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  • राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के लिए एनसीईआरटी समिति का पुनर्गठन, नवंबर तक आएगी 11वीं कक्षा की नई किताब

    राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के लिए एनसीईआरटी समिति का पुनर्गठन, नवंबर तक आएगी 11वीं कक्षा की नई किताब

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने स्कूली शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी और प्रासंगिक बनाने के उद्देश्य से बड़ा कदम उठाया है। परिषद ने कक्षा 11वीं और 12वीं की राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने के लिए 20 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम का पुनर्गठन किया है। इस नई समिति में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, स्कूल शिक्षकों और विषय विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

    पुनर्गठित समिति में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, इग्नू, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल, पांडिचेरी यूनिवर्सिटी और उत्कल यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ शिक्षाविद शामिल हैं। इस 20 सदस्यीय टीम की संरचना में विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले विशेषज्ञों का समावेश किया गया है, ताकि अध्ययन सामग्री को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप संतुलित और समृद्ध बनाया जा सके।

    पाठ्यपुस्तक विकास दल की कमान प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद संदीप शास्त्री को सौंपी गई है। समिति को दोनों कक्षाओं की पुस्तकों के निर्माण के लिए स्पष्ट समयसीमा प्रदान की गई है। इसके तहत कक्षा 11वीं की राजनीतिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक को 30 नवंबर 2026 तक अंतिम रूप दिए जाने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि कक्षा 12वीं की नई पुस्तक 30 जुलाई 2027 तक तैयार की जाएगी।

    एनसीईआरटी की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 के तहत संचालित की जाएगी। समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वह सामाजिक विज्ञान, भारतीय ज्ञान प्रणाली, पर्यावरण शिक्षा और आधुनिक शिक्षाशास्त्र से जुड़े विभिन्न समूहों के मार्गदर्शन में कार्य करे। तैयार की जाने वाली सामग्री को अंतिम स्वीकृति देने, प्रकाशित करने और वितरित करने का दायित्व परिषद के पास ही रहेगा।

    शैक्षणिक सुधारों की इस श्रृंखला के तहत मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्कूलों में नए सत्र के अनुसार पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। नई पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा के दौरान समावेशन, सांस्कृतिक जुड़ाव, आधुनिक मूल्यांकन पद्धतियों और भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है।

    अकादमिक जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि विषय विशेषज्ञों के व्यापक अनुभव से तैयार होने वाली ये नई किताबें विद्यार्थियों को राजनीतिक सिद्धांतों और भारतीय शासन व्यवस्था की गहरी समझ प्रदान करेंगी। एनसीईआरटी का प्राथमिक उद्देश्य विद्यार्थियों को अद्यतन जानकारी के साथ गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना है।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय ने पोस्टग्रेजुएट इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। जुलाई 2026 से लागू नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत के इतिहास से जुड़े एक प्रमुख पेपर को तीसरे सत्र की अंतिम सूची से हटा दिया गया है। यह बदलाव नई शिक्षा नीति और नए पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप किए गए पाठ्यक्रम संशोधन का हिस्सा बताया गया है।

    हटाए गए विषय का नाम दिल्ली सल्तनत : मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की बनावट था। इस पेपर में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और सत्ता के स्वरूप का अध्ययन कराया जाता था। विषय के जरिए विद्यार्थियों को उस दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलावों को समझने का अवसर मिलता था।

    नए पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली सल्तनत से जुड़े पेपर में ही बदलाव नहीं हुआ है। उत्तर भारत के इतिहास से संबंधित लगभग 1400 से 1550 की अवधि वाला एक अन्य विषय भी तीसरे सत्र की अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है। इससे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की संरचना में बदलाव दिखाई देता है।

    पाठ्यक्रम में प्रस्तावित कई अन्य विषयों को भी अंतिम रूप से जगह नहीं मिली है। इनमें शुरुआती भारत में महिलाओं और लिंग से संबंधित इतिहास, प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे विषय शामिल हैं। इन बदलावों के कारण इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विषयों का दायरा पहले की तुलना में अलग हो गया है।

    इतिहास विभाग की ओर से तीसरे सत्र के लिए कुल 38 विशेष वैकल्पिक विषय प्रस्तावित किए गए थे। अंतिम पाठ्यक्रम में इनमें से 16 विषयों को ही शामिल किया गया है। इस तरह 22 प्रस्तावित विषय अंतिम सूची का हिस्सा नहीं बने हैं। विश्वविद्यालय के नए पीजी ढांचे के तहत विषयों के चयन और संरचना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को हटाए जाने को समझने के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। परास्नातक स्तर पर हटाए गए पेपर में केवल सल्तनत काल की घटनाओं का सामान्य परिचय नहीं दिया जाता था, बल्कि सत्ता, शासन और इतिहास को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता था।

    वहीं स्नातक स्तर पर दिल्ली सल्तनत के इतिहास से संबंधित विषय अभी अलग स्वरूप में पढ़ाया जाता है। इसमें इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं, शासकों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यापक ऐतिहासिक विकास का अध्ययन शामिल होता है। इसलिए पीजी के एक विशेष पेपर को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली सल्तनत का इतिहास दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था से समाप्त हो गया है।

    नए बदलावों के पीछे विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम संरचना को नई शिक्षा नीति और संशोधित पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें वैकल्पिक विषयों की संख्या, उनकी विशेषज्ञता और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अध्ययन क्षेत्रों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव अकादमिक अध्ययन की दिशा को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से परास्नातक स्तर पर विषयों का चयन विद्यार्थियों को किसी ऐतिहासिक कालखंड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देता है। ऐसे में नए पाठ्यक्रम के तहत शामिल विषयों और हटाए गए विषयों को लेकर अकादमिक क्षेत्र में चर्चा होना स्वाभाविक है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किए गए इस संशोधित पाठ्यक्रम के तहत अब विद्यार्थियों को उपलब्ध अंतिम 16 वैकल्पिक विषयों में से अपने अध्ययन क्षेत्र का चयन करना होगा। विश्वविद्यालय की नई व्यवस्था में इतिहास के विभिन्न कालखंडों और विषयगत क्षेत्रों को नए शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।

  • नई शिक्षा नीति के अनुरूप CBSE का निर्णय: 9वीं कक्षा में तीन भाषाएं अनिवार्य, 1 जुलाई से लागू नियम

    नई शिक्षा नीति के अनुरूप CBSE का निर्णय: 9वीं कक्षा में तीन भाषाएं अनिवार्य, 1 जुलाई से लागू नियम

    नई दिल्ली । भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी बदलाव की घोषणा की गई है, जिसने स्कूल शिक्षा के ढांचे को नई दिशा देने की शुरुआत कर दी है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड CBSE ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए एक नई भाषा नीति लागू करने का निर्णय लिया है, जिसके तहत अब छात्रों को कम से कम तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य होगा।

    यह व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से पूरे देश के विद्यालयों में लागू की जाएगी और इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे के अनुरूप एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य छात्रों में बहुभाषी क्षमता को विकसित करना, भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ाना और शिक्षा को अधिक समावेशी एवं व्यावहारिक बनाना है। नए नियम के अनुसार प्रत्येक छात्र को आर1, आर2 और आर3 के रूप में तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी आवश्यक हैं।

    यदि कोई छात्र विदेशी भाषा का चयन करता है तो उसे पहले दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य होगा, इसके बाद ही वह तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में विदेशी भाषा चुन सकेगा। इस निर्णय को शिक्षा विशेषज्ञ छात्रों के समग्र विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं, क्योंकि इससे न केवल भाषाई दक्षता बढ़ेगी बल्कि सांस्कृतिक समझ और संचार कौशल भी मजबूत होंगे।

    बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि कक्षा 10 में आर3 भाषा के लिए किसी प्रकार की बोर्ड परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी, बल्कि इसका मूल्यांकन पूरी तरह स्कूल स्तर पर आंतरिक रूप से किया जाएगा। इसका उद्देश्य छात्रों पर परीक्षा का अतिरिक्त बोझ कम करना और सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहज बनाना है।

    हालांकि, आर3 विषय का प्रदर्शन छात्रों के प्रमाणपत्र में दर्ज किया जाएगा, जिससे उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों का उचित मूल्यांकन हो सके। इस नीति के लागू होने से विद्यालयों को भी अपनी तैयारी मजबूत करनी होगी क्योंकि उन्हें योग्य भाषा शिक्षकों की व्यवस्था करनी होगी। जिन स्कूलों में संसाधनों की कमी है, वहां अंतर-विद्यालय सहयोग, ऑनलाइन शिक्षण और मिश्रित शिक्षण मॉडल का सहारा लिया जा सकता है।

    इसके अलावा सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य स्नातकोत्तर उम्मीदवारों की सेवाएं लेने की भी अनुमति दी गई है ताकि शिक्षण व्यवस्था प्रभावित न हो। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी छात्र को इस नई व्यवस्था के कारण बोर्ड परीक्षा से वंचित नहीं किया जाएगा और विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए आवश्यक छूट भी प्रदान की जाएगी। साथ ही विदेश से लौटने वाले छात्रों को भी विशेष परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान रखा गया है।

    कुल मिलाकर यह निर्णय भारतीय शिक्षा प्रणाली को एक बहुभाषी और आधुनिक ढांचे में ढालने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में छात्रों की भाषा क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नई मजबूती प्रदान करेगा।