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  • आईसीयू में बदल रहा मरीजों का पैटर्न: युवाओं में स्ट्रेस और स्क्रीन टाइम बढ़ा रहा परेशानी बुजुर्गों में कई बीमारियां बनी बड़ी वजह

    आईसीयू में बदल रहा मरीजों का पैटर्न: युवाओं में स्ट्रेस और स्क्रीन टाइम बढ़ा रहा परेशानी बुजुर्गों में कई बीमारियां बनी बड़ी वजह


    भोपाल । भोपाल में आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले गंभीर मरीजों में बुजुर्गों की संख्या अधिक दिखाई देती थी लेकिन अब कम उम्र के लोगों में भी ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ रही हैं जो धीरे धीरे गंभीर रूप ले सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक युवाओं में बढ़ता तनाव नींद की कमी लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना और बिगड़ी लाइफस्टाइल चिंता का कारण बन रहे हैं। हालांकि इनमें से ज्यादातर मरीज शुरुआत में आईसीयू तक नहीं पहुंचते और ओपीडी में ही इलाज कराते हैं लेकिन कुछ मामलों में स्थिति गंभीर होने पर अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ सकती है।
    भोपाल में आयोजित एमपी क्रिटिकॉन 1.0 में इंदौर के क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. संजय धानुका और डॉ. आनंद सांघी ने आईसीयू में बदलते मरीजों के पैटर्न पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने बताया कि बीमारियों का मूल स्वरूप पूरी तरह नहीं बदला है लेकिन मरीजों की उम्र उनकी जीवनशैली और गंभीर अवस्था तक पहुंचने के कारणों में बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है।

    20 से 40 साल की उम्र के लोगों में स्ट्रेस डिसऑर्डर इंसोम्निया सिरदर्द और लाइफस्टाइल से जुड़ी परेशानियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। लंबे समय तक मोबाइल और कंप्यूटर चलाने तथा देर रात तक जागने की आदत का असर नींद के साथ गर्दन कंधे और मांसपेशियों पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि लगातार स्क्रीन देखने के बजाय बीच बीच में ब्रेक लेना चाहिए। इसके साथ सर्वाइकल और शोल्डर एक्सरसाइज को दिनचर्या में शामिल करना भी मददगार हो सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार प्रोफेशनल स्ट्रेस अब केवल ऑफिस की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गया है। काम का दबाव कम समय में ज्यादा काम करने की अपेक्षा और घर की जिम्मेदारियां मिलकर तनाव को बढ़ा सकती हैं। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव कुछ लोगों में गंभीर मानसिक परेशानियों का कारण बन सकता है। आईसीयू में पॉइजनिंग के मरीज भी पहुंचते हैं जिनमें कीटनाशक और सल्फास जैसी चीजों से हुई पॉइजनिंग के मामले शामिल हैं। ऐसे मामलों में मरीज के शारीरिक इलाज के साथ मानसिक स्थिति का आकलन भी जरूरी माना जाता है और जरूरत पड़ने पर साइकेट्रिस्ट को उपचार में शामिल किया जाता है।

    तनाव का असर बच्चों और छात्रों में भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक मोबाइल नहीं देने पढ़ाई को लेकर डांटने या अपेक्षाओं के दबाव जैसी स्थितियां कुछ बच्चों में काफी तनाव पैदा कर सकती हैं। ऐसे मामलों में परिवार की भूमिका अहम हो जाती है। केवल दिखाई देने वाले लक्षणों का इलाज करने के बजाय तनाव के पीछे की वजह समझना जरूरी है।

    वहीं दूसरी तरफ आईसीयू में बुजुर्ग मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। बढ़ती उम्र के साथ डायबिटीज ब्लड प्रेशर किडनी संबंधी बीमारी और दूसरी पुरानी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहती हैं। कई बार संक्रमण डायलिसिस हार्ट अटैक एंजाइना या ऑपरेशन के बाद होने वाली जटिलताओं के कारण ऐसे मरीजों को आईसीयू की जरूरत पड़ती है। बढ़ती उम्र और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का असर भी क्रिटिकल केयर सेवाओं पर दिखाई दे रहा है। ऐसे में बदलती जीवनशैली और बढ़ती उम्र दोनों ही आईसीयू पर अलग अलग तरह का दबाव बढ़ा रहे हैं।

  • एक मां की आखिरी धड़कन बनी किसी की पहली उम्मीद, हार्ट ट्रांसप्लांट ने लिखा जिंदगी का नया अध्याय

    एक मां की आखिरी धड़कन बनी किसी की पहली उम्मीद, हार्ट ट्रांसप्लांट ने लिखा जिंदगी का नया अध्याय

    नई दिल्ली: कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहां एक परिवार का सबसे बड़ा दुख किसी दूसरे के लिए नई उम्मीद बन जाता है। एक ऐसी ही भावनात्मक और प्रेरणादायक घटना में एक मां का दिल अब किसी और के सीने में धड़क रहा है, जिसने 14 साल के एक बच्चे को नई जिंदगी दे दी। यह कहानी केवल एक सर्जरी की नहीं, बल्कि साहस, त्याग और इंसानियत की गहरी मिसाल है।

    एक महिला को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया। यह उनके परिवार के लिए बेहद कठिन समय था। ऐसे हालात में जहां हर कोई अपने दुख में डूब जाता है, वहीं उनके परिवार ने एक बड़ा और संवेदनशील निर्णय लिया। उन्होंने अंगदान की अनुमति देकर यह सुनिश्चित किया कि उनकी प्रिय की धड़कन किसी और की जिंदगी में उम्मीद बन सके।

    इसी बीच, एक 14 वर्षीय बच्चा लंबे समय से दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी और हर गुजरते दिन के साथ खतरा बढ़ता जा रहा था। डॉक्टरों के अनुसार, हार्ट ट्रांसप्लांट ही उसके जीवन को बचाने का एकमात्र विकल्प था। परिवार लगातार किसी उपयुक्त डोनर का इंतजार कर रहा था, और आखिरकार वह अवसर सामने आया जिसने सब कुछ बदल दिया।

    जैसे ही डोनर हार्ट उपलब्ध हुआ, तुरंत एक विशेष मिशन शुरू किया गया। दिल को सुरक्षित तरीके से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि इसमें हर मिनट की अहमियत होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया, जिससे रास्ते को पूरी तरह खाली कर दिया गया और दिल को बेहद कम समय में अस्पताल तक पहुंचाया गया। यह तेज और सटीक व्यवस्था इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए बेहद जरूरी साबित हुई।

    अस्पताल पहुंचते ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने बिना समय गंवाए ऑपरेशन शुरू किया। यह एक जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया थी, जिसमें हर कदम पर सावधानी और सटीकता की जरूरत होती है। कई घंटों की मेहनत और समर्पण के बाद आखिरकार हार्ट ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इसके बाद बच्चे को गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया, जहां उसकी स्थिति स्थिर बनी हुई है और वह धीरे-धीरे रिकवरी की ओर बढ़ रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम में विभिन्न टीमों के बीच शानदार समन्वय देखने को मिला, जिसने इस मिशन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन सबसे बड़ा योगदान उस परिवार का है, जिसने अपने निजी दुख को ताक पर रखकर एक अनजान बच्चे को जीवन देने का निर्णय लिया।

    यह घटना हमें यह सिखाती है कि इंसानियत का असली अर्थ क्या होता है। जब कोई अपने सबसे कठिन समय में भी दूसरों के लिए सोचता है, तो वह केवल एक जिंदगी नहीं बचाता, बल्कि समाज में उम्मीद और संवेदनशीलता की एक नई मिसाल कायम करता है। एक मां का दिल अब किसी और की धड़कन बन चुका है, और यही इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत है।

  • एम्स भोपाल को मिलेंगी गामा नाइफ और पेट स्कैन जैसी हाईटेक सुविधाएं ट्रांसप्लांट के लिए नया ऑपरेशन थिएटर भी शुरू

    एम्स भोपाल को मिलेंगी गामा नाइफ और पेट स्कैन जैसी हाईटेक सुविधाएं ट्रांसप्लांट के लिए नया ऑपरेशन थिएटर भी शुरू

    भोपाल । नए साल 2026 में मध्य प्रदेश के मरीजों के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में एक नई उम्मीद सामने आई है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स भोपाल इस साल अपने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक विस्तार करने जा रहा है। इस विस्तार के तहत एम्स भोपाल में गामा नाइफ और पेट स्कैन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों को स्थापित किया जाएगा जिससे गंभीर बीमारियों खासकर कैंसर और ट्यूमर के इलाज में बड़े सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।

    एम्स भोपाल इस वर्ष ‘ट्रांसप्लांट’ के लिए समर्पित एक नया ऑपरेशन थिएटर भी शुरू करने की योजना बना रहा है। इस ऑपरेशन थिएटर के शुरू होने से हृदय लिवर और किडनी ट्रांसप्लांट अब एक ही छत के नीचे संक्रमण रहित वातावरण में किए जा सकेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वेटिंग लिस्ट कम हो सकेगी और अधिक मरीजों को समय पर उपचार मिल सकेगा जिससे उनका जीवन बचाया जा सकेगा।

    इसके अलावा गामा नाइफ तकनीक का इस्तेमाल ब्रेन ट्यूमर और मस्तिष्क के अन्य जटिल रोगों के इलाज में किया जाएगा। गामा नाइफ के माध्यम से बिना चीरा लगाए सटीक रेडिएशन के जरिए ट्यूमर का इलाज संभव हो सकेगा। यह तकनीक विशेषकर उन मरीजों के लिए वरदान साबित होगी जिन्हें ब्रेन ट्यूमर के इलाज में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

    एम्स भोपाल के इस नए कदम से अब मरीजों को दिल्ली मुंबई या अन्य बड़े शहरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी क्योंकि यहां उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलेंगी। संस्थान का पूरा फोकस इस वर्ष डायग्नोस्टिक सेवाओं को और बेहतर बनाने और क्रिटिकल केयर की क्षमता को बढ़ाने पररहेगा।यह पहल न केवल मध्य प्रदेश बल्कि आस-पास के क्षेत्रों के मरीजों केलिए भी राहत लेकर आएगी क्योंकि अब उन्हें उच्च गुणवत्ता वालेउपचार के लिए दूर-दराज के शहरों में जाने की आवश्यकता नहीं होगी।