मजबूत आधार प्रदान किया। इन कारणों से आर्थिक गतिविधियों में तेजी बनी रही और वृद्धि दर अनुमान से बेहतर स्तर तक पहुंच गई।

    हालांकि आगामी वित्त वर्ष के लिए तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में तेज उछाल से भारत जैसे आयात आधारित देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऊर्जा लागत बढ़ने का असर परिवहन, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों पर पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।

    इसके साथ ही मानसून को लेकर भी आशंकाएं बनी हुई हैं। मौसम संबंधी पूर्वानुमानों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। यदि वर्षा अपेक्षा से कमजोर रहती है तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कृषि क्षेत्र में किसी भी प्रकार की कमजोरी का असर ग्रामीण आय, उपभोग और खाद्य आपूर्ति पर पड़ता है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

    महंगाई भी आने वाले समय में एक प्रमुख चुनौती बन सकती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में मुद्रास्फीति का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रह सकता है। खाद्य पदार्थों, ऊर्जा और परिवहन लागत में संभावित वृद्धि से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने की स्थिति में घरेलू खपत की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, जो आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।

    वैश्विक परिस्थितियां भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा मांग पर पड़ सकता है। यदि वैश्विक बाजारों में सुस्ती बनी रहती है तो भारतीय निर्यात क्षेत्र को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे औद्योगिक उत्पादन और निवेश गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना रहेगी।

    इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियादी ढांचे, बढ़ते निवेश, डिजिटल विस्तार और घरेलू मांग की वजह से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बनी रहेगी। निजी उपभोग अब भी आर्थिक वृद्धि का प्रमुख आधार बना हुआ है और हालिया आंकड़े संकेत देते हैं कि उपभोक्ता मांग में मजबूती बरकरार है। यही कारण है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल माना जा रहा है।

    आने वाले महीनों में तेल कीमतों, मानसून की प्रगति, महंगाई के रुझान और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर विशेष नजर रहेगी। यही कारक तय करेंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था अनुमानित वृद्धि दर हासिल कर पाती है या विकास की गति में और बदलाव देखने को मिलता है।