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  • अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत: खुदरा महंगाई में फिर तेजी के संकेत

    अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत: खुदरा महंगाई में फिर तेजी के संकेत


    नई दिल्ली । भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर जारी एक नई आकलन रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव फिर से बढ़ सकता है। अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में देश की औसत खुदरा महंगाई दर 5.1 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। हालांकि हाल के महीनों में महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है, लेकिन वैश्विक और घरेलू परिस्थितियां आगे चलकर स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।

    पिछले कुछ समय में खुदरा महंगाई में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन यह अब भी सीमित दायरे में बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में उपभोक्ता कीमतों पर बड़ा दबाव पूरी तरह सामने नहीं आया है, लेकिन आने वाले समय में यह स्थिति बदल सकती है। ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती लागत इस दबाव का एक प्रमुख कारण मानी जा रही है, जिसका असर धीरे-धीरे परिवहन और उत्पादन लागत पर पड़ रहा है।

    कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि भी एक अहम चिंता का विषय बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहने की आशंका है, जिससे आयात बिल बढ़ सकता है और इसका सीधा असर घरेलू बाजार की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे न केवल ईंधन बल्कि वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का जोखिम रहता है।

    हालांकि सरकार की ओर से ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने के प्रयासों से अभी तक उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिली है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जैसे-जैसे लागत बढ़ेगी, कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे महंगाई में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

    इसके अलावा खाद्य महंगाई को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। मौसम से जुड़े जोखिम, खासकर कम मानसून और अल नीनो जैसी परिस्थितियां, कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। यदि फसल उत्पादन में गिरावट आती है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जा रहा है, जिससे आम लोगों की खर्च क्षमता पर असर पड़ सकता है।

    अर्थव्यवस्था से जुड़े जानकारों का मानना है कि फिलहाल महंगाई स्थिर दिख रही है, लेकिन यह स्थिरता अस्थायी हो सकती है। आने वाले महीनों में ऊर्जा, परिवहन और खाद्य क्षेत्रों से जुड़े कारक मिलकर महंगाई की दिशा तय करेंगे।

  • पेट्रोल-डीजल के दाम में नहीं हुआ कोई बदलाव, 7 मई को भी ईंधन कीमतें स्थिर

    पेट्रोल-डीजल के दाम में नहीं हुआ कोई बदलाव, 7 मई को भी ईंधन कीमतें स्थिर

    नई दिल्ली। देशभर में 7 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में किसी तरह का बदलाव नहीं देखा गया। लगातार कई दिनों से ईंधन के दाम स्थिर बने हुए हैं, जिससे उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू स्तर पर इसका असर तुरंत दिखाई नहीं दे रहा है।

    भारत में ईंधन की कीमतें रोजाना आधार पर तय की जाती हैं, लेकिन हाल के समय में इनमें स्थिरता बनी हुई है। इसका मुख्य कारण वैश्विक बाजार में संतुलन और घरेलू टैक्स संरचना का स्थिर रहना माना जा रहा है। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों और मुद्रा विनिमय दरों के आधार पर रेट तय करती हैं, लेकिन फिलहाल बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं।

    राजधानी दिल्ली में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले की तरह ही बनी हुई हैं। वहीं मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर के आसपास या उससे ऊपर बनी हुई हैं। डीजल की कीमतें अधिकतर शहरों में अभी भी 100 रुपये के नीचे हैं।

    महानगरों में ईंधन की कीमतों में अंतर टैक्स और परिवहन लागत की वजह से देखने को मिलता है। कुछ शहरों में पेट्रोल की कीमतें अपेक्षाकृत अधिक हैं, जबकि छोटे शहरों में यह दरें थोड़ी कम बनी हुई हैं।

    पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव कम देखने को मिले हैं। टैक्स में बदलाव के बाद से कीमतें एक सीमित दायरे में स्थिर बनी हुई हैं, जिससे उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली है।

    ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं, जिनमें कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स और लॉजिस्टिक्स लागत शामिल हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में किसी भी बदलाव का असर धीरे-धीरे घरेलू कीमतों पर पड़ता है।

  • भारतीय बाजार में रिकवरी के संकेत रुपया 91- तक मजबूत हो सकता है रिपोर्ट..

    भारतीय बाजार में रिकवरी के संकेत रुपया 91- तक मजबूत हो सकता है रिपोर्ट..

    नई दिल्ली:भारतीय शेयर बाजार में आने वाले महीनों में मजबूत वापसी के संकेत मिल रहे हैं। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और शेयरों के वैल्यूएशन में कमी के चलते बाजार में सुधार की संभावना बन रही है। रिपोर्ट के अनुसार डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी मजबूती दिखाते हुए 91 के स्तर तक पहुंच सकता है।

    एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड मौजूदा 6.83 प्रतिशत से घटकर लगभग 6.65 प्रतिशत तक आ सकती है। यह बदलाव अगले दो से तीन महीनों में देखने को मिल सकता है, जब बाजार सामान्य स्थिति में लौटने लगेगा।

    हालांकि, पिछले कुछ समय में बाजार पर विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव साफ दिखाई दिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि निफ्टी पिछले तीन कारोबारी सत्रों में करीब 5 प्रतिशत तक गिरा, जिसकी मुख्य वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली रही। इसके बावजूद उम्मीद जताई गई है कि यह ट्रेंड जल्द बदल सकता है और भारत निवेश के लिए आकर्षक बाजार बनकर उभर सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्त वर्ष 2027 में अगर ब्रेंट क्रूड की कीमत औसतन 80 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6.6 प्रतिशत रह सकती है। इसके साथ ही मुद्रास्फीति बढ़कर 4.3 प्रतिशत और चालू खाता घाटा जीडीपी के 1.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।

    अगर वैश्विक परिस्थितियों के कारण तेल की कीमतें और बढ़ती हैं और ब्रेंट 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला जाता है, तो भारत के लिए आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में चालू खाता घाटा 2.5 प्रतिशत से अधिक हो सकता है और व्यापार घाटा 85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मौजूदा तेल कीमतों के स्तर पर सरकार को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में लगभग 19.5 रुपए प्रति लीटर की कटौती करनी पड़ सकती है। साथ ही एलपीजी पर करीब 1 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त सब्सिडी का भार भी सरकार को उठाना पड़ सकता है।

  • ईरान ने कतर की गैस फैसिलिटी पर किया मिसाइल हमला, भारत में LPG महंगा होने का खतरा

    ईरान ने कतर की गैस फैसिलिटी पर किया मिसाइल हमला, भारत में LPG महंगा होने का खतरा


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष अब सीधे ऊर्जा अवसंरचना पर बढ़ते हमलों की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में ईरान ने कतर की अहम गैस फैसिलिटी रास लाफान पर मिसाइल हमला किया, जिससे आग लगी और ढांचागत नुकसान हुआ। इस हमले के बाद वैश्विक गैस और तेल बाजार में हलचल मच गई है।

    ईरान का एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला

    ईरान ने इस कदम के जरिए इजरायल पर साउथ पार्स गैस फील्ड पर हुए हमले का बदला लेना शुरू किया। मिसाइल हमले से कतर की प्रमुख LNG लिक्विफाइड नेचुरल गैस उत्पादन सुविधाएं प्रभावित हुईं और रास लाफान कॉम्प्लेक्स ने तुरंत अपना उत्पादन रोक दिया। इसके अलावा ईरान ने सऊदी अरब और यूएई में तेल और गैस ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी भी दी है।

    कतर के गैस हब पर आग और नुकसान

    रास लाफान कॉम्प्लेक्स, कतर की सबसे महत्वपूर्ण गैस सुविधाओं में से एक है। इस हमले से वैश्विक ऊर्जा मार्केट में अनिश्चितता बढ़ गई है। इससे साफ संकेत मिलता है कि यह संघर्ष अब केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरा बन गया है।

    भारत पर असर क्यों होगा

    भारत अपनी गैस जरूरतों का करीब 47% हिस्सा कतर से आयात करता है। सालाना 27 मिलियन टन LNG में से लगभग 12-13 मिलियन टन कतर से आती है। रास लाफान पर हमले के कारण भारत को गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा होर्मुज जलसंधि में बढ़ता तनाव पहले से ही भारत के गैस टैंकरों की आवाजाही में बाधा डाल रहा है।

    एलपीजी और घरेलू गैस की कीमतें बढ़ने का खतरा

    भारत में घरेलू एलपीजी रसोई गैस का बड़ा हिस्सा LNG पर आधारित है। अगर कतर की गैस फैसिलिटी लंबे समय तक ठप रही, तो भारत को दूसरी जगह से महंगी गैस खरीदनी पड़ सकती है। इसका असर सीधे सिलेंडर की कीमतों पर और आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

    अनिश्चित भविष्य और बढ़ता जोखिम
    विश्लेषकों के मुताबिक, यदि ईरान के हमले जारी रहे और रास लाफान पूरी तरह बंद हो जाए, तो गैस और तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर और बढ़ सकती हैं। भारत की मिडिल ईस्ट पर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बढ़ता जोखिम बनती जा रही है। आम जनता पर इसका असर आने वाले महीनों में घरेलू गैस और पेट्रोल-डीजल के महंगे होने के रूप में दिख सकता है।