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  • इजरायली तकनीक से नरसिंहपुर में चमत्कार: बंजर जमीन पर खड़ा किया 70 एकड़ का 'मैंगो किंगडम', अब लंदन-दुबई में धूम

    इजरायली तकनीक से नरसिंहपुर में चमत्कार: बंजर जमीन पर खड़ा किया 70 एकड़ का 'मैंगो किंगडम', अब लंदन-दुबई में धूम

    मध्य प्रदेश। राज्य के नरसिंहपुर जिले के छेना गाँव से आधुनिक कृषि और दृढ़ संकल्प की एक ऐसी अभूतपूर्व कहानी सामने आई है, जिसने देश के कृषि विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। जहां की पथरीली और कम उपजाऊ जमीन पर पारंपरिक खेती करना भी घाटे का सौदा माना जाता था, वहीं आज इजरायली तकनीक के चमत्कार से 70 एकड़ का एक विशाल और आधुनिक आमों का साम्राज्य खड़ा हो चुका है। स्थानीय प्रगतिशील किसान के इस साहसिक और तकनीकी प्रयास की बदौलत अब नरसिंहपुर के रसीले आमों का स्वाद सात समंदर पार दुबई और लंदन जैसे वैश्विक बाजारों तक पहुँच गया है।

    कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस सफलता के पीछे इजरायल की प्रसिद्ध ‘अल्ट्रा हाई डेंसिटी प्लांटेशन’ (UHDP) यानी सघन बागवानी कूटनीति और आधुनिक ड्रिप सिंचाई प्रणाली का कुशल उपयोग है। पारंपरिक तरीके से जहां एक एकड़ में आम के बेहद सीमित पौधे लगाए जाते हैं, वहीं इस आधुनिक इजरायली तकनीक के माध्यम से प्रति एकड़ पौधों की संख्या कई गुना बढ़ा दी गई। इसके साथ ही, बूंद-बूंद सिंचाई और नियंत्रित खाद प्रबंधन के जरिए पौधों को सीधे जड़ों तक पोषक तत्व दिए गए, जिससे पथरीली और कम पानी वाली जमीन पर भी पौधों का तेजी से और स्वस्थ विकास संभव हो सका।

    नरसिंहपुर के इस विशाल मैंगो ऑर्चर्ड (आम के बाग) में आम की कई उन्नत और व्यावसायिक प्रजातियों का उत्पादन किया जा रहा है, जिनकी मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बहुत अधिक है। फसल की गुणवत्ता, रंग और स्वाद को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाए रखने के लिए पूरी तरह से जैविक और वैज्ञानिक पद्धतियों का पालन किया जाता है। यही कारण है कि इस बाग के आमों को सीधे विदेशों में निर्यात करने के लिए अंतरराष्ट्रीय डीलर्स और बड़ी कंपनियों से अनुबंध मिले हैं, जिससे स्थानीय क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी आय के नए मार्ग खुल गए हैं।

    इस चमत्कारिक कृषि मॉडल ने न केवल नरसिंहपुर बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के कृषि परिदृश्य को एक नई दिशा दिखाई है। जिला प्रशासन और बागवानी विभाग के अधिकारी भी इस सफलता को एक बड़े उदाहरण के रूप में देख रहे हैं। इस बागवानी मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी और विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों में भी बंपर पैदावार सुनिश्चित करता है। लंदन और दुबई जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में यहां के आमों की खेप पहुंचने से भारतीय कृषि उत्पादों की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत हुई है।

    इस कृषि क्रांति ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही तकनीक, कड़ा परिश्रम और आधुनिक दृष्टिकोण को मिला दिया जाए, तो किसी भी बंजर या कम उम्मीद वाली जमीन को सोने की खान में बदला जा सकता है। आज इस 70 एकड़ के आम साम्राज्य को देखने और समझने के लिए दूर-दूर से किसान और कृषि वैज्ञानिक नरसिंहपुर के छेना गाँव पहुँच रहे हैं। यह प्रोजेक्ट अब क्षेत्र के ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया बन चुका है और आत्मनिर्भर खेती की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।

  • कश्मीर के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता, अब किसान 40 हजार रुपये किलो वाले दुर्लभ मशरूम की कर सकेंगे खेती

    कश्मीर के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता, अब किसान 40 हजार रुपये किलो वाले दुर्लभ मशरूम की कर सकेंगे खेती

    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जिसके बाद अब किसान 15 हजार से 40 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकने वाला दुर्लभ मशरूम अपने खेतों में भी उगा सकेंगे। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) के वैज्ञानिकों ने पहली बार नियंत्रित वातावरण में इस मशरूम की सफल खेती कर दिखाई है।

    जंगलों पर निर्भरता से मिली मुक्ति

    यह मशरूम मोरल्स या मोरचेला (स्थानीय नाम कंगाच) है, जो अब तक सिर्फ ऊंचे पहाड़ी जंगलों में बारिश के मौसम में प्राकृतिक रूप से उगता था। इसकी उपलब्धता बेहद सीमित और मुश्किल होने के कारण बाजार में इसकी कीमत बेहद अधिक रहती है।

    वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

    SKUAST के कुलपति प्रोफेसर नजीर अहमद गनई ने इस उपलब्धि को “गेम चेंजर” बताया है। उनके अनुसार, यह तकनीक जंगलों पर निर्भरता खत्म कर नियंत्रित उत्पादन का रास्ता खोलती है, जिससे किसानों, युवाओं और स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

    पांच साल की मेहनत से मिला परिणाम

    इस शोध में प्रोफेसर तारिक अहमद सोफी, उनके छात्र कमरान मुनीर और प्रोफेसर विकास गुप्ता शामिल रहे। टीम ने पिछले पांच वर्षों में 1000 से अधिक प्राकृतिक स्थलों से मोरचेला के नमूने एकत्र किए और उनके वातावरण, मिट्टी, नमी और पौधों का गहन अध्ययन किया।

    शोध के दौरान 10 किस्मों को चुना गया, जिनमें से 3 किस्मों में सफलतापूर्वक खेती संभव हो सकी।

    पॉलीहाउस से लेकर खुले खेत तक सफलता

    शुरुआत में इस मशरूम की खेती पॉलीहाउस में की गई, जबकि बाद में इसे खुले वातावरण में भी उगाने में सफलता मिली। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके लिए पेटेंट प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। यह प्रयोग बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर सहित कई क्षेत्रों में किया गया है।

    खास पर्यावरण की जरूरत वाला मशरूम

    मोरचेला की खेती हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है क्योंकि इसे विशेष तापमान, नमी और मिट्टी की स्थिति की आवश्यकता होती है। साथ ही अलग-अलग किस्मों के लिए अलग पौधों और प्राकृतिक वातावरण का संतुलन भी जरूरी होता है।

    किसानों के लिए नई आर्थिक संभावना

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से जम्मू-कश्मीर की कृषि अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग के चलते यह फसल किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत विकल्प बन सकती है और जैव-अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे सकती है।