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  • मोटर इंश्योरेंस खरीदने वालों को मिल सकते हैं ज्यादा विकल्प, IRDAI के प्रस्ताव से डीलर कमीशन व्यवस्था में बदलाव संभव

    मोटर इंश्योरेंस खरीदने वालों को मिल सकते हैं ज्यादा विकल्प, IRDAI के प्रस्ताव से डीलर कमीशन व्यवस्था में बदलाव संभव

    नई दिल्ली । नई कार या बाइक खरीदते समय ज्यादातर ग्राहक इंश्योरेंस भी उसी डीलर से करा लेते हैं, जहां से वाहन खरीदा जाता है। ऐसे में अलग-अलग बीमा कंपनियों की पॉलिसी, कीमत और उपलब्ध विकल्पों की तुलना करना हमेशा आसान नहीं होता। अब मोटर इंश्योरेंस की बिक्री व्यवस्था में बदलाव के प्रस्ताव से ग्राहकों को डीलर के अलावा दूसरे माध्यमों से बीमा खरीदने का विकल्प मिल सकता है।

    भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण ने मोटर इंश्योरेंस की बिक्री और कमीशन व्यवस्था को लेकर एक पब्लिक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है। इसमें मोटर इंश्योरेंस से जुड़े कमीशन और वितरण व्यवस्था की समीक्षा की गई है। नियामक के अनुसार अलग-अलग मामलों में मोटर इंश्योरेंस पर कमीशन 13 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक हो सकता है, जबकि औसत करीब 24 प्रतिशत बताया गया है।

    नए और पुराने वाहनों की बिक्री से जुड़े ब्रोकर्स और मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स के माध्यम से वित्त वर्ष 2025 में करीब 29,000 करोड़ रुपये का प्रीमियम जुटाया गया। इसमें करीब 7,050 करोड़ रुपये कमीशन के तौर पर गया। प्रस्ताव में इस बात पर विचार किया गया है कि अपेक्षाकृत सरल मोटर इंश्योरेंस उत्पादों पर इतनी ऊंची कमीशन लागत कितनी उचित है।

    प्रस्तावित व्यवस्था में ग्राहकों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए नए और पुराने वाहनों के इंश्योरेंस उत्पादों तक पहुंच देने की बात कही गई है। इससे ग्राहक अलग-अलग विकल्पों की जानकारी ले सकेंगे और डीलर से अलग माध्यम के जरिए पॉलिसी खरीदने का विकल्प चुन सकते हैं। ऐसे गैर-लाभकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लागत वसूलने के लिए प्रीमियम का अधिकतम पांच प्रतिशत शुल्क रखने का प्रस्ताव भी दिया गया है।

    अगर प्रस्ताव लागू होते हैं तो वाहन डीलरों को ग्राहकों के सामने डिजिटल प्लेटफॉर्म का विकल्प और क्यूआर कोड स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना पड़ सकता है। इसका उद्देश्य ग्राहक को यह जानकारी देना है कि इंश्योरेंस खरीदने के लिए केवल डीलर पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है।

    वाहन लोन के साथ इंश्योरेंस की बिक्री को लेकर भी प्रस्ताव में ध्यान दिया गया है। लोन और बीमा की बंडलिंग से जुड़े मामलों में करीब 16 प्रतिशत कमीशन देखे जाने का उल्लेख किया गया है। प्रस्तावित बदलावों में ग्राहक को लोन लेते समय इंश्योरेंस की कीमत और उसे खरीदने के माध्यम की स्पष्ट जानकारी देने पर जोर है।

    पुराने वाहनों के बीमा में भी कमीशन व्यवस्था की समीक्षा की गई है। प्रस्ताव के मुताबिक कई डीलरों के पास सर्विस और रिपेयर की सुविधाएं होने के बावजूद पुराने वाहनों के इंश्योरेंस पर मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स को औसतन करीब 12 प्रतिशत कमीशन मिलता है।

    कैशलेस रिपेयर को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव है। यदि ग्राहक ने किसी दूसरे बीमाकर्ता से पॉलिसी खरीदी है और उसमें कैशलेस रिपेयर की सुविधा उपलब्ध है, तो केवल इस आधार पर डीलर सुविधा से इनकार नहीं कर सकेगा कि बीमा उसी डीलर से नहीं लिया गया।

    इसके अलावा पॉलिसी बिक्री के आधार पर अतिरिक्त इंसेंटिव देने वाली कुछ व्यवस्थाओं पर रोक का प्रस्ताव है। अनिवार्य थर्ड-पार्टी बीमा और सरल मोटर इंश्योरेंस उत्पादों पर कम कमीशन रखने की भी बात कही गई है।

    हालांकि, ये बदलाव अभी लागू नहीं हुए हैं। संबंधित प्रस्ताव पर सुझाव और आपत्तियां 25 अक्टूबर 2026 तक मांगी गई हैं। इसके बाद प्राप्त प्रतिक्रियाओं पर विचार करके आगे की प्रक्रिया तय होगी। इसलिए फिलहाल मोटर इंश्योरेंस की मौजूदा व्यवस्था में तत्काल बदलाव नहीं माना जा सकता।

  • 1 अगस्त से चीनी कारोबार पर सख्ती, जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने तय की नई स्टॉक सीमा

    1 अगस्त से चीनी कारोबार पर सख्ती, जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने तय की नई स्टॉक सीमा

    नई दिल्ली । देशभर में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। सरकार ने 1 अगस्त 2026 से 30 नवंबर 2026 तक चीनी के थोक और खुदरा कारोबारियों के लिए स्टॉक सीमा लागू करने का निर्णय लिया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है, ताकि त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध हो सके।

    नए नियम के अनुसार थोक व्यापारी, खुदरा विक्रेता और बड़े रिटेल स्टोर अधिकतम 4,000 क्विंटल तक ही चीनी का स्टॉक अपने पास रख सकेंगे। इसके साथ ही कारोबारियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मिलों से खरीदी गई चीनी को 30 दिनों के भीतर बाजार में बेच दिया जाए। निर्धारित अवधि से अधिक समय तक स्टॉक रोककर रखने की अनुमति नहीं होगी। सरकार का मानना है कि इससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।

    सरकार ने कारोबारियों के लिए पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से साप्ताहिक स्टॉक विवरण देना भी अनिवार्य किया है। सभी संबंधित व्यापारियों को प्रत्येक सप्ताह सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध चीनी के स्टॉक की जानकारी दर्ज करनी होगी। इससे प्रशासन को बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखने और आवश्यक होने पर त्वरित कार्रवाई करने में सुविधा मिलेगी।

    यह निर्णय ऐसे समय लिया गया है जब त्योहारों के मौसम में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मांग बढ़ने के बावजूद बाजार में कृत्रिम संकट उत्पन्न न हो और उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तु उचित मूल्य पर मिलती रहे। साथ ही, चीनी की आपूर्ति श्रृंखला भी सुचारु रूप से संचालित होती रहे।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह आदेश आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत लागू किया जाएगा। यदि कोई व्यापारी निर्धारित स्टॉक सीमा या समयसीमा का उल्लंघन करता पाया जाता है तो उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी। खाद्य विभाग के अधिकारी जांच के दौरान गोदामों का निरीक्षण कर सकेंगे और नियमों के विरुद्ध पाए गए पुराने स्टॉक को जब्त भी किया जा सकता है।

    नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों के खिलाफ व्यापारिक लाइसेंस रद्द करने, संबंधित सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण समाप्त करने और अन्य कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान रखा गया है। गंभीर मामलों में दोष सिद्ध होने पर जुर्माना लगाने के साथ-साथ कारावास की सजा भी दी जा सकती है। सरकार का मानना है कि कड़े प्रावधानों से जमाखोरी की प्रवृत्ति पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापारियों को अब अपनी खरीद और बिक्री की योजना मांग के अनुरूप बनानी होगी। उन्हें उतनी ही मात्रा में चीनी का स्टॉक रखना होगा, जिसे स्थानीय बाजार में लगभग 20 से 25 दिनों के भीतर आसानी से बेचा जा सके। इससे गोदामों में अनावश्यक भंडारण कम होगा और बाजार में नियमित आपूर्ति बनी रहेगी।

    सरकार को उम्मीद है कि इस व्यवस्था से चीनी की उपलब्धता बेहतर होगी, कीमतों में अनावश्यक उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रहेगा और त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। साथ ही, बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था अधिक संतुलित बनेगी।