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  • डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा

    डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा


    नई दिल्ली ।भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय उद्योगों को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की इस मंजूरी के बाद निर्धारित योग्यता और आवश्यक मानकों को पूरा करने वाली भारतीय कंपनियां इन मिसाइल प्रणालियों का देश में उत्पादन कर सकेंगी।

    इस फैसले का सीधा असर भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता पर पड़ने की उम्मीद है। अब तक मिसाइल प्रणालियों के अनुसंधान, विकास और तकनीकी परीक्षण में डीआरडीओ की प्रमुख भूमिका रही है। नई व्यवस्था के तहत विकसित और निर्धारित मानकों पर खरी उतरने वाली तकनीक को उद्योगों तक पहुंचाया जाएगा, जिससे अनुसंधान से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

    रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल देश में हथियारों का इस्तेमाल करने या तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उत्पादन क्षमता, आपूर्ति श्रृंखला, जरूरी कलपुर्जों की उपलब्धता और तकनीकी विशेषज्ञता का घरेलू स्तर पर मजबूत होना भी जरूरी है। मिसाइल तकनीक के हस्तांतरण से इन सभी क्षेत्रों में भारतीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है।

    इस व्यवस्था के तहत योग्य कंपनियां डीआरडीओ की विकसित तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मिसाइल प्रणालियों के औद्योगिक उत्पादन में भूमिका निभाएंगी। इससे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक प्रणालियों की आपूर्ति को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाने में मदद मिल सकती है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रगति होने की उम्मीद है।

    इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखला में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए अवसर बढ़ना है। मिसाइल निर्माण केवल मुख्य प्रणाली तैयार करने तक सीमित नहीं होता। इसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष सामग्री, सेंसर, संचार प्रणालियों, यांत्रिक हिस्सों और अन्य तकनीकी घटकों की जरूरत होती है। ऐसे में बड़ी कंपनियों के साथ छोटे और मध्यम भारतीय उद्यम भी उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं।

    सरकार की व्यापक रणनीति देश में ऐसा रक्षा औद्योगिक आधार तैयार करने की है, जिसमें अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल हो। डीआरडीओ नई और उन्नत सैन्य तकनीकों के अनुसंधान एवं विकास पर अधिक ध्यान दे सकता है, जबकि पहले से विकसित तकनीकों को औद्योगिक उत्पादन में बदलने की जिम्मेदारी प्रमाणित भारतीय कंपनियां संभाल सकती हैं।

    इससे नई सैन्य तकनीक विकसित होने और उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपलब्ध कराने के बीच लगने वाले समय को कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है। भारतीय उद्योगों को तकनीकी क्षमता विकसित करने और रक्षा उत्पादन में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

    भारत पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के घरेलू निर्माण को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों तक पहुंचाने का यह निर्णय उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण, तकनीकी क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर, डीआरडीओ की विकसित मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों के लिए उपलब्ध कराने से अनुसंधान और उत्पादन के बीच की दूरी कम करने का प्रयास किया गया है। यह कदम भारतीय कंपनियों और एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने के साथ देश की रक्षा आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    नई दिल्ली । भारत की रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई Su-57 को लेकर फिलहाल भारत की ओर से कोई खरीद योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। इसके बजाय भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले को रूस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मॉस्को लंबे समय से भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश करता रहा है।

    रूस ने भारत को Su-57 विमान खरीदने के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें विमान निर्माण में सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय जरूरतों के अनुसार बदलाव की पेशकश भी शामिल थी। रूस की कोशिश थी कि भारत पांचवीं पीढ़ी के इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को अपने बेड़े में शामिल करे। इससे पहले ऐसी संभावनाएं जताई जा रही थीं कि भारत करीब 36 से 40 Su-57 विमानों की खरीद पर विचार कर सकता है। हालांकि, अब भारत की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से संकेत दिया गया है कि फिलहाल Su-57 को लेकर कोई सक्रिय खरीद योजना नहीं है। भारत अपने मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को और अधिक आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहा है। Su-30MKI भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का प्रमुख हिस्सा रहा है। इन विमानों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई तकनीकी सुधार और अपग्रेड की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

    इसके साथ ही भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। राफेल पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है और इसकी क्षमता को देखते हुए भारत इसे एक भरोसेमंद विकल्प मान रहा है। राफेल अपनी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी के हथियारों और बहुउद्देश्यीय क्षमता के लिए जाना जाता है। इससे वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर ऑपरेशनल क्षमता मिलती है।

    हालांकि राफेल और Su-57 अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमान हैं। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक विमान माना जाता है, जबकि Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। Su-57 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम रडार पहचान क्षमता और आंतरिक हथियार भंडारण प्रणाली है। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

    भारत की रक्षा योजना में अब स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA परियोजना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यह भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम को मजबूत करना चाहता है।

    रक्षा क्षेत्र में बदलती जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच भारत का ध्यान अब संतुलित विकल्पों पर है। एक ओर जहां राफेल जैसे आधुनिक और युद्ध में परखे गए विमानों को शामिल करने की योजना है, वहीं दूसरी ओर Su-30MKI अपग्रेड और AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में Su-57 की खरीद पर फिलहाल विराम लगना भारत की बदलती रक्षा नीति का संकेत माना जा रहा है।

  • रणभूमि से आगे मानवीय सेवा तक भारतीय सेना की पहचान, राजनाथ सिंह ने गिनाईं सैन्य चिकित्सा की नई प्राथमिकताएं

    रणभूमि से आगे मानवीय सेवा तक भारतीय सेना की पहचान, राजनाथ सिंह ने गिनाईं सैन्य चिकित्सा की नई प्राथमिकताएं

    नई दिल्ली । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारतीय सशस्त्र बलों की पहचान केवल युद्ध के मैदान में उनके साहस और पराक्रम से नहीं होती, बल्कि मानवीय सहायता, आपदा राहत और सेवा भावना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय संकटों और कठिन परिस्थितियों में भारतीय सैनिक हमेशा लोगों की सहायता के लिए सबसे आगे रहते हैं। उनके अनुसार देश की सुरक्षा के साथ-साथ मानवता की सेवा भी भारतीय सेनाओं की मूल पहचान का हिस्सा है।

    रक्षा मंत्री ने लखनऊ स्थित कमांड हॉस्पिटल में देश के पहले समर्पित ‘डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री मेडिसिन’ की स्थापना के अवसर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण और विषम भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। सियाचिन की अत्यधिक बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर रेगिस्तानी इलाकों की भीषण गर्मी तक, जवानों को अनेक प्रकार की शारीरिक और चिकित्सीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि कठिन तैनाती के दौरान सैनिकों को संक्रामक रोगों, अत्यधिक गर्मी और ठंड से होने वाली चोटों, अधिक ऊंचाई से जुड़ी बीमारियों, थकान, पोषण संबंधी समस्याओं, निर्जलीकरण और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों से जूझना पड़ता है। उनका विश्वास है कि नया विभाग इन परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक और प्रभावी चिकित्सा प्रोटोकॉल विकसित करेगा, जिससे सैनिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा।

    उन्होंने आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि आज सुरक्षा चुनौतियां पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रह गई हैं। रासायनिक, जैविक और रेडियोलॉजिकल खतरों जैसे नए जोखिम लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह विभाग इन उभरती चुनौतियों पर अनुसंधान और विकास का प्रमुख केंद्र बनेगा तथा सैन्य चिकित्सा के क्षेत्र में नई तकनीकों और उपचार पद्धतियों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय सैन्य चिकित्सा सेवाओं की प्रतिष्ठा केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। भारत संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशनों में प्रमुख सैन्य योगदान देने वाले देशों में शामिल है। विदेशों में तैनात भारतीय सैन्य चिकित्सकों को भी विभिन्न प्रकार की चिकित्सा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे अनुभवों के आधार पर विकसित होने वाला यह विभाग भविष्य में वैश्विक स्तर पर भी सैन्य चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान देने में सक्षम होगा।

    उन्होंने कहा कि कमांड हॉस्पिटल, लखनऊ लंबे समय से सैन्य चिकित्सा, अनुसंधान और अनुशासन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां के चिकित्सकों ने ‘ऑपरेशन विजय’ और कारगिल युद्ध जैसे महत्वपूर्ण अभियानों के दौरान उल्लेखनीय सेवाएं दी हैं। अब इसी संस्थान में स्थापित हो रहा ‘डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री मेडिसिन’ सैन्य स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने के साथ-साथ चिकित्सा अनुसंधान को भी मजबूत करेगा।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला केवल आर्थिक और सामाजिक प्रगति नहीं होती, बल्कि उसकी सैन्य शक्ति और सैनिकों का मनोबल भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि जब कोई सैनिक देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करता है, तो उसके पीछे ऐसा मजबूत स्वास्थ्य तंत्र होना चाहिए जो हर परिस्थिति में उसका साथ दे। उनके अनुसार यह नया विभाग इसी विश्वास को और मजबूत करेगा तथा सशस्त्र बलों के कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित होगा।

  • चार दशकों की सैन्य सेवा के बाद जनरल अनिल चौहान का रिटायरमेंट, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर गार्ड ऑफ ऑनर के साथ भावुक विदाई

    चार दशकों की सैन्य सेवा के बाद जनरल अनिल चौहान का रिटायरमेंट, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर गार्ड ऑफ ऑनर के साथ भावुक विदाई

    नई दिल्ली । देश के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी पद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) से जनरल अनिल चौहान का कार्यकाल शनिवार को औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। राष्ट्रीय राजधानी में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर आयोजित एक गरिमामय समारोह में उन्होंने त्रि-सेवाओं द्वारा दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर को स्वीकार किया और शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित कर अपने सैन्य जीवन को भावनात्मक विदाई दी। चार दशक से अधिक समय तक भारतीय सेना में सेवा देने वाले जनरल चौहान ने 1981 में सेना में कमीशन प्राप्त किया था और अपने लंबे करियर के दौरान कई महत्वपूर्ण कमान और स्टाफ पदों पर कार्य किया। उनके रिटायरमेंट समारोह में सैन्य परंपराओं और सम्मान की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी, जहां उन्होंने वर्दीधारी जीवन को अलविदा कहते हुए इसे अपने जीवन का एक अत्यंत गौरवपूर्ण अध्याय बताया।

    जनरल चौहान ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर अंतिम बार पुष्पांजलि अर्पित करना उनके लिए अत्यंत भावुक और सम्मानजनक क्षण था, क्योंकि यह उन वीर जवानों को श्रद्धांजलि देने का अवसर था जिन्होंने देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं द्वारा दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर के साथ विदाई लेना उनके लिए गर्व का विषय है और यह उनके सैन्य जीवन की सबसे यादगार क्षणों में से एक रहेगा। इस अवसर पर उन्होंने अपने सहकर्मियों, वरिष्ठ अधिकारियों और सभी साथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय सेना में बिताया गया प्रत्येक क्षण उनके लिए सीख और प्रेरणा से भरा रहा है।

    अपने कार्यकाल को याद करते हुए जनरल चौहान ने कहा कि सीडीएस के रूप में उनका समय अत्यंत संतोषजनक रहा और इस दौरान तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और एकीकरण को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास किए गए। उन्होंने संयुक्त रक्षा प्रणाली और आधुनिक रणनीतिक ढांचे को आगे बढ़ाने में सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। उनके नेतृत्व में कई महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव और संयुक्त अभ्यासों को बढ़ावा मिला, जिससे देश की रक्षा क्षमता को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में कदम उठाए गए।

    जनरल चौहान की सेवानिवृत्ति को भारतीय सैन्य ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान त्रि-सेवाओं के बीच तालमेल और एकीकृत रणनीति को बढ़ावा देने में केंद्रीय भूमिका निभाई। चार दशकों से अधिक की सेवा में उन्होंने देश के विभिन्न संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और अनेक प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान भी प्राप्त किए। उनके योगदान को भारतीय रक्षा इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा, जहां उन्होंने न केवल नेतृत्व किया बल्कि आधुनिक सैन्य संरचना को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई।

  • भारत–कोरिया रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती, राजनाथ सिंह की यात्रा से बढ़ा सहयोग का दायरा

    भारत–कोरिया रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती, राजनाथ सिंह की यात्रा से बढ़ा सहयोग का दायरा


    नई दिल्ली । भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को नई दिशा देने के उद्देश्य से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की हालिया दक्षिण कोरिया यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने सियोल स्थित राष्ट्रीय समाधि स्थल पर पहुंचकर देश के वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इस अवसर पर उनका संदेश केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें दोनों देशों के बीच साझा मूल्यों, आपसी सम्मान और वैश्विक शांति के प्रति गहरी प्रतिबद्धता भी झलकती दिखाई दी। उन्होंने कहा कि सैनिकों का साहस, त्याग और देशभक्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेगा और किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा उसकी सेना के बलिदान पर ही आधारित होती है।

    इस महत्वपूर्ण दौरे के दौरान रक्षा मंत्री ने दक्षिण कोरिया के अपने समकक्ष के साथ व्यापक स्तर पर द्विपक्षीय वार्ता की योजना भी साझा की, जिसमें रक्षा सहयोग, सैन्य तकनीक, समुद्री सुरक्षा, और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में नए अवसरों की तलाश पर विशेष ध्यान दिया गया। दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है और अब इसे एक अधिक संरचित और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी में बदलने पर जोर दिया जा रहा है। बैठक में क्षेत्रीय स्थिरता और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी विचारों का आदान-प्रदान किया जाना प्रस्तावित है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह यात्रा केवल औपचारिक नहीं बल्कि दूरगामी रणनीतिक महत्व रखती है।

    राजनाथ सिंह की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं और देशों के बीच रक्षा सहयोग अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भारत और दक्षिण कोरिया दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्य, शांति और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के पक्षधर माने जाते हैं, और यही समानता दोनों देशों को और अधिक करीब ला रही है। समुद्री सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और रक्षा निर्माण के क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी भविष्य में नई ऊंचाइयों को छू सकती है।

    सियोल स्थित राष्ट्रीय समाधि स्थल पर दी गई श्रद्धांजलि को एक प्रतीकात्मक लेकिन महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि भारत न केवल अपने ही सैनिकों के बलिदान का सम्मान करता है, बल्कि अन्य देशों के वीरों के प्रति भी समान सम्मान की भावना रखता है। यह दृष्टिकोण दोनों देशों के बीच मानवीय और सांस्कृतिक संबंधों को भी मजबूत करता है।

    इस यात्रा से यह संकेत मिलता है कि भारत और दक्षिण कोरिया अब केवल व्यापारिक या औपचारिक संबंधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें रक्षा, तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह साझेदारी एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग का एक मजबूत आधार बन सकती है।

  • ईरान पर हमलों के बीच ट्रंप ने ब्रिटेन के PM पर साधा निशाना, कहा युद्ध जीतने के बाद सहयोग की ज़रूरत नहीं

    ईरान पर हमलों के बीच ट्रंप ने ब्रिटेन के PM पर साधा निशाना, कहा युद्ध जीतने के बाद सहयोग की ज़रूरत नहीं


    नई दिल्ली । अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों के बीच ब्रिटेन के समर्थन की कमी को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। शनिवार को ट्रंप ने प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरोपीय देश अब पश्चिम एशिया में एयरक्रॉफ्ट कैरियर भेजने पर विचार कर रहे हैं लेकिन अमेरिका को युद्ध जीतने के बाद ऐसे सहयोगियों की ज़रूरत नहीं है।

    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में लिखा यूनाइटेड किंगडम जो कभी हमारा महान सहयोगी था अब मिडिल ईस्ट में 2 विमानवाहक पोत भेजने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। ठीक है प्रधानमंत्री स्टार्मर हमें उनकी अब ज़रूरत नहीं है। हमें ऐसे लोग चाहिए ही नहीं जो युद्ध जीतने के बाद इसमें शामिल हों।

    इससे पहले ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने 7 मार्च के ऑपरेशन अपडेट में बताया कि अमेरिका ने ईरान पर रक्षात्मक अभियानों के लिए ब्रिटिश ठिकानों का उपयोग शुरू कर दिया है। इसका मकसद क्षेत्र में मिसाइल दागने से रोकना और ब्रिटिश नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

    ट्रंप ने इससे पहले भी ईरान पर ब्रिटेन के रुख को असहयोगी बताया था। उन्होंने कीर स्टार्मर की आलोचना करते हुए कहा कि वे विंस्टन चर्चिल नहीं हैं और दोनों देशों के संबंधों को बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

    ब्रिटेन की संसद में बुधवार को प्रधानमंत्री स्टार्मर ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी विमान ब्रिटिश ठिकानों से उड़ान भर रहे हैं और ब्रिटिश जेट संयुक्त ठिकानों से मिडिल ईस्ट में अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के लिए ड्रोन और मिसाइलों को मार गिरा रहे हैं। उन्होंने कहा यही स्पेशल रिलेशनशिप है – अपने लोगों की सुरक्षा के लिए रोज़ खुफिया जानकारी साझा करना।

    विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान अमेरिका-यूके के बीच संबंधों में तनाव बढ़ा सकता है जबकि ब्रिटेन अपनी भूमिका को रक्षात्मक और सुरक्षा-केंद्रित बताते हुए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। इस बीच क्षेत्र में तनाव और बढ़ता नजर आ रहा है क्योंकि ईरान अमेरिका और इजराइल के बीच सैन्य गतिवधियों की तीव्रता बढ़ रही है।

  • कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर विवादित बयान दिया कहा 'पहले दिन हम बुरी तरह हार गए थे'

    कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर पर विवादित बयान दिया कहा 'पहले दिन हम बुरी तरह हार गए थे'


    नई दिल्ली । कांग्रेसी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ऑपरेशन सिंदूर पर एक विवादित बयान दिया है जिसके बाद राजनीति में हलचल मच गई है। चव्हाण का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन भारतीय वायु सेना ने अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि उस दिन भारतीय विमानों के पाकिस्तान द्वारा मार गिराए जाने की संभावना बहुत अधिक थी।

    पृथ्वीराज चव्हाण ने एक इंटरव्यू में कहा ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन अगर ग्वालियर बठिंडा या सिरसा से कोई विमान उड़ान भरता तो उसे पाकिस्तान द्वारा बहुत आसानी से मार गिराया जा सकता था। यही कारण था कि एयर फोर्स को पूरी तरह से ग्राउंडेड रखा गया था। चव्हाण ने आगे कहा कि पहले दिन हम बुरी तरह हार गए थे लेकिन ऑपरेशन के अगले चरणों में स्थिति में सुधार हुआ और भारतीय सेना ने अपनी ताकत दिखाई।

    यह बयान ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायु सेना के एक्शन को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर जो कि 1999 में कारगिल युद्ध के बाद भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ किया गया था एक बड़ा सैन्य अभियान था जिसमें भारतीय वायु सेना और सेना ने एकजुट होकर पाकिस्तान की अग्रिम चौकियों को निशाना बनाया था। चव्हाण के बयान के बाद विपक्षी दलों और रक्षा विशेषज्ञों ने उनकी टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

    चव्हाण का यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब भारतीय वायु सेना और सेना के संचालन पर लगातार चर्चा हो रही है। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान भारतीय सेना और वायु सेना की कार्यप्रणाली को गलत तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि चव्हाण ने अपनी बात तथ्यों पर आधारित रखते हुए रखी है और ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन भारतीय विमानों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त उपाय किए गए थे।

    इससे पहले भारतीय वायु सेना और सेना के कई अधिकारियों ने भी माना था कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले दिन कुछ फैसले धीमे थे क्योंकि पाकिस्तान द्वारा भारतीय विमानों को निशाना बनाने का खतरा बहुत ज्यादा था। हालांकि बाद में स्थिति में सुधार हुआ और भारतीय सेना ने दुश्मन के ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया।

    चव्हाण के बयान ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि क्या भारतीय वायु सेना के लिए ऐसे ऑपरेशनों में निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई कमजोरी रही थी। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बयानों से भारतीय सेना की रणनीतिक क्षमता पर सवाल उठते हैं जो एक संवेदनशील मामला हो सकता है।

    यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव हमेशा बना रहता है और ऐसे बयान से दोनों देशों के सैन्य इतिहास और रणनीति पर चर्चा और विवाद दोनों का सामना करना पड़ सकता है। चव्हाण के बयान को लेकर भारतीय रक्षा मंत्रालय और वायु सेना से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन इस बयान ने राजनीतिक और रक्षा हलकों में हंगामा मचा दिया है। ऑपरेशन सिंदूर के बारे में चव्हाण का यह बयान भारतीय राजनीति में एक नई बहस का कारण बन सकता है और अब यह देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया देता है।