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  • ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, NavIC से सेना की नेविगेशन क्षमता होगी मजबूत, 1500 किलोमीटर तक बढ़ेगी पहुंच

    ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, NavIC से सेना की नेविगेशन क्षमता होगी मजबूत, 1500 किलोमीटर तक बढ़ेगी पहुंच


    नई दिल्ली ।भारत ने अंतरिक्ष और स्वदेशी नेविगेशन तकनीक के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर की देर रात GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अगली पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 का सफल प्रक्षेपण किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से यह मिशन पूरा किया गया। इस प्रक्षेपण से भारत के स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC को मजबूती मिलने की उम्मीद है। इसका लाभ नागरिक सेवाओं के साथ रक्षा और रणनीतिक गतिविधियों में भी मिल सकता है।

    NVS-03 को भारत की भौगोलिक सीमा से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक फैले NavIC के कवरेज क्षेत्र में नेविगेशन सेवाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस प्रणाली के जरिए सशस्त्र बलों को रणनीतिक अभियानों के दौरान स्थान और दिशा से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके अलावा सड़क, हवाई और समुद्री परिवहन सहित कई नागरिक क्षेत्रों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

    ISRO के अनुसार, GSLV-F18 रॉकेट की यह 20वीं उड़ान थी। प्रक्षेपण के लगभग 18 मिनट 40 सेकंड बाद रॉकेट ने 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट को निर्धारित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया। हालांकि, सैटेलाइट को पूरी तरह सक्रिय होने से पहले अपनी निर्धारित परिचालन कक्षा तक पहुंचने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सफल प्रक्षेपण पर ISRO के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के समर्पण और उनकी तकनीकी क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयास देश को लगातार गौरवान्वित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के मिशन महत्वपूर्ण तकनीकों में भारत की आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाते हैं।

    NVS-03 दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट समूह का तीसरा उपग्रह है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक शामिल है। सैटेलाइट में भारत में विकसित एटॉमिक क्लॉक के साथ आयातित एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई हैं। नेविगेशन प्रणाली में सटीक समय की गणना बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी के आधार पर उपग्रहों से मिलने वाले संकेतों के जरिए किसी स्थान की स्थिति निर्धारित की जाती है।

    इस सैटेलाइट में L1 फ्रीक्वेंसी का नया सिग्नल भी शामिल किया गया है। इससे पहले NavIC में L5 और S-बैंड सिग्नल का इस्तेमाल किया जाता था। L1 सिग्नल जुड़ने से इस प्रणाली की अनुकूलता अधिक उपकरणों और नेविगेशन रिसीवर के साथ बढ़ेगी। इससे आम नागरिकों के लिए मोबाइल और अन्य नेविगेशन सेवाओं में भी इसका उपयोग आसान हो सकता है।

    NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। इसे ISRO ने भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित किया है। अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS, यूरोप के Galileo और चीन के BeiDou की तरह यह भी लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं उपलब्ध कराता है। इसकी दो प्रमुख सेवाएं हैं। Standard Positioning Service आम नागरिकों और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए है, जबकि Restricted Service अधिकृत रणनीतिक और रक्षा उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड सेवा प्रदान करती है।

    भारत को अपने स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम की जरूरत 1999 के कारगिल युद्ध के अनुभव के बाद विशेष रूप से महसूस हुई थी। उस समय दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सटीक लोकेशन और सैन्य गतिविधियों की जानकारी के लिए आधुनिक नेविगेशन तकनीक की आवश्यकता सामने आई। विदेशी GPS सेवाओं पर निर्भरता ने भी स्वतंत्र प्रणाली विकसित करने के रणनीतिक महत्व को उजागर किया। इसी दिशा में Indian Regional Navigation Satellite System परियोजना शुरू हुई, जिसे बाद में NavIC नाम दिया गया।

    NVS-03 का प्रक्षेपण जनवरी 2025 में NVS-02 मिशन के अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद भी महत्वपूर्ण है। NVS-02 को ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया था, लेकिन तकनीकी समस्या के कारण वह निर्धारित परिचालन कक्षा तक नहीं पहुंच सका। जांच में ऑर्बिट बढ़ाने वाले इंजन की ऑक्सीडाइजर लाइन के पायरो वाल्व तक जरूरी ड्राइव सिग्नल नहीं पहुंचने की बात सामने आई थी। इसके बाद भविष्य के मिशनों में सुरक्षा और विश्वसनीयता बढ़ाने की सिफारिशें की गई थीं।

    NVS-03 अब अपनी निर्धारित जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचने के लिए ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से ऑर्बिट मैन्यूवर करेगा। इसके बाद उपकरणों और नेविगेशन संकेतों की जांच होगी। इन प्रक्रियाओं के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद ही इसकी नियमित सेवाएं शुरू हो सकेंगी। दूसरी पीढ़ी के इस कार्यक्रम में NVS-01 और NVS-02 के बाद NVS-03 को शामिल किया गया है। आगे NVS-04 और NVS-05 के प्रक्षेपण की भी योजना है। इन उपग्रहों के जरिए भारत NavIC की क्षमता, विश्वसनीयता और सेवाओं की निरंतरता को और मजबूत करना चाहता है।

  • ऑपरेशन सिंदूर से भारत की हवाई ताकत का प्रदर्शन, वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने बताया कैसे दुश्मन तक पहुंच सकते हैं सटीक हमले

    ऑपरेशन सिंदूर से भारत की हवाई ताकत का प्रदर्शन, वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने बताया कैसे दुश्मन तक पहुंच सकते हैं सटीक हमले

    नई दिल्ली ।भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इस सैन्य अभियान ने साबित किया कि भारतीय वायुसेना की पहुंच से कोई भी लक्ष्य बाहर नहीं है। उनके मुताबिक, पश्चिमी मोर्चे पर लगभग 1,200 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में और दुश्मन के इलाके के भीतर 200 किलोमीटर तक सटीक हमले करने की क्षमता ने वायुसेना की परिचालन ताकत को प्रदर्शित किया। उनके इस बयान को पाकिस्तान के संदर्भ में भारत की सैन्य क्षमता के स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

    एपी सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय वायुसेना के क्षमता-केंद्रित दृष्टिकोण की पुष्टि की। इस रणनीति में किसी एक विमान या हथियार प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न विमानों, सेंसर, हथियारों और संचार नेटवर्क को एकीकृत करके इस्तेमाल किया जाता है। इससे परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग संसाधनों का उपयोग करते हुए प्रभावी सैन्य कार्रवाई करना संभव होता है।

    वायुसेना प्रमुख के अनुसार, इस अभियान ने संकट के समय तेजी से कार्रवाई करने वाली शक्ति के रूप में वायुसेना की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सैन्य अभियानों में कई विकल्प उपलब्ध रखना और दुश्मन की रणनीति में बदलाव के अनुसार तेजी से प्रतिक्रिया देना बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक, क्षमता-केंद्रित व्यवस्था ने भारतीय वायुसेना को परिस्थितियों के अनुरूप जवाबी कार्रवाई करने और संघर्ष को बढ़ने से रोकने में मदद की।

    पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में भारत ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस अभियान के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मौजूद आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाया गया। एपी सिंह ने कहा कि अभियान के दौरान भारतीय वायुसेना ने लंबी दूरी तक सटीक हमले करने की अपनी क्षमता का इस्तेमाल किया। उन्होंने स्वदेश में विकसित हथियार प्रणालियों के प्रदर्शन को भी प्रभावी बताया।

    वायुसेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि अभियान की सफलता किसी एक हथियार या विमान के कारण नहीं थी। इसके पीछे सटीक खुफिया जानकारी, नेटवर्क आधारित अभियान, दूर से हमला करने वाले हथियार, सटीक निशाना लगाने वाली प्रणालियां और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं का संयुक्त योगदान था। इसके साथ ही बहुस्तरीय वायु रक्षा व्यवस्था और मानवरहित हवाई प्रणालियों का मुकाबला करने की क्षमता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना की स्वदेशी नेटवर्क आधारित वायु रक्षा प्रणाली ने पाकिस्तानी सेना की ओर से दागे गए ड्रोन और दूर से हमला करने वाले हथियारों का मुकाबला करने में भूमिका निभाई। उनके अनुसार, इस तरह की क्षमताओं ने भारतीय पक्ष को प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने में मदद की। उन्होंने यह भी कहा कि अभियान के दौरान नागरिकों और असैन्य संपत्ति को नुकसान से बचाने की प्रतिबद्धता का पालन किया गया।

    एपी सिंह ने आगाह किया कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बावजूद वायुसेना को अपनी क्षमताओं का लगातार विस्तार करना होगा। इसके लिए खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन रोधी तकनीक, मजबूत नेटवर्क तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय सहायता प्रणाली को बेहतर बनाने की जरूरत है। उन्होंने रसद, रखरखाव और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया।

    उन्होंने कहा कि लंबे समय तक उच्च तीव्रता वाले सैन्य अभियानों को जारी रखने के लिए स्वदेशी उत्पादन क्षमता का विस्तार जरूरी है। यह लक्ष्य विकसित भारत 2047 की व्यापक राष्ट्रीय परिकल्पना से भी जुड़ा है। एपी सिंह के मुताबिक, भारतीय वायुसेना का उद्देश्य ऐसी बहु-क्षेत्रीय सैन्य शक्ति बनना है, जो भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक हितों की रक्षा कर सके। वर्ष 2047 तक दुनिया की सक्षम, नवोन्मेषी और तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर वायु सेनाओं में शामिल होना इस दिशा में उसका प्रमुख लक्ष्य है।

  • F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

    F-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता अमेरिका, सर्जियो गोर ने भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार, रक्षा सहयोग पर कही अहम बात

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को लेकर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपना अत्याधुनिक एफ-35 लड़ाकू विमान हर देश को नहीं देता, बल्कि इसे केवल उन्हीं साझेदारों को उपलब्ध कराता है जिन पर उसे भरोसा होता है। गोर ने भारत को अमेरिका का भरोसेमंद साझेदार बताते हुए क्वॉड समूह में उसकी भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों, सैन्य अभ्यासों और संभावित लड़ाकू विमान सौदों को लेकर चर्चा जारी है।

    सर्जियो गोर ने भारत में हाल के संयुक्त सैन्य अभ्यासों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले एक महीने के दौरान करीब 500 अमेरिकी सैनिक भारत में आयोजित युद्धाभ्यास में शामिल हुए। इसके अलावा, तरंग शक्ति अभ्यास के दौरान अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमान भी भारत पहुंचे और भारतीय वायुसेना के साथ अभ्यास किया। इन गतिविधियों को दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    एफ-35 अमेरिका के आधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल है। इसमें स्टील्थ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिसका उद्देश्य विमान को दुश्मन के रडार की पकड़ में आने से बचने में मदद करना है। इस तरह के विमान और उनसे जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल तथा हस्तांतरण संवेदनशील रक्षा मामलों में गिना जाता है। गोर के बयान के मुताबिक, अमेरिका ऐसे विमानों के मामले में भरोसेमंद साझेदारों को प्राथमिकता देता है। हालांकि, भारत के लिए एफ-35 की खरीद को लेकर किसी अंतिम समझौते की घोषणा इस बयान में नहीं की गई।

    गोर ने भारत को क्वॉड समूह का मूल्यवान साझेदार भी बताया। क्वॉड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और सहयोग से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। चारों देशों के बीच संवाद और गतिविधियों का उद्देश्य क्षेत्रीय चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाना है। ऐसे में भारत के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यास और एफ-35 विमानों की भागीदारी दोनों देशों के रक्षा संबंधों की अहमियत को रेखांकित करती है।

    भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं है। दोनों देश सैन्य क्षमताओं के समन्वय, संयुक्त प्रशिक्षण और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी सहयोग करते हैं। संयुक्त अभ्यासों के दौरान सेनाओं को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली, संचालन प्रक्रियाओं और क्षमताओं को समझने का अवसर मिलता है। इससे भविष्य में साथ काम करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, किसी खास अभ्यास से तकनीक हस्तांतरण या विमान खरीद का समझौता अपने आप तय नहीं हो जाता।

    एफ-35 को लेकर गोर की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब भारत अपनी वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने और विभिन्न देशों के साथ रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद से जुड़े फैसलों में लागत, तकनीकी जरूरतें, रखरखाव, परिचालन आवश्यकताएं और रणनीतिक प्राथमिकताएं जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए अमेरिकी राजदूत का बयान दोनों देशों के बीच भरोसे और सैन्य संपर्कों को तो दर्शाता है, लेकिन इसे किसी निश्चित विमान सौदे की पुष्टि नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, सर्जियो गोर ने अपने बयान में भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार बताया है। हाल के सैन्य अभ्यासों और तरंग शक्ति में एफ-35 की भागीदारी को उन्होंने दोनों देशों के मजबूत होते रक्षा संबंधों के संदर्भ में रखा। फिलहाल, भारत को एफ-35 की बिक्री को लेकर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में दोनों देशों के रक्षा सहयोग की दिशा और संभावित समझौतों पर होने वाली बातचीत महत्वपूर्ण रहेगी।

  • तुर्किये-पाकिस्तान के साथ इंडोनेशिया के रक्षा समझौते से ब्रह्मोस तकनीक पर सवाल, विशेषज्ञों ने बताई भारत की सुरक्षा रणनीति

    तुर्किये-पाकिस्तान के साथ इंडोनेशिया के रक्षा समझौते से ब्रह्मोस तकनीक पर सवाल, विशेषज्ञों ने बताई भारत की सुरक्षा रणनीति

    नई दिल्ली । तुर्किये, कतर, पाकिस्तान और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए हुए बद्र मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) के बाद भारत के रक्षा हितों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। इस समझौते का उद्देश्य सैन्य उत्पादन, रक्षा क्षमताओं, तकनीकी प्रशिक्षण और अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस साझेदारी से भारत और इंडोनेशिया के बीच हुए मिसाइल सौदों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है और क्या भारत की संवेदनशील सैन्य तकनीक उसके प्रतिद्वंद्वी देशों तक पहुंचने का जोखिम पैदा हो सकता है।

    भारत ने जुलाई 2026 में इंडोनेशिया के साथ करीब 630 मिलियन डॉलर यानी लगभग 5,300 करोड़ रुपये के दो रक्षा समझौते किए थे। इनमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल की बिक्री से संबंधित समझौते शामिल हैं। ऐसे में चार देशों के नए रक्षा सहयोग को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इंडोनेशिया के दूसरे देशों के साथ बढ़ते सैन्य संबंधों का इन सौदों पर कोई प्रभाव पड़ेगा या नहीं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में विशेषज्ञों ने केवल बद्र MoU के आधार पर भारतीय मिसाइल तकनीक को खतरा मानने की आशंका को उचित नहीं बताया है।

    डीआरडीओ के चेयरमैन एमेरिटस और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व महानिदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक सुधीर कुमार मिश्रा के अनुसार, इंडोनेशिया के साथ हुए समझौतों में तकनीकी जानकारी की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान शामिल किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया को हथियारों के इस्तेमाल से संबंधित उपयोगकर्ता पुस्तिका दी जाएगी, न कि तकनीक हस्तांतरण से जुड़ी पुस्तिका। उनके मुताबिक, समझौतों में डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार और रक्षा संप्रभुता से जुड़े सख्त प्रावधान भी शामिल हैं, जिनका पालन इंडोनेशिया को करना होगा।

    मिश्रा की राय में, इन सुरक्षा उपायों के रहते ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों की संवेदनशील तकनीक भारत के प्रतिद्वंद्वियों तक पहुंचने की आशंका नहीं है। हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए जरूरी जानकारी साझा करना और उनके निर्माण या तकनीकी विकास से जुड़ी विस्तृत जानकारी हस्तांतरित करना अलग-अलग बातें हैं। यही अंतर भारत के रक्षा निर्यात समझौतों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    रक्षा विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत ने भी भारत-इंडोनेशिया रक्षा सौदों के प्रभावित होने की अटकलों को खारिज किया। वह सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज में वरिष्ठ फेलो हैं। उनके अनुसार, किसी समझौता ज्ञापन को सैन्य गठबंधन के बराबर नहीं माना जा सकता। केवल एक MoU पर हस्ताक्षर होने से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पहले से तय रक्षा निर्यात सौदे खतरे में पड़ गए हैं।

    अहलावत ने बद्र समझौते की भाषा को रक्षा अनुसंधान एवं विकास में सहयोग और कार्य विभाजन की व्यवस्था के रूप में देखा। उनके मुताबिक, यह साझा इस्लामी पहचान वाले देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में तालमेल बढ़ाने की कोशिश भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि भारत को इस घटनाक्रम पर नजर रखनी चाहिए, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक चिंता नहीं करनी चाहिए। किसी देश को हथियार बेचने का अर्थ यह नहीं है कि उसे उनके निर्माण और विकास की पूरी तकनीक भी सौंप दी जाए।

    भारत के लिए आगे सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि बद्र MoU के तहत चारों देशों के बीच रक्षा अनुसंधान, सैन्य उत्पादन और तकनीकी सहयोग किस स्तर तक बढ़ता है। साथ ही, भारत-इंडोनेशिया समझौतों में तय सुरक्षा प्रावधान किस तरह लागू होते हैं, यह भी अहम रहेगा। फिलहाल विशेषज्ञों की राय है कि नए रक्षा सहयोग पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन केवल इस समझौते के आधार पर ब्रह्मोस और अस्त्र की तकनीक की सुरक्षा को लेकर खतरे का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

  • आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, रक्षा और कृषि में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा

    आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, रक्षा और कृषि में सहयोग बढ़ाने पर हुई चर्चा


    अबिदजान।
    विदेश मंत्री एस जयशंकर (External Affairs Minister S. Jaishankar) ने कहा कि भारत (India) और आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) की साझेदारी आपसी सम्मान पर आधारित है। दोनों देशों की विकास और समृद्धि के लिए साझा प्रतिबद्धता है। जयशंकर ने पश्चिम अफ्रीकी देश की अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति अलासाने औटारा (President Alassane Ouattara) से मुलाकात की। वह तीन अफ्रीकी देशों की यात्रा पर हैं। इसमें घाना, आइवरी कोस्ट और इथियोपिया शामिल हैं।

    जयशंकर बुधवार को घाना से आइवरी कोस्ट पहुंचे थे। यह उनकी तीन देशों की यात्रा का दूसरा पड़ाव है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, आइवरी कोसट के राष्ट्रपति अलासाने औटारा से मुलाकात कर सम्मानित महसूस किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत शुभकामनाएं उन्हें दीं।

    विदेश मंत्री ने कहा, भारत-आइवरी कोस्ट साझेदारी आपसी सम्मान और विकास तथा समृद्धि के लिए साझा प्रतिबद्धता पर आधारित है। उन्होंने राष्ट्रपति औटारा को ‘मजबूत, लंबे समय तक चलने वाली और दोनों के लिए फायदेमंद साझेदारी के अपने दृष्टिकोण को साझा करने’ के लिए धन्यवाद दिया।


    रक्षा सहयोग पर क्या हुई बात?

    बुधवार को जयशंकर ने अबिदजान में आइवरी कोस्ट के उप प्रधानमंत्री तेने बिराहिमा औटारा से भी मुलाकात की। दोनों ने दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर चर्चा की। बैठक के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया पर लिखा, हमने आपसी भरोसे, क्षमता निर्माण और साझा हितों पर आधारित अपने बढ़ते रक्षा सहयोग पर बात की।

    उन्होंने कहा, हमने रक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग को और बढ़ाने के अवसरों पर विचार साझा किए। इसमें प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संस्थागत स्तर पर बढ़े हुए आदान-प्रदान के जरिए सहयोग शामिल है।

    औटारा आइवरी कोस्ट के रक्षा मंत्री भी हैं। उन्होंने कहा कि जयशंकर के साथ बातचीत आइवरी कोस्ट और भारत के बीच सहयोग मजबूत करने पर केंद्रित रही। औटारा ने सोशल मीडिया पर लिखा, यह बैठक शांति, सुरक्षा और विकास के लिए रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की हमारी साझा प्रतिबद्धता को दोहराती है।


    व्यापार और स्वास्थ्य पर भी चर्चा

    जयशंकर ने आइवरी कोस्ट की विदेश मामलों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की राज्य मंत्री नियाले काबा से भी बातचीत की। इसमें दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई। इसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, कृषि और स्वास्थ्य सेवा पर खास ध्यान रहा। जयशंकर ने कहा कि काबा के साथ भारत-आइवरी कोस्ट साझेदारी को आगे बढ़ाने पर ‘व्यापक चर्चा’ हुई। इसमें व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचा, कृषि, स्वास्थ्य सेवा और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध शामिल हैं।

    उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर कहा, मैंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को केंद्र में रखकर होने वाला हमारा सहयोग कोट द’आइवोर की प्राथमिकताओं के अनुसार आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने बहुपक्षीय मंचों पर अपने सहयोग को और गहरा करने पर भी चर्चा की।


    अफ्रीका में क्षमता निर्माण पर जोर

    जयशंकर ने बुधवार को आइवरी कोस्ट में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग यानी आईटीईसी के पूर्व छात्रों से भी बातचीत की। उन्होंने कहा कि भारत की विकास साझेदारी हमेशा से अफ्रीका के साथ उसके संबंधों का अहम हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि भारत का सहयोग उसके अफ्रीकी साझेदारों की जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुसार होना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग यानी आईटीईसी कार्यक्रम 1964 में शुरू हुआ था। यह दूसरे देशों के साथ क्षमता निर्माण और सहयोग के लिए भारत के सबसे महत्वपूर्ण मंचों में से एक बन गया है। जयशंकर ने आइवरी कोस्ट में भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी बातचीत की।

    उनकी यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत अफ्रीकी देशों के साथ अपनी साझेदारी को और मजबूत करना चाहता है। भारत वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। साथ ही व्यापार और निवेश से लेकर क्षमता निर्माण, रक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

  • रक्षा उत्पादन में बड़ा बदलाव, 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट से एचएएल बाहर, निजी कंपनियों को मिली बड़ी जिम्मेदारी

    रक्षा उत्पादन में बड़ा बदलाव, 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट से एचएएल बाहर, निजी कंपनियों को मिली बड़ी जिम्मेदारी

    नई दिल्ली। देश में स्वदेशी लड़ाकू विमान और रक्षा उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान तैयार करने वाली एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए परियोजना से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बाहर कर दिया गया है। यह पहली बार होगा जब किसी स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजना में एचएएल की भागीदारी नहीं होगी।

    एएमसीए को देश की उन्नत लड़ाकू विमान परियोजनाओं में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का विकास करना है। एचएएल लंबे समय से देश के लड़ाकू विमान निर्माण कार्यक्रमों का प्रमुख हिस्सा रही है, लेकिन इस बार परियोजना की अगली प्रक्रिया में उसे शामिल नहीं किया गया है।

    रक्षा सचिव आरके सिंह के मुताबिक, एचएएल को कुछ जरूरी तकनीकी शर्तें पूरी नहीं कर पाने के कारण परियोजना से बाहर किया गया। एचएएल इस समय तेजस-एमके2 लड़ाकू विमान के विकास पर भी काम कर रही है। ऐसे में एएमसीए परियोजना से उसका बाहर होना रक्षा विमान निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव है।

    एचएएल के बाहर होने के बाद अब एएमसीए के प्रोटोटाइप तैयार करने की दौड़ में तीन दावेदार बचे हैं। इनमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम, एलएंडटी-बेल-डायनामैटिक कंसोर्टियम और भारत फोर्ज-बीईएमएल-डाटा पैटर्न्स का कंसोर्टियम शामिल है।

    इस बदलाव के साथ पहली बार किसी लड़ाकू विमान परियोजना के प्रोटोटाइप निर्माण की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र की कंपनियों के हाथों में जाने जा रही है। इससे देश के निजी रक्षा उद्योग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। अब चयनित कंपनी को एएमसीए परियोजना के तहत निर्धारित तकनीकी और निर्माण संबंधी जिम्मेदारियों को पूरा करना होगा।

    एएमसीए परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15 हजार करोड़ रुपये बताई गई है। चुनी जाने वाली कंपनी को कुल पांच उड़ने वाले प्रोटोटाइप तैयार करने होंगे। इसके अलावा एक ऐसा विमान भी बनाना होगा, जिसका इस्तेमाल जमीन पर तकनीकी परीक्षण के लिए किया जा सके।

    परियोजना की समयसीमा के अनुसार एएमसीए का पहला प्रोटोटाइप सितंबर 2028 में पहली उड़ान भर सकता है। इसके बाद बाकी प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे और उनकी अलग-अलग स्तर पर टेस्टिंग की जाएगी। इस परीक्षण प्रक्रिया के जरिए विमान की तकनीकी क्षमताओं और परियोजना से जुड़ी आवश्यकताओं को परखा जाएगा।

    एएमसीए परियोजना से एचएएल के बाहर होने के बाद अब निजी क्षेत्र की कंपनियों के बीच प्रोटोटाइप निर्माण के लिए प्रतिस्पर्धा होगी। परियोजना में चयनित कंपनी को विमान के विकास और प्रोटोटाइप निर्माण से जुड़ी निर्धारित जिम्मेदारियां निभानी होंगी। इस तरह पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में पहली बार निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका मिलने जा रही है।

  • राजनाथ सिंह बोले- चिप से जहाज और स्क्रू से हथियार तक, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी

    राजनाथ सिंह बोले- चिप से जहाज और स्क्रू से हथियार तक, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी

    नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में भारत को अपनी रक्षा विनिर्माण क्षमता मजबूत करने के साथ-साथ महत्वपूर्ण तकनीकों पर अधिक नियंत्रण हासिल करना होगा। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को रणनीतिक स्वायत्तता से जोड़ते हुए कहा कि देश में जिस चीज का निर्माण संभव है, उसे घरेलू स्तर पर तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना जरूरी है।

    राजधानी में आयोजित रक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की सोच स्पष्ट है कि जो वस्तु देश में बनाई जा सकती है, उसके लिए आयात पर निर्भरता कम की जाए। उन्होंने कहा कि चिप से लेकर जहाजों तक और छोटे स्क्रू से लेकर पूरी हथियार प्रणालियों तक घरेलू उत्पादन की क्षमता विकसित करना भारत को रणनीतिक रूप से अधिक सक्षम बनाएगा।

    रक्षा मंत्री ने स्वदेशी डिजाइन, नवाचार और देश की जरूरतों के अनुरूप तकनीक विकसित करने को भविष्य की रक्षा तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, रक्षा आपूर्ति श्रृंखला के अहम हिस्सों का निर्माण देश में करने और उन पर नियंत्रण रखने से राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी तथा विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटेगी।

    सिंह ने कहा कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल मौजूदा जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लंबी अवधि की तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों में विशेषज्ञता हासिल करना और पूरे विनिर्माण तंत्र को मजबूत बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में सरकार ने घरेलू रक्षा उद्योग को गति देने के लिए कई संरचनात्मक और परिवर्तनकारी सुधार किए हैं।

    रक्षा मंत्री ने युद्ध के बदलते स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह दूरसंचार तकनीक 2जी से 5जी तक पहुंची, उसी तरह युद्ध भी तकनीक के नए चरण में प्रवेश कर चुका है। आधुनिक संघर्षों में तकनीकी क्षमता सैन्य अभियानों और उनके परिणामों को तेजी से प्रभावित कर रही है।

    उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम तकनीक, रोबोटिक्स, स्वायत्त प्रणालियां और साइबर सुरक्षा अब आधुनिक युद्ध का अभिन्न हिस्सा बन रही हैं। भारत इन क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ रक्षा नवाचार के लिए जरूरी नीतिगत ढांचे को भी मजबूत कर रहा है।

    सिंह के अनुसार, भारत संपर्क आधारित और गैर-संपर्क युद्ध के साथ-साथ काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक सैन्य अभियानों से निपटने की क्षमता बढ़ा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधनों में विविधता लाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि रणनीतिक जरूरतों के समय निर्भरता कम रहे।

    उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्धक्षेत्र कई क्षेत्रों में फैले होंगे और उनमें तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ेगी। अत्याधुनिक तकनीकों में बढ़त हासिल करने वाले देशों के पास बदलती सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम साधन होंगे।

    रक्षा मंत्री ने देश के युवाओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि युवा भारतीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और स्वायत्त प्रणालियों जैसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक युवा केवल भविष्य की नौकरियों के लिए तैयारी नहीं कर रहे, बल्कि देश की भविष्य की रक्षा जरूरतों के लिए तकनीक विकसित करने में भी योगदान दे रहे हैं।

  • डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा

    डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा


    नई दिल्ली ।भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय उद्योगों को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की इस मंजूरी के बाद निर्धारित योग्यता और आवश्यक मानकों को पूरा करने वाली भारतीय कंपनियां इन मिसाइल प्रणालियों का देश में उत्पादन कर सकेंगी।

    इस फैसले का सीधा असर भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता पर पड़ने की उम्मीद है। अब तक मिसाइल प्रणालियों के अनुसंधान, विकास और तकनीकी परीक्षण में डीआरडीओ की प्रमुख भूमिका रही है। नई व्यवस्था के तहत विकसित और निर्धारित मानकों पर खरी उतरने वाली तकनीक को उद्योगों तक पहुंचाया जाएगा, जिससे अनुसंधान से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

    रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल देश में हथियारों का इस्तेमाल करने या तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उत्पादन क्षमता, आपूर्ति श्रृंखला, जरूरी कलपुर्जों की उपलब्धता और तकनीकी विशेषज्ञता का घरेलू स्तर पर मजबूत होना भी जरूरी है। मिसाइल तकनीक के हस्तांतरण से इन सभी क्षेत्रों में भारतीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है।

    इस व्यवस्था के तहत योग्य कंपनियां डीआरडीओ की विकसित तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मिसाइल प्रणालियों के औद्योगिक उत्पादन में भूमिका निभाएंगी। इससे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक प्रणालियों की आपूर्ति को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाने में मदद मिल सकती है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रगति होने की उम्मीद है।

    इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखला में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए अवसर बढ़ना है। मिसाइल निर्माण केवल मुख्य प्रणाली तैयार करने तक सीमित नहीं होता। इसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष सामग्री, सेंसर, संचार प्रणालियों, यांत्रिक हिस्सों और अन्य तकनीकी घटकों की जरूरत होती है। ऐसे में बड़ी कंपनियों के साथ छोटे और मध्यम भारतीय उद्यम भी उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं।

    सरकार की व्यापक रणनीति देश में ऐसा रक्षा औद्योगिक आधार तैयार करने की है, जिसमें अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल हो। डीआरडीओ नई और उन्नत सैन्य तकनीकों के अनुसंधान एवं विकास पर अधिक ध्यान दे सकता है, जबकि पहले से विकसित तकनीकों को औद्योगिक उत्पादन में बदलने की जिम्मेदारी प्रमाणित भारतीय कंपनियां संभाल सकती हैं।

    इससे नई सैन्य तकनीक विकसित होने और उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपलब्ध कराने के बीच लगने वाले समय को कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है। भारतीय उद्योगों को तकनीकी क्षमता विकसित करने और रक्षा उत्पादन में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

    भारत पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के घरेलू निर्माण को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों तक पहुंचाने का यह निर्णय उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण, तकनीकी क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर, डीआरडीओ की विकसित मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों के लिए उपलब्ध कराने से अनुसंधान और उत्पादन के बीच की दूरी कम करने का प्रयास किया गया है। यह कदम भारतीय कंपनियों और एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने के साथ देश की रक्षा आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    नई दिल्ली । भारत की रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई Su-57 को लेकर फिलहाल भारत की ओर से कोई खरीद योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। इसके बजाय भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले को रूस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मॉस्को लंबे समय से भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश करता रहा है।

    रूस ने भारत को Su-57 विमान खरीदने के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें विमान निर्माण में सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय जरूरतों के अनुसार बदलाव की पेशकश भी शामिल थी। रूस की कोशिश थी कि भारत पांचवीं पीढ़ी के इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को अपने बेड़े में शामिल करे। इससे पहले ऐसी संभावनाएं जताई जा रही थीं कि भारत करीब 36 से 40 Su-57 विमानों की खरीद पर विचार कर सकता है। हालांकि, अब भारत की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से संकेत दिया गया है कि फिलहाल Su-57 को लेकर कोई सक्रिय खरीद योजना नहीं है। भारत अपने मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को और अधिक आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहा है। Su-30MKI भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का प्रमुख हिस्सा रहा है। इन विमानों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई तकनीकी सुधार और अपग्रेड की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

    इसके साथ ही भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। राफेल पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है और इसकी क्षमता को देखते हुए भारत इसे एक भरोसेमंद विकल्प मान रहा है। राफेल अपनी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी के हथियारों और बहुउद्देश्यीय क्षमता के लिए जाना जाता है। इससे वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर ऑपरेशनल क्षमता मिलती है।

    हालांकि राफेल और Su-57 अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमान हैं। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक विमान माना जाता है, जबकि Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। Su-57 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम रडार पहचान क्षमता और आंतरिक हथियार भंडारण प्रणाली है। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

    भारत की रक्षा योजना में अब स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA परियोजना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यह भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम को मजबूत करना चाहता है।

    रक्षा क्षेत्र में बदलती जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच भारत का ध्यान अब संतुलित विकल्पों पर है। एक ओर जहां राफेल जैसे आधुनिक और युद्ध में परखे गए विमानों को शामिल करने की योजना है, वहीं दूसरी ओर Su-30MKI अपग्रेड और AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में Su-57 की खरीद पर फिलहाल विराम लगना भारत की बदलती रक्षा नीति का संकेत माना जा रहा है।