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  • ईरान-ओमान के बीच होर्मुज को लेकर हुई डील….अब अमेरिका पर सबकी नजर!

    ईरान-ओमान के बीच होर्मुज को लेकर हुई डील….अब अमेरिका पर सबकी नजर!


    तेजरान।
    अमेरिका (America) और इजरायल (Israel) द्वारा मिलकर ईरान (Iran) पर हमला किए जाने के बाद पश्चिम एशिया (West Asia) की राजनीति तेजी के साथ बदली है। कभी सभी के लिए खुला रहने वाला होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) आज केवल कुछ ही देशों के लिए चालू है। अब इस मामले पर एक अहम परिवर्तन हुआ है। होर्मुज के दोनों किनारों पर स्थित ईरान और ओमान ने इस समुद्री रास्ते को लेकर एक नया समझौता किया है। हालांकि, इस पर अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन ईरानी मीडिया के मुताबिक इस समझौते के तहत कुछ हद तक जानकारियां सामने आई हैं।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों खाड़ी देशों के बीच हुए इस समझौते होर्मुज से निकलने वाले जहाजों की स्थिति के बारे में तय किया गया है। इसमें होर्मुज में बाहर से आने वाले कमर्शियल जहाजों को ईरान संभालेगा। वही, इनको नियंत्रित करेगा। दूसरी तरफ, ओमान होर्मुज से बाहर की तरफ जाने वाले जहाजों की देख रेख करेगा और उनकी नेविगेशन को संभालेगा।


    होर्मुज पर फीस लेंगे ओमान और ईरान?

    क्या अब यहां पर यह दोनों देश किसी तरह की फीस भी लेंगे? इसको लेकर खुले तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि, ईरान, अमेरिका के साथ जारी युद्ध के बाद लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि वह होर्मुज पर फीस लगाने वाला है। वह इसे फीस नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए दिया जाने वाला ‘सर्विस टैक्स’ करार देता है।


    शिपिंग लाइन बनाएंगे ओमान और ईरान

    आने-जाने वाले जहाजों को और अधिक सुविधा देने और टक्कर से बचाने के लिए ईरान और ओमान इस रास्ते पर शिपिंग लाइन का निर्माण करेंगे। इसका उद्देश्य जहाजों के बीच की टक्कर को रोकना होगा। दोनों देशों की तरफ से बताया गया कि इस समझौते का मुख्य लक्ष्य महीनों से उलझे होर्मुज स्ट्रेट के विवाद को शांत करना और ग्लोबल ऊर्जा सप्लाई चैन को दोबारा से शुरू करना है। इस मामले पर अभी दोनों देश काम कर रहे हैं। तकनीकी चीजें साफ होने के बाद इस पर एक आधिकारिक दस्तावेज जारी किया जाएगा।


    अमेरिका पर निगाहें

    ओमान और ईरान किसी भी समझौते पर पहुंच जाएं। लेकिन फिलहाल होर्मुज स्ट्रेट काम करेगा या नहीं यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका क्या ऐक्शन लेता है। वर्तमान में अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट के बाहर नाकेबंदी करके बैठा हुआ है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति का एक बयान सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि वह जल्दी ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिकी संपत्ति घोषित करने वाले हैं। इससे क्षेत्र में और भी ज्यादा तनाव बढ़ गया है।

    दरअसल, अमेरिका चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट पर युद्ध पूर्व की स्थिति बरकरार रहे और किसी भी देश के ऊपर कोई टैक्स न लगाया जाए। लेकिन अपने दशकों पुराने अमेरिकी हमले के डर का सामना कर चुका ईरान अब पीछे हटने को तैयार नहीं है। क्योंकि तेहरान को इस समय लग रहा है कि वह जो भी शर्तें मनवाना चाहें, मनवा सकता है। दोनों तरफ से युद्ध में जीत के दावे की वजह से होर्मुज की स्थिति और भी ज्यादा खराब हो गई है।


    दुनिया के लिए क्यों जरूरी है होर्मुज स्ट्रेट

    पश्चिम एशिया संकट के बीच होर्मुज स्ट्रेट शुरुआत से ही चर्चा का विषय रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि यह समुद्री रास्ता वैश्विक अनवीकरणीय ऊर्जा का करीब 20 फीसदी हिस्से की सप्लाई के लिए जिम्मेदार माना जाता है। खाड़ी देश इसी रास्ते से दुनिया भर को तेल और गैस की सप्लाई करते हैं। अब चूंकि इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर हमला हो रहा है। ऐसी स्थिति में मामला बिगड़ गया है।

    जहाजों का बीमा महंगा हो गया है और अब कंपनियां हमलों के डर से इस रास्ते पर जाने से भी कतरा रही हैं। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा के दाम बढ़ रहे हैं।

  • जियो फाइनेंशियल की बड़ी वैश्विक साझेदारी…. बैंक ऑफ अमेरिका से हुई ₹1,8000 करोड़ की डील

    जियो फाइनेंशियल की बड़ी वैश्विक साझेदारी…. बैंक ऑफ अमेरिका से हुई ₹1,8000 करोड़ की डील


    मुम्बई।
    मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) की जियो फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (Jio Financial Services Limited) ने वित्तीय सेवा कारोबार को विस्तार देने के लिए बैंक ऑफ अमेरिका (Bank of America) के साथ बड़ी डील किया है। 12 अगस्त 2026 को हुए ज्वाइंट वेंचर एग्रीमेंट के तहत बैंक ऑफ अमेरिका की सहायक कंपनी NB Holdings, जियो क्रेडिट लिमिटेड में कुल 49.9 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करेगी। इसके लिए बैंक ऑफ अमेरिका करीब 1.9 अरब डॉलर यानी लगभग ₹18,168 करोड़ का निवेश करेगा।इस डील से जियो क्रेडिट का वैल्यूएशन उसकी नेटवर्थ के करीब 2.5 गुना पर होता है। खास बात यह है कि जियो क्रेडिट को शुरू हुए अभी करीब दो साल ही हुए हैं।


    मुकेश अंबानी ने क्या कहा?

    मुकेश अंबानी ने कहा कि भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ऐसा वित्तीय तंत्र जरूरी है, जो बड़े पैमाने पर काम करने के साथ भरोसेमंद और समावेशी हो। उन्होंने कहा कि जियो फाइनेंशियल तकनीक और बेहतर गवर्नेंस के जरिए भारतीयों के लिए वित्तीय सेवाओं को आसान बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके मुताबिक बैंक ऑफ अमेरिका की वैश्विक विशेषज्ञता और जियो की डिजिटल पहुंच का मेल भारत में क्रेडिट की पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा।


    पहले 26.5% हिस्सेदारी, फिर 49.9% तक पहुंच जाएगा निवेश

    समझौते के तहत एनबी होल्डिंग्स पहले प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए जियो क्रेडिट के 4.29 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदेगी। इसके लिए करीब ₹6,613 करोड़ का भुगतान किया जाएगा। इससे बैंक ऑफ अमेरिका को शुरुआती तौर पर 26.50 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलेगी।

    इसके बाद एनबी होल्डिंग्स 7.56 करोड़ वारंट के लिए करीब ₹11,655 करोड़ का निवेश करेगी। इन वारंट को 18 महीने के भीतर इक्विटी शेयरों में बदला जा सकेगा। वारंट के कन्वर्जन के बाद बैंक ऑफ अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 49.90 प्रतिशत हो जाएगी।


    महज 2 साल में खड़ा हो गया बहुत बड़ा कारोबार

    जियो क्रेडिट, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज की NBFC कंपनी है। यह ग्राहकों को अलग-अलग तरह के कर्ज उपलब्ध कराती है। कंपनी ने बहुत कम समय में बड़ा कारोबार खड़ा किया है। करीब दो साल में इसका एसेट अंडर मैनेजमेंट ₹30,667 करोड़, यानी लगभग 3.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। कंपनी का फोकस डिजिटल तरीके से कर्ज उपलब्ध कराने और भारत में क्रेडिट की पहुंच बढ़ाने पर है।


    क्या रंग लाएगी यह साझेदारी

    इस साझेदारी का मकसद जियो फाइनेंशियल की भारत में मजबूत डिजिटल पहुंच और स्थानीय बाजार की समझ को बैंक ऑफ अमेरिका की वैश्विक वित्तीय विशेषज्ञता के साथ जोड़ना है। दोनों कंपनियां डिजिटल वित्तीय सेवाओं, नए क्रेडिट उत्पादों, रिस्कक मैनेजमेंट और ग्राहकों तक कर्ज की पहुंच बढ़ाने पर काम करेंगी।


    बोर्ड में दोनों कंपनियों की बराबर हिस्सेदारी
    डील के बाद जियो क्रेडिट के बोर्ड में जियो फाइनेंशियल सर्विसेज और बैंक ऑफ अमेरिका को बराबर प्रतिनिधित्व मिलेगा। हालांकि कंपनी की मौजूदा मैनेजमेंट टीम ही इसके रोजमर्रा के संचालन और रणनीति को आगे बढ़ाएगी। जियो क्रेडिट, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज की वित्तीय रिपोर्टिंग में सहायक कंपनी के रूप में बनी रहेगी।


    बैंक ऑफ अमेरिका भी भारत को लेकर उत्साहित

    बैंक ऑफ अमेरिका के चेयरमैन और सीईओ ब्रायन मोयनिहान ने भारत को दुनिया के महत्वपूर्ण विकासशील बाजारों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि जियो फाइनेंशियल ने सिर्फ दो वर्षों में उल्लेखनीय पैमाना हासिल किया है। बैंक ऑफ अमेरिका की वैश्विक पहुंच और डिजिटल विशेषज्ञता को जियो फाइनेंशियल के मार्केट पर पकड़ और ग्राहक आधार से जोड़ने से भारत में वित्तीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

  • सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख

    सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख


    नई दिल्ली। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल में हुए रक्षा समझौते को लेकर तस्वीर अब कुछ बदलती नजर आ रही है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य खास देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है। उनके बयान के बाद इस डिफेंस डील के उद्देश्य और आपसी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं।

    शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते को लेकर यह बात सामने आई थी कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में इसे तीनों पर हमला माना जाएगा।

    ‘इस्लामिक NATO’ के नाम से हो रही चर्चा
    यह समझौता तेल संपन्न सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना वाले तुर्की को एक सुरक्षा ढांचे में लाता है। तुर्की का रक्षा उद्योग तेजी से विकसित हुआ है और उसके ड्रोन भी दुनियाभर में चर्चा में रहे हैं। इसी वजह से तीनों सुन्नी बहुल देशों के इस गठजोड़ की तुलना NATO से की जा रही है और इसे कई जगह ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा है। माना जा रहा था कि क्षेत्र में ईरान से जुड़े सुरक्षा तनाव के बीच यह समझौता सऊदी अरब के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।

    तुर्की ने कहा- किसी खास देश को दुश्मन नहीं माना
    अब तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु एजेंसी को दिए इंटरव्यू में इस समझौते को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि तीनों देश किसी विशेष राष्ट्र को तब तक अपना दुश्मन नहीं मानते, जब तक वह उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण कार्रवाई न करे। फिदान के मुताबिक, समझौते में किसी साझा खतरे को लेकर किसी खास देश का नाम निर्धारित नहीं किया गया है। उनका कहना था कि जो देश तुर्की पर हमला नहीं करता, उसे तुर्की अपना निशाना नहीं मानता।

    NATO के अनुच्छेद 5 से कैसे अलग है व्यवस्था?
    फिदान ने समझौते में आपसी रक्षा से जुड़ी व्यवस्था को तकनीकी तौर पर NATO के अनुच्छेद 5 के समान बताया। NATO के अनुच्छेद 5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। हालांकि, तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस नए समझौते में सैन्य मदद अपने आप सक्रिय नहीं होगी। यदि किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे औपचारिक तौर पर अन्य दो देशों से सहायता मांगनी होगी। इसके बाद खतरे की स्थिति और उसके स्तर के आधार पर सहायता का स्वरूप तय किया जा सकता है। इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, लॉजिस्टिक सहायता देना या जरूरत पड़ने पर सैन्य टुकड़ियां भेजना शामिल हो सकता है।

    दूसरे देशों को भी जोड़ने की तैयारी
    फिदान ने यह भी बताया कि कुछ अन्य देशों ने इस समझौते का हिस्सा बनने में रुचि दिखाई है। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उम्मीद जताई कि मिस्र अगले चरण में इस व्यवस्था से जुड़ सकता है।

    समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री तथा उनके सैन्य प्रमुख नियमित रूप से समिति की बैठक करेंगे। इसके अलावा तीनों देशों के बीच समन्वय के लिए एक सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जिसका मुख्यालय सऊदी अरब में होगा। इस तरह मक्का में हुआ यह रक्षा समझौता भले ही तीन देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन तुर्की के ताजा बयान से यह साफ हो गया है कि इसका लक्ष्य किसी एक देश, खासकर ईरान के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं है।

  • US: ट्रंप फेमिली को 1.6 अरब डालर की डील में हुआ बंपर मुनाफा…. वित्त मंत्री का नाम भी शामिल

    US: ट्रंप फेमिली को 1.6 अरब डालर की डील में हुआ बंपर मुनाफा…. वित्त मंत्री का नाम भी शामिल


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) को लेकर एक नया बवाल शुरू हो गया है। हाल ही में हुए एक बड़े खुलासे के मुताबिक, अमेरिकी सरकार ने हाल ही में एक ऐसी डील (Deel) की है जिससे ट्रंप के बेटे को अरबों का फायदा होने जा रहा है। वहीं इस प्रॉफिट वाली डील में ट्रंप के परिवार के साथ साथ अमेरिका के वित्त मंत्री हावर्ड लुटनिक (Finance Minister Howard Lutnick) का नाम भी है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन की अमेरिका फर्स्ट की नीति को लेकर सवाल उठने शुरू हो हुए हैं।

    दरअसल यह खुलासा द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में हुआ है। इसके मुताबिक कजाकिस्तान (Kazakhstan) के साथ दुनिया के सबसे बड़े दुर्लभ खनिज ‘टंगस्टन’ के भंडार को विकसित करने के लिए अमेरिका ने हाल ही में 1.6 अरब डॉलर यानी करीब 13,500 करोड़ रुपये की सरकारी डील की है। इस डील से सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के बेटों और उनके वाणिज्य मंत्री के परिवार को तगड़ा वित्तीय मुनाफा होने जा रहा है।

    बेहद अहम है ये डील
    कजाकिस्तान के साथ हुआ यह सौदा अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। फिलहाल वैश्विक टंगस्टन बाजार पर पूरी तरह चीन का कब्जा है। चीन लगातार इस दुर्लभ खनिज के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध बढ़ा रहा है। बता दें कि टंगस्टन का इस्तेमाल मिसाइल वॉरहेड्स, फाइटर जेट्स, सेमीकंडक्टर्स और कई एडवांस सैन्य तकनीकों में होता है। अमेरिका इस डील के जरिए चीन पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है। हालांकि अब टंगस्टन से ज्यादा अब चर्चा उन चेहरों की हो रही है, जिनकी तिजोरियां इस सरकारी सौदे से भरने वाली हैं।

    तय हुई डील, पीछे-पीछे बेटों ने लगा दिए पैसे
    दस्तावेजों के मुताबिक, जैसे-जैसे सरकारी स्तर पर इस डील की बातचीत आगे बढ़ रही थी, ठीक उसी समय ट्रंप और उनके करीबी मंत्रियों के परिवारों की कंपनियां इस सौदे में अपनी हिस्सेदारी खरीद रही थीं। सितंबर 2025 में न्यूयॉर्क के सेंट रेजिस होटल में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव के बीच बैठक हुई। इसी बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद फोन कॉल के जरिए कजाकिस्तान के राष्ट्रपति को इस प्रोजेक्ट के लिए राजी किया।

    इस बैठक के ठीक कुछ हफ्तों बाद, ‘डोमिनारी सिक्योरिटीज’ नाम की एक इन्वेस्टमेंट फर्म ने इस कजाकिस्तान माइनिंग प्रोजेक्ट से जुड़ी मुख्य कंपनी में शेयर खरीद लिए। यह कंपनी ट्रंप टावर से चलती है और इसमें डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप की 20% हिस्सेदारी है। दूसरी तरफ, वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के बेटों ब्रैंडन और काइल की एक कंपनी इन्वेस्टमेंट बैंक ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ ने इस प्रोजेक्ट में निवेश के लिए 210 मिलियन डॉलर का फंड जुटाया।

    सरकारी तिजोरी से $8.9 अरब पाने की होड़
    यह कोई इकलौता मामला नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप और लुटनिक परिवारों से जुड़ी कंपनियां कम से कम 14 ऐसी माइनिंग प्रोजेक्ट्स में हित रखती हैं, जिन्हें अमेरिकी सरकार का समर्थन प्राप्त है। ये कंपनियां अमेरिकी सरकार से लगभग 8.9 अरब डॉलर की फेडरल फंडिंग, लोन या रेगुलेटरी मंजूरी पाने की रेस में सबसे आगे हैं।

    संसद में उठे सवाल, वाइट हाउस ने खारिज किए आरोप
    अमेरिकी सांसद मैक्सिन डेक्सटर ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा, “संसद को यह सुनिश्चित करना होगा कि टैक्सपेयर्स के पैसों का इस्तेमाल देश के हित में हो, न कि ट्रंप प्रशासन के करीबी लोगों और उनके परिवार के सदस्यों की जेबें भरने के लिए।” वहीं हितों के टकराव के आरोपों पर अब वाइट हाउस ने अपनी सफाई जारी की है। वाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “ट्रंप प्रशासन के फैसलों के पीछे सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी जनता का हित है। अमेरिका की क्रिटिकल सप्लाई चेन को सुरक्षित करना राष्ट्रपति ट्रंप की प्राथमिकता है।” इधर वाणिज्य विभाग ने कहा है कि मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने अपनी पुरानी कंपनी ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ में अपनी हिस्सेदारी पहले ही बेच दी है और उनका इस लोन या फंडिंग फैसलों से कोई लेना-देना नहीं है।

  • पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे सस्ते…. ! ट्रंप का दावा- US-ईरान के बीच हुई डील, होर्मुज खोलने पर बनी सहमति

    पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे सस्ते…. ! ट्रंप का दावा- US-ईरान के बीच हुई डील, होर्मुज खोलने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया में कई महीनों से जारी तनाव के बीच एलपीजी (LPG), पेट्रोल-डीजल (Petrol Diesel) को लेकर राहत भरी खबर है। आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल (Petrol Diesel) और एलपीजी के दाम (LPG Price) में कटौती देखने को मिल सकती है। बड़ी खबर यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistan’s Prime Minister Shehbaz Sharif) ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। इस समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट को फिर से आवाजाही के लिए खोलने और सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी है।


    भारत के लिए क्यों है अहम यह शांति समझौता?

    भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। होर्मुज स्ट्रेट से भारत के लिए बड़ी मात्रा में तेल और LPG की सप्लाई होती है। अगर यह समझौता सफल रहता है तो पेट्रोल-डीजल पर दबाव कम हो सकता है। LPG कीमतों में राहत की उम्मीद बढ़ सकती है। साथ ही महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिलेगी।


    ऑयल मार्केट में बड़ी गिरावट

    शांति समझौते की खबर आते ही ब्रेंट क्रूड 3% से ज्यादा टूटकर 84 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गया। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी 3.4% गिरकर 81.99 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज खुलने से ग्लोबल ऑयल सप्लाई सामान्य हो सकती है, जिससे ऊर्जा बाजार पर दबाव कम होगा।


    शेयर बाजार में लौटी रौनक

    इस खबर के बाद दुनिया भर के शेयर बाजारों में जोरदार तेजी आई, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। S&P 500 फ्यूचर्स में 0.8% की तेजी आई और बिटकॉइन 2.1% उछलकर 65,341 डॉलर पर पहुंच गया जबकि, एथेरियम 3.1% बढ़कर 1,721 डॉलर पर। निवेशक अब मान रहे हैं कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को राहत मिलेगी।

    – रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित समझौते में अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे।
    – होर्मुज स्ट्रेट में नाकाबंदी खत्म होगी।
    – ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नई बातचीत शुरू होगी।
    – ईरान के तेल निर्यात पर लगे कुछ प्रतिबंधों में राहत मिल सकती है।
    – लेबनान में सैन्य गतिविधियां रोकने पर भी सहमति बनी है।
    – समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की संभावना बताई गई है।

    बता दें दिल्ली में पेट्रोल करीब ₹102 प्रति लीटर और डीजल ₹95 प्रति लीटर के आसपास बिक रहा है। जबकि, यहां आज भी 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत ₹942 और 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत ₹3,113.50 है। ईरान युद्ध के दौरान घरेलू एलपीजी सिलेंडर 89 रुपये महंगा हुआ है और कमर्शियल 1373 रुपये। पेट्रोल और डीजल चार बार में 7.50-7.50 रुपये महंगे हुए।

  • ट्रंप ने फिर दी धमकी…. बोले- डील नहीं हुई तो पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा अमेरिका

    ट्रंप ने फिर दी धमकी…. बोले- डील नहीं हुई तो पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) के साथ जारी शांति वार्ता (Peace talks) के बीच डील को लेकर बड़ी धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि ईरान (Iran) के साथ या तो बड़ी और बेहतर परिणामों वाली डील होगी या फिर कोई भी डील नहीं होगी। इतना ही नहीं ट्रंप ने डील न होने की स्थिति में फिर से युद्ध शुरू करने की भी धमकी दी।

    उन्होंने कहा कि अब अगर डील नहीं होती है, तो अमेरिका पूरी ताकत के साथ युद्ध के मैदान में होगा। इसके साथ ही ट्रंप ने अरब देशों से अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने की अपील की, जिसमें कुछ देश पहले से शामिल हैं। बता दें, ट्रंप की यह धमकी ऐसे समय में सामने आई है, जब ईरान और अमेरिका के बीच हो रही शांति वार्ता लगातार लंबी खिंचती जा रही है। ईरान और अमेरिका दोनों ही तरफ से अच्छे संकेत दिए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है।

    ईरान के साथ लंबी खिंचती बातचीत के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कोई भी नहीं चाहता कि पश्चिम एशिया का युद्ध फिर से शुरू हो। इसलिए बेहतर है कि डील हो जाए। सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने शनिवार को मध्य-पूर्व के राष्ट्राध्यक्षों के साथ हुई अपनी बातचीतों का ब्यौरा भी साझा किया। उन्होंने बताया खाड़ी देशों के नेताओं, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान के साथ मिलकर इस संकट को सुलझाने के लिए बातचीत की है। उम्मीद है कि यह जल्दी ही सुलझ जाएगा, लेकिन इसके साथ ही ट्रंप ने अपील की यह सभी देश अब्राहम अकॉर्ड पर भी हस्ताक्षर करें। इतना ही नहीं ट्रंप ने कहा कि अगर ऐसा होता है, तो ईरान भी अब्राहम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर कर सकता है।


    एक-दो देशों को छोड़कर बाकी देशों को समस्या नहीं होनी चाहिए: ट्रंप

    सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने इस्लामिक देशों के अब्राहम अकॉर्ड को स्वीकार न करने के डर को भी महत्व दिया। उन्होंने कहा, “संभव है कि एक या दो देशों के बाद ऐसा न करने का कारण हो, हम उसे स्वीकार भी करेंगे। लेकिन अधिकांश देशों को इसके लिए तैयार होना होगा। इससे ईरान के साथ होने वाला समझौता और भी ज्यादा ऐतिहासिक हो जाएगा। यह समझौता संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकस्तान के लिए वित्तीय, आर्थिक और सामाजिक बूम साबित हुआ है। इस संघर्ष के दौर में भी इन देशों को इसका फायदा मिला है।”


    क्या हैं अब्राहम अकॉर्ड्स?

    अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका द्वारा बनाए गए समझौतों की एक लिस्ट है। इसका प्रमुख उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच के राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना है। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान शुरू हुए इस समझौते पर सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को ने हस्ताक्षर किए थे। सूडान ने भी इसको सहमति दी है, लेकिन अभी तक उसकी संसद ने इस पर हामी नहीं भरी है। वहीं, अमेरिका का करीबी माने जाने वाला सऊदी अरब भी अभी तक इस समझौते से दूरी बनाए हुए है। हालांकि, सऊदी क्राउन प्रिंस ने इस समझौते में शामिल होने के लिए एक शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि वह इसमें शामिल होने के लिए तैयार हैं, बशर्ते इसमें दो-राष्ट्र समाधान को लेकर स्पष्टता हो।

    दरअसल, अरब देशों और इस्लामिक देशों की दुनिया में अब्राहम अकॉर्ड्स को फिलिस्तीन के साथ धोखे के तौर पर देखा जाता है। इसलिए ज्यादातर देश इससे कन्नी काटते हुए नजर आते हैं। इस समझौते के बाद देशों को इजरायल के साथ सामान्य संबंधों पर राजी होना पड़ता है, जिससे उनकी जनता इस पर नाराज हो सकती है। पाकिस्तान जैसे देश के लिए तो यह समझौता और भी ज्यादा परेशानी पैदा करने वाला है, क्योंकि वह तो इजरायल को देश के रूप में मान्यता ही नहीं देते हैं।

  • भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जंग रहे युद्ध के बीच अमेरिका साउथ ईस्ट एशिया में स्थित एक मुस्लिम देश संग मिलकर बड़ा खेल करने की तैयारी में था। हालांकि एक भारतीय रिपोर्ट ने इस प्लान पर पानी फेर दिया है। बीते दिनों अमेरिका और दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया के बीच एक सीक्रेट समझौते की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब इंडियन मीडिया की एक रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है।

    दरअसल अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक डिफेंस डील साइन होनी थी। हालांकि डील साइन होने से ठीक पहले 12 अप्रैल को एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अमेरिका इंडोनेशिया के एयरस्पेस में अपने सैन्य विमानों को पूरी इजाजत देने की योजना बना रहा है। इस लीक के बाद इंडोनेशिया में भारी हंगामा हुआ और आखिरकार इस प्रावधन को फाइनल डील से बाहर कर दिया गया है।
    रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    इस डील की पूरी जानकारी रिपोर्ट ‘संडे गार्जियन’ में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच कई महीने से इस गुप्त योजना पर काम कर रही थी। फरवरी में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच वाइट हाउस में हुई बैठक में भी इस पर चर्चा हुई थी। इसे 13 अप्रैल को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री शाफ्री जमसोएद्दीन की बैठक में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना था, लेकिन विवाद के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

    डील में क्या था?

    इस प्रस्तावित डील के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशिया के एयरस्पेस में बिना किसी रोक-टोक के उड़ान भरने की इजाजत मिल जाती। आधिकारिक तौर पर इसे इमरजेंसी और संकट के समय इस्तेमाल के लिए बताया गया, लेकिन इसका असली मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निगरानी बढ़ाना था, खासकर उस समय जब ईरान ने होर्मुज पर दबाव बढ़ा दिया है और ग्लोबल ऑयल सप्लाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर पकड़ मजबूत करना चाहता था, जो दुनिया का सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्ग है और जहां से करीब 30 प्रतिशत समुद्री तेल और 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार गुजरता है।
    इंडोनेशिया ही क्यों?

    इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति इस रणनीति के केंद्र में है, क्योंकि वह मलक्का के पास स्थित है।

    अमेरिका के लिए यह डील इंडो-पैसिफिक में चीन पर नजर रखने के लिए अहम साबित हो सकती थी, क्योंकि फिलहाल उसे उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के सैन्य ठिकानों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो दूरी के लिहाज से कम प्रभावी हैं।
    क्यों हटना पड़ा पीछे?

    हालांकि जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, इंडोनेशिया में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया। जकार्ता में सांसदों ने इस तरह के किसी भी समझौते की वैधता पर सवाल उठाए। संसद के डिप्टी चेयर सुकामता ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी सैन्य सहयोग के लिए संसद से सलाह लेना जरूरी है और बिना कानूनी आधार के एयरस्पेस देना संभव नहीं है।

    इस विरोध के बाद प्रबोवो सरकार दबाव में आ गई। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि अमेरिकी विमानों को ओवरफ्लाइट एक्सेस देने का प्रस्ताव फाइनल डील का हिस्सा नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह सिर्फ “लेटर ऑफ इंटेंट” के स्तर पर चर्चा में था और अभी न तो अंतिम है और न ही बाध्यकारी। साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी समझौते में इंडोनेशिया की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह डील फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।
  • फिल्मी जुदाई जैसी हकीकत: महिला अधिकारी ने 1.5 करोड़ में खरीदा पति, प्रेमिका ने दी दाम की रकम

    फिल्मी जुदाई जैसी हकीकत: महिला अधिकारी ने 1.5 करोड़ में खरीदा पति, प्रेमिका ने दी दाम की रकम


    भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा। फिल्मी कहानी जैसी यह घटना असल जिंदगी में भी हुई जहां एक महिला अधिकारी ने अपने प्रेमी को उसकी पत्नी से खरीद लिया। मामला इतना चौंकाने वाला है कि इसे भोपाल का पहला ऐसा केस कहा जा रहा है जहां तलाक के बदले डेढ़ करोड़ रुपए की बड़ी डील हुई।

    यह पूरा मामला कुटुंब न्यायालय में दर्ज हुआ। 42 वर्षीय पति का दिल अपने दफ्तर में साथ काम करने वाली 54 वर्षीय महिला अधिकारी पर आ गया। वह अपनी पत्नी से 10 साल बड़ी है। पत्नी और पति के बीच कई बार काउंसलिंग भी हुई लेकिन पति ने अपनी नई प्रेमिका के साथ रहने का फैसला कर लिया। पत्नी ने भी यह बात समझ ली कि पति वापस नहीं आएगा लेकिन अपने और अपनी बेटियों के भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा की शर्त रखी। पत्नी ने पति से कहा कि वह उसे छोड़ दे लेकिन इसके बदले 27 लाख रुपए कैश चाहिए।

    यह सुनते ही प्रेमिका ने तुरंत सहमति दे दी। उसने यह भी नहीं चाहा कि प्रेमी का परिवार सड़क पर आ जाए और उनकी जिंदगी बर्बाद हो। प्रेमिका ने अपनी गाढ़ी कमाई से यह रकम चुकाने को तैयार हो गई। धीरे धीरे बातचीत आगे बढ़ी और दोनों पक्षों के बीच सौदा तय हो गया। कुल मिलाकर करीब डेढ़ करोड़ रुपए मकान + कैश में मामला सुलझा लिया गया। दोनों पक्षों ने सहमति से अलग होने का फैसला किया और कुटुंब न्यायालय में यह मामला भी दर्ज हुआ।

    यह घटना कई सवाल खड़े करती है। क्या यह प्यार है या केवल पैसों का सौदा? क्या कानून की नजर में यह समझौता सही है? इस मामले में पत्नी ने अपने भविष्य और बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जबकि प्रेमिका ने अपने प्रेमी को पाने के लिए आर्थिक दांव खेला। कुटुंब न्यायालय में इस तरह की पैसे से तलाक की डीलें दुर्लभ हैं लेकिन यह मामला एक बार फिर सामाजिक और नैतिक सीमाओं पर बहस को बढ़ा देगा।

    किसी भी मामले में यह स्पष्ट है कि पति पत्नी के बीच रिश्तों का टूटना केवल परिवार को ही नहीं बल्कि समाज को भी प्रभावित करता है। वहीं इस घटना से यह भी संदेश जाता है कि आर्थिक स्थिति मजबूत होने पर लोग रिश्तों को अपनी मर्जी से बदलने से नहीं चूकते। अब इस मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और कुटुंब न्यायालय में यह केस कैसे निपटता है यह देखने वाली बात होगी।

  • पुतिन भारत दौरे पर रवाना: शाम को PM मोदी देंगे प्राइवेट डिनर; S-400 खरीद पर हो सकता है बड़ा समझौता, पाकिस्तानी जेट गिराने में है सक्षम

    पुतिन भारत दौरे पर रवाना: शाम को PM मोदी देंगे प्राइवेट डिनर; S-400 खरीद पर हो सकता है बड़ा समझौता, पाकिस्तानी जेट गिराने में है सक्षम


    नई दिल्ली। भारत और रूस के बीच कल शुक्रवार को 9 अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं जिसमें रक्षा सौदे प्रमुख होंगेभारत रूस से और ज्यादा S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने पर डील कर सकता है।’ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान S-400 ने कई पाकिस्तानी जेट्स मार गिराए थे, जिसने भारत के लिए गेमचेंजर का काम किया।इसके अपडेटेड वर्जन S-500 को खरीदने को लेकर भी बातचीत हो सकती है।पुतिन के दौरे से ठीक पहले, भारत ने रूस से करीब 2 अरब डॉलर में परमाणु-संचालित अटैक सबमरीन पनडुब्बी 10 साल की लीज पर लेने की डील लगभग फाइनल कर ली है। यह सबमरीन भारतीय नौसैनिकों को ट्रेनिंग देने में मदद करेगी।
    रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा
    पुतिन का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पीएम मोदी अपनी वैश्विक भूमिका को मजबूत करना चाहते हैं, लेकिन भारत-अमेरिका संबंध ट्रम्प प्रशासन के लौटने के बाद सबसे खराब दौर में चले गए हैं।भारत की रणनीति रही है कि वह रूस को छोड़े नहीं और पश्चिमी देशों को भी नाराज न करे। मोदी के लिए यह संतुलन साधना अहम हैट्रम्प के लौटने के बाद भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ का मामला अभी भी अटका हुआ है, ऐसे में पुतिन का दौरा मोदी की रणनीतिक स्वतंत्रता की असली परीक्षा है। भारत को यह दिखाना होगा कि वह पुतिन का भरोसेमंद साझेदार है, लेकिन अमेरिका और यूरोप को भी पूरी तरह नाराज नहीं कर रहा है।

    रूस का दबदबा घटा, पर अभी भी सबसे बड़ा सप्लायर

    पिछले दस साल में भारत ने अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है, जिससे हथियारों की सप्लाई में रूस की हिस्सेदारी घटकर लगभग 36% रह गई है SIPRI रिपोर्ट। हालांकि, रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर बना हुआ है, खासकर न्यूक्लियर सबमरीन, मिसाइल डिफेंस और विशेष तकनीक जैसे बड़े डिफेंस सिस्टम के लिए।

    2030 तक $100 अरब ट्रेड का लक्ष्य

    पुतिन दो दिवसीय दौरे पर 23वीं भारत-रूस समिट में भाग लेंगे, जिसका मुख्य लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाना है।एनर्जी, इन्वेस्टमेंट, तकनीक और इंडस्ट्री।भारत रूस की मदद से कुडनकुलम  तमिलनाडु में न्यूक्लियर पावर प्लांट चला रहा है। इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर भी बात होगी।

    इंडियन वर्कर्स के लिए रूस में नौकरी और पेमेंट सिस्टम पर बात

    पुतिन के साथ 7 मंत्री और रूसी सेंट्रल बैंक के गवर्नर भी आ रहे हैं। इस दौरान दो बड़े मुद्दों पर बात हो सकती हैरूस में वर्कर्स की कमी के कारण, रूस चाहता है कि भारत से तकनीकी विशेषज्ञ, मेडिकल स्टाफ, इंजीनियर आदि आएं। भारत से 10 लाख स्किल्ड वर्कर्स को रूस में रोजगार देने के लिए मोबिलिटी पैक्ट हो सकता है।
    अमेरिका और यूरोपीय दबाव के कारण रूस से सस्ता क्रूड ऑयल खरीदने के पेमेंट में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए, रुपया-रूबल ट्रेड, डिजिटल भुगतान या किसी तीसरे देश के बैंक का इस्तेमाल जैसे नए पेमेंट सिस्टम बनाने पर सहमति बन सकती हैरूस, भारत को आर्कटिक रीजन की एनर्जी परियोजनाओं में निवेश का मौका भी दे सकता है।

    पुतिन करेंगे ज़्यादा तेल खरीद की डिमांड

    यूक्रेन युद्ध के बाद भारत की रूस से तेल खरीद 2.5% से बढ़कर 35% हो गई थी, लेकिन अमेरिका के टैरिफ लगाने के बाद भारत ने यह खरीद कम कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन चाहते हैं कि भारत दोबारा बढ़-चढ़कर रूसी तेल खरीदे, जो दोनों देशों के व्यापार संतुलन के लिए अहम है।पुतिन दिल्ली के ITC मौर्य होटल में रुकेंगे, और दोनों नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत होगी।