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  • एनडीए में शामिल होने की खबरों को किया खारिज, शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा- दीदी के साथ खड़ा हूं और रहूंगा

    एनडीए में शामिल होने की खबरों को किया खारिज, शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा- दीदी के साथ खड़ा हूं और रहूंगा

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के संभावित राजनीतिक रुख को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच पार्टी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने उन अटकलों को सिरे से खारिज किया है जिनमें उन्हें पार्टी के कथित बागी सांसदों की सूची में शामिल बताया जा रहा था। सिन्हा ने साफ कहा कि वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं और उनका साथ छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

    राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ दिनों से ऐसी चर्चाएं तेज थीं कि तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद पार्टी नेतृत्व से असंतुष्ट हैं और वे अपना राजनीतिक भविष्य किसी नए समीकरण के साथ जोड़ सकते हैं। इसी बीच कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि पार्टी के कई सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अलग राजनीतिक रुख अपनाने की इच्छा जताई है। इन चर्चाओं में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम भी सामने आया था।

    हालांकि शत्रुघ्न सिन्हा ने इन खबरों को पूरी तरह निराधार बताया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने उनके जीवन और राजनीतिक सफर के कठिन दौर में उनका साथ दिया था। ऐसे में उनके प्रति उनकी प्रतिबद्धता और सम्मान हमेशा बना रहेगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह किसी भी प्रकार की बगावत या दल बदल से जुड़े नहीं हैं और पार्टी नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़े हैं।

    सूत्रों के अनुसार भी ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई है कि शत्रुघ्न सिन्हा ने किसी पत्र या प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हों। उनके करीबी लोगों का कहना है कि उनके नाम को लेकर जो दावे किए गए, वे तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। इस स्पष्टीकरण के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही अटकलों पर काफी हद तक विराम लग गया है।

    दरअसल हाल के दिनों में शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक रूप से शुभकामनाएं देने के बाद राजनीतिक चर्चाओं को और बल मिला था। प्रधानमंत्री के लगातार लंबे कार्यकाल को लेकर दिए गए उनके संदेश को कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने अलग नजरिए से देखा था। हालांकि अब स्वयं सिन्हा ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी नेता को बधाई देना राजनीतिक निष्ठा बदलने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए।

    शत्रुघ्न सिन्हा वर्तमान में पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने हालिया लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी। फिल्म जगत से राजनीति में आए सिन्हा लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति का चर्चित चेहरा रहे हैं और विभिन्न दलों के नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध भी रहे हैं।

    इस बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में राज्यसभा स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम भी देखने को मिले हैं। हाल के दिनों में कुछ नेताओं के इस्तीफों ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज किया है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि संगठन मजबूत है और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है।

    शत्रुघ्न सिन्हा के ताजा बयान को तृणमूल कांग्रेस के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। उनके स्पष्ट रुख ने पार्टी के भीतर संभावित टूट या बड़े स्तर पर असंतोष की चर्चाओं को फिलहाल कमजोर कर दिया है। आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति में घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ते हैं, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों और दलों की नजर बनी रहेगी।

  • भतीजे अभिषेक बनर्जी के पर कतरे और खुद दिल्ली आ रहीं ममता, टीएमसी के नाराज सांसदों की दिल्ली में मौजूदगी से सियासी हलचल तेज

    भतीजे अभिषेक बनर्जी के पर कतरे और खुद दिल्ली आ रहीं ममता, टीएमसी के नाराज सांसदों की दिल्ली में मौजूदगी से सियासी हलचल तेज

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा आंतरिक असंतोष अब राज्य की भौगोलिक सीमाओं को पार कर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया है। राज्य विधानसभा में 58 विधायकों की बड़ी बगावत का सामना कर रहीं मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी को अब देश की संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में भी एक बड़े विद्रोह की आशंका सताने लगी है। तृणमूल कांग्रेस के कई असंतुष्ट और नाराज लोकसभा सांसदों द्वारा अचानक दिल्ली में डेरा डाल दिए जाने के बाद से कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार बेहद गर्म है।

    इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में दो-तिहाई बहुमत यानी ’19’ का एक ऐसा गणित है, जिसने तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की रातों की नींद उड़ा रखी है। दरअसल, वर्तमान लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 निर्वाचित सांसद हैं। देश के कड़े दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ अलग गुट नहीं बनाते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता रद्द हो सकती है। ऐसे में टीएमसी के संसदीय दल को वैधानिक रूप से तोड़ने और कार्रवाई से बचने के लिए कम से कम 19 सांसदों के एक साथ आने की आवश्यकता है। सूत्रों का दावा है कि बागी गुट इसी जादुई आंकड़े को छूने की कवायद में जुटा हुआ है।

    संसदीय दल में संभावित बिखराव को रोकने और डैमेज कंट्रोल के लिए ममता बनर्जी ने बेहद आक्रामक और रणनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आधिकारिक आवास पर राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक आपात बैठक बुलाकर ममता बनर्जी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा फेरबदल किया है। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के पर कतरने के साफ संकेत मिले हैं। ममता बनर्जी ने अभिषेक के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन को पार्टी का नया संयुक्त राष्ट्रीय सचिव नियुक्त कर दिया है, जिसे सीधे तौर पर अभिषेक के अधिकारों में कटौती के रूप में देखा जा रहा है।

    पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, सांसदों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उपजे इस असंतोष की सबसे बड़ी वजह डायमंड हार्बर के सांसद अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली है। बागी गुट का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी का संगठन चलाने का तरीका बेहद एकाकी है और वे पुराने व वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर एक विशेष ‘सिंडिकेट’ के जरिए पार्टी पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं। इसी कार्यप्रणाली से नाराज होकर कूचबिहार के सांसद जगदीश चंद्र बसुनिया समेत पार्टी के कुछ अन्य सांसद इस समय दिल्ली में मौजूद हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे निजी दौरा बताया जा रहा है। इसके साथ ही बंगाल के दो बड़े अभिनेता-सांसदों के भी अगले कुछ दिनों में दिल्ली पहुंचने की संभावना है।

    इस राजनीतिक घमासान के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संगठन के साथ खड़े होने का दावा किया है। सांसद सौगत रॉय ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि यह सब कुछ ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा है, जिसके तहत धनबल और केंद्रीय एजेंसियों के डर का इस्तेमाल कर क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी इस चुनौती का मजबूती से सामना करेगी। वहीं दूसरी ओर, कृष्णानगर की सांसद महुआ मोइत्रा और बर्धमान-दुर्गापुर के सांसद कीर्ति आजाद ने भी ममता बनर्जी के नेतृत्व के प्रति अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त की है।

    इस बीच, अपनी पार्टी को बिखरने से बचाने और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता का संदेश देने के लिए खुद ममता बनर्जी आठ जून को दिल्ली के दौरे पर आ रही हैं। वे यहां ‘इंडिया’ गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होंगी, जहां उनके साथ अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ ब्रायन भी मौजूद रहेंगे। दिल्ली दौरे के दौरान ममता बनर्जी अपने नाराज सांसदों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर उनकी शिकायतों को दूर करने का प्रयास भी कर सकती हैं, ताकि लोकसभा में किसी भी तरह के संभावित विभाजन को समय रहते टाला जा सके।

  • पश्चिम बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई तेज, रिजू दत्ता बोले- अब भी नहीं चेतीं ममता तो संगठन का अस्तित्व खतरे में

    पश्चिम बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई तेज, रिजू दत्ता बोले- अब भी नहीं चेतीं ममता तो संगठन का अस्तित्व खतरे में

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी से निष्कासित नेताओं द्वारा लगातार किए जा रहे दावों और बयानों ने राज्य की सियासत को नई दिशा दे दी है। इसी कड़ी में निष्कासित नेता रिजू दत्ता ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ा राजनीतिक बदलाव आकार ले रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पार्टी नेतृत्व ने समय रहते हालात को नहीं समझा तो संगठन केवल नाममात्र का ढांचा बनकर रह जाएगा।

    रिजू दत्ता का यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी के एक अन्य निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। बागी खेमे का कहना है कि इन विधायकों ने उन्हें अपना नेता चुना है और इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को भी समर्थन पत्र सौंपा जा चुका है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इससे राज्य की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

    रिजू दत्ता ने कहा कि बागी गुट की ओर से उठाया गया कदम पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत किया गया है। उनके अनुसार, समय के साथ ऋतब्रत बनर्जी को समर्थन देने वाले विधायकों की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अधिकांश विधायक अब भी ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी का प्रमुख चेहरा मानते हैं, लेकिन संगठन में दूसरे नेतृत्व को लेकर असंतोष मौजूद है।

    बागी नेताओं ने विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व शैली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है और कई वरिष्ठ नेताओं तथा विधायकों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। इसी असंतोष ने वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को जन्म दिया है।

    तृणमूल कांग्रेस के लिए यह संकट ऐसे समय सामने आया है जब हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कभी राज्य विधानसभा में भारी बहुमत रखने वाली पार्टी की संख्या अब काफी कम हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी झटकों के बाद संगठन के भीतर उभर रहे मतभेद नेतृत्व के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकते हैं।

    इस बीच, पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास भी जारी हैं। हालांकि बागी नेताओं के लगातार बयान यह संकेत दे रहे हैं कि असंतोष केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व शैली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और कानूनी प्रक्रियाएं इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।

    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में नजरें इस बात पर टिकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व इस चुनौती का सामना किस तरह करता है। एक ओर बागी गुट अपने समर्थन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व संगठनात्मक एकता बनाए रखने की कोशिश में जुटा हुआ है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष राज्य की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक बन सकता है।

  • चुनावी हार के बाद बढ़ीं ममता बनर्जी की चुनौतियां, बागी विधायकों के बाद अब सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने बढ़ाई चिंता

    चुनावी हार के बाद बढ़ीं ममता बनर्जी की चुनौतियां, बागी विधायकों के बाद अब सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद जारी सियासी उथल-पुथल अब राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती दिखाई दे रही है। राज्य में चुनावी पराजय के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। इसी बीच ऐसे दावे भी किए जा रहे हैं कि पार्टी के कुछ सांसद भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं और भविष्य में राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    सूत्रों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं और वैकल्पिक राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि कई सांसदों और भाजपा नेतृत्व के बीच विभिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है। यदि भविष्य में इस तरह का कोई राजनीतिक घटनाक्रम सामने आता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति और संसद में विपक्षी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

    तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। हालांकि हालिया विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही संगठन के भीतर असंतोष की खबरें सामने आने लगी थीं। पार्टी के कुछ नेताओं और विधायकों ने नेतृत्व की कार्यशैली, संगठनात्मक निर्णयों और विभिन्न विवादों के प्रबंधन को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए थे।

    राज्य विधानसभा में भी राजनीतिक स्थिति तेजी से बदली है। बड़ी संख्या में विधायकों द्वारा अलग रुख अपनाने और नए नेतृत्व के समर्थन की खबरों ने तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठनात्मक संकट को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े चुनावी झटके के बाद दलों के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर असहमति उभरना असामान्य नहीं है, लेकिन यदि यह असंतोष लगातार बढ़ता है तो इसका असर पार्टी की भविष्य की राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है।

    संसद में तृणमूल कांग्रेस विपक्ष की प्रमुख पार्टियों में गिनी जाती रही है। ऐसे में सांसदों के संभावित राजनीतिक बदलाव की अटकलें विपक्षी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संसद में किसी भी बड़े दल की संख्या में बदलाव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

    दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व संगठन को एकजुट रखने और राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में जुटा हुआ है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाए रखना और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास कायम रखना होगा। इसके साथ ही पार्टी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि चुनावी हार के बाद उत्पन्न असंतोष और मतभेदों को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।

    फिलहाल राजनीतिक परिदृश्य में अनिश्चितता बनी हुई है और सभी की निगाहें संभावित घटनाक्रमों पर टिकी हैं। यदि सांसदों के पाला बदलने संबंधी दावे आगे चलकर वास्तविक रूप लेते हैं तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण बदलाव का कारण बन सकता है। वहीं यदि पार्टी नेतृत्व स्थिति को संभालने में सफल रहता है तो यह संकट उसके लिए संगठनात्मक पुनर्गठन का अवसर भी साबित हो सकता है।

  • तमिलनाडु राजनीति में बड़ा संकट: AIADMK दो गुटों में बंटी, पलानीस्वामी ने बागियों पर की सख्त कार्रवाई

    तमिलनाडु राजनीति में बड़ा संकट: AIADMK दो गुटों में बंटी, पलानीस्वामी ने बागियों पर की सख्त कार्रवाई


    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी तूफान खड़ा हो गया है, जहां राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी AIADMK गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। हाल ही में हुए फ्लोर टेस्ट के बाद पार्टी में खुलकर बगावत सामने आई है, जिससे न केवल संगठनात्मक ढांचा हिल गया है बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा पर भी गहरा असर पड़ने की संभावना बन गई है। इस घटनाक्रम ने पार्टी को दो स्पष्ट गुटों में विभाजित कर दिया है, जिसमें एक ओर एडप्पादी के. पलानीस्वामी का नेतृत्व है और दूसरी ओर षणमुगम और वेलुमणि के नेतृत्व में बागी खेमे का गठन हुआ है।

    फ्लोर टेस्ट के दौरान जब 25 AIADMK विधायकों ने कथित तौर पर मुख्यमंत्री विजय की पार्टी TVK के पक्ष में क्रॉस वोट किया, तो राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद सत्ता समीकरण बदलते नजर आए और TVK की स्थिति मजबूत होती दिखाई दी। पार्टी नेतृत्व ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।

    एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने सख्त रुख अपनाते हुए षणमुगम और वेलुमणि को उनके पदों से हटा दिया। इसके साथ ही उन्होंने दलबदल विरोधी कानून के तहत संबंधित विधायकों को अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। पार्टी का दावा है कि बागी विधायकों ने व्हिप का उल्लंघन किया है, जबकि दूसरी ओर बागी गुट इसे अवैध और असंवैधानिक बता रहा है।

    षणमुगम गुट ने पलटवार करते हुए कहा है कि पार्टी महासचिव को सीधे व्हिप नियुक्त करने का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, विधायकों की बैठक में ही नेता और व्हिप का चुनाव किया जाता है, इसलिए वर्तमान व्हिप नियुक्ति कानूनी रूप से मान्य नहीं है। इस विवाद ने पार्टी के भीतर कानूनी और राजनीतिक लड़ाई को और तेज कर दिया है, जिससे संकट गहरा गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच चेन्नई में तनाव का माहौल बन गया है। AIADMK मुख्यालय के बाहर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी संभावित टकराव या हिंसा को रोका जा सके। 2022 में हुई हिंसक झड़पों की यादें अभी भी ताजा हैं, जब पार्टी के दो गुटों के बीच परिसर में तोड़फोड़ और मारपीट जैसी घटनाएं हुई थीं। प्रशासन इस बार किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क है।

    पार्टी के भीतर चल रही इस खींचतान ने संगठनात्मक एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पलानीस्वामी गुट अब आगे की रणनीति तय करने के लिए वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की तैयारी में है, वहीं बागी गुट ने साफ कर दिया है कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता, वे पार्टी मुख्यालय से दूरी बनाए रखेंगे।

    इस राजनीतिक उथल-पुथल का असर केवल AIADMK तक सीमित नहीं है, बल्कि तमिलनाडु की पूरी राजनीति पर पड़ सकता है। सत्ता समीकरण बदलने की संभावना ने अन्य दलों की रणनीति भी प्रभावित कर दी है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पार्टी इस संकट से उबर पाती है या यह विभाजन स्थायी रूप ले लेता है।

  • AAP में बगावत पर सियासी संग्राम: 7 सांसदों के BJP में जाने पर बोले संजय सिंह, यह असंवैधानिक, सदस्यता रद्द हो

    AAP में बगावत पर सियासी संग्राम: 7 सांसदों के BJP में जाने पर बोले संजय सिंह, यह असंवैधानिक, सदस्यता रद्द हो


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के कई राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की खबर के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम पर पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया है।  संजय सिंह ने कहा कि राघव चड्ढा समेत सात राज्यसभा सांसदों का यह कदम संसदीय नियमों के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति को पत्र लिखकर इन सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग करेंगे।

    पार्टी के प्रति जिम्मेदारी पर उठाए सवाल

    संजय सिंह ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन्हें पार्टी ने अवसर और पहचान दी, उनसे अपेक्षा थी कि वे जनता और संगठन के हित में काम करेंगे। उन्होंने खासतौर पर पंजाब के संदर्भ में कहा कि इन नेताओं को राज्य और पार्टी के विस्तार में योगदान देना चाहिए था।

    सोशल मीडिया पर भी उठाया मुद्दा

    संजय सिंह ने यह भी दावा किया कि पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इंस्टाग्राम और फेसबुक को निलंबित कर दिया गया है। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे व्हाट्सऐप और अन्य माध्यमों के जरिए पार्टी का संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राज्यसभा में इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया जाता है और क्या वाकई इन सांसदों की सदस्यता पर कोई कार्रवाई होती है। फिलहाल इतना तय है कि यह मामला आने वाले दिनों में और ज्यादा गरमाने वाला है।
  • AAP को एक और झटका: स्वाति मालीवाल BJP में शामिल, मोदी-शाह की तारीफ कर केजरीवाल पर जमकर किए हमले

    AAP को एक और झटका: स्वाति मालीवाल BJP में शामिल, मोदी-शाह की तारीफ कर केजरीवाल पर जमकर किए हमले


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी को एक और बड़ा झटका देते हुए राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। करीब दो दशक पुराने रिश्ते को खत्म करते हुए उन्होंने इस फैसले के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब एक दिन पहले ही राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने पहले ही संकेत दिए थे कि पार्टी के कुछ और सांसद भी जल्द पाला बदल सकते हैं, जिस पर अब मालीवाल के फैसले से मुहर लग गई है। भाजपा में शामिल होने के बाद स्वाति मालीवाल ने कहा कि उन्होंने यह कदम किसी दबाव में नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक सोच और विश्वास के आधार पर उठाया है। उन्होंने लोगों से अपील की कि जो लोग सकारात्मक और रचनात्मक राजनीति करना चाहते हैं, वे भाजपा से जुड़ें।

    केजरीवाल पर तीखे आरोप

    इस दौरान स्वाति मालीवाल ने अरविंद केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वह 2006 से उनके साथ थीं और हर आंदोलन में सहयोग किया, लेकिन उन्हें ही अपने घर में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। मालीवाल ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने आवाज उठाई तो उन पर दबाव बनाया गया और एफआईआर वापस लेने के लिए धमकाया गया। उन्होंने केजरीवाल को “महिला विरोधी” बताते हुए यह भी कहा कि पिछले दो वर्षों में उन्हें संसद में बोलने का अवसर तक नहीं दिया गया।

    मोदी-शाह की तारीफ

    स्वाति मालीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नीतियों और फैसलों की सराहना की। उन्होंने कहा कि देश के विकास और बड़े निर्णयों में इनका नेतृत्व महत्वपूर्ण रहा है। कुल मिलाकर, AAP से लगातार हो रहे दलबदल ने दिल्ली की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है और आने वाले समय में इसके और असर देखने को मिल सकते हैं।