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  • सिरोही में क्रॉस वोटिंग के आरोपों से भाजपा में घमासान, मंदिर में वफादारी की कसम खाने वाले पार्षद समेत चार लोग व्हाट्सऐप ग्रुप से हटाए

    सिरोही में क्रॉस वोटिंग के आरोपों से भाजपा में घमासान, मंदिर में वफादारी की कसम खाने वाले पार्षद समेत चार लोग व्हाट्सऐप ग्रुप से हटाए

    सिरोही। राजस्थान के सिरोही में नगर परिषद सभापति चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर क्रॉस वोटिंग को लेकर विवाद जारी है। पार्टी के नगर मंडल के व्हाट्सऐप ग्रुप से तीन पार्षदों और एक पार्षद पति को हटा दिया गया है। इनमें गीता पुरोहित, प्रवीण राठौड़, गौरव प्रजापत और धनपत सिंह शामिल हैं। इस घटनाक्रम को सभापति चुनाव में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को अपेक्षा से कम वोट मिलने के बाद उठे सवालों से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, भाजपा ने अब तक किसी पार्षद के क्रॉस वोटिंग करने की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    सिरोही नगर परिषद में कुल 35 वार्ड हैं। सितंबर 2026 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 23 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा के खाते में 10 सीटें आई थीं। दो वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुए थे। इसके बाद 21 सितंबर को सभापति पद के लिए चुनाव हुआ। कांग्रेस ने रितु जैन को और भाजपा ने पूजा माली को उम्मीदवार बनाया था। मतदान में रितु जैन को 30 वोट मिले, जबकि पूजा माली को केवल 5 वोट प्राप्त हुए। इस तरह कांग्रेस ने 25 वोटों के अंतर से सभापति पद पर जीत हासिल की। बाद में कांग्रेस के ईश्वर सिंह उपसभापति पद पर निर्विरोध चुने गए और नगर परिषद में कांग्रेस का बोर्ड बन गया।

    भाजपा के 10 पार्षदों के मुकाबले पार्टी उम्मीदवार को केवल पांच वोट मिलने के बाद क्रॉस वोटिंग की आशंका जताई जाने लगी। नतीजों के आधार पर यह सवाल उठा कि क्या भाजपा के कुछ पार्षदों ने कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, सभापति चुनाव में मतदान गोपनीय होने के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि किस पार्षद ने किस उम्मीदवार को वोट दिया। पार्टी के भीतर संदेह और असंतोष के बीच बुधवार देर रात चार लोगों को नगर मंडल के व्हाट्सऐप ग्रुप से हटा दिया गया। फिलहाल उनके खिलाफ पार्टी से निष्कासन या किसी पद से हटाने का आदेश सामने नहीं आया है।

    इस विवाद में गौरव प्रजापत का नाम भी चर्चा में है। सभापति चुनाव के बाद भाजपा के पांच पार्षद सारणेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे थे। वहां उन्होंने हाथ में जल लेकर पार्टी के प्रति वफादार रहने और सभापति पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का समर्थन करने की कसम खाई थी। इन पार्षदों में गौरव प्रजापत का नाम भी बताया गया था। अब उन्हें भी व्हाट्सऐप ग्रुप से हटाए जाने के बाद मंदिर में ली गई कसम का मामला फिर चर्चा में आ गया है। हालांकि, गौरव प्रजापत के क्रॉस वोटिंग करने की पुष्टि नहीं हुई है।

    व्हाट्सऐप ग्रुप से हटाए जाने के बाद पार्षद प्रवीण राठौड़ ने संगठन के सभी पदों और जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने बताया कि वह लंबे समय से ईमानदारी के साथ पार्टी के लिए काम कर रहे थे और संगठन की ओर से दी गई जिम्मेदारियां निभाते रहे। नगर परिषद चुनाव के बाद पार्टी में हुए घटनाक्रम से उन्हें दुख पहुंचा है। उनके अनुसार, अब पहले की तरह सम्मान और भरोसे के साथ काम करना मुश्किल हो गया है। उन्होंने अपना इस्तीफा व्हाट्सऐप के माध्यम से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष को भेजा है। राठौड़ ने संगठन के पद छोड़े हैं, लेकिन पार्षद पद से इस्तीफा नहीं दिया है।

    सिरोही भाजपा जिलाध्यक्ष रक्षा भंडारी ने कहा कि उन्हें पार्षदों को व्हाट्सऐप ग्रुप से हटाए जाने की जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि सभापति चुनाव में क्रॉस वोटिंग को लेकर कुछ पार्षदों के खिलाफ शिकायतें मिली हैं और संगठन इन शिकायतों के आधार पर कार्रवाई करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें किसी पार्षद का इस्तीफा नहीं मिला है। इस बीच जिले के अन्य निकायों में भी क्रॉस वोटिंग की चर्चा है। पिंडवाड़ा में उपसभापति और शिवगंज में सभापति चुनाव के दौरान दूसरी पार्टी को एक-एक वोट मिलने की बात सामने आई है। आबूरोड में सभापति चुनाव में भाजपा को 27 और कांग्रेस को 13 वोट मिले थे, जबकि उपसभापति चुनाव में भाजपा के वोट घटकर 22 और कांग्रेस के बढ़कर 18 हो गए। हालांकि, इन मामलों में भी संबंधित मतदाताओं की पहचान की पुष्टि नहीं हुई है। सिरोही में सभापति चुनाव से पहले रितु जैन के नामांकन पर भाजपा ने आपत्ति जताई थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद दोनों उम्मीदवार मैदान में रहे और रितु जैन चुनाव जीत गईं।

  • यूपी राज्यसभा चुनाव में सपा का तीसरा दांव, 10 सीटों पर मुकाबला रोचक; बीजेपी की आठवीं सीट और क्रॉस वोटिंग पर नजर

    यूपी राज्यसभा चुनाव में सपा का तीसरा दांव, 10 सीटों पर मुकाबला रोचक; बीजेपी की आठवीं सीट और क्रॉस वोटिंग पर नजर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में 10 राज्यसभा सीटों के लिए नामांकन का मंगलवार को आखिरी दिन है। दोपहर तीन बजे तक उम्मीदवार अपना नामांकन दाखिल कर सकते हैं। इसी वजह से राज्य में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। भारतीय जनता पार्टी ने आठ और समाजवादी पार्टी ने दो प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। सात सीटों पर बीजेपी की जीत संख्या बल के आधार पर लगभग तय मानी जा रही है, जबकि सपा के दो उम्मीदवारों के लिए भी स्थिति मजबूत है। हालांकि बीजेपी के आठवें उम्मीदवार और सपा के संभावित तीसरे उम्मीदवार के कारण चुनाव का गणित दिलचस्प हो गया है।

    सपा के तीसरे उम्मीदवार को लेकर पार्टी के भीतर लगातार चर्चा चल रही है। राज्यसभा उम्मीदवार रामगोपाल यादव से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अभी तीन बजे तक नामांकन का समय है और फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव चाहेंगे तो तीसरा उम्मीदवार उतरेगा, नहीं तो नहीं उतरेगा। अखिलेश यादव मंगलवार को विपक्षी गठबंधन के विरोध मार्च में शामिल हुए। विपक्षी सांसद संसद भवन के मकर द्वार से निर्वाचन आयोग मुख्यालय की ओर मार्च कर रहे थे। ऐसे में नामांकन की समयसीमा खत्म होने तक यह स्पष्ट होना था कि सपा तीसरा प्रत्याशी उतारती है या नहीं।

    सपा के तीसरे उम्मीदवार के नामांकन को लेकर यह भी दावा किया गया कि पार्टी ने जरूरी 10 विधायकों के हस्ताक्षर बतौर प्रस्तावक जुटा लिए हैं। तीसरे उम्मीदवार के नामांकन की स्थिति में 16 अक्टूबर को मतदान होना है और मुकाबला अतिरिक्त वोटों पर निर्भर हो सकता है। सपा पहले ही अपने वरिष्ठ राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव और रिलायंस ग्रुप के सीईओ धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। दोनों उम्मीदवार अखिलेश यादव की मौजूदगी में अपना नामांकन दाखिल कर चुके हैं। रामगोपाल यादव छठी बार राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं।

    उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर मौजूदा सांसदों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। विधानसभा में विधायकों की प्रभावी संख्या 397 बताई गई है। इस हिसाब से प्रत्येक उम्मीदवार को जीत के लिए कम से कम 37 मतों की जरूरत होगी। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास करीब 285 से 290 विधायक हैं। इस संख्या के आधार पर बीजेपी के सात उम्मीदवारों की जीत आसान मानी जा रही है, लेकिन आठवीं सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। दूसरी ओर सपा के पास 101 विधायक बताए गए हैं, जिससे उसके दो उम्मीदवारों की जीत संभव है। तीसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए सपा को अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी।

    वोटों के इसी गणित के कारण क्रॉस वोटिंग को लेकर भी चर्चा है। बीजेपी के आठवें उम्मीदवार और सपा के संभावित तीसरे उम्मीदवार के लिए अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी। कांग्रेस के दो विधायक सपा के खाते में बताए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद तीसरे उम्मीदवार के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना जरूरी होगा। ऐसे में दोनों दलों के सामने अतिरिक्त वोट जुटाने की चुनौती होगी। अंतिम दिन नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सपा तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है या नहीं। यदि तीसरा उम्मीदवार उतरता है तो 10 सीटों के लिए उम्मीदवारों की संख्या बढ़ जाएगी और 16 अक्टूबर को मतदान की स्थिति बनेगी।

    राज्यसभा चुनाव में तीसरे उम्मीदवार को लेकर सपा की रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है। पार्टी के पास दो सीटों के लिए पर्याप्त संख्या है, जबकि तीसरे उम्मीदवार के लिए उसे अतिरिक्त विधायकों का समर्थन चाहिए। बीजेपी ने आठ उम्मीदवार उतारकर आठवीं सीट के लिए भी दावा पेश किया है। ऐसे में नामांकन की अंतिम समयसीमा तक दोनों दलों की रणनीति और विधायकों के समर्थन का गणित महत्वपूर्ण बना हुआ है। मतदान की स्थिति बनने पर क्रॉस वोटिंग भी चुनाव के परिणाम को प्रभावित करने वाला अहम पहलू हो सकती है।

  • विधान परिषद चुनाव में NDA को झटका, कांग्रेस की रणनीति सफल; BJP ने बनाई जांच कमेटी, प्रदेश नेतृत्व दिल्ली तलब

    विधान परिषद चुनाव में NDA को झटका, कांग्रेस की रणनीति सफल; BJP ने बनाई जांच कमेटी, प्रदेश नेतृत्व दिल्ली तलब


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। चुनाव के दौरान कथित क्रॉस वोटिंग की घटनाओं ने भारतीय जनता पार्टी के भीतर गंभीर चिंताएं बढ़ा दी हैं। पार्टी नेतृत्व ने इस मामले को संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा मानते हुए तत्काल जांच के आदेश दिए हैं। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भाजपा ने स्पष्ट संकेत दिया है कि पार्टी लाइन से हटकर मतदान करने वाले नेताओं और विधायकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा सकती है।

    कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए अपने सभी उम्मीदवारों को जीत दिलाने में सफलता हासिल की। वहीं भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल जनता दल (सेक्युलर) को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। चुनावी गणित के आधार पर जिस प्रकार के परिणामों की संभावना जताई जा रही थी, उससे अलग तस्वीर सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में क्रॉस वोटिंग की चर्चा तेज हो गई।

    चुनाव परिणामों के विश्लेषण के दौरान यह बात सामने आई कि कुछ विधायकों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के बजाय अन्य दलों के उम्मीदवारों को समर्थन दिया हो सकता है। इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए भाजपा नेतृत्व ने पूरे मामले की आंतरिक जांच कराने का निर्णय लिया है। पार्टी का मानना है कि यदि संगठन के भीतर अनुशासनहीनता या राजनीतिक विश्वासघात की कोई घटना हुई है, तो उसकी पूरी सच्चाई सामने आना आवश्यक है।

    भाजपा द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति को पूरे घटनाक्रम की विस्तार से समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। समिति चुनावी मतदान के पैटर्न, विधायकों की भूमिका और संभावित क्रॉस वोटिंग से जुड़े सभी तथ्यों का अध्ययन करेगी। जांच टीम को निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट पार्टी नेतृत्व को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं ताकि आवश्यक कार्रवाई पर निर्णय लिया जा सके।

    इस घटनाक्रम के बाद भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी के शीर्ष नेताओं ने राज्य इकाई से विस्तृत जानकारी मांगी है। इसी क्रम में प्रदेश नेतृत्व और वरिष्ठ पदाधिकारियों को राष्ट्रीय राजधानी बुलाया गया है, जहां चुनावी परिणामों और संगठनात्मक स्थिति पर व्यापक चर्चा की जाएगी। माना जा रहा है कि बैठक में भविष्य की रणनीति और अनुशासनात्मक कदमों पर भी विचार किया जाएगा।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्रॉस वोटिंग जैसी घटनाएं केवल चुनावी हार-जीत तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि संगठन की आंतरिक एकजुटता और नेतृत्व की पकड़ को भी प्रभावित करती हैं। ऐसे मामलों में राजनीतिक दल आमतौर पर कड़ा रुख अपनाते हैं ताकि भविष्य में इस प्रकार की परिस्थितियों को रोका जा सके। भाजपा भी इसी दिशा में सक्रिय दिखाई दे रही है।

    प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि पार्टी अनुशासन सर्वोपरि है और किसी भी स्तर पर अनुशासनहीनता को स्वीकार नहीं किया जाएगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद यदि किसी विधायक या पदाधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो उसके खिलाफ संगठनात्मक नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

    कर्नाटक विधान परिषद चुनाव के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब केवल चुनावी परिणामों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राज्य की राजनीति और भाजपा संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है। आने वाले दिनों में जांच समिति की रिपोर्ट और पार्टी नेतृत्व के फैसलों पर राजनीतिक हलकों की नजर बनी रहेगी।

  • कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका, दो विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस की पांचवीं सीट की राह आसान

    कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका, दो विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस की पांचवीं सीट की राह आसान


    नई दिल्ली । कर्नाटक विधान परिषद की सात सीटों के लिए जारी चुनावी प्रक्रिया के बीच भारतीय जनता पार्टी को एक अप्रत्याशित राजनीतिक झटका लगा है। मतदान के दौरान भाजपा से निष्कासित दो विधायकों द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किए जाने की खबर ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस घटनाक्रम को कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बढ़त और भाजपा के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

    विधान परिषद की सात सीटों के लिए हो रहे चुनाव में कुल आठ उम्मीदवार मैदान में हैं। सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा में मौजूद दलों की संख्या के आधार पर कांग्रेस चार और भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती थी। हालांकि सातवीं सीट को लेकर पहले से ही कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। अब क्रॉस वोटिंग की खबरों ने इस मुकाबले को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

    राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा उन दो विधायकों को लेकर हो रही है जिन्होंने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। दोनों नेताओं को पहले भाजपा से निष्कासित किया जा चुका है, लेकिन उनके वोटों का असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। मतदान के दौरान उनकी मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत माना है।

    कर्नाटक में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन के बाद डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला है। ऐसे में विधान परिषद का यह चुनाव उनके नेतृत्व की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। कांग्रेस की कोशिश है कि उपलब्ध संख्या बल के अलावा निर्दलीय और अन्य समर्थन जुटाकर परिषद में अपनी स्थिति और मजबूत बनाई जाए। दूसरी ओर भाजपा इस चुनाव को अपनी संगठनात्मक मजबूती और विपक्षी भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रही है।

    निर्वाचन प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक उम्मीदवार को जीत सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम 28 वोटों की आवश्यकता है। विधानसभा में कांग्रेस के पास सबसे अधिक विधायक हैं, जबकि भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) भी अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। सातवीं सीट के लिए आवश्यक अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने रही है। ऐसे में क्रॉस वोटिंग की घटना चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर केवल परिषद चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में राज्य की राजनीतिक दिशा और दलों के भीतर अनुशासन संबंधी सवालों को भी प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से भाजपा के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि पार्टी से अलग हो चुके नेताओं का प्रभाव अभी भी कुछ क्षेत्रों में बना हुआ है।

    चुनाव मैदान में कांग्रेस, भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला जारी है। कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार उतारे हैं जबकि भाजपा के दो और जेडीएस का एक प्रत्याशी मैदान में है। इस कारण अंतिम सीट को लेकर राजनीतिक रणनीतियां लगातार बदलती रही हैं।

    मतदान समाप्त होने के बाद मतगणना के साथ ही तस्वीर साफ होगी कि क्रॉस वोटिंग का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा। हालांकि मतदान के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक की राजनीति में अंदरूनी खींचतान और राजनीतिक पुनर्संरेखण की प्रक्रिया अभी भी जारी है।

    विधान परिषद चुनाव के नतीजे न केवल दलों की वर्तमान ताकत को दर्शाएंगे, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीतिक रणनीतियों और गठबंधनों की दिशा भी तय कर सकते हैं। इसी कारण सभी दलों की नजर अब मतगणना और अंतिम परिणामों पर टिकी हुई है।

  • झारखंड राज्यसभा चुनाव में '61' का नया सियासी सस्पेंस, क्या एनडीए खेमे में सेंधमारी कर पाएगा सत्तारूढ़ महागठबंधन

    झारखंड राज्यसभा चुनाव में '61' का नया सियासी सस्पेंस, क्या एनडीए खेमे में सेंधमारी कर पाएगा सत्तारूढ़ महागठबंधन

    नई दिल्ली । झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की सियासत में भारी गरमाहट पैदा कर दी है। चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे दोनों ही खेमों के बीच शह और मात का खेल दिलचस्प होता जा रहा है। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ महागठबंधन अपने दोनों प्रत्याशियों की जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त दिख रहा है, वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए भी अपनी रणनीति को धार देने में जुटा हुआ है। इस बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक नए नारे ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है और राज्य में बड़े सियासी उलटफेर के संकेत दे दिए हैं।

    सत्तारूढ़ दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव विनोद पांडेय द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किए गए ’56 नहीं, 61′ के नारे ने चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से रहस्यमयी बना दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस संक्षिप्त लेकिन प्रभावी संदेश के कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं। वर्तमान संख्या बल के हिसाब से देखा जाए तो विधानसभा में इंडिया गठबंधन के पास कुल छप्पन विधायक मौजूद हैं, जो दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए पूरी तरह से पर्याप्त हैं। ऐसे में महासचिव के इस दावे के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि महागठबंधन विपक्ष के कुछ विधायकों को अपने पाले में लाने में सफल हो चुका है।

    संख्या बल के वास्तविक समीकरणों पर नजर डालें तो इक्यासी सदस्यीय झारखंड विधानसभा में इंडिया गठबंधन के पास वर्तमान में कुल छप्पन विधायकों का मजबूत समर्थन हासिल है। इस कुनबे में झारखंड मुक्ति मोर्चा के चौंतीस, कांग्रेस के सोलह, राष्ट्रीय जनता दल के चार और सीपीआई एमएल के दो विधायक शामिल हैं। दूसरी तरफ, एनडीए गठबंधन के पाले में कुल चौबीस विधायक हैं, जबकि एक विधायक निर्दलीय चुनाव जीतकर सदन में पहुंचे हैं। नियम के अनुसार, एक राज्यसभा सीट पर सीधे तौर पर जीत दर्ज करने के लिए किसी भी प्रत्याशी को कम से कम अट्ठाईस प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है।

    गणित के इस खेल में महागठबंधन को अपनी दोनों सीटों पर प्रणव झा और वैद्यनाथ राम को सुरक्षित रूप से राज्यसभा भेजने के लिए कुल छप्पन वोटों की जरूरत है, जो उनके पास पहले से ही उपलब्ध हैं। वहीं, एनडीए द्वारा समर्थित प्रत्याशी परिमल नथवानी की राह थोड़ी मुश्किल नजर आ रही है। एनडीए के पास अपने केवल चौबीस वोट हैं और उन्हें जीत की दहलीज पार करने के लिए चार और अतिरिक्त मतों की दरकार है। शुरुआत में कयास लगाए जा रहे थे कि एनडीए विपक्षी खेमे के असंतुष्ट विधायकों में सेंध लगाकर यह जादुई आंकड़ा हासिल कर सकता है, लेकिन जेएमएम के नए नारे ने पासा पलट दिया है।

    अब चर्चा इस बात की है कि महागठबंधन खुद एनडीए के पांच विधायकों को अपने पक्ष में मतदान कराने के लिए तैयार कर चुका है, जिससे उनका आंकड़ा छप्पन से बढ़कर इकसठ तक पहुंच सकता है। इस संभावित क्रॉस वोटिंग के डर ने दोनों ही खेमों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। राज्य में रिसॉर्ट और होटल पॉलिटिक्स एक बार फिर सक्रिय हो गई है, जहां विधायकों को एकजुट रखने के लिए गुप्त रणनीतियां बनाई जा रही हैं और मॉक पोल के जरिए मतदान का अभ्यास कराया जा रहा है। मतदान की प्रक्रिया सुबह से शुरू होकर शाम तक चलेगी, जिसके तुरंत बाद आने वाले परिणाम ही इस नए नारे के वास्तविक सच और झारखंड की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे।

  • राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    नई दिल्ली । राज्यसभा की रिक्त हो रही 26 सीटों के लिए 18 जून को होने वाले चुनाव से पहले देश की राजनीति में गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्यसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रहा है, जबकि विपक्षी दल अपने मौजूदा संख्या बल को सुरक्षित रखने और संभावित राजनीतिक चुनौतियों से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही कई राज्यों में राजनीतिक समीकरणों और संभावित क्रॉस-वोटिंग को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    इस बार सबसे अधिक चर्चा मध्य प्रदेश और झारखंड की हो रही है, जहां भाजपा के कुछ फैसलों ने विपक्षी दलों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों राज्यों में उम्मीदवारों के चयन और चुनावी गणित ने मुकाबले को अपेक्षा से अधिक दिलचस्प बना दिया है। भाजपा की कोशिश केवल अपनी सीटें सुरक्षित करने तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि वह विपक्षी दलों पर मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाने का प्रयास भी कर रही है।

    मध्य प्रदेश में भाजपा द्वारा तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतारना राजनीतिक हलकों में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और वह दो सीटों पर सहज जीत की स्थिति में मानी जा रही है। हालांकि तीसरे उम्मीदवार की एंट्री ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, को सतर्क कर दिया है। कांग्रेस का मानना है कि यह कदम चुनावी मुकाबले को जटिल बनाने और विपक्षी खेमे में असहजता पैदा करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठा सकती है। संभावित क्रॉस-वोटिंग या अनुपस्थिति की आशंकाओं के बीच पार्टी नेतृत्व लगातार अपने विधायकों के संपर्क में बताया जा रहा है। इसी कारण राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में गतिविधियां सामान्य से अधिक तेज हो गई हैं।

    विधानसभा के वर्तमान गणित के अनुसार किसी उम्मीदवार को जीत के लिए निर्धारित संख्या में मतों की आवश्यकता होगी। ऐसे में अतिरिक्त उम्मीदवार की मौजूदगी चुनाव को केवल औपचारिक प्रक्रिया न बनाकर रणनीतिक मुकाबले में बदल सकती है। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल लगातार एक-दूसरे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी कर रहे हैं।

    झारखंड में भी राजनीतिक तस्वीर कम दिलचस्प नहीं है। यहां दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय स्वरूप ले चुका है। झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन देकर चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस फैसले ने राज्य में राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

    झारखंड में अब नजर इस बात पर रहेगी कि उपलब्ध संख्या बल और सहयोगी दलों के समर्थन के आधार पर कौन-सा उम्मीदवार बढ़त हासिल कर पाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मतदान के दौरान कोई अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आता है तो परिणामों पर उसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

    दूसरी ओर राजस्थान में स्थिति अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है। यहां रिक्त सीटों के मुकाबले उतने ही उम्मीदवार मैदान में होने के कारण निर्विरोध निर्वाचन की संभावना मजबूत मानी जा रही है। वहीं गुजरात में भी भाजपा के उम्मीदवारों की राह अपेक्षाकृत आसान दिखाई दे रही है और वहां बड़े मुकाबले की संभावना कम नजर आ रही है।

    राज्यसभा चुनाव भले ही प्रत्यक्ष जनमत से नहीं लड़े जाते, लेकिन इनका राजनीतिक महत्व बेहद व्यापक होता है। संसद के उच्च सदन में संख्या बल किसी भी सरकार की विधायी क्षमता को प्रभावित करता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले प्रत्येक सीट को लेकर राजनीतिक दल पूरी ताकत और रणनीति के साथ मैदान में उतरते हैं। इस बार भी मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में विकसित हो रहे समीकरण चुनावी प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहे हैं।