Tag: crude oil price

  • होर्मुज तनाव से उछला कच्चा तेल, 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट; पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ी चिंता

    होर्मुज तनाव से उछला कच्चा तेल, 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट; पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रमों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। तेल बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के कारण निवेशकों और आयातक देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।

    बाजार आंकड़ों के अनुसार ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड में भी तेजी देखने को मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल आपूर्ति मार्गों को लेकर पैदा हुई आशंकाओं ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है, जिसके चलते कीमतों में तेजी आई है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या आपूर्ति बाधित होने की आशंका सीधे तेल बाजार को प्रभावित करती है। रिपोर्टों के अनुसार हालिया घटनाओं के बाद निवेशकों ने आपूर्ति जोखिम को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। हालांकि बाजार की दिशा काफी हद तक आने वाले दिनों में राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। फिलहाल निवेशक हर नए घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी महत्वपूर्ण मानी जाती है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का असर परिवहन, उद्योग और महंगाई पर पड़ सकता है। हालांकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की दरों से तय नहीं होतीं, बल्कि इनमें कर, परिवहन लागत, विनिमय दर और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी अहम भूमिका निभाती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भविष्य में ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल किसी तत्काल मूल्य वृद्धि को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    देश के प्रमुख महानगरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में ईंधन दरों में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव दर्ज नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के कारण उपभोक्ताओं और उद्योग जगत की निगाहें तेल बाजार पर टिकी हुई हैं।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक मांग और आपूर्ति संतुलन तथा प्रमुख तेल उत्पादक देशों की नीतियां कच्चे तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगी। ऐसे में ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का दौर कुछ समय तक जारी रह सकता है।

  • पेट्रोल की कीमतों का रहस्य: अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?

    पेट्रोल की कीमतों का रहस्य: अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?


    नई दिल्ली । दुनिया भर के बाजारों में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है, लेकिन इसका फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को तुरंत नहीं मिल रहा है। यही कारण है कि आम लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जब ब्रेंट क्रूड सस्ता हो रहा है तो देश में पेट्रोल और डीजल महंगा क्यों हो रहा है।

    दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल 98 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुका है, जिससे यह उम्मीद थी कि भारत में ईंधन सस्ता होगा। लेकिन इसके उलट हाल के हफ्तों में पेट्रोल और डीजल के दामों में कई बार बढ़ोतरी देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर कई रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    इस स्थिति की एक बड़ी वजह तेल कंपनियों की मूल्य नीति और उनका वित्तीय संतुलन है। भारत की प्रमुख तेल कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum Corporation Limited और Hindustan Petroleum Corporation Limited पहले वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने के बावजूद कीमतें तुरंत नहीं बढ़ा पाईं थीं। उस समय कंपनियों ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए खुद घाटा सहा था। अब माना जा रहा है कि वे उसी पुराने नुकसान की भरपाई कर रही हैं।

    इसके अलावा भारत की तेल आयात पर भारी निर्भरता भी कीमतों को प्रभावित करती है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वैश्विक बाजार में मामूली उतार-चढ़ाव भी घरेलू कीमतों पर सीधा असर डालता है।

    एक और अहम कारण है डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी। भारत कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है। इसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता क्यों न हो रहा हो।

    कीमतों में टैक्स का भी बड़ा योगदान होता है। पेट्रोल और डीजल के दाम सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करते, बल्कि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के एक्साइज ड्यूटी और वैट जैसे टैक्स भी शामिल होते हैं। यही टैक्स अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने वाली कीमत को काफी बढ़ा देते हैं।

    इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन खर्च, डीलर कमीशन और लॉजिस्टिक्स लागत भी अंतिम कीमत में जुड़ते हैं। इन सभी कारकों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का असर तुरंत भारतीय बाजार में नहीं दिखता।

    विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और नीचे नहीं आतीं, रुपया मजबूत नहीं होता और टैक्स संरचना में राहत नहीं मिलती, तब तक पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी कमी की उम्मीद करना मुश्किल है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार

    अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ नजर आने लगा है। लगातार तीसरे दिन कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती सख्ती और जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। इसी के चलते ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

    फरवरी से अब तक 50% से ज्यादा महंगा हुआ तेल

    विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। फरवरी से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं पिछले सप्ताह ही कीमतों में करीब 8 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया था।

    ट्रंप चाहते हैं कि ईरान जल्द समझौते के लिए तैयार हो जाए। माना जा रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएं कम हो सकती हैं और तेल परिवहन सामान्य हो सकता है।

    ट्रंप ने दी सख्त चेतावनी

    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि तेहरान के पास समय बहुत कम है और उसे जल्द फैसला लेना होगा। ट्रंप ने कहा कि ईरान को केवल एक परमाणु साइट संचालित करने की अनुमति होगी, जबकि बाकी साइटों को बंद करना पड़ेगा।

    इसके अलावा ट्रंप ने हाई एनरिच्ड यूरेनियम का भंडार अमेरिका को सौंपने की बात कही। उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका ईरान की विदेशों में फ्रीज की गई संपत्तियों का बड़ा हिस्सा जारी नहीं करेगा।

    ईरान ने भी दी जवाबी धमकी

    ट्रंप के बयान के बाद ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ईरानी सैन्य प्रवक्ता अबोलफजल शेकर्ची ने कहा कि यदि ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी संसाधनों और ठिकानों को निशाना बनाने में देर नहीं लगेगी।

    यूएई के न्यूक्लियर प्लांट के पास ड्रोन हमला

    इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अल धफरा क्षेत्र स्थित बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के बाहरी हिस्से में ड्रोन हमला होने की खबर सामने आई है। हमले के बाद इलाके में आग लग गई, हालांकि सुरक्षा और दमकल टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक, इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

  • शेयर बाजार में गिरावट: सेंसेक्स-निफ्टी 2% से ज्यादा टूटे, निवेशकों में चिंता

    शेयर बाजार में गिरावट: सेंसेक्स-निफ्टी 2% से ज्यादा टूटे, निवेशकों में चिंता


    नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारतीय शेयर बाजार को इस सप्ताह गहरे दबाव में डाल दिया। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच निवेशकों की धारणा कमजोर रही, जिसका असर सीधे तौर पर प्रमुख बेंचमार्क सूचकांकों सेंसेक्स और निफ्टी पर देखने को मिला। दोनों सूचकांक सप्ताह के अंत में 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए।

    एनएसई निफ्टी-50 इस सप्ताह 2.2 प्रतिशत यानी 532 अंक टूटकर 23,643.5 के स्तर पर आ गया, जबकि बीएसई सेंसेक्स 2.7 प्रतिशत यानी 2,000 से अधिक अंकों की गिरावट के साथ 75,238 पर बंद हुआ। बाजार में यह गिरावट केवल बड़े इंडेक्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक बाजार भी इसकी चपेट में आ गया। मिडकैप इंडेक्स में 2 प्रतिशत से ज्यादा और स्मॉलकैप इंडेक्स में करीब 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की संपत्ति पर और अधिक दबाव बना।

    सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो रियल्टी और आईटी सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। बीएसई रियल्टी इंडेक्स में लगभग 8 प्रतिशत की तेज गिरावट दर्ज हुई, जबकि आईटी इंडेक्स 5.7 प्रतिशत टूट गया। ऑटो, कैपिटल गुड्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल, बैंकिंग और पीएसयू सेक्टर में भी लगातार बिकवाली का दबाव देखने को मिला। हालांकि, कुछ रक्षात्मक सेक्टर जैसे मेटल और हेल्थकेयर ने थोड़ी मजबूती दिखाई और मामूली बढ़त दर्ज की।

    सेंसेक्स के प्रमुख शेयरों में टाइटन सबसे बड़ा नुकसान झेलने वाला स्टॉक रहा, जिसमें 7.6 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, टेक महिंद्रा और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे बड़े शेयरों में भी कमजोरी देखी गई, जिससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया।

    विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 105 से 110 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी हुई हैं, जो महंगाई और आर्थिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय है। इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर की मजबूती और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी ने उभरते बाजारों से विदेशी निवेश को बाहर खींचा है, जिससे एफआईआई की लगातार बिकवाली देखने को मिल रही है।

    हालांकि, इस नकारात्मक माहौल के बीच घरेलू निवेशकों की भागीदारी बाजार के लिए एक सहारा बनी रही। एसआईपी के जरिए लगातार आने वाले निवेश ने बाजार को कुछ हद तक स्थिर बनाए रखने में मदद की। अप्रैल में एसआईपी निवेश 31,115 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जिसने विदेशी बिकवाली के असर को आंशिक रूप से संतुलित किया।

    कुल मिलाकर, वैश्विक तनाव, तेल कीमतों में उछाल और आर्थिक अनिश्चितताओं के चलते भारतीय शेयर बाजार में दबाव बना हुआ है, और आने वाले समय में निवेशकों की नजर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और कच्चे तेल के रुझानों पर टिकी रहेगी।

  • वैश्विक संकट का असर जारी, कच्चा तेल 100 डॉलर के आसपास रहने की संभावना

    वैश्विक संकट का असर जारी, कच्चा तेल 100 डॉलर के आसपास रहने की संभावना

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, जहां कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता की बजाय उतार-चढ़ाव का दबाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही रणनीतिक समुद्री मार्गों में कुछ राहत मिले, लेकिन वैश्विक बाजार पर इसका तात्कालिक असर सीमित रहेगा।

    विश्लेषकों के अनुसार, शिपिंग व्यवस्था, रिफाइनरी संचालन और टैंकरों की उपलब्धता पर पड़ रहे दबाव के कारण तेल की सप्लाई चेन पूरी तरह सामान्य नहीं हो पा रही है। इन बाधाओं के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है और बड़े सुधार की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है।

    रिपोर्ट में यह भी अनुमान जताया गया है कि आने वाले समय में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकती है। इसका मतलब है कि ऊर्जा बाजार को मध्यम अवधि में सप्लाई की कमी और भू-राजनीतिक तनाव दोनों का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है, क्योंकि तेल की कीमतों का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और महंगाई पर पड़ता है।

    हाल के दिनों में तेल बाजार में तेजी भी देखी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रही है, जबकि अन्य बेंचमार्क भी इसी स्तर के आसपास मजबूती दिखा रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़त केवल मांग और आपूर्ति के असंतुलन का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता की भी अहम भूमिका है।

    इसके अलावा, उत्पादन में भी गिरावट देखने को मिली है। प्रमुख तेल उत्पादक समूह द्वारा हाल के महीनों में उत्पादन में कटौती के कारण वैश्विक आपूर्ति और सीमित हो गई है। उत्पादन में इस कमी ने कीमतों को और अधिक मजबूती दी है और बाजार में अस्थिरता को बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सिर्फ समुद्री मार्गों के सामान्य होने से बाजार तुरंत स्थिर नहीं होगा। लॉजिस्टिक चुनौतियां, सप्लाई चेन की बाधाएं और उत्पादन में असंतुलन आने वाले महीनों तक जारी रह सकते हैं। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर देखने को मिलेगा।

    कुल मिलाकर, कच्चे तेल का बाजार फिलहाल एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, जहां हर भू-राजनीतिक घटना कीमतों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जब तक वैश्विक स्तर पर तनाव और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं पूरी तरह हल नहीं होतीं, तब तक तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद कम ही दिखाई देती है।

  • कच्चे तेल की तेजी से शेयर बाजार दबाव में, बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली

    कच्चे तेल की तेजी से शेयर बाजार दबाव में, बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली


    नई दिल्ली| कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार मंगलवार को कमजोरी के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिसका असर सीधे प्रमुख सूचकांकों पर दिखाई दिया।

    सुबह 9:17 बजे तक सेंसेक्स करीब 203 अंक गिरकर 77,099 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी लगभग 50 अंक टूटकर 24,042 पर पहुंच गया। बाजार में शुरुआती गिरावट का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक तनाव को माना जा रहा है।

    सेक्टोरल फ्रंट पर बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखने को मिली। Nifty Bank Index में आधा प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विसेज, फार्मा, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर भी लाल निशान में रहे।

    हालांकि कुछ सेक्टरों में मजबूती भी देखी गई। एनर्जी, मेटल, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटो और डिफेंस सेक्टर में खरीदारी का रुझान बना रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए हरे निशान में कारोबार किया, जिससे व्यापक बाजार में कुछ संतुलन देखने को मिला।

    एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा। टोक्यो, शंघाई और हांगकांग के बाजार कमजोर रहे, जबकि बैंकॉक और सोल में हल्की तेजी देखी गई। वहीं अमेरिकी बाजारों में सोमवार को डाओ जोन्स में गिरावट और नैस्डैक में हल्की तेजी दर्ज की गई।

    बाजार पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 109 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह तेजी मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव का परिणाम है, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती अनिश्चितता के कारण। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के शांति प्रस्ताव पर अमेरिका की असहमति ने भी बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई है, जिससे ऊर्जा कीमतों में तेजी आई है।

    जब तक कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक तनाव में स्थिरता नहीं आती, तब तक शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • अनिवेशकों सावधान! कच्चे तेल के चलते 15 साल के सबसे बड़े संकट की ओर बाजार, सोना और चांदी भी डॉलर की मजबूती के आगे पस्त

    अनिवेशकों सावधान! कच्चे तेल के चलते 15 साल के सबसे बड़े संकट की ओर बाजार, सोना और चांदी भी डॉलर की मजबूती के आगे पस्त


    नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय निवेशकों की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान स्थिति निवेश के हर मोर्चे-चाहे वह शेयर बाजार हो, सोना-चांदी हो या म्यूचुअल फंड-के लिए बड़ा झटका साबित हो रही है। इस पूरे संकट की धुरी “कच्चा तेल” बना हुआ है, जिसके बेतहाशा बढ़ते दाम वैश्विक अर्थव्यवस्था के पहियों को जाम कर रहे हैं। यदि तनाव बढ़ता है और होर्मुज जलमार्ग Strait of Hormuzपर तेल की आपूर्ति 4 से 8 सप्ताह तक बाधित रहती है, तो कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए शेयर बाजार में भारी गिरावट और आसमान छूती महंगाई का दोहरा संकट खड़ा होना तय है।

    बाजार विश्लेषकों के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में भारतीय बाजार ने कई युद्ध और वैश्विक संकट देखे हैं, लेकिन यह पहली बार है जब सभी एसेट क्लास Asset Classesमें एक साथ गिरावट दर्ज की जा रही है। इसका सीधा असर विदेशी संस्थागत निवेशकों FPI के व्यवहार पर दिख रहा है, जिन्होंने इस महीने भारतीय बाजार से लगभग 52,704 करोड़ रुपये की भारी बिकवाली की है। निवेशक अब जोखिम भरे इक्विटी मार्केट से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर और बॉन्ड्स की ओर रुख कर रहे हैं। गौरतलब है कि कच्चे तेल के दाम संघर्ष की शुरुआत के समय 72.48 डॉलर प्रति बैरल थे, जो मार्च तक 65% की उछाल के साथ 119 डॉलर के पार निकल गए थे, और अब एक बार फिर 100 डॉलर के ऊपर बने हुए हैं।

    इस अनिश्चितता का सबसे चौंकाने वाला असर सोने और चांदी पर पड़ा है। आम तौर पर युद्ध के समय सोने की कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन इस बार डॉलर की मजबूती ने इसे फीका कर दिया है। फरवरी के अंत से अब तक सोना 6% और चांदी 9% तक टूट चुकी है। चूंकि कच्चे तेल का व्यापार डॉलर में होता है, तेल की कीमतें बढ़ने से डॉलर की मांग और मजबूती बढ़ जाती है, जिसका सीधा दबाव कीमती धातुओं पर पड़ता है। वहीं, म्यूचुअल फंड सेक्टर में भी घबराहट साफ देखी जा सकती है; फरवरी में जहां 65.7 लाख नए SIP खाते खुले, वहीं लगभग 49.7 लाख खाते बंद भी हो गए, जिससे ‘एसआईपी स्टॉपेज अनुपात’ बढ़कर 76% के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

    हालांकि, विशेषज्ञों का एक धड़ा यह भी मानता है कि भारतीय बाजार हर बड़े झटके से उबरने का माद्दा रखता है। उदाहरण के तौर पर, 2020 के कोविड संकट के दौरान बाजार ने जितनी बड़ी गिरावट देखी थी, उसके अगले कुछ ही वर्षों में निवेशकों को 21-22% तक का शानदार रिटर्न भी दिया। फिलहाल ऑटो, बैंकिंग और कंज्यूमर सेक्टर के शेयरों पर बिकवाली का सबसे ज्यादा दबाव है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए इतिहास गवाह है कि संकट के बाद बाजार हमेशा मजबूती से वापसी करता है। आगे की राह इस बात पर टिकी है कि मध्य-पूर्व का यह तनाव कितनी जल्दी शांत होता है।

  • मिडिल ईस्ट संकट गहराया, Crude Oil की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पार

    मिडिल ईस्ट संकट गहराया, Crude Oil की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पार


    नई दिल्ली।मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया और कीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष और तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण निवेशकों में चिंता बढ़ गई है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ा है।

    ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई में तेज उछाल
    अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude की कीमत 9 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 100.76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। वहीं अमेरिकी मानक कच्चे तेल WTI Crude का भाव भी करीब 9 प्रतिशत की तेजी के साथ लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता नजर आया। तेल बाजार में इस तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।

    आईईए ने इमरजेंसी रिजर्व से तेल जारी करने का फैसला
    कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए International Energy Agency (आईईए) ने बड़ा कदम उठाया है। 32 सदस्य देशों वाले इस संगठन ने अपने आपातकालीन भंडार से 400 मिलियन बैरल कच्चा तेल जारी करने की घोषणा की है। यह आईईए के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा इमरजेंसी रिलीज माना जा रहा है। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों में तेजी को कुछ हद तक नियंत्रित करना है।

    अमेरिका ने भी रणनीतिक भंडार से तेल जारी करने की घोषणा की
    आईईए के फैसले के अलावा United States Department of Energy ने भी अलग से बड़ा ऐलान किया है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने अपने Strategic Petroleum Reserve से 172 मिलियन बैरल तेल जारी करने की घोषणा की है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव Chris Wright के अनुसार इस तेल की आपूर्ति अगले सप्ताह से शुरू हो सकती है और इसे पूरा होने में लगभग 120 दिन का समय लग सकता है।

    पहले भी 119 डॉलर तक पहुंच चुका है कच्चा तेल
    विशेषज्ञों के अनुसार हाल के दिनों में मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के कारण कच्चे तेल की कीमतें पहले भी तेजी से बढ़ी थीं और एक समय यह 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में बाजार में कुछ स्थिरता आने के बाद कीमतें गिरकर लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ गई थीं। लेकिन मौजूदा हालात ने फिर से बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
    तेल बाजार में तेजी की एक बड़ी वजह Strait of Hormuz में बढ़ता तनाव भी है। यह मध्य पूर्व का एक संकरा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया में उत्पादित होने वाले करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

    तेल टैंकरों पर हमलों से बढ़ी चिंता
    मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। यही कारण है कि निवेशकों और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है और कच्चे तेल की कीमतों में फिर से तेज उछाल देखने को मिल रहा है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच राहत: भारत में नहीं बढ़ेंगे पेट्रोल डीजल के दाम, कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से LPG आयात की तैयारी

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच राहत: भारत में नहीं बढ़ेंगे पेट्रोल डीजल के दाम, कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से LPG आयात की तैयारी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है लेकिन भारत सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश में पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे। छह दिन से जारी युद्ध के चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 16 प्रतिशत बढ़कर 85 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है और ब्रेंट क्रूड लगभग 85.41 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। इसके बावजूद केंद्र सरकार का कहना है कि भारत के पास पर्याप्त तेल और गैस का भंडार मौजूद है और घरेलू बाजार पर इसका तत्काल कोई असर नहीं पड़ेगा।

    पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर तेजी से काम किया है। एलपीजी के मामले में भारत केवल कतर पर निर्भर नहीं है बल्कि ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने भी गैस की आपूर्ति का प्रस्ताव दिया है। सरकार का कहना है कि जरूरत पड़ने पर इन देशों से आयात बढ़ाकर किसी भी संभावित कमी को पूरा किया जा सकता है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक भारत लगातार विभिन्न ऊर्जा उत्पादकों और आपूर्तिकर्ताओं के संपर्क में है और स्थिति पर करीबी नजर रखी जा रही है।

    दरअसल पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के बीच कतर ने अस्थायी रूप से अपना गैस उत्पादन रोक दिया है जिसका असर वैश्विक आपूर्ति पर पड़ सकता है। वर्तमान में भारत लगभग 195 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का आयात करता है जिसमें करीब 60 एमएमएससीएम यानी लगभग 30 प्रतिशत गैस कतर से आती है। सरकार का कहना है कि इस कमी को पूरा करने के लिए अन्य देशों से गैस आयात बढ़ाने की योजना तैयार है। यदि जरूरत पड़ी तो गैस कंपनियां उद्योगों को गैस आपूर्ति की प्राथमिकताओं में बदलाव कर सकती हैं लेकिन घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पीएनजी और सीएनजी जैसे घरेलू उपयोग वाले गैस उपभोक्ताओं को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। उद्योगों के पास वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत उपलब्ध होते हैं इसलिए गैस की संभावित कमी की स्थिति में आपूर्ति का संतुलन बनाया जा सकता है। फिलहाल ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी है जिससे आम उपभोक्ताओं को चिंता करने की जरूरत पड़े।

    ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सरकार ने यह भी जानकारी दी है कि देश में फिलहाल करीब 50 दिनों के लिए तेल का पर्याप्त भंडार मौजूद है। इसमें 25 दिनों के लिए कच्चे तेल का स्टॉक और लगभग 25 दिनों की जरूरत के हिसाब से पेट्रोल और डीजल उपलब्ध है। इसके अलावा भारत लगातार दूसरे देशों से भी तेल आपूर्ति को लेकर बातचीत कर रहा है ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

    ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की दी जा रही धमकी को लेकर भी सरकार ने कहा है कि इसका भारत पर सीमित असर पड़ेगा। भारत के कुल तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा ही इस मार्ग से गुजरता है जबकि बाकी 60 प्रतिशत अन्य रास्तों से आता है। सरकार ने सुरक्षित मार्गों से आयात बढ़ाने की रणनीति भी तैयार कर ली है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध कुछ समय और चलता है तो कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं लेकिन संघर्ष थमते ही कीमतों में गिरावट की संभावना है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता पर्याप्त है। इस बीच भारत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और ओपेक जैसे संगठनों के साथ भी आपूर्ति को लेकर लगातार बातचीत कर रहा है। साथ ही समुद्री परिवहन को सुरक्षित और सस्ता बनाए रखने के लिए अमेरिका की वित्तीय संस्था डीएफसी के साथ जहाजों के बीमा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा जारी है।

  • ईरान-इजरायल टकराव का तेल बाजार पर पड़ा असर, कच्चा तेल 80 डॉलर के पार

    ईरान-इजरायल टकराव का तेल बाजार पर पड़ा असर, कच्चा तेल 80 डॉलर के पार


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनकी जद में दुबई और अबू धाबी जैसे प्रमुख शहरों के साथ कतर, बहरीन, सऊदी अरब और ओमान भी आए। इस घटनाक्रम ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बढ़ा दी हैं और निवेशकों में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है।

    कीमतों में तेज उछाल
    तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी दर्ज की गई। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड, जो शुक्रवार को 72 डॉलर प्रति बैरल के सात महीने के उच्च स्तर पर बंद हुआ था और 2026 के पहले दो महीनों में करीब 19% चढ़ चुका था, अब 12% की छलांग लगाकर 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। यह स्तर पिछले साल जून के बाद पहली बार देखा गया है।

    वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट में भी करीब 8% की तेजी आई और यह 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव लंबा खिंचता है तो कीमतों में और अस्थिरता देखी जा सकती है।

    ईरान की उत्पादन क्षमता और वैश्विक सप्लाई

    भले ही क्षेत्रीय राजनीति में ईरान की स्थिति समय के साथ बदली हो, लेकिन ऊर्जा बाजार में उसकी भूमिका अब भी अहम है। ओपेक+ गठबंधन में वह चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। सऊदी अरब के नेतृत्व वाले इस समूह के कुल उत्पादन में ईरान की हिस्सेदारी लगभग 12% है। ईरान प्रतिदिन करीब 3.3 मिलियन बैरल तेल उत्पादन की क्षमता रखता है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 3% है। उसकी सबसे बड़ी रिफाइनरी की क्षमता लगभग 5 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जाती है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी निगाहें

    संकट का सबसे संवेदनशील पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। इस समुद्री मार्ग से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% और एलएनजी की बड़ी खेप गुजरती है। यही कारण है कि इसे वैश्विक ऊर्जा सप्लाई का ‘चोक पॉइंट’ माना जाता है। ईरान का लगभग 90% तेल निर्यात भी इसी रास्ते चीन तक पहुंचता है।

    हालांकि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया है कि जलडमरूमध्य को बंद करने का कोई इरादा नहीं है। फिर भी बाजार में आशंकाएं बनी हुई हैं और समुद्री यातायात को लेकर विरोधाभासी रिपोर्टें सामने आ रही हैं।

    100 डॉलर तक पहुंचने की आशंका

    विश्लेषकों, जिनमें बार्कलेज जैसी वित्तीय संस्थाएं शामिल हैं, का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बाधित रहता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि यदि हालात जल्द सामान्य हो जाते हैं तो मौजूदा ऊंचे स्तर टिकाऊ नहीं रहेंगे।

    इसी बीच ओपेक+ ने अपनी मासिक बैठक में अप्रैल से उत्पादन बढ़ोतरी की रफ्तार तेज करने पर सहमति जताई है। समूह के प्रमुख सदस्य सऊदी अरब और रूस, जिन्होंने पहली तिमाही में उत्पादन वृद्धि रोकी थी, अब अप्रैल से प्रतिदिन 2,06,000 बैरल अतिरिक्त तेल बाजार में उतारेंगे। यह बढ़ोतरी पिछले दिसंबर में घोषित 1,37,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि से करीब डेढ़ गुना ज्यादा है।

    मौजूदा हालात में तेल बाजार पूरी तरह भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर नजर आ रहा है। यदि तनाव और बढ़ता है तो कीमतों में और उछाल संभव है, जबकि कूटनीतिक समाधान की स्थिति में बाजार को कुछ राहत मिल सकती है।