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  • राजनाथ सिंह वियतनाम दौरे पर, रक्षा सहयोग को नई दिशा; भारत-वियतनाम रिश्तों में बढ़ी रणनीतिक गहराई

    राजनाथ सिंह वियतनाम दौरे पर, रक्षा सहयोग को नई दिशा; भारत-वियतनाम रिश्तों में बढ़ी रणनीतिक गहराई

    नई दिल्ली। रक्षा मंत्री Rajnath Singh के वियतनाम दौरे ने भारत-वियतनाम संबंधों को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक स्थिरता पर अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
    हनोई/नई दिल्ली। भारत और वियतनाम के बीच रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने के उद्देश्य से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने वियतनाम दौरे के दौरान वहां के शीर्ष नेतृत्व से अहम बातचीत की। इस बैठक में रक्षा सहयोग, सुरक्षा साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और संतुलन बनाए रखने में भारत और वियतनाम की साझेदारी बेहद अहम भूमिका निभा सकती है।

    राजनाथ सिंह ने इस दौरान भारत की ओर से वियतनाम के साथ रक्षा सहयोग को और गहरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच साझेदारी केवल रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपसी विश्वास, तकनीकी सहयोग और सामरिक समझ पर आधारित एक व्यापक संबंध है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी शुभकामनाएं वियतनाम नेतृत्व को दीं।

    इसी बीच भारत के ऐतिहासिक विदेश नीति दृष्टिकोण की चर्चा भी एक बार फिर सामने आई है। कहा जाता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने 1960 के दशक में अमेरिका के वियतनाम युद्ध में गहराई से शामिल होने पर सावधानी बरतने की सलाह दी थी। हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनके विचार सीधे और औपचारिक रूप में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं, लेकिन कई समकालीन लेखों और स्मृतियों में उनके इस रुख का उल्लेख मिलता है कि वियतनाम में सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

    आगे चलकर वियतनाम युद्ध ने वैश्विक राजनीति पर गहरा असर डाला, जिसमें भारी जनहानि और लंबे संघर्ष के बाद अंततः अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। युद्ध के बाद वियतनाम एकीकृत राष्ट्र के रूप में उभरा।

    भारत और वियतनाम के संबंध केवल रणनीतिक ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी गहरे हैं। 1959 में तत्कालीन राष्ट्रपति Rajendra Prasad ने हो ची मिन्ह को बोधि वृक्ष भेंट किया था, जो आज भी दोनों देशों की मित्रता का प्रतीक माना जाता है। यह प्रतीक समय-समय पर भारत-वियतनाम रिश्तों की मजबूती को दर्शाता रहा है।

  • सुरक्षा सहयोग और समुद्री स्थिरता पर सहमति, वियतनाम दौरे में राजनाथ सिंह की अहम कूटनीतिक पहल

    सुरक्षा सहयोग और समुद्री स्थिरता पर सहमति, वियतनाम दौरे में राजनाथ सिंह की अहम कूटनीतिक पहल


    नई दिल्ली । भारत की विदेश और रक्षा नीति को नई दिशा देने वाले प्रयासों के तहत रक्षा मंत्री Rajnath Singh के वियतनाम दौरे को महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने वियतनाम के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता को लेकर व्यापक चर्चा की। इस मुलाकात में आपसी विश्वास और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।

    राजधानी हनोई में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में राजनाथ सिंह ने वियतनाम के जनरल सेक्रेटरी और राष्ट्रपति To Lam से शिष्टाचार मुलाकात की। बातचीत के दौरान दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत और वियतनाम के संबंध केवल पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब यह रक्षा और रणनीतिक सहयोग के एक मजबूत ढांचे में विकसित हो चुके हैं। रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर भारत की ओर से शुभकामनाएं भी प्रेषित कीं और दोनों देशों के बीच साझेदारी को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप और गहरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    इस दौरान समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्वतंत्र नौवहन जैसे विषय प्रमुख रहे। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नियम आधारित व्यवस्था बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत और वियतनाम की साझेदारी को संतुलन और सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सहयोग क्षेत्रीय तनावों के बीच एक स्थिर शक्ति के रूप में उभर रहा है।

    इसके साथ ही रक्षा मंत्री ने वियतनाम के रक्षा मंत्री सीनियर लेफ्टिनेंट जनरल Phan Van Giang के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता की, जिसमें रक्षा उद्योग, सैन्य प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने यह स्वीकार किया कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए संयुक्त प्रयास और तकनीकी सहयोग बेहद आवश्यक हैं।

    बैठक के बाद राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत और वियतनाम के बीच रक्षा साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है और यह साझेदारी अब व्यापक रणनीतिक सहयोग के नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। दोनों देशों ने रक्षा उत्पादन और प्रशिक्षण के क्षेत्र में संयुक्त प्रयासों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई, जिससे भविष्य में रक्षा क्षमताओं को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू उन्नत तकनीकी सहयोग से जुड़ा रहा, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम तकनीक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। इसे भविष्य की रक्षा और तकनीकी रणनीति के लिए एक निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह पहल इस बात का संकेत देती है कि भारत और वियतनाम केवल वर्तमान सुरक्षा चुनौतियों पर ही नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकी जरूरतों पर भी मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं।

    कुल मिलाकर यह यात्रा भारत और वियतनाम के बीच बढ़ते रणनीतिक विश्वास और सहयोग का प्रतीक मानी जा रही है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और तकनीकी साझेदारी के माध्यम से दोनों देश एक मजबूत और संतुलित क्षेत्रीय व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

  • भारत-ऑस्ट्रिया के बीच बड़ी साझेदारी खाद्य सुरक्षा से लेकर रक्षा तक कई अहम समझौते पर मुहर

    भारत-ऑस्ट्रिया के बीच बड़ी साझेदारी खाद्य सुरक्षा से लेकर रक्षा तक कई अहम समझौते पर मुहर


    नई दिल्ली । भारत और ऑस्ट्रिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देते हुए कई महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति बनी है। राजधानी नई दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रिया के फेडरल चांसलर क्रिश्चियन स्टॉकर के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। इस बैठक के दौरान कई डील्स पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे भारत और ऑस्ट्रिया के रिश्तों में नई मजबूती देखने को मिली है।

    बैठक के दौरान सबसे अहम समझौता ऑडियो विजुअल को प्रोडक्शन से जुड़ा रहा, जिसका उद्देश्य दोनों देशों की फिल्म इंडस्ट्री के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है। इस समझौते से संयुक्त फिल्म निर्माण को बढ़ावा मिलेगा, सांस्कृतिक और क्रिएटिव एक्सचेंज को मजबूती मिलेगी और भारतीय कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नए अवसर प्राप्त होंगे। इससे भारतीय सिनेमा और देश की सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर को भी वैश्विक स्तर पर विस्तार मिलेगा।

    इसके साथ ही दोनों देशों ने व्यापार और निवेश को आसान बनाने के लिए फास्ट ट्रैक मैकेनिज्म पर सहमति जताई है। इसका उद्देश्य भारतीय और ऑस्ट्रियाई कंपनियों को आने वाली अड़चनों की पहचान कर उनका समाधान करना है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध और अधिक मजबूत होंगे। यह कदम निवेशकों के लिए बेहतर माहौल तैयार करेगा और बाजार पहुंच को भी आसान बनाएगा।

    रक्षा क्षेत्र में भी दोनों देशों ने सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। इसके तहत एक संस्थागत ढांचा तैयार किया जाएगा, जो डिफेंस इंडस्ट्रियल और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप को मजबूत करेगा। साथ ही रक्षा नीति पर संवाद, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ेगा, जिससे भारत के रक्षा क्षेत्र को नई तकनीकी मजबूती मिलेगी।

    आतंकवाद विरोधी सहयोग को लेकर भी एक संयुक्त कार्य समूह के गठन पर सहमति बनी है। यह समूह राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, खुफिया जानकारी साझा करने और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाएगा। इससे दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और अधिक प्रभावी होगा।

    खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा समझौता हुआ है, जिसके तहत भारत के एफएसएसएआई और ऑस्ट्रिया के संबंधित संस्थान एजीईएस के बीच सहयोग स्थापित किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य खाद्य मानकों में सुधार, वैज्ञानिक आदान प्रदान, जोखिम मूल्यांकन और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करना है। इससे कृषि और खाद्य उत्पादों के व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा। कुल मिलाकर यह बैठक भारत और ऑस्ट्रिया के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

  • मोम्बासा में भारतीय युद्धपोत ‘त्रिकंद’ का आगमन, सौंपे 100 राइफल और 50,000 गोलियां, रक्षा सहयोग को सशक्त किया गया

    मोम्बासा में भारतीय युद्धपोत ‘त्रिकंद’ का आगमन, सौंपे 100 राइफल और 50,000 गोलियां, रक्षा सहयोग को सशक्त किया गया


    नई दिल्ली। भारतीय नौसेना का फ्रंटलाइन गाइडेड प्रक्षेपास्त्र युद्धपोत ‘त्रिकंद’ केन्या के मोम्बासा बंदरगाह पर पहुंच चुका है। इस दौरान भारत ने केन्याई रक्षा बलों को 100 इंसास राइफल और करीब 50,000 गोलियां सौंपे। इसके अतिरिक्त, भारत ने केन्या को 1.5 टेस्ला क्षमता वाली एमआरआई मशीन भी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है। यह कदम दोनों देशों के बीच समुद्री सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

    युद्धपोत ‘त्रिकंद’ दक्षिण-पश्चिम हिन्द महासागर क्षेत्र में अपनी ऑपरेशनल तैनाती के तहत मोम्बासा पहुंचा है। इस दौरे के दौरान भारतीय उप-नौसेनाध्यक्ष कृष्णा स्वामीनाथन केन्या में मौजूद हैं। पोत के मोम्बासा प्रवास के दौरान कई पेशेवर, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही भारतीय दल केन्या रक्षा बलों को आवश्यक सामग्रियां भी सौंप रहा है।

    इस यात्रा के दौरान भारत और केन्या के बीच उच्चस्तरीय रक्षा संवाद भी हुआ। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने केन्या के रक्षा अधिकारियों से मुलाकात की और सैन्य नेतृत्व के नियमित उच्चस्तरीय दौरों, संस्थागत बैठकों और बढ़ते रक्षा सहयोग की सराहना की। इसी क्रम में केन्या रक्षा बलों को 1.5 टेस्ला क्षमता वाली एमआरआई मशीन प्रदान करने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

    मोम्बासा में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उप-नौसेनाध्यक्ष कृष्णा स्वामीनाथन ने केन्या नौसेना के कमांडर मेजर जनरल पॉल ओटिएनो को 100 राइफल और 50,000 गोलियां सौंपकर दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग और भरोसे को मजबूत किया। मोम्बासा से प्रस्थान के बाद युद्धपोत ‘त्रिकंद’ केन्या नौसेना के जहाजों के साथ समुद्री अभ्यास करेगा। इस अभ्यास के माध्यम से दोनों देशों की नौसेनाएं सर्वोत्तम प्रक्रियाओं का आदान-प्रदान करेंगी और संयुक्त संचालन क्षमता को और मजबूत करेंगी।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह दौरा भारत के ‘महासागर’ विजन के अनुरूप हिन्द महासागर क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इस यात्रा के माध्यम से भारत और केन्या दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी, समुद्री सहयोग और मानव सुरक्षा में सहयोग को और प्रगाढ़ किया जा रहा है।

  • अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़

    अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़


    नई दिल्ली:अमेरिका और इज़रायल का रिश्ता आज के समय में केवल दोस्ती नहीं बल्कि एक गहरा रणनीतिक गठबंधन बन चुका है, जिसे वैश्विक राजनीति का सबसे मजबूत समीकरण माना जाता है, यह रिश्ता केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि सुरक्षा, तकनीक, खुफिया जानकारी और आर्थिक हितों पर आधारित है, अमेरिका इज़रायल को मध्य पूर्व में अपना एक ऐसा मजबूत ठिकाना मानता है जो पूरे क्षेत्र में उसके हितों की रक्षा करता है, इज़रायल अमेरिका के लिए एक ऐसा सहयोगी है जो उसके रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

    मध्य पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां तेल और गैस के विशाल भंडार हैं, वहां इज़रायल अमेरिका के लिए एक सुरक्षा ढाल की तरह काम करता है, ईरान जैसे देशों के साथ तनाव के दौरान इज़रायल न केवल अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के हितों की भी सुरक्षा करता है, यही कारण है कि अमेरिका इज़रायल को हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देता है, हालांकि यह सहायता अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही वापस मिल जाती है क्योंकि इज़रायल इन पैसों से अमेरिकी हथियार खरीदता है

    युद्ध के मैदान में इन हथियारों के उपयोग से अमेरिका को वास्तविक समय का डेटा मिलता है जिससे वह अपने हथियारों को और उन्नत बना सकता है, मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे आयरन डोम में भी अमेरिका की अहम भागीदारी है, यह सहयोग दोनों देशों को तकनीकी रूप से और मजबूत बनाता है

    खुफिया जानकारी के क्षेत्र में भी इज़रायल अमेरिका का बेहद भरोसेमंद साझेदार है, इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का नेटवर्क दुनिया के कई हिस्सों में फैला हुआ है, खासकर इस्लामिक देशों और ईरान के अंदर इसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है, इस एजेंसी से मिलने वाली जानकारियां अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, जिससे वह अपने देश पर संभावित खतरों को समय रहते रोक पाता है

    तकनीकी और आर्थिक साझेदारी भी इस रिश्ते का अहम हिस्सा है, इज़रायल को स्टार्टअप नेशन कहा जाता है, जहां दुनिया की बड़ी कंपनियां जैसे इंटेल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट अपने रिसर्च सेंटर स्थापित कर चुकी हैं, इज़रायल और अमेरिका के बीच टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का गहरा संबंध है, जिसने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है

    अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी इज़रायल का प्रभाव साफ देखा जा सकता है, अमेरिकी इज़रायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी जैसी शक्तिशाली लॉबी वहां की विदेश नीति को प्रभावित करती है, कोई भी अमेरिकी नेता इज़रायल के खिलाफ खुलकर नहीं जा सकता क्योंकि इससे उसका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है

    इसके अलावा अमेरिका में एक बड़ा ईसाई वर्ग इज़रायल को धार्मिक दृष्टिकोण से समर्थन देता है, वे इसे अपनी आस्था का हिस्सा मानते हैं और इज़रायल की सुरक्षा को अपना कर्तव्य समझते हैं, यह धार्मिक और सांस्कृतिक समर्थन भी इस रिश्ते को मजबूत बनाता है

    इतिहास की बात करें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप से आए कई यहूदी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों को शरण दी, जिनमें अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक शामिल थे, जिन्होंने परमाणु अनुसंधान और मैनहट्टन प्रोजेक्ट की नींव रखने में भूमिका निभाई, एडवर्ड टेलर और जॉन वॉन न्यूमैन जैसे वैज्ञानिकों ने अमेरिका को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने में योगदान दिया

    ऑपरेशन पेपरक्लिप के जरिए भी अमेरिका ने जर्मन वैज्ञानिकों को अपने साथ जोड़ा, जिससे अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक में बड़ी प्रगति हुई, इस तरह यह रिश्ता केवल आज का नहीं बल्कि दशकों पुरानी रणनीतिक सोच का परिणाम है

  • समुद्री शक्ति और सहयोग का प्रदर्शन आईएनएस त्रिकंड का सेशेल्स अभियान

    समुद्री शक्ति और सहयोग का प्रदर्शन आईएनएस त्रिकंड का सेशेल्स अभियान


    नई दिल्ल:
    भारतीय नौसेना का अत्याधुनिक युद्धपोत आईएनएस त्रिकंड हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री कूटनीति और सामरिक सहयोग को मजबूत करते हुए सेशेल्स के पोर्ट विक्टोरिया से सफलतापूर्वक रवाना हो गया है यह यात्रा भारत की बढ़ती समुद्री शक्ति और क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है

    यह पोर्ट कॉल 16 मार्च को शुरू हुआ था और इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती मिली आईएनएस त्रिकंड भारतीय नौसेना का एक आधुनिक स्टेल्थ फ्रिगेट है जो अपनी उन्नत तकनीक और युद्ध क्षमताओं के लिए जाना जाता है सेशेल्स में अपने प्रवास के दौरान जहाज ने कई महत्वपूर्ण गतिविधियों में हिस्सा लिया और द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का कार्य किया

    जहाज के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन सचिन कुलकर्णी ने सेशेल्स सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और भारत के उच्चायुक्त से मुलाकात की इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सहयोग को और गहरा करने पर चर्चा हुई साथ ही सेशेल्स को आवश्यक स्पेयर पार्ट्स और अन्य जरूरी सामग्री भी सौंपी गई जो आपसी भरोसे और सहयोग का प्रतीक है

    इस यात्रा का सबसे अहम पहलू संयुक्त सैन्य अभ्यास लामितिये 2026 में भारतीय भागीदारी रही यह पहली बार था जब इस अभ्यास में भारतीय थल सेना नौसेना और वायुसेना तीनों की संयुक्त भागीदारी देखी गई इस अभ्यास को व्यापक स्तर पर आयोजित किया गया और इसमें भारत तथा सेशेल्स के सैनिकों ने मिलकर अपनी संयुक्त क्षमताओं का प्रदर्शन किया

    अभ्यास के दौरान कई महत्वपूर्ण सैन्य गतिविधियां आयोजित की गईं हार्बर चरण में विजिट बोर्ड सर्च एंड सीजर प्रशिक्षण कराया गया जिसमें संयुक्त बोर्डिंग ऑपरेशनों का अभ्यास हुआ इसके बाद समुद्री चरण में आईएनएस त्रिकंड ने सेशेल्स कोस्ट गार्ड के जहाज ले विजिलेंट के साथ मिलकर संयुक्त अभ्यास किया

    इस दौरान भारतीय नौसेना के मरीन कमांडो और सेशेल्स के विशेष बलों ने समुद्र में सफलतापूर्वक संयुक्त बोर्डिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया जिसमें जहाज पर चढ़ाई तलाशी और नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल थे इसके अलावा घुसपैठ रोकने ड्रोन से निगरानी छापेमारी और घायल सैनिकों को निकालने जैसे अभ्यास भी किए गए

    अभ्यास का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा प्रस्लिन द्वीप पर किया गया संयुक्त लैंडिंग ऑपरेशन था जिसमें दोनों देशों की सेनाओं ने मिलकर अपनी समन्वित क्षमता का प्रदर्शन किया इस दौरान सेशेल्स के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी मौजूद रहे और उन्होंने पूरे अभ्यास का प्रत्यक्ष अवलोकन किया

    यह पूरा अभियान भारत की महासागर नीति का सशक्त उदाहरण है जो क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा देने पर केंद्रित है आईएनएस त्रिकंड की यह तैनाती भारत की इस प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार और प्रथम प्रतिक्रिया देने वाली शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहेगा

    Tags
    Indian Navy, INS Trikand, Maritime Security, Defense Cooperation, Indo Pacific