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  • भारत का डेटा सेंटर बाजार तेजी से बढ़ा, छह वर्षों में लाइव आईटी क्षमता चार गुना होकर 1.7 गीगावाट पहुंची

    भारत का डेटा सेंटर बाजार तेजी से बढ़ा, छह वर्षों में लाइव आईटी क्षमता चार गुना होकर 1.7 गीगावाट पहुंची

    नई दिल्ली ।भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बाद सबसे बड़े डेटा सेंटर बाजार के रूप में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। पिछले छह वर्षों में देश की लाइव आईटी क्षमता करीब चार गुना बढ़कर 1.7 गीगावाट हो गई है। डेटा सेंटर क्षेत्र में बढ़ती मांग, मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे और बड़े निवेश के कारण आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र के और विस्तार की उम्मीद है।

    भारत में डेटा सेंटर परियोजनाओं की एक बड़ी पाइपलाइन भी तैयार हो चुकी है। वर्तमान में करीब 1.3 गीगावाट क्षमता निर्माणाधीन है। इसके अलावा लगभग 3.2 गीगावाट क्षमता वाली ऐसी परियोजनाएं भी मौजूद हैं, जिनके लिए जमीन, बिजली और निर्माण से संबंधित जरूरी मंजूरियां हासिल की जा चुकी हैं। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में देश की डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

    डेटा सेंटर उद्योग के विस्तार में बिजली की उपलब्धता और फाइबर कनेक्टिविटी को महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। भारत में इंटरनेट उपयोग, क्लाउड सेवाओं, डिजिटल भुगतान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार के साथ डेटा स्टोरेज तथा प्रोसेसिंग की जरूरत लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि वैश्विक और घरेलू कंपनियां भारत में बड़े स्तर पर निवेश की योजनाएं बना रही हैं।

    महाराष्ट्र देश का सबसे प्रमुख डेटा सेंटर बाजार बना हुआ है। भारत की कुल लाइव आईटी क्षमता में राज्य की हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत है। निर्माण शुरू करने के लिए जरूरी मंजूरियां प्राप्त कर चुकी परियोजनाओं की सबसे बड़ी पाइपलाइन भी महाराष्ट्र में मौजूद है। मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में पहले से विकसित डिजिटल और बिजली संबंधी बुनियादी ढांचा इस क्षेत्र के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    डेटा सेंटर विकास का अगला चरण केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहने वाला है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी कंपनियां बड़े निवेश और नई परियोजनाओं की घोषणाएं कर रही हैं। इन राज्यों में जमीन, बिजली, कनेक्टिविटी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता के कारण भविष्य में नई क्षमता विकसित होने की संभावना है।

    घरेलू कारोबारी समूहों ने देश में डेटा सेंटर विकास के लिए करीब 210 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। यह घोषित कुल निवेश का लगभग 45 प्रतिशत है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत में डेटा सेंटर क्षेत्र का विकास केवल विदेशी कंपनियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि घरेलू उद्योग भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है।

    वैश्विक हाइपरस्केलर कंपनियां भी भारत के डेटा सेंटर बाजार में बड़े निवेश की तैयारी कर रही हैं। गूगल, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने मिलकर करीब 84 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है। घोषित कुल निवेश का लगभग 95 प्रतिशत बड़े हाइपरस्केल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कैंपस से जुड़ा है।

    डेटा सेंटर के विस्तार का सीधा असर बिजली की मांग पर भी पड़ेगा। भारत में डेटा सेंटर क्षेत्र की बिजली खपत 2025 में करीब 11 टेरावाट-घंटे से बढ़कर 2035 तक 91 टेरावाट-घंटे पहुंचने का अनुमान है। यानी एक दशक में मांग आठ गुना से अधिक बढ़ सकती है।

    बढ़ती बिजली जरूरत के बीच अक्षय ऊर्जा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। कई बड़ी हाइपरस्केल कंपनियों ने वर्ष 2030 तक नेट-जीरो लक्ष्य निर्धारित किए हैं। ऐसे में डेटा सेंटर संचालन के लिए सौर और अन्य नवीकरणीय स्रोतों से बिजली की मांग बढ़ने की संभावना है। भारत की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में 2021 से अब तक 7.1 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार करती है।

  • भारत में डेटा सेंटर सेक्टर बनेगा रोजगार का नया इंजन, 2030 तक 1 लाख इंजीनियरों की मांग का अनुमान, एआई और क्लाउड टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी अवसरों की रफ्तार

    भारत में डेटा सेंटर सेक्टर बनेगा रोजगार का नया इंजन, 2030 तक 1 लाख इंजीनियरों की मांग का अनुमान, एआई और क्लाउड टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी अवसरों की रफ्तार

    नई दिल्ली ।भारत में तेजी से बढ़ता डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में रोजगार सृजन का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। डिजिटल सेवाओं के विस्तार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग में लगातार वृद्धि के बीच एक नई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र में करीब एक लाख कुशल इंजीनियरों और तकनीकी पेशेवरों की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते योग्य मानव संसाधन तैयार किए गए, तो यह क्षेत्र देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति देने के साथ लाखों युवाओं के लिए करियर के बेहतर अवसर भी उपलब्ध कराएगा।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्थापित डेटा सेंटर क्षमता वर्तमान लगभग 1.5 गीगावाट से बढ़कर दशक के अंत तक करीब 6.5 गीगावाट तक पहुंचने की संभावना है। इसी के साथ देश का डेटा सेंटर बाजार 22 अरब डॉलर से अधिक का आकार प्राप्त कर सकता है। बढ़ती डिजिटल सेवाओं, ई-कॉमर्स, वित्तीय तकनीकों, सरकारी डिजिटल परियोजनाओं और एआई आधारित अनुप्रयोगों ने डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज की जरूरतों को पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा दिया है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डेटा सेंटर क्षेत्र में अब तक 126 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धताएं सामने आ चुकी हैं। लगातार हो रहे निवेश के कारण यह उद्योग देश के सबसे तेजी से विकसित होने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में शामिल हो गया है। नई परियोजनाओं के शुरू होने से निर्माण, संचालन, रखरखाव और तकनीकी प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है।

    हालांकि रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि शिक्षा संस्थानों, उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय नहीं हुआ तो भविष्य में कुशल पेशेवरों की कमी इस क्षेत्र की प्रगति में बड़ी चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और व्यावहारिक कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार केवल तकनीकी निवेश नहीं, बल्कि भारत के युवाओं के लिए दीर्घकालिक रोजगार और कौशल विकास का बड़ा अवसर है। एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड ऑपरेशंस, ऑटोमेशन, पावर सिस्टम और क्रिटिकल फैसिलिटी मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही प्लेटफॉर्म इंजीनियरिंग, डेवऑप्स, एमएलऑप्स और डेटा सेंटर ऑटोमेशन जैसी आधुनिक तकनीकी भूमिकाएं भी तेजी से उभर रही हैं।

    अनुमान है कि आने वाले वर्षों में एआई आधारित वर्कलोड भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा बन जाएगा। ऐसे में डेटा सेंटर उद्योग में काम करने वाले इंजीनियरों के लिए एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा दक्षता और आधुनिक कंप्यूटिंग प्रणालियों की समझ आवश्यक कौशल के रूप में विकसित होगी। इससे तकनीकी शिक्षा और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत भी बढ़ेगी।

    रिपोर्ट के अनुसार भविष्य के डेटा सेंटर केवल डिजिटल स्टोरेज तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऊर्जा प्रबंधन, उन्नत कूलिंग सिस्टम और अत्याधुनिक तकनीकी अवसंरचना पर आधारित होंगे। इसी कारण एआई इंफ्रास्ट्रक्चर ऑपरेशंस इंजीनियर, लिक्विड कूलिंग इंजीनियर, एनर्जी ऑप्टिमाइजेशन स्पेशलिस्ट, क्रिटिकल फैसिलिटीज इंजीनियर और पावर सिस्टम विशेषज्ञ जैसे नए पदों की मांग लगातार बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत समय रहते कुशल कार्यबल तैयार करने में सफल रहता है, तो डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और रोजगार परिदृश्य दोनों को नई मजबूती प्रदान करेगा।

  • रियल एस्टेट सेक्टर पर निवेशकों का भरोसा मजबूत, 33 फीसदी बढ़ा प्राइवेट इक्विटी निवेश, विदेशी पूंजी ने बढ़ाई रफ्तार

    रियल एस्टेट सेक्टर पर निवेशकों का भरोसा मजबूत, 33 फीसदी बढ़ा प्राइवेट इक्विटी निवेश, विदेशी पूंजी ने बढ़ाई रफ्तार


    नई दिल्ली । भारतीय रियल एस्टेट बाजार लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है और वर्ष 2026 की पहली छमाही ने इस क्षेत्र के लिए बेहद उत्साहजनक तस्वीर पेश की है। जनवरी से जून के बीच देश के रियल एस्टेट सेक्टर में 3.2 अरब डॉलर का निजी इक्विटी निवेश दर्ज किया गया है जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक है। यह बढ़ोतरी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों का भरोसा भारतीय रियल एस्टेट बाजार पर लगातार मजबूत हो रहा है और आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं और अधिक बढ़ सकती हैं।

    ग्लोबल रियल एस्टेट कंसल्टिंग फर्म सैविल्स इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार केवल दूसरी तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान ही करीब 2 अरब डॉलर का निवेश हुआ। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट बताती है कि निवेशकों की प्राथमिकताएं अब तेजी से बदल रही हैं और पारंपरिक ऑफिस परिसंपत्तियों के साथ-साथ डेटा सेंटर जैसे आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी उनका भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

    दूसरी तिमाही के दौरान कुल निवेश में डेटा सेंटर का हिस्सा सबसे अधिक 38 प्रतिशत रहा। इसके बाद ऑफिस सेक्टर ने 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरा स्थान हासिल किया जबकि रेजिडेंशियल सेक्टर 16 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर रहा। हालांकि यदि पूरे जनवरी से जून की अवधि की बात करें तो ऑफिस सेक्टर अब भी सबसे आगे बना हुआ है और कुल निजी इक्विटी निवेश में इसकी हिस्सेदारी 34 प्रतिशत रही। इससे साफ है कि कॉरपोरेट गतिविधियों के विस्तार और आधुनिक कार्यस्थलों की बढ़ती मांग के कारण ऑफिस स्पेस निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ है।

    रिपोर्ट के मुताबिक निवेश केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा बल्कि हॉस्पिटैलिटी हेल्थकेयर और स्टूडेंट हाउसिंग या को लिविंग जैसे वैकल्पिक रियल एस्टेट सेगमेंट में भी पूंजी का प्रवाह बढ़ा है। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में 8 प्रतिशत और स्टूडेंट हाउसिंग तथा को लिविंग में 3 प्रतिशत निवेश दर्ज किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि निवेशक अब तेजी से उभरते नए क्षेत्रों में भी अवसर तलाश रहे हैं।

    निवेश के स्रोतों पर नजर डालें तो इस अवधि में कुल निजी इक्विटी निवेश का 51 प्रतिशत हिस्सा घरेलू निवेशकों से आया जबकि 49 प्रतिशत निवेश विदेशी निवेशकों ने किया। घरेलू निवेश का बड़ा हिस्सा ऑफिस सेक्टर में लगाया गया और इसका लगभग 68 प्रतिशत निवेश देश के प्रमुख टियर वन शहरों में केंद्रित रहा। दूसरी ओर विदेशी निवेशकों की पूंजी का 69 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका और कनाडा से आया जिसने मुख्य रूप से डेटा सेंटर और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर को प्राथमिकता दी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था मजबूत शहरीकरण बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थिर आर्थिक माहौल निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बढ़ता निवेश इस बात का संकेत है कि डिजिटल सेवाओं और क्लाउड टेक्नोलॉजी की मांग भविष्य में और तेजी से बढ़ने वाली है।

    सैविल्स इंडिया के कैपिटल मार्केट सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर सुमीत भाटिया का कहना है कि पहली छमाही के निवेश आंकड़े भारतीय रियल एस्टेट बाजार में निवेशकों के मजबूत विश्वास को दर्शाते हैं। उनका मानना है कि हॉस्पिटैलिटी हेल्थकेयर स्टूडेंट हाउसिंग और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ता निवेश यह साबित करता है कि निवेशक अब भारत की डिजिटल और वैकल्पिक रियल एस्टेट ग्रोथ स्टोरी पर लंबी अवधि का दांव लगा रहे हैं। कंपनी को उम्मीद है कि आने वाली तिमाहियों में भी निवेश का यह सकारात्मक रुझान जारी रहेगा और भारतीय रियल एस्टेट बाजार वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।

  • बिजली बिल में 30% तक कटौती का नया फॉर्मूला, उद्योगों ने पारंपरिक सप्लाई छोड़ हरित ऊर्जा की ओर बढ़ाए कदम

    बिजली बिल में 30% तक कटौती का नया फॉर्मूला, उद्योगों ने पारंपरिक सप्लाई छोड़ हरित ऊर्जा की ओर बढ़ाए कदम

    नई दिल्ली । देश का औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्र बिजली खरीदने की पारंपरिक व्यवस्था से तेजी से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है। बढ़ती ऊर्जा लागत और प्रतिस्पर्धी बाजार के दबाव के बीच बड़ी कंपनियां अब सस्ती, स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हरित ऊर्जा विकल्पों को प्राथमिकता दे रही हैं। इसका परिणाम यह है कि सौर और पवन ऊर्जा आधारित परियोजनाओं में कॉरपोरेट निवेश लगातार बढ़ रहा है और ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदल रही है।

    फैक्ट्रियों, आईटी कंपनियों, कॉरपोरेट कार्यालयों और बड़े डेटा सेंटरों की बिजली आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल पारंपरिक बिजली आपूर्ति पर निर्भर रहना कई कंपनियों के लिए महंगा साबित हो रहा है। यही वजह है कि अब वे सीधे नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों से बिजली खरीदने के विकल्प तलाश रही हैं। इससे न केवल बिजली की लागत कम हो रही है बल्कि लंबे समय के लिए ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि उद्योगों और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की कुल बिजली मांग देश की कुल खपत का लगभग आधा हिस्सा है। इसके बावजूद इस मांग का बड़ा भाग अभी भी पारंपरिक स्रोतों से पूरा किया जाता है। यही कारण है कि हरित ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा होने की संभावना जताई जा रही है।

    हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते रुझान का सबसे बड़ा कारण आर्थिक लाभ है। कंपनियों को सौर और पवन परियोजनाओं के माध्यम से मिलने वाली बिजली पारंपरिक बिजली की तुलना में काफी सस्ती पड़ती है। इससे बिजली बिल में उल्लेखनीय कमी आती है और उत्पादन लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में लागत नियंत्रण किसी भी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण रणनीति बन चुका है, इसलिए ऊर्जा क्षेत्र में यह बदलाव स्वाभाविक माना जा रहा है।

    ओपन एक्सेस मॉडल इस परिवर्तन का प्रमुख आधार बनकर उभरा है। इस व्यवस्था के तहत कंपनियां सीधे बिजली उत्पादकों से ऊर्जा खरीद सकती हैं। इससे उन्हें वितरण प्रणाली की कुछ पारंपरिक सीमाओं से राहत मिलती है और अपनी जरूरतों के अनुसार ऊर्जा स्रोत चुनने की स्वतंत्रता भी प्राप्त होती है। पिछले कुछ वर्षों में इस मॉडल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है और इसे उद्योग जगत में भविष्य की व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

    डेटा सेंटर क्षेत्र इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी और प्रेरक दोनों बनकर सामने आया है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है। इन संस्थानों के लिए बिजली सबसे महत्वपूर्ण परिचालन लागतों में से एक है। साथ ही उन्हें चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली की आवश्यकता होती है। इसी कारण डेटा सेंटर संचालक नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और हाइब्रिड ऊर्जा समाधानों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

    हालांकि इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। विभिन्न राज्यों में नियमों और शुल्क संरचनाओं में बदलाव से परियोजनाओं की व्यवहारिकता प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद नई तकनीकें, बैटरी भंडारण व्यवस्था और ऊर्जा प्रबंधन प्रणालियां इन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत कर रही हैं।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में हरित ऊर्जा आधारित औद्योगिक विकास और तेज होगा। लागत में बचत, ऊर्जा सुरक्षा, बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढांचा और नीतिगत समर्थन इस बदलाव को नई गति प्रदान करेंगे। परिणामस्वरूप देश का औद्योगिक ऊर्जा परिदृश्य पहले की तुलना में अधिक स्वच्छ, प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।