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  • भविष्य की तकनीकों पर भारत-अमेरिका का बड़ा दांव, AI और सेमीकंडक्टर सेक्टर में बढ़ेगी साझेदारी

    भविष्य की तकनीकों पर भारत-अमेरिका का बड़ा दांव, AI और सेमीकंडक्टर सेक्टर में बढ़ेगी साझेदारी

    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका ने भविष्य की तकनीकों और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। वाशिंगटन में आयोजित उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे अहम क्षेत्रों में साझेदारी को और गहरा करने पर व्यापक चर्चा की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब दुनिया तकनीकी प्रतिस्पर्धा के नए दौर में प्रवेश कर रही है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरती तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

    भारतीय दूतावास द्वारा जारी जानकारी के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने अमेरिकी विदेश विभाग के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जैकब एस. हेलबर्ग से मुलाकात कर द्विपक्षीय तकनीकी सहयोग को मजबूत बनाने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। बैठक का मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों की पहचान करना था जहां दोनों देश मिलकर दीर्घकालिक और भरोसेमंद साझेदारी विकसित कर सकते हैं।

    वार्ता के दौरान सेमीकंडक्टर निर्माण को विशेष प्राथमिकता दी गई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित और विविधतापूर्ण बनाने के लिए सेमीकंडक्टर उत्पादन क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। हाल के वर्षों में चिप्स की वैश्विक कमी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी उद्योगों की स्थिरता के लिए मजबूत और विश्वसनीय उत्पादन नेटवर्क बेहद जरूरी हैं।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी दोनों देशों के बीच व्यापक चर्चा हुई। भारत और अमेरिका ने एआई तकनीक के विकास, उसके सुरक्षित उपयोग और विभिन्न क्षेत्रों में उसके प्रभावी अनुप्रयोग को बढ़ावा देने पर विचार साझा किए। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में एआई स्वास्थ्य, शिक्षा, विनिर्माण, रक्षा और वित्तीय सेवाओं सहित अनेक क्षेत्रों में बड़े बदलाव ला सकता है।

    बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता और आपूर्ति को लेकर भी महत्वपूर्ण बातचीत हुई। ये खनिज उन्नत विनिर्माण, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी उत्पादन और रक्षा उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। दोनों देशों ने इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के उपायों पर चर्चा की।

    भारत और अमेरिका के बीच यह संवाद ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। तकनीकी सहयोग को लेकर दोनों देशों की बढ़ती नजदीकियां वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

    इस बीच केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में कहा था कि वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है और इसमें कुशल पेशेवरों की भारी मांग पैदा हो रही है। उनके अनुसार वर्तमान में लगभग 800 अरब डॉलर मूल्य की यह इंडस्ट्री जल्द ही 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर सकती है।

    वैष्णव ने यह भी बताया कि वर्ष 2032 तक दुनिया भर में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में लगभग 10 लाख नई नौकरियां पैदा होने की संभावना है। वहीं उद्योग को लगभग 10 लाख कुशल पेशेवरों की कमी का भी सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में भारत के पास वैश्विक तकनीकी प्रतिभा केंद्र के रूप में उभरने और दुनिया को प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध कराने का सुनहरा अवसर है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता यह तकनीकी सहयोग न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भी नई दिशा तय कर सकता है।

  • अमेरिका की चेतावनी: चीन पर निर्भर क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन बन सकती है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती

    अमेरिका की चेतावनी: चीन पर निर्भर क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन बन सकती है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर रणनीतिक महत्व रखने वाले क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका ने गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा है कि दुनिया भर में जरूरी खनिजों के उत्पादन और प्रोसेसिंग पर एक ही देश की अत्यधिक निर्भरता आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। उनके अनुसार लिथियम, कोबाल्ट, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और ग्रेफाइट जैसे खनिज आधुनिक तकनीक, रक्षा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर्स और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, और इन पर सीमित देशों का नियंत्रण वैश्विक असंतुलन पैदा कर सकता है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने संसद में दिए बयान में कहा कि यदि किसी जरूरी संसाधन की सप्लाई का लगभग पूरा हिस्सा एक ही देश पर केंद्रित हो जाए, तो यह स्थिति केवल आर्थिक जोखिम नहीं बल्कि रणनीतिक कमजोरी भी बन जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी निर्भरता संकट के समय राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने का माध्यम बन सकती है, जिससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका रहती है।

    उन्होंने बताया कि अमेरिका इस स्थिति से निपटने के लिए दुनिया के कई देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है ताकि सप्लाई चेन को अधिक विविध और संतुलित बनाया जा सके। इसके तहत केवल कच्चे माल की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग क्षमता को भी विभिन्न देशों में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। उनका कहना था कि अब यह रणनीति अमेरिकी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है और लगभग सभी राजनयिक मिशनों में इस विषय पर काम किया जा रहा है।

    इस मुद्दे को लेकर अमेरिका की नीति चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है। इसी कारण अमेरिका कई देशों को साथ लेकर एक व्यापक सप्लाई नेटवर्क बनाने की दिशा में काम कर रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता को कम किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की भूमिका लगातार बढ़ रही है, जिससे इनके उत्पादन और आपूर्ति पर नियंत्रण रखने वाले देशों की रणनीतिक शक्ति भी बढ़ती जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक तेज होती दिख रही है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यापार और तकनीकी संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि केवल खनिज ही नहीं, बल्कि दवा निर्माण जैसे अन्य क्षेत्रों में भी उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण चिंता का विषय है। उनके अनुसार भविष्य की वैश्विक नीतियों में सप्लाई चेन की सुरक्षा और विविधीकरण को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में दुनिया को बड़े व्यवधान से बचाया जा सके।

  • ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव, भारत-अमेरिका साझेदारी से क्रिटिकल मिनरल्स पर नया रणनीतिक खेल

    ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव, भारत-अमेरिका साझेदारी से क्रिटिकल मिनरल्स पर नया रणनीतिक खेल

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर हुए नए रणनीतिक समझौते को वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक समीकरणों में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य 14 महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित और विविध बनाना है, जिनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरणों और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों में बड़े पैमाने पर होता है। इस समझौते के बाद दोनों देश मिलकर खनन, प्रसंस्करण और आपूर्ति नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में काम करेंगे, जिससे वैश्विक बाजार में एक संतुलित विकल्प तैयार हो सके।

    विशेषज्ञों के अनुसार अब तक इन खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता कुछ देशों तक सीमित रही है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक तरह का केंद्रीकरण देखा गया है। भारत और अमेरिका का यह सहयोग इसी निर्भरता को कम करने और एक वैकल्पिक ढांचा विकसित करने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। योजना के तहत भारत में रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग क्षमताओं को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिससे कच्चे माल के मूल्यवर्धन की प्रक्रिया देश के भीतर ही पूरी हो सके। इससे औद्योगिक उत्पादन और तकनीकी विकास को भी गति मिलने की संभावना है।

    इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें 14 क्रिटिकल मिनरल्स को प्राथमिकता दी गई है, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट जैसे तत्व शामिल हैं। इन खनिजों का उपयोग आधुनिक तकनीक और ऊर्जा परिवर्तन के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इलेक्ट्रिक वाहनों के बैटरी सिस्टम से लेकर उन्नत सैन्य उपकरणों तक, इन संसाधनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसी कारण वैश्विक स्तर पर इनकी आपूर्ति और नियंत्रण को लेकर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।

    इस रणनीतिक साझेदारी के तहत अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में संयुक्त निवेश और खनन परियोजनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। भारत और अमेरिका की संस्थाएं मिलकर इन क्षेत्रों में खनन अवसरों का विस्तार कर सकती हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला अधिक स्थिर और विविध हो सके। इससे वैश्विक स्तर पर संसाधनों पर एकाधिकार की स्थिति को संतुलित करने का प्रयास माना जा रहा है।

    भारत में इस समझौते का एक बड़ा प्रभाव सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग पर भी देखने को मिल सकता है। देश में विकसित हो रहे सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स को गैलियम, जर्मेनियम और इंडियम जैसे दुर्लभ खनिजों की नियमित आपूर्ति की आवश्यकता होती है। इस सहयोग से इन संसाधनों की उपलब्धता में सुधार होने की संभावना है, जिससे भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को बल मिल सकता है।

    इसके साथ ही अमेरिका को भी भारत से उच्च गुणवत्ता वाले प्रोसेस्ड मैग्नेट्स और अन्य औद्योगिक उत्पादों की आपूर्ति का लाभ मिलेगा, जो उनके रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर में उपयोगी होंगे। यह आपसी निर्भरता आधारित व्यापार मॉडल दोनों देशों के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के ढांचे में धीरे-धीरे एक बड़ा बदलाव ला सकता है। क्लीन एनर्जी और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में नए सहयोग मॉडल उभर सकते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और संसाधन प्रबंधन की दिशा बदल सकती है।

  • लिथियम से लेकर टाइटेनियम तक भारत की नई खनिज नीति से आत्मनिर्भरता को मिलेगा बल

    लिथियम से लेकर टाइटेनियम तक भारत की नई खनिज नीति से आत्मनिर्भरता को मिलेगा बल


    नई दिल्ली:
    देश की आर्थिक उन्नति और भविष्य की ऊर्जा परियोजनाओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है सोमवार से खनिज ब्लॉकों की नीलामी के सातवें चरण की शुरुआत होगी इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया का शुभारंभ केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी और राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे द्वारा किया जाएगा। भारत के खान मंत्रालय के अनुसार यह नीलामी देश की खनिज सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए बेहद अहम मानी जा रही है
    आज के समय में जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीकों की ओर तेजी से बढ़ रही है तब लिथियम ग्रेफाइट दुर्लभ पृथ्वी तत्व टंगस्टन वैनेडियम और धातुओं जैसे खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है हालांकि इन खनिजों की उपलब्धता सीमित है और कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित होने के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बना रहता है।
    46 खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर चुकी है जिसे उद्योग जगत से पॉजिटिव रिएक्शन मिला है इससे यह संकेत मिलता है कि भारत के खनिज क्षेत्र में निवेश और भागीदारी बढ़ रही है सातवें चरण में इस रेट को जारी रखते हुए कई राज्यों में 19 नए ब्लॉक नीलामी के लिए पेश किए जाएंगे जिनमें स्वच्छ ऊर्जा उर्वरक और खनिज उद्योगों के लिए जरूरी खनिज शामिल हैं

    नीलामी प्रक्रिया को ज्यादा उचित और असरदार बनाने के लिए सरकार ने नियमों में भी कई सुधार किए हैं 2025 और 2026 के संशोधनों के तहत प्रदर्शन सुरक्षा अग्रिम भुगतान और अन्य गतिविधियों को सरल बनाया गया है साथ ही बैंक गारंटी के विकल्प के रूप में बीमा गारंटी बॉन्ड की सुविधा भी दी गई है जिससे भारतीयों को आसानी होगी

    यह पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन दो चरणों वाली उचित नीलामी प्रणाली के तहत आयोजित की जाएगी जिसमें उच्चतम बोली लगाने वाले को खनन का अधिकार मिलेगा इस पहल से न केवल देश की खनिज आपूर्ति मजबूत होगी बल्कि भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी वहीं

    आने वाले समय में यह कदम भारत को स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है

  • अमेरिका की नई योजना: 50 देशों के साथ चीन के खनिज प्रभुत्व को देगा चुनौती, भारत की भूमिका अहम

    अमेरिका की नई योजना: 50 देशों के साथ चीन के खनिज प्रभुत्व को देगा चुनौती, भारत की भूमिका अहम


    नई दिल्ली। अमेरिका चीन के वर्चस्व वाले क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ा रणनीतिक कदम उठा रहा है। 4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ बैठक में अमेरिका ने करीब 50 देशों का एक ट्रेडिंग ब्लॉक बनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के उत्पादन, प्रोसेसिंग और कीमतों को स्थिर करना और चीन के प्रभुत्व को तोड़ना है।

    अमेरिका की रणनीति
    उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बैठक में कहा कि सदस्य देशों के उत्पादकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम कीमत और टैरिफ जैसी व्यवस्थाएं की जाएंगी। उनका कहना था कि अमेरिका अपनी क्रिटिकल मिनरल्स इंडस्ट्री को पुनर्जीवित करना चाहता है और चीन जैसी बाजार-सक्रियता से बचाव जरूरी है। वेंस ने इसे “साथी और सहयोगी के बीच सुरक्षित जोन” बताया, जिसमें अमेरिकी उद्योग को आवश्यक खनिजों की निर्बाध आपूर्ति और मित्र देशों में संयुक्त उत्पादन बढ़ाने पर जोर होगा।

    ब्लॉक का उद्देश्य
    चीन वर्तमान में दुनिया के लगभग 70% रेयर अर्थ माइनिंग और 90% प्रोसेसिंग पर नियंत्रण रखता है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, जेट इंजन, सेमीकंडक्टर और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम के लिए ये खनिज जरूरी हैं। अमेरिका का यह ब्लॉक चीन के एकाधिकार को तोड़ने और सप्लाई चेन को ‘डी-रिस्क’ De-risk करने की वैश्विक रणनीति है।

    भारत की भागीदारी और अवसर
    भारत ने इस बैठक में सक्रिय भूमिका निभाई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आपूर्ति शृंखला में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत के पास लिथियम और कॉपर के बड़े भंडार हैं, और इस ब्लॉक के माध्यम से उसे माइनिंग और प्रोसेसिंग में अमेरिकी तकनीक और फंड का लाभ मिल सकता है। इससे भारत अपनी चिप-मैन्युफैक्चरिंग और EV योजनाओं के लिए चीन पर निर्भर नहीं रहेगा।

    जयशंकर ने सोशल मीडिया पर कहा अत्यधिक संकेंद्रण से जुड़ी चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से आपूर्ति शृंखलाओं के जोखिम को कम करने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कनाडा, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, इटली, मलेशिया, बहरीन, मंगोलिया, पोलैंड, रोमानिया, इजराइल और उज्बेकिस्तान के मंत्रियों के साथ भी बैठक की।