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  • पुलिस हिरासत और मीडिया की अफवाहों पर छलका राज कुंद्रा का दर्द, शिल्पा शेट्टी से जुड़े कई राज किए उजागर

    पुलिस हिरासत और मीडिया की अफवाहों पर छलका राज कुंद्रा का दर्द, शिल्पा शेट्टी से जुड़े कई राज किए उजागर


    नई दिल्ली ।
    अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति और व्यवसायी राज कुंद्रा ने साल 2021 में हुई अपनी गिरफ्तारी और उसके बाद जेल में बिताए कठिन समय से जुड़े कई नए पहलुओं को उजागर किया है। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने बताया कि किस प्रकार कानूनी कानूनी समस्याओं के साथ-साथ उन्हें व्यक्तिगत जीवन में भी कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। जब वे सलाखों के पीछे थे, तब उनके पास कई तरह की भ्रामक खबरें पहुंच रही थीं, जिसने उन्हें मानसिक रूप से बेहद तोड़ दिया था।

    राज कुंद्रा ने खुलासा किया कि उन्हें अपनी गिरफ्तारी की जानकारी भी काफी नाटकीय ढंग से मिली थी। वे पुलिस स्टेशन केवल पूछताछ में शामिल होने के लिए गए थे, लेकिन वहां पहुंचते ही उन्हें सोशल मीडिया के जरिए पता चला कि उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया है। इस बारे में जब उन्होंने उपस्थित अधिकारियों से सवाल किया, तो उन्हें बताया गया कि उच्च अधिकारियों के आदेश के तहत यह कार्रवाई की गई है। इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी उनके परिवार और पत्नी शिल्पा शेट्टी को भी मीडिया माध्यमों के जरिए ही मिल सकी थी।

    जेल में बिताए दिनों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि व्यावसायिक स्तर पर भी उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। उनके भारतीय व्यवसाय में हजारों लोग कार्यरत थे, और उनके अचानक हिरासत में जाने से पूरा काम ठप हो गया। इस दौरान उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी ने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के बजाय तुरंत बंद करने का कठिन फैसला लिया, क्योंकि अनिश्चितता के माहौल में प्रबंधन संभालना लगभग असंभव हो गया था। एक ही झटके में सब कुछ बदल जाने से वे गहरा सदमा महसूस कर रहे थे।

    सबसे अधिक निराशाजनक स्थिति तब पैदा हुई जब जेल के भीतर उन तक यह खबर पहुंची कि उनकी पत्नी उनसे अलग हो रही हैं और तलाक की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। राज कुंद्रा के अनुसार, इस एक अफवाह ने उन्हें अंदर से पूरी तरह झकझोर दिया था। उस समय उन्हें लगा कि जीवन का कोई अर्थ नहीं बचा है, क्योंकि उनके लिए उनका परिवार ही सबसे पहली प्राथमिकता था। मानसिक तनाव इस कदर बढ़ गया था कि वे रातों को सो नहीं पाते थे और उनके मन में बेहद नकारात्मक विचार आने लगे थे।

    हालांकि, बाद में सच्चाई सामने आने और परिवार के स्पष्ट रुख से उन्हें संबल मिला। शिल्पा शेट्टी ने हर परिस्थिति में अपने पति का समर्थन करने का फैसला किया, जिससे उन्हें इस कठिन दौर से बाहर निकलने में मदद मिली। रिहाई के बाद राज कुंद्रा ने अपने जीवन को दोबारा पटरी पर लाने का प्रयास शुरू किया और एक नई शुरुआत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे जांच में पूरा सहयोग दे रहे हैं और यदि किसी भी अदालत में वे दोषी पाए जाते हैं, तो वे हर प्रकार की सजा भुगतने के लिए तैयार हैं।

    इस मामले के तार देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े हुए थे, जहां जांच एजेंसियों ने कई राज्यों में फैली डिजिटल गतिविधियों की पड़ताल की थी। कानूनी जानकारों और मध्य प्रदेश सहित विभिन्न क्षेत्रों के विश्लेषकों का मानना है कि हाई-प्रोफाइल मामलों में मीडिया रिपोर्ट्स का व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। फिलहाल राज कुंद्रा अपने व्यापारिक उपक्रमों को फिर से स्थापित करने और अपनी छवि को सुधारने में जुटे हुए हैं।

  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत का फैसला बदला, बच्चे से मुलाकात पर शुल्क लगाना बताया पूरी तरह अनुचित

    कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत का फैसला बदला, बच्चे से मुलाकात पर शुल्क लगाना बताया पूरी तरह अनुचित


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक पारिवारिक विवाद से जुड़ी याचिका पर फैसला सुनाते हुए बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है कि पिता को अपने ही बच्चे से मिलने का अधिकार बिना किसी आर्थिक शर्त के मिलना चाहिए। अदालत ने निचली पारिवारिक अदालत के उस फैसले में संशोधन किया जिसमें अलग रह रहे पिता को बच्चे से हर बार मिलने के बदले पांच हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने साफ तौर पर कहा कि जब यह मुलाकात न्यायालय परिसर के अंदर स्थित विजिटेशन रूम में आयोजित की जानी है, तब किसी भी तरह का शुल्क वसूलना तर्कसंगत नहीं है।

    यह मामला एक ऐसे पति-पत्नी से संबंधित है जिनके बीच तलाक का मुकदमा अदालत में लंबित है। वर्तमान में चार साल के बच्चे की देखरेख और अंतरिम कस्टडी मां के पास है, जबकि पिता ने बच्चे की स्थायी अभिरक्षा पाने के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल की हुई है। इससे पहले पारिवारिक अदालत ने पिता को महीने के तय दिनों में बच्चे से मिलने की अनुमति तो दी थी, लेकिन साथ ही हर मुलाकात के लिए पांच हजार रुपये जमा करने की शर्त भी लागू कर दी थी।

    उच्च न्यायालय में जब पिता ने इस शर्त को चुनौती दी, तो अदालत ने स्थिति का निष्पक्षता से मूल्यांकन किया। अदालत ने पाया कि जब मां ने स्वयं विजिटेशन रूम को मुलाकात के लिए सुरक्षित और उपयुक्त स्थान माना है, तो पिता पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने का कोई औचित्य नहीं बनता। उच्च न्यायालय ने माना कि इस तरह का आर्थिक दबाव न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है और इसलिए फीस से जुड़ी शर्त को तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों पक्षों के घर के बीच कोई बहुत अधिक दूरी नहीं है। इसके बावजूद दस्तावेजों और रिकॉर्ड से संकेत मिला कि मां कई अवसरों पर बच्चे को तय समय पर मुलाकात के लिए लेकर नहीं आती थी। इस पर चिंता व्यक्त करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि भविष्य में भी मुलाकात के समय में इस प्रकार की अड़चनें पैदा की जाती हैं, तो इसका प्रभाव अंतिम कस्टडी के निर्णय पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का सर्वांगीण विकास और उसका सर्वोत्तम हित ही न्याय का सबसे प्रमुख आधार है।

    पिता ने अदालत के सामने यह बात भी रखी थी कि उन्हें बच्चे के साथ अकेले और सहज माहौल में समय बिताने का मौका नहीं दिया जाता, जिससे बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव प्रभावित हो रहा है। दूसरी ओर मां का कहना था कि बच्चा पिता के पास जाने में हिचकिचाता है और पिता भरण पोषण की जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं संभाल रहे हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुनते हुए एक व्यावहारिक व्यवस्था बनाई ताकि बच्चे और पिता के बीच संवाद बेहतर हो सके।

    उच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था के तहत निर्देश दिया कि मुलाकात के दौरान बच्चे के दादा-दादी वहां उपस्थित नहीं रहेंगे। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पिता और पुत्र बिना किसी दबाव के आपस में गुणवत्तापूर्ण समय बिता सकें। अदालत ने अंत में दोहराया कि स्थायी कस्टडी का मुख्य फैसला अभी लंबित है और वह सभी साक्ष्यों एवं बच्चे के हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।