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  • मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती क्षमताओं के बीच एक नया मामला सामने आया है, जिसने एआई सुरक्षा और परीक्षण प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। मेटा ने खुलासा किया है कि उसके एक एआई मॉडल ने साइबर सिक्योरिटी परीक्षण के दौरान अनजाने में इंटरनेट तक पहुंच बना ली और इसके बाद एक बाहरी सर्विस सिस्टम की सुरक्षा कमजोरी का फायदा उठाकर उसमें अनधिकृत प्रवेश कर लिया। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह घटना परीक्षण के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी का परिणाम थी और इसकी विस्तृत जांच जारी है।

    कंपनी के अनुसार यह घटना उसके हाल ही में जारी किए गए एआई मॉडल ‘म्यूज स्पार्क 1.1’ के परीक्षण के दौरान हुई। परीक्षण के लिए तैयार किए गए विशेष वातावरण में एक गलत कॉन्फिगरेशन के कारण मॉडल इंटरनेट से कनेक्ट हो गया। सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार के परीक्षण पूरी तरह नियंत्रित और सीमित नेटवर्क पर किए जाते हैं, लेकिन तकनीकी त्रुटि के चलते मॉडल बाहरी नेटवर्क तक पहुंच गया। इसके बाद उसने एक थर्ड पार्टी सर्विस में मौजूद सुरक्षा कमजोरी का उपयोग करते हुए अनधिकृत पहुंच प्राप्त कर ली।

    मेटा ने कहा कि परीक्षण प्रक्रिया एक स्वतंत्र साइबर सिक्योरिटी पार्टनर के सहयोग से संचालित की जा रही थी। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि तकनीकी सेटअप में हुई कॉन्फिगरेशन संबंधी गलती के कारण यह स्थिति बनी। कंपनी ने जोर देकर कहा कि यह किसी जानबूझकर किए गए साइबर हमले का मामला नहीं था, बल्कि परीक्षण वातावरण में हुई चूक के कारण उत्पन्न हुई अप्रत्याशित घटना थी। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत समीक्षा की जा रही है और सभी तथ्य सामने आने के बाद विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाएगी।

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया भर की प्रमुख एआई कंपनियां अधिक सक्षम और स्वायत्त मॉडल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान अन्य बड़ी एआई कंपनियों ने भी परीक्षण के दौरान अपने मॉडल्स द्वारा बाहरी सिस्टम तक अनपेक्षित पहुंच बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी साझा की थी। इन घटनाओं ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि अत्यधिक सक्षम एआई मॉडल्स के परीक्षण के लिए वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक एआई एजेंट अब केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे नेटवर्क संरचना, सिस्टम की कमजोरियों और संभावित सुरक्षा खामियों की पहचान करने में भी पहले से अधिक सक्षम हो रहे हैं। यदि परीक्षण वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और अलग-थलग न हो तो इस प्रकार की घटनाएं भविष्य में बड़े जोखिम का कारण बन सकती हैं। यही वजह है कि नियंत्रित परीक्षण ढांचे, मजबूत नेटवर्क आइसोलेशन और बहुस्तरीय सुरक्षा उपायों की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है।

    घटना के बाद एआई सुरक्षा मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा की मांग भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई पीढ़ी के एआई मॉडल्स की बढ़ती क्षमताओं को देखते हुए केवल पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। कंपनियों को अधिक कठोर परीक्षण प्रोटोकॉल, सुरक्षित नेटवर्क संरचना और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट अपनाने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। फिलहाल मेटा पूरे मामले की जांच में जुटा है और अंतिम निष्कर्ष आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

  • एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    नई दिल्ली । कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एंथ्रोपिक ने भारत में अपने कारोबार का रणनीतिक विस्तार करते हुए एक बड़ी योजना की घोषणा की है। कंपनी के क्लाउड एआई मॉडल अब अमेजन बेडरॉक के भारतीय बुनियादी ढांचे के जरिए देश के भीतर ही संचालित होंगे। इस नई व्यवस्था से भारतीय उपयोगकर्ताओं और बड़े संगठनों का संवेदनशील एआई डाटा देश की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रहेगा, जिससे डेटा रेजिडेंसी और कानूनी नियमों का पालन करना अत्यधिक सुगम हो जाएगा।

    स्थानीय स्तर पर डेटा प्रोसेसिंग होने का सबसे बड़ा लाभ बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, सरकारी एजेंसियों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और अन्य विनियमित क्षेत्रों को प्राप्त होगा। इन क्षेत्रों में डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सर्वोपरि होती है। अमेजन वेब सर्विसेज इंडिया के अनुसार, भारतीय सर्वरों पर क्लाउड मॉडलों की उपलब्धता से घरेलू एआई आधारित एप्लीकेशन तैयार करने वाले डेवलपर्स और कंपनियों को कम लेटेंसी और बेहतर प्रदर्शन का लाभ मिलेगा।

    एंथ्रोपिक के अधिकारियों का मानना है कि भारत क्लाउड एआई के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। स्थानीय एआई विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कंपनी अपने पार्टनर नेटवर्क के माध्यम से भारत में 5,000 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित करने जा रही है। इसके साथ ही कंपनी भारत में अपने कार्यबल का विस्तार करने और भारतीय भाषाओं के लिए अपने मॉडल के समर्थन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

    साइबर सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए एंथ्रोपिक ने डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया, एमओएसआईपी और ओपनजीटूपी जैसी संस्थाओं के साथ साझेदारी की है। एआई आधारित सुरक्षा परीक्षण के माध्यम से संगठन अपनी सॉफ्टवेयर कमजोरियों की पहचान कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में एआई के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कंपनी ने कार्या के साथ भी सहयोग किया है, जिससे डिजिटल सेवाओं की पहुंच आम जनता तक आसान होगी।

  • उत्तराखंड में मुख्यमंत्री राहत कोष समेत दस प्रमुख विभागों की वेबसाइट पर साइबर हमला..

    उत्तराखंड में मुख्यमंत्री राहत कोष समेत दस प्रमुख विभागों की वेबसाइट पर साइबर हमला..


    नई दिल्ली ।
    उत्तराखंड में मुख्यमंत्री राहत कोष समेत दस प्रमुख सरकारी विभागों की आधिकारिक वेबसाइटों पर अचानक हुए एक बड़े मालवेयर हमले के बाद हड़कंप मच गया। शनिवार को हुए इस साइबर हमले के तुरंत बाद सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत प्रभावित सभी वेबसाइटों को बंद करना पड़ा, ताकि डेटा की सुरक्षा से कोई समझौता न हो। साइबर सुरक्षा से जुड़ी तकनीकी टीम ने तुरंत मोर्चा संभाला और कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद डेटा सेंटर में रखे गए बैकअप की मदद से अधिकांश वेबसाइटों का संचालन सुचारू कर दिया। हालांकि मुख्यमंत्री राहत कोष की वेबसाइट को पूरी तरह से सुरक्षित कर बहाल करने का काम देर तक जारी रहा।

    साइबर हमले की जानकारी मिलते ही सूचना प्रौद्योगिकी विकास एजेंसी की विशेष टीम तुरंत हरकत में आई। तकनीकी विशेषज्ञों ने नेटवर्क में सेंध लगाने वाले मालवेयर को डिटेक्ट कर स्थिति को नियंत्रित किया। जिन प्रमुख विभागों के डिजिटल पोर्टल इस हमले से प्रभावित हुए, उनमें मुख्यमंत्री राहत कोष के अलावा लोक निर्माण विभाग, खाद्य आपूर्ति विभाग, उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा अभिकरण, राज्य कर विभाग, ईएसआईसी, परिवहन विभाग और पर्यटन विभाग शामिल हैं। शुरुआती तकनीकी पड़ताल में इस मालवेयर के तार विदेशी सर्वर से जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है, हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    डिजिटल सेवाओं को सुरक्षित रखने के लिए अपनाई गई दूरदर्शी रणनीति इस संकट के समय बेहद कारगर साबित हुई। पूर्व में हुए सुरक्षा अनुभवों से सबक लेते हुए एजेंसी ने पहले ही सभी महत्वपूर्ण विभागों के डेटा का नियमित बैकअप सुरक्षित रखना शुरू कर दिया था। इसी बैकअप प्रणाली की वजह से साइबर हमलावरों के मंसूबे पूरी तरह कामयाब नहीं हो सके और महज कुछ ही घंटों के भीतर ज्यादातर वेबसाइटों को पुरानी स्थिति में लाकर शुरू कर दिया गया। सुरक्षा एजेंसियां अब इस हमले के स्रोत और हैकर्स के तरीकों का गहराई से विश्लेषण कर रही हैं।

    उत्तराखंड में सरकारी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले वर्ष 2024 के अक्टूबर महीने में राज्य में एक बहुत बड़ा साइबर हमला हुआ था, जिसकी वजह से मुख्यमंत्री हेल्पलाइन समेत करीब 90 सरकारी वेबसाइटें पूरी तरह ठप हो गई थीं। उस समय व्यवस्था को सामान्य करने में कई दिनों का समय लग गया था। उसी घटना के बाद प्रशासनिक स्तर पर साइबर सुरक्षा ढांचे को काफी मजबूत किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले हमले के बाद लागू किए गए कड़े सुरक्षा मानकों के कारण ही इस बार नुकसान को सीमित रखा जा सका।

    फिलहाल साइबर सुरक्षा विंग राज्य के पूरे डेटा सेंटर और सर्वर नेटवर्क पर पैनी नजर बनाए हुए है। किसी भी अन्य संभावित खतरे को रोकने के लिए फायरवॉल को और अधिक मजबूत किया जा रहा है। डिजिटल सिस्टम की लगातार निगरानी की जा रही है ताकि भविष्य में इस तरह के मालवेयर अटैक को समय रहते नाकाम किया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि ऑनलाइन सरकारी सेवाओं और आम जनता के डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और इसके लिए सभी आवश्यक तकनीकी उपाय निरंतर किए जा रहे हैं।

  • पीएम मोदी और क्रिस्टोफर लक्सन की अहम बैठक, आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस, साइबर सुरक्षा और हिंद-प्रशांत सहयोग बढ़ाने का साझा संकल्प

    पीएम मोदी और क्रिस्टोफर लक्सन की अहम बैठक, आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस, साइबर सुरक्षा और हिंद-प्रशांत सहयोग बढ़ाने का साझा संकल्प


    नई दिल्ली ।
    भारत और न्यूजीलैंड ने द्विपक्षीय संबंधों को नई रणनीतिक दिशा देते हुए आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और उभरती वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के खिलाफ सहयोग को और मजबूत बनाने का संकल्प दोहराया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता में दोनों देशों ने क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक चर्चा की। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थिरता और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मिलकर कार्य करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

    वार्ता के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद के सभी स्वरूपों की स्पष्ट और कड़ी निंदा की। उन्होंने सीमा पार आतंकवाद सहित किसी भी प्रकार की हिंसक गतिविधियों को वैश्विक शांति के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए ऐसे अपराधों के खिलाफ समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया। दोनों नेताओं ने हाल के आतंकी हमलों की निंदा करते हुए कहा कि ऐसे अपराधों के जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाना और उन्हें शीघ्र दंड दिलाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।

    संयुक्त बयान में आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को दोहराते हुए आतंकवादी संगठनों के वित्तीय नेटवर्क, सुरक्षित ठिकानों और ऑनलाइन गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया गया। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि आतंकवाद और हिंसक कट्टरपंथ से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सूचना साझा करने, तकनीकी सहयोग बढ़ाने और संस्थागत समन्वय को मजबूत करना आवश्यक है। इसी दिशा में आतंकवाद निरोधक संयुक्त कार्य समूह के गठन के लिए हुए समझौते का भी स्वागत किया गया, जिससे दोनों देशों की एजेंसियों के बीच नियमित संवाद और सूचना आदान-प्रदान को नई गति मिलेगी।

    बैठक में साइबर सुरक्षा और डिजिटल क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियां भी प्रमुख विषय रहीं। दोनों देशों ने साइबर अपराध, डिजिटल सुरक्षा, महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा और नई तकनीकों से उत्पन्न जोखिमों का संयुक्त रूप से सामना करने पर सहमति व्यक्त की। इसके साथ ही वित्तीय अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराधों के विरुद्ध कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग बढ़ाने का निर्णय भी लिया गया। दोनों पक्षों ने नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने और संबंधित एजेंसियों के बीच औपचारिक सहयोग व्यवस्था को शीघ्र अंतिम रूप देने की दिशा में कार्य करने पर सहमति जताई।

    प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री लक्सन ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि को साझा प्राथमिकता बताते हुए स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी क्षेत्रीय व्यवस्था के समर्थन को दोहराया। दोनों नेताओं ने कहा कि सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए तथा समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन वैश्विक व्यापार एवं सुरक्षा के लिए आवश्यक है। उन्होंने समुद्री विवादों का समाधान शांतिपूर्ण संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप किए जाने पर भी बल दिया।

    दोनों देशों ने क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए बहुपक्षीय मंचों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने आसियान की केंद्रीय भूमिका का समर्थन करते हुए पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, आसियान क्षेत्रीय मंच और अन्य क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के माध्यम से सहयोग को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यापक सहमति से भारत और न्यूजीलैंड के बीच सुरक्षा, कानून प्रवर्तन, साइबर सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती मिलेगी तथा दोनों देश बदलती वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सकेंगे।

  • भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति की प्रमुख ताकत बनकर उभर रही है। डिजिटल भुगतान, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकों के विस्तार ने न केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच को व्यापक बनाया है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी अधिक पारदर्शी, तेज और प्रभावी बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास यात्रा में डिजिटल इकोसिस्टम की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित डिजिटल भुगतान विषयक एक विचार-विमर्श कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने डिजिटल परिवर्तन के कई पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। उनका कहना था कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी है और देश के करोड़ों नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके माध्यम से सरकारी सेवाओं, वित्तीय लेनदेन और डिजिटल सुविधाओं तक लोगों की पहुंच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हुई है।

    विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल तकनीक के विस्तार से मजबूत नहीं होगी। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन, मजबूत संस्थागत ढांचा, अनुसंधान, नवाचार और लगातार निवेश की आवश्यकता है। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती तकनीकों का प्रभावी उपयोग करने वाले देश भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकेंगे। इसलिए नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ कौशल विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

    डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को लेकर विशेषज्ञों ने कहा कि इसकी सफलता का सबसे बड़ा आधार नागरिकों का भरोसा है। यदि डिजिटल सेवाओं में डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, उपयोगकर्ता की सहमति और सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित की जाती है, तभी डिजिटल परिवर्तन का वास्तविक लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंच सकेगा। उन्होंने तकनीकी विकास के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    डिजिटल भुगतान प्रणाली के भविष्य को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। विशेषज्ञों का मानना है कि अब तक डिजिटल भुगतान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य व्यापक पहुंच और इंटरऑपरेबिलिटी रहा है, लेकिन आने वाले समय में इसकी मजबूती, बैकअप सिस्टम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को प्राथमिकता देनी होगी। इससे लेनदेन अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बन सकेंगे।

    कार्यक्रम में सीमा पार डिजिटल भुगतान को आसान बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि इसके लिए एकीकृत डिजिटल अवसंरचना, समान तकनीकी मानक और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था विकसित करना जरूरी होगा। इससे भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगी तथा अंतरराष्ट्रीय लेनदेन भी सरल और सुरक्षित बनेंगे।

    साइबर सुरक्षा को डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया। विशेषज्ञों ने बढ़ते साइबर अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी को देखते हुए मजबूत संस्थागत समन्वय, आधुनिक सुरक्षा तकनीकों और आम नागरिकों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि डिजिटल वित्तीय प्रणाली में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करना आवश्यक है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत का डिजिटल इकोसिस्टम अब केवल भुगतान प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, नवाचार, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक समावेशन का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। यदि तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा, भरोसा और समावेशिता को समान प्राथमिकता दी जाती है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत स्थान हासिल कर सकता है।

  • CBSE रिजल्ट पोर्टल पर बड़ा साइबर हमला, 38 लाख से अधिक संदिग्ध रिक्वेस्ट ब्लॉक; सिस्टम रहा सुरक्षित

    CBSE रिजल्ट पोर्टल पर बड़ा साइबर हमला, 38 लाख से अधिक संदिग्ध रिक्वेस्ट ब्लॉक; सिस्टम रहा सुरक्षित


    नई दिल्ली । केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) के पोस्ट-रिजल्ट पोर्टल पर 3 जून 2026 को एक बड़ा साइबर हमला दर्ज किया गया। इस हमले में करीब 38 लाख से अधिक संदिग्ध रिक्वेस्ट भेजी गईं, जिसका उद्देश्य सिस्टम को बाधित करना था। हालांकि, बोर्ड की मजबूत साइबर सुरक्षा व्यवस्था और तकनीकी टीम की सतर्कता के चलते पोर्टल पर कोई असर नहीं पड़ा और सेवा पूरी तरह सुचारू रूप से चलती रही।

     DDoS अटैक के जरिए किया गया हमला
    विशेषज्ञों के अनुसार यह हमला डिनायल-ऑफ-सेवा (DDoS) श्रेणी का था, जिसमें एक साथ भारी मात्रा में ट्रैफिक भेजकर किसी वेबसाइट को ठप करने की कोशिश की जाती है। CBSE के अनुसार, पोर्टल शुरू होने के कुछ ही मिनटों में लाखों रिक्वेस्ट आईं, जिनमें बड़ी संख्या अनधिकृत लॉगिन प्रयासों की थी। सिस्टम ने इन सभी को पहचानकर तुरंत ब्लॉक कर दिया।

     मजबूत साइबर सुरक्षा व्यवस्था ने रोका नुकसान
    बोर्ड ने बताया कि पोर्टल लॉन्च से पहले व्यापक सुरक्षा परीक्षण किए गए थे, जिनमें पेनिट्रेशन टेस्टिंग, वल्नरेबिलिटी असेसमेंट और लोड टेस्टिंग शामिल थीं। पोर्टल को आधुनिक सुरक्षा तकनीकों जैसे वेब एप्लिकेशन फायरवॉल (WAF), DDoS सुरक्षा प्रणाली, ऑडिट लॉगिंग और 24×7 मॉनिटरिंग से सुरक्षित किया गया था। इसी वजह से यह हमला सफल नहीं हो सका।

     रिजल्ट के बाद बढ़ा ट्रैफिक, हजारों आवेदन दर्ज
    रिजल्ट के बाद छात्रों की ओर से पुनर्मूल्यांकन और सत्यापन के लिए बड़ी संख्या में आवेदन भी आए हैं। बोर्ड को अब तक हजारों आवेदन प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन और अंकों के सत्यापन की मांग शामिल है।

     शुरुआती मिनटों में ही भारी दबाव
    रिपोर्ट के अनुसार, पोर्टल लाइव होने के मात्र दो मिनट के भीतर लगभग 15 लाख एक्सेस रिक्वेस्ट दर्ज की गईं। सिस्टम ने तुरंत सक्रिय होकर 1 लाख से अधिक संदिग्ध प्रयासों को ब्लॉक कर दिया।

    यह घटना दिखाती है कि डिजिटल सिस्टम पर साइबर हमलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन मजबूत सुरक्षा ढांचे के चलते बड़े संस्थान भी ऐसे हमलों से सुरक्षित रह सकते हैं।

  • साइबर खतरों को लेकर गंभीर आरोप: डॉ. भार्गव मल्लप्पा ने मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया

    साइबर खतरों को लेकर गंभीर आरोप: डॉ. भार्गव मल्लप्पा ने मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया


    नई दिल्ली । डिजिटल युग में बढ़ते साइबर अपराधों और निजता के उल्लंघन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जब पीपल फोरम ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. भार्गव मल्लप्पा ने अपने परिवार को कथित रूप से निशाना बनाए जाने और मोबाइल टैपिंग जैसी गतिविधियों के आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। यह मामला न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ा बताया जा रहा है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ते असुरक्षित वातावरण की ओर भी इशारा करता है, जहां आम नागरिकों की निजता खतरे में पड़ती दिख रही है।

    डॉ. मल्लप्पा ने अपने आरोपों में कहा है कि उनके परिवार के सदस्यों को संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों के जरिए निशाना बनाया गया, जिसमें अज्ञात व्यक्ति द्वारा टेलीग्राम जैसे माध्यम से संदिग्ध लिंक भेजे जाने की घटना शामिल है। यह लिंक केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नी और भाई को भी भेजा गया, जिससे यह आशंका और गहरी हो गई कि यह कोई सामान्य घटना नहीं बल्कि सुनियोजित डिजिटल हमला हो सकता है। इन घटनाओं को लेकर उन्होंने संबंधित शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग व्यवस्था में दर्ज कराई थी, जिसके बाद मामला जांच की प्रक्रिया में बताया जा रहा है।

    इस शिकायत में 13 अप्रैल को दर्ज की गई ऑनलाइन अपराध संबंधी प्रविष्टि का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें डिजिटल साक्ष्य और संबंधित रिकॉर्ड जांच एजेंसियों को सौंपे जाने की बात कही गई है। डॉ. मल्लप्पा का कहना है कि इस तरह की घटनाएं केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता, निजता और सुरक्षा पर सीधा हमला हैं।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मोबाइल टैपिंग, साइबर धोखाधड़ी और डिजिटल माध्यमों से डराने-धमकाने जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिन्हें अब अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, यह एक व्यापक पैटर्न की ओर संकेत करता है, जिसे रोकने के लिए संस्थागत स्तर पर सख्त और त्वरित कार्रवाई आवश्यक है।

    डॉ. मल्लप्पा ने मानवाधिकार आयोग से अपील की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए, जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती संदिग्ध गतिविधियों को देखते हुए देश के साइबर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि आम नागरिक सुरक्षित वातावरण में डिजिटल सेवाओं का उपयोग कर सकें।

    उन्होंने जोर देकर कहा कि जागरूकता की कमी और तकनीकी सुरक्षा में खामियां ऐसे मामलों को और बढ़ावा देती हैं, इसलिए सरकार और संबंधित संस्थानों को मिलकर एक मजबूत रणनीति तैयार करनी चाहिए। इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मौजूदा डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था नागरिकों की निजता की रक्षा करने में पर्याप्त है या नहीं, और क्या भविष्य में ऐसे मामलों पर और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता होगी।

  • अमेरिका में पेट्रोल पंपों के फ्यूल सिस्टम पर साइबर हमला, जांच एजेंसियों को ईरान समर्थित हैकर्स पर शक; ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

    अमेरिका में पेट्रोल पंपों के फ्यूल सिस्टम पर साइबर हमला, जांच एजेंसियों को ईरान समर्थित हैकर्स पर शक; ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता



    नई दिल्ली। अमेरिका के कई राज्यों में पेट्रोल पंपों के ऑटोमैटिक टैंक गेज (ATG) सिस्टम को निशाना बनाकर साइबर हमले किए जाने का मामला सामने आया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि इसके पीछे ईरान समर्थित हैकर समूह हो सकते हैं, हालांकि अब तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैकर्स ने उन डिजिटल सिस्टम्स में सेंध लगाई जो पेट्रोल पंपों में फ्यूल की मात्रा मापने और मॉनिटर करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। शुरुआती जांच में पता चला है कि कई सिस्टम इंटरनेट से जुड़े थे और उनमें पर्याप्त पासवर्ड सुरक्षा मौजूद नहीं थी, जिससे हैकर्स को घुसपैठ का मौका मिला।

    अधिकारियों के अनुसार, कुछ मामलों में डिस्प्ले स्क्रीन पर दिखने वाले डेटा से छेड़छाड़ की गई, लेकिन फ्यूल की वास्तविक मात्रा या सप्लाई सिस्टम को प्रभावित नहीं किया जा सका। फिलहाल किसी बड़े हादसे या नुकसान की सूचना नहीं है।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसे सिस्टम पर पूरी तरह नियंत्रण हासिल कर लिया जाए तो गैस लीक, आग या बड़े औद्योगिक हादसों जैसी गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसी वजह से इस घटना को अमेरिकी ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा के लिहाज से बेहद गंभीर माना जा रहा है।

    जांच एजेंसियां इस मामले को अमेरिका-ईरान तनाव के मौजूदा दौर से भी जोड़कर देख रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान समर्थित साइबर समूह पहले भी तेल, गैस, पानी और मेडिकल सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में ईरानी साइबर नेटवर्क की तकनीकी क्षमता काफी बढ़ी है और वे अब पारंपरिक युद्ध के बजाय साइबर हमलों को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

    अमेरिका के कई पेट्रोल पंपों के फ्यूल मॉनिटरिंग सिस्टम में साइबर घुसपैठ का मामला सामने आया है, जिसमें जांच एजेंसियों को ईरान समर्थित हैकर्स पर शक है।
    हालांकि कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने अमेरिका की ऊर्जा और साइबर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

  • ग्वालियर में एयरफोर्स ऑफिसर से 'डिजिटल डकैती': 2 क्रेडिट कार्ड से ठगों ने उड़ाए ₹1.66 लाख, एक साथ खरीदे 8 मोबाइल

    ग्वालियर में एयरफोर्स ऑफिसर से 'डिजिटल डकैती': 2 क्रेडिट कार्ड से ठगों ने उड़ाए ₹1.66 लाख, एक साथ खरीदे 8 मोबाइल


    ग्वालियर। मध्यप्रदेश के ग्वालियर स्थित महाराजपुरा एयरफोर्स स्टेशन में पदस्थ एक ज्वाइंट वारेंट ऑफिसर साइबर ठगी का शिकार हो गए हैं। शातिर ठगों ने अधिकारी के दो अलग-अलग बैंकों के क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर महज कुछ ही मिनटों में ₹1.66 लाख की ऑनलाइन खरीदारी कर डाली। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पीड़ित अधिकारी ने न तो किसी के साथ अपना ओटीपी OTP साझा किया और न ही किसी संदिग्ध कॉल पर कोई जानकारी दी। पुलिस को अंदेशा है कि यह पूरा खेल मोबाइल में भेजी गई एक घातकAPKफाइल के जरिए रचा गया है।

    मूल रूप से जम्मू के रहने वाले अधिकारी ऋषि नरगोवाजो वर्तमान में महाराजपुरा एयरफोर्स स्टेशन में तैनात हैंउनके साथ यह घटना 6 फरवरी की रात घटित हुई। रात करीब 10:11 बजे अचानक उनके मोबाइल पर ट्रांजैक्शन के मैसेज आने शुरू हुए। ठगों ने उनके स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के क्रेडिट कार्ड से ₹95,020 और इंडसइंड बैंक के कार्ड से ₹70,753 की चपत लगाई।

    अगले दिन जब अधिकारी बैंक पहुंचेतो पता चला कि इन पैसों से कुल 8 महंगे मोबाइल फोन खरीदे गए हैं। अधिकारी ने तत्काल साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराईजिसके बादई-जीरो एफआईआरके माध्यम से मामला महाराजपुरा थाने भेजा गया है।

    पुलिस की प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि अधिकारी के मोबाइल पर कोई संदिग्ध लिंक याAPKफाइल आई होगीजिसे अनजाने में ओपन करने से उनके फोन का पूरा एक्सेस ठगों के पास चला गया। इससे ठगों ने बिना कॉल किए ही ओटीपी और कार्ड की डिटेल्स हैक कर लीं। फिलहालसाइबर सेल उस आईडी और डिलीवरी एड्रेस को ट्रैक कर रही हैजहाँ इन 8 मोबाइल फोनों को मंगवाया गया है। यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि किसी भी अनजान लिंक या फाइल को ओपन करना वित्तीय जोखिम का कारण बन सकता है।