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  • तेलंगाना में बेटियों की घट रही संख्या, 1000 बेटों पर सिर्फ 787 बेटियां, 14 जिलों में हालात गंभीर

    तेलंगाना में बेटियों की घट रही संख्या, 1000 बेटों पर सिर्फ 787 बेटियां, 14 जिलों में हालात गंभीर


    नई दिल्ली। तेलंगाना में जन्म के समय लिंगानुपात को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य में बेटियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। साल 2024 के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना के 33 जिलों में से 14 जिलों में प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 900 से भी नीचे पहुंच गई है।

    इन आंकड़ों में सबसे खराब स्थिति नलगोंडा जिले की सामने आई है, जहां साल 2024 में प्रति 1,000 लड़कों पर सिर्फ 787 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया। यह तेलंगाना में सबसे कम और देश के चिंताजनक आंकड़ों में शामिल है।

    नलगोंडा में लंबे समय से बनी हुई है समस्या
    नलगोंडा जिले में जन्म के समय लिंगानुपात की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई प्रयासों के बावजूद यहां बेटियों की संख्या में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। नए आंकड़ों ने एक बार फिर प्रशासन और सामाजिक संगठनों की चिंता बढ़ा दी है।

    कामारेड्डी ने पेश की सकारात्मक मिसाल
    जहां एक ओर कई जिलों में बेटियों की संख्या कम हो रही है, वहीं कामारेड्डी जिला उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है। यह तेलंगाना का एकमात्र जिला है जहां लड़कियों का जन्म लड़कों से अधिक दर्ज किया गया।

    कामारेड्डी में प्रति 1,000 लड़कों पर 1,060 लड़कियों का जन्म हुआ। इसके बाद मुलुगु (991) और सिद्दीपेट (951) जिलों का स्थान रहा। इन दोनों जिलों ने राज्य के औसत 910 से बेहतर प्रदर्शन किया है।

    कई अन्य जिलों में भी स्थिति चिंताजनक
    नलगोंडा के अलावा कई अन्य जिलों में भी जन्म के समय लिंगानुपात काफी कम दर्ज किया गया है।

    महबूबाबाद: 805 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के
    नागरकुरनूल: 842
    वनपर्थी: 848

    इसके अलावा वारंगल, रंगारेड्डी और खम्मम जैसे बड़े जिलों में भी लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में कम दर्ज की गई है।

    साल 2024 में तेलंगाना में कुल 7.7 लाख बच्चों का जन्म दर्ज हुआ। देरी से होने वाले पंजीकरण की संख्या कम होने के कारण इन आंकड़ों को काफी सटीक माना जा रहा है।

    पुराने मामलों ने फिर बढ़ाई चिंता
    नलगोंडा के ताजा आंकड़ों ने साल 2017 की घटनाओं की याद भी ताजा कर दी है। उस समय लड़कियों की सुरक्षा के लिए गठित ‘रक्षिता’ कमेटी ने जिले में कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के 14 मामले सामने लाए थे।

    जांच में सामने आया था कि कुछ मामलों में बेटियों के जन्म को छिपाया गया और उनके शवों को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगाया गया। साल 2011 की जनगणना में भी कम उम्र के बच्चों में लड़कियों की घटती संख्या के संकेत मिले थे।

    बेटियों की संख्या घटने की वजह क्या है?
    विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे सामाजिक सोच और परंपरागत मान्यताएं बड़ी वजह हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बेटे को परिवार का वंश आगे बढ़ाने वाला और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है।

    वहीं दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों के कारण कुछ लोग बेटियों को आर्थिक बोझ के रूप में देखते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कम लिंगानुपात वाले जिलों में सरकार को निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।

    विशेषज्ञों ने अल्ट्रासाउंड केंद्रों की नियमित जांच और पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) कानून को सख्ती से लागू करने की मांग की है, ताकि भ्रूण लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।

  • भारत में 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद, हर दिन 25 स्कूलों पर लगा ताला, छात्रों के नामांकन में गिरावट

    भारत में 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद, हर दिन 25 स्कूलों पर लगा ताला, छात्रों के नामांकन में गिरावट


    नई दिल्ली। देश में स्कूली शिक्षा को लेकर नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में भारत में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 सरकारी स्कूलों पर ताला लगा। इस दौरान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में भी 2.26 करोड़ की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

    नीति आयोग की रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एनहांसमेंट’ के अनुसार, वर्ष 2014-15 में देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख थी, जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गई। इसी अवधि में सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या भी 83 हजार से घटकर 79 हजार हो गई। वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख पहुंच गई।

    छात्रों के नामांकन में भी आई बड़ी गिरावट
    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014-15 में देशभर के स्कूलों में कुल 26.95 करोड़ छात्रों का नामांकन था, जो 2024-25 में घटकर 24.69 करोड़ रह गया। यानी एक दशक में 2.26 करोड़ छात्रों की कमी दर्ज की गई।

    क्यों घट रही है बच्चों की संख्या?
    रिपोर्ट में इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं। इनमें घटती प्रजनन दर के कारण स्कूल जाने योग्य बच्चों की संख्या में कमी, कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का आपस में विलय और उच्च कक्षाओं में छात्रों को स्कूल से जुड़े रखने की चुनौती प्रमुख हैं।

    स्कूलों के विलय पर उठे सवाल
    केंद्र सरकार और नीति आयोग ने संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का विलय किया है। हालांकि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस नीति का असर नामांकन पर भी पड़ा है। उनका तर्क है कि जब गांव या मोहल्ले का नजदीकी स्कूल बंद हो जाता है, तो दूरी बढ़ने के कारण कई बच्चे, खासकर लड़कियां, पढ़ाई छोड़ देती हैं।

    बड़ी कक्षाओं में बढ़ रहा ड्रॉपआउट
    रिपोर्ट में माध्यमिक स्तर पर बढ़ते ड्रॉपआउट को गंभीर चिंता का विषय बताया गया है। पहली से पांचवीं कक्षा तक स्कूल छोड़ने की दर सिर्फ 0.3 प्रतिशत है, लेकिन छठी से आठवीं तक यह बढ़कर 3.5 प्रतिशत हो जाती है। वहीं नौवीं और दसवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते ड्रॉपआउट दर 11.5 प्रतिशत हो जाती है।

    आठवीं से नौवीं कक्षा में जाने वाले छात्रों की दर भी 2014-15 के 91.58 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 86.6 प्रतिशत रह गई है। पुडुचेरी और केरल जैसे राज्यों में यह दर 99.6 प्रतिशत है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में यह अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई है।

    यूपी और एमपी में सबसे ज्यादा स्कूलों का विलय
    रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सबसे बड़े स्तर पर स्कूलों का विलय किया गया। दोनों राज्यों को मिलाकर करीब 40 हजार स्कूल बंद या मर्ज किए गए हैं।

    9वीं के छात्रों की बुनियादी पढ़ाई भी कमजोर
    नीति आयोग की रिपोर्ट में छात्रों के सीखने के स्तर को लेकर भी चिंता जताई गई है। अध्ययन में पाया गया कि कक्षा 9 के कई छात्र बीजगणित और ज्यामिति जैसे विषयों के साथ-साथ प्रतिशत, भिन्न और अनुपात जैसी बुनियादी गणितीय अवधारणाओं को समझने में भी कठिनाई महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह शुरुआती कक्षाओं में सीखने की कमियों के आगे तक बने रहने का संकेत है।

  • Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर

    Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर


    अंकारा।
    पड़ोसी पाकिस्तान (Neighboring Pakistan) का मददगार देश तुर्किये (Turkey) तेजी से एक गंभीर जनसांख्यिकीय संकट (Demographic crisis) की ओर बढ़ रहा है। यह संभवत: दुनिया का इकलौता ऐसा मुस्लिम मुल्क (Muslim country) है, जहां आबादी तेजी से गिर रही है और यही बात वहां के हुक्मरानों को परेशान कर रही है। तुर्की सांख्यिकीय संस्थान के अनुसार, 2024 में तुर्की की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.48 प्रति महिला रह गई है। यह जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी नीचे है। संस्थान के मुताबिक, 25 साल पहले यानी 2001 में यह दर 2.38 थी, जो पिछले 11 वर्षों से लगातार गिर रही है और अब गिरकर 1.48 पर पहुंच गई है।

    देश में जन्म दर में आई ऐतिहासिक गिरावट ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इसे देश के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा और तबाही करार दिया है। उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ ने चेतावनी दी है कि तुर्किये का तथाकथित “जनसांख्यिकीय अवसर काल” (Demographic Dividend) 2035 से पहले ही खत्म हो सकता है। बुधवार को जनसंख्या नीति बोर्ड की बैठक से पहले यिलमाज़ ने कहा कि देश अब एक “डेमोग्राफिक टर्निंग पॉइंट” पर खड़ा है और सरकार इस मुद्दे को अस्तित्व से जुड़ा सवाल मानती है। यह वही शब्दावली है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लंबे समय से करते आ रहे हैं।


    जन्म दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर

    तुर्किये की कुल प्रजनन दर (Fertility Rate) 2017 में 2.08 था जो 2024 में गिरकर 1.48 पर पहुंच गया है। यह दर न सिर्फ आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 से काफी कम है, बल्कि वैश्विक औसत 2.25 से भी नीचे है। यिलमाज़ के मुताबिक, “पिछले 10 वर्षों में जन्म दर में सबसे तेज गिरावट वाले देशों में तुर्किये दुनिया में पांचवें स्थान पर है।” जनसांख्यिकीय अवसर काल वह समय होता है जब कामकाजी आबादी, आश्रित आबादी (बच्चे और बुज़ुर्ग) से कहीं अधिक होती है। इससे आर्थिक विकास को रफ्तार मिलती है। लेकिन यिलमाज़ ने चेताया कि, “अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो यह अवसर 2035 से काफी पहले खत्म हो सकता है।”


    बुज़ुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही

    हालांकि तुर्किये की आबादी अब 8.6 करोड़ से ज्यादा है और यह यूरोप में सबसे अधिक है, लेकिन देश तेजी से बूढ़ा हो रहा है। 2024 में 65 वर्ष से ऊपर की आबादी 10.6% थी। हालांकि कुछ प्रांतों में यह आंकड़ा 20% से ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार, तुर्किये अब “अत्यधिक वृद्ध आबादी” वाले देशों की श्रेणी में आ चुका है।

    अनुमान है कि 2050 तक हर चौथा व्यक्ति 65+ होगा और 2075 तक हर तीसरा शख्स 65+ होगा। अनुमान के मुताबिक, 2100 तक हर 10 में से 4 लोग बुज़ुर्ग होंगे। इसका सीधा असर पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के पलायन के कारण बुज़ुर्गों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से भी अधिक हो चुका है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए तीन बच्चों की पॉलिसी लागू की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन या उससे अधिक बच्चों वाली जन्म दर वाले प्रांतों की संख्या 2017 में 10 थी जो 2024 में सिर्फ़ 1 रह गई है।


    सरकार की पहल

    इस बीच, राष्ट्रपति एर्दोगन ने पिछले साल 2025 को “परिवार वर्ष” घोषित किया था। इसके अलावा 2026–2035 को “परिवार और जनसंख्या दशक” घोषित किया गया है। आबादी बढ़ाने के लिए सरकार ने इसके अलावा कई प्रोत्साहन योजनाओं की भी घोषणा की है। इसके तहत पहले बच्चे के जन्म पर 5,000 लीरा का एकमुश्त भुगतान और दूसरे बच्चे के लिए मासिक भत्ता भुगतान की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा नवविवाहित जोड़ों को 150,000 लीरा तक का ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है, जिसमें पहले दो साल कोई भुगतान नहीं करना होगा। राष्ट्रपति एर्दोगन लंबे समय से तुर्की के परिवारों से कम से कम 3 बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं ताकि देश की जनसांख्यिकीय शक्ति बनी रहे। इसके अलावा सरकार ने युवाओं के लिए सामाजिक आवास, मातृत्व और बाल भत्ते में बढ़ोतरी की भी व्यवस्था की है।


    क्यों घट रही है जन्म दर?

    विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, जन्म दर घटने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। इनमें सबसे अहम आर्थिक कारण हैं। तुर्किये में उच्च मुद्रास्फीति (Inflation), आवास की बढ़ती लागत और नौकरी की असुरक्षा के कारण युवा परिवार शुरू करने से डर रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं के बीच उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ा है, जिससे वे शादी और बच्चों के बजाय करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। शहरों में रहने वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जहां ग्रामीण इलाकों की तुलना में बच्चों की संख्या कम होती है। इसके अलावा आर्थिक दबाव और जीवन-यापन की बढ़ती लागत भी इसकी एक अहम वजह है। बता दें कि चीन-जापान भी इसी तरह की समस्या का सामना कर रहा है।