Tag: CriticalMinerals

  • लिथियम कोबाल्ट और निकेल की बढ़ेगी रिकॉर्ड मांग विकसित भारत के लक्ष्य में क्रिटिकल मिनरल निभाएंगे सबसे अहम भूमिका

    लिथियम कोबाल्ट और निकेल की बढ़ेगी रिकॉर्ड मांग विकसित भारत के लक्ष्य में क्रिटिकल मिनरल निभाएंगे सबसे अहम भूमिका


    नई दिल्ली। भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसके साथ ही आने वाले वर्षों में क्रिटिकल मिनरल की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि होने की संभावना जताई गई है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2047 तक देश में लिथियम कोबाल्ट निकेल ग्रेफाइट तांबा और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की मांग वर्तमान स्तर से चार से दस गुना तक बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को विकसित भारत 2047 और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करना है तो इन महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल होगी।

    रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता विकसित करने का लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए भी तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं। यही कारण है कि बैटरियों और ऊर्जा भंडारण प्रणाली में इस्तेमाल होने वाले खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि केवल इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों की मांग ही वर्ष 2030 तक 110 से 130 गीगावाट तक पहुंच सकती है जिससे इन खनिजों का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा।

    रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत को केवल खनिजों के आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू स्तर पर अन्वेषण रिफाइनिंग प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग की मजबूत व्यवस्था विकसित करनी होगी। यदि देश समय रहते इन क्षेत्रों में निवेश करता है तो भविष्य में वैश्विक आपूर्ति संकट और आयात पर बढ़ती निर्भरता से बचा जा सकता है। इसके साथ ही घरेलू उद्योगों को भी नई गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

    विशेषज्ञों ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तीन चरणों वाला रोडमैप भी सुझाया है। पहले चरण में वर्ष 2026 से 2031 के बीच बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसमें एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी लागू करना सर्कुलर मिनरल प्रोसेसिंग जोन विकसित करना और बैटरी ट्रेसबिलिटी तथा रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करना शामिल है। दूसरे चरण में वर्ष 2031 से 2036 के बीच रीसाइक्लिंग नेटवर्क का विस्तार और ग्रीन फाइनेंसिंग के जरिए औद्योगिक विकास को गति देने की योजना प्रस्तावित की गई है।

    तीसरे और अंतिम चरण में वर्ष 2036 से 2047 तक भारत को रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने आयात पर निर्भरता कम करने और 10 से 15 अरब डॉलर की वार्षिक रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था विकसित करने की परिकल्पना की गई है। इससे भारत वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नीतियों का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं बल्कि संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसके लिए खनिज आधारित रणनीतियों को अपनाने घरेलू वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने और मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की आवश्यकता बताई गई है। साथ ही डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने और निजी निवेश आकर्षित करने पर भी जोर दिया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रिफाइनिंग सेपरेशन और रीसाइक्लिंग जैसे क्षेत्र अत्यधिक पूंजी निवेश वाले हैं और इनमें निवेश का लाभ लंबे समय बाद मिलता है। इसलिए सरकारी सहायता ग्रीन बॉन्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वेंचर कैपिटल और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों के सहयोग जैसी बहुस्तरीय वित्तीय व्यवस्था विकसित करना जरूरी होगा। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के लिए किए गए वित्तीय प्रावधान को सकारात्मक कदम बताते हुए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए और अधिक लक्षित वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि भारत भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को आत्मनिर्भर तरीके से पूरा कर सके।

  • भारत-अमेरिका ने सेमीकंडक्टर, एआई और क्रिटिकल मिनरल्स पर बढ़ाया रणनीतिक फोकस, उभरती तकनीकों में गहरे सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

    भारत-अमेरिका ने सेमीकंडक्टर, एआई और क्रिटिकल मिनरल्स पर बढ़ाया रणनीतिक फोकस, उभरती तकनीकों में गहरे सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच उभरती प्रौद्योगिकियों तथा रणनीतिक औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा देने के उद्देश्य से उच्च स्तरीय वार्ता आयोजित की गई। इस चर्चा में सेमीकंडक्टर निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की मजबूती और क्रिटिकल मिनरल्स तक पहुंच जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। दोनों देशों ने बदलते वैश्विक आर्थिक और तकनीकी परिदृश्य के बीच साझेदारी को और गहरा करने की आवश्यकता पर बल दिया।

    वाशिंगटन में आयोजित इस बैठक के दौरान भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों ने तकनीकी सहयोग के विभिन्न आयामों पर चर्चा की। बातचीत का प्रमुख केंद्र उन क्षेत्रों पर रहा जिन्हें भविष्य की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेष रूप से सेमीकंडक्टर निर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में संयुक्त प्रयासों की संभावनाओं का मूल्यांकन किया गया।

    वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर उद्योग को आधुनिक तकनीकी विकास की रीढ़ माना जाता है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑटोमोबाइल, रक्षा उपकरण और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के निर्माण में इसकी केंद्रीय भूमिका है। हाल के वर्षों में दुनिया ने चिप आपूर्ति संकट का सामना किया है, जिसके बाद कई देशों ने इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित करने पर जोर बढ़ाया है। भारत और अमेरिका की यह पहल भी इसी व्यापक रणनीतिक सोच का हिस्सा मानी जा रही है।

    वार्ता के दौरान दोनों देशों ने भरोसेमंद और विविधीकृत सप्लाई चेन विकसित करने पर भी विशेष ध्यान दिया। वैश्विक व्यापार में भू-राजनीतिक चुनौतियों और आपूर्ति व्यवधानों को देखते हुए मजबूत सप्लाई नेटवर्क की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी उत्पादों और औद्योगिक विनिर्माण के लिए स्थिर आपूर्ति श्रृंखला भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बनेगी।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस चर्चा का एक प्रमुख विषय रहा। एआई वर्तमान समय में स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त, विनिर्माण और प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों को तेजी से प्रभावित कर रहा है। भारत और अमेरिका दोनों ही इस तकनीक को आर्थिक विकास, नवाचार और उत्पादकता बढ़ाने के प्रभावी माध्यम के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में एआई अनुसंधान, नवाचार और व्यावसायिक उपयोग के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।

    इसके साथ ही क्रिटिकल मिनरल्स तक पहुंच सुनिश्चित करने के मुद्दे पर भी बातचीत हुई। ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, क्लीन एनर्जी सिस्टम, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों के लिए अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं। वैश्विक स्तर पर इन संसाधनों की बढ़ती मांग को देखते हुए कई देश इनके सुरक्षित और स्थायी स्रोत विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। भारत और अमेरिका ने भी इस क्षेत्र में सहयोग को रणनीतिक महत्व का विषय माना है।

    यह संवाद ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में डिजिटल प्रौद्योगिकी, नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण के क्षेत्रों में सहयोग का दायरा तेजी से बढ़ा है। दोनों देश उभरती तकनीकों के क्षेत्र में दीर्घकालिक साझेदारी को वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग आने वाले वर्षों में तेज विस्तार के दौर में प्रवेश करने वाला है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। भारत के पास विशाल तकनीकी प्रतिभा और प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध हैं, जिससे वह वैश्विक सेमीकंडक्टर और उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कौशल केंद्र के रूप में उभर सकता है।

    कुल मिलाकर यह वार्ता केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था, औद्योगिक सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति तंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है। आने वाले वर्षों में इस सहयोग का प्रभाव तकनीक, निवेश, रोजगार और नवाचार के क्षेत्र में व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है।

  • वैश्विक संसाधनों की नई जंग में बड़ा कदम: भारत-अमेरिका समझौते से तकनीक और उद्योग क्षेत्र को मिलेगा नया आधार

    वैश्विक संसाधनों की नई जंग में बड़ा कदम: भारत-अमेरिका समझौते से तकनीक और उद्योग क्षेत्र को मिलेगा नया आधार

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी अब एक नए और महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। दोनों देशों ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की माइनिंग, प्रोसेसिंग और सुरक्षित सप्लाई को लेकर एक व्यापक समझौते पर सहमति जताई है। वैश्विक स्तर पर इस समझौते को भविष्य की अर्थव्यवस्था, तकनीकी विकास और रणनीतिक संसाधनों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच यह कदम केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक नजरिए से भी विशेष महत्व रखता है।

    पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की मांग लगातार बढ़ी है। आधुनिक तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उपकरण, सेमीकंडक्टर उद्योग और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ इन संसाधनों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जिन देशों के पास इन संसाधनों की मजबूत उपलब्धता और सप्लाई चेन होगी, वे वैश्विक तकनीकी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में आगे रहेंगे।

    भारत और अमेरिका के बीच हुआ यह समझौता इसी व्यापक सोच का हिस्सा माना जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि एक ऐसी आपूर्ति व्यवस्था तैयार करना भी है जो किसी एक क्षेत्र या सीमित स्रोत पर अत्यधिक निर्भर न हो। वैश्विक बाजार में सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों को देखते हुए यह पहल दोनों देशों के लिए रणनीतिक सुरक्षा का आधार बन सकती है।

    इस समझौते से भारत को विशेष लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। आर्थिक मामलों के जानकारों के अनुसार इससे भारत माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसाइक्लिंग और निवेश जैसे क्षेत्रों में अपनी भूमिका को मजबूत कर सकता है। इसके साथ ही घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को भी नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। लंबे समय से भारत उत्पादन और तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है और यह समझौता उस प्रयास को गति देने वाला कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में भविष्य की प्रतिस्पर्धा काफी हद तक रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर आधारित होगी। ऐसे में इन संसाधनों तक सुरक्षित और स्थिर पहुंच किसी भी देश की औद्योगिक शक्ति को प्रभावित कर सकती है। इसी कारण यह समझौता केवल व्यापारिक नहीं बल्कि तकनीकी और रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक भी बनकर सामने आया है।

    इसी दौरान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्गों की सुरक्षा, व्यापारिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन को लेकर सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में ऐसी साझेदारियां भविष्य के आर्थिक और रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।

    फिलहाल यह समझौता भारत और अमेरिका के संबंधों में एक नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में इसके प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वैश्विक रणनीति और तकनीकी विकास के क्षेत्र में भी इसके दूरगामी परिणाम दिखाई दे सकते हैं।