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  • अंकारा NATO शिखर सम्मेलन में कई बड़े फैसले, रक्षा बजट बढ़ाने, यूक्रेन सहायता और ईरान पर सख्त रुख के बीच ट्रंप ने फिर उठाया ग्रीनलैंड का मुद्दा

    अंकारा NATO शिखर सम्मेलन में कई बड़े फैसले, रक्षा बजट बढ़ाने, यूक्रेन सहायता और ईरान पर सख्त रुख के बीच ट्रंप ने फिर उठाया ग्रीनलैंड का मुद्दा

    नई दिल्ली । तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित दो दिवसीय उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) शिखर सम्मेलन कई महत्वपूर्ण निर्णयों और राजनीतिक संदेशों के साथ संपन्न हुआ। बैठक के दौरान सदस्य देशों ने रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने, यूक्रेन को निरंतर सहायता जारी रखने और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक रणनीति पर सहमति जताई। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान, ग्रीनलैंड और सहयोगी देशों को लेकर दिए गए बयानों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ समझौते को समाप्त मानते हुए तेहरान के नेतृत्व पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ईरान को किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जा सकते। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की संभावना कम दिखाई देती है। NATO के संयुक्त घोषणापत्र में भी ईरान से अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने का आग्रह किया गया और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

    शिखर सम्मेलन में रक्षा खर्च बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुख एजेंडा रहा। सदस्य देशों ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने, आधुनिक हथियार प्रणालियों, हवाई एवं मिसाइल रक्षा, मानव रहित तकनीकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और खुफिया क्षमताओं के विकास पर निवेश बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। गठबंधन का उद्देश्य बदलते सुरक्षा वातावरण के अनुरूप अपनी सामूहिक रक्षा क्षमता को और प्रभावी बनाना है। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सभी सदस्य देश अभी निर्धारित रक्षा व्यय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में इस दिशा में प्रयास तेज करने का भरोसा जताया गया।

    यूक्रेन को लेकर भी NATO ने अपना समर्थन दोहराया। सम्मेलन में सदस्य देशों ने सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए आने वाले वर्षों तक सहयोग बनाए रखने का आश्वासन दिया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने सम्मेलन के दौरान कई नेताओं से मुलाकात कर अतिरिक्त सहयोग की मांग रखी। अमेरिका ने भी यूक्रेन की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए, जिससे संघर्ष के बीच कीव को महत्वपूर्ण समर्थन मिलने की उम्मीद है।

    सम्मेलन के दौरान ग्रीनलैंड का मुद्दा भी एक बार फिर चर्चा में रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्व पर जोर देते हुए अपने पुराने रुख को दोहराया। दूसरी ओर डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड उसके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है और उसके भविष्य का निर्णय स्थानीय जनता तथा डेनमार्क के संवैधानिक ढांचे के अनुसार ही होगा। यूरोपीय पक्ष ने भी इस विषय पर डेनमार्क के रुख का समर्थन किया।

    बैठक के दौरान सहयोगी देशों के बीच रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर भी व्यापक विचार-विमर्श हुआ। कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आने के बावजूद सदस्य देशों ने सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। विश्लेषकों का मानना है कि इस शिखर सम्मेलन के फैसले आने वाले समय में यूरोप, मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा रणनीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।

    अंकारा शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में NATO अपने रक्षा ढांचे को अधिक आधुनिक और सक्षम बनाने के साथ-साथ यूक्रेन जैसे साझेदार देशों के समर्थन तथा क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

  • अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

    अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

    नई दिल्ली। वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच नाटो का आगामी शिखर सम्मेलन तुर्किए की राजधानी अंकारा में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी सबसे अधिक चर्चा में है। सम्मेलन के दौरान उनका मुख्य फोकस रक्षा खर्च बढ़ाने, सदस्य देशों के बीच जिम्मेदारियों के संतुलित बंटवारे और रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने पर रहेगा। इसके साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं।

    ट्रंप सम्मेलन के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों नेताओं के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को लेकर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा ट्रंप यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से भी अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में क्षेत्रीय संघर्षों, सुरक्षा सहयोग और भविष्य की रणनीति पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

    समिट के कार्यक्रम के अनुसार ट्रंप नाटो नेताओं के आधिकारिक स्वागत समारोह, सामूहिक फोटो सत्र और कार्यकारी बैठकों में हिस्सा लेंगे। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष रक्षा और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रस्तावों पर चर्चा करेंगे। समापन से पहले ट्रंप मीडिया को संबोधित करेंगे और उसके बाद अपनी निर्धारित द्विपक्षीय बैठकों को पूरा करेंगे।

    इस बार सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय नाटो देशों द्वारा रक्षा बजट बढ़ाने की प्रतिबद्धता माना जा रहा है। पिछले वर्ष सदस्य देशों ने अपनी सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर खर्च करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया था। अब इस लक्ष्य की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी। अमेरिका चाहता है कि सभी सदस्य देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए तय समयसीमा के भीतर रक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि करें।

    अमेरिकी पक्ष का मानना है कि यूरोप के कई देशों ने रक्षा खर्च बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। पोलैंड, नॉर्डिक देशों और बाल्टिक क्षेत्र के देशों को इस मामले में अग्रणी बताया जा रहा है, जबकि जर्मनी भी निर्धारित लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसके बावजूद अमेरिका का मानना है कि सभी सदस्य देशों को समान रूप से जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि गठबंधन का सामूहिक सुरक्षा ढांचा और अधिक मजबूत बन सके।

    सम्मेलन में रक्षा उत्पादन बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के संयुक्त निर्माण पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। अमेरिका का उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ आधुनिक हथियार प्रणालियों, रक्षा तकनीक और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। माना जा रहा है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा क्षेत्र में कई बड़े निवेश और सैन्य खरीद से जुड़े समझौतों की घोषणा भी हो सकती है, जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर तक पहुंच सकती है।

    रूस-यूक्रेन युद्ध भी सम्मेलन के सबसे अहम विषयों में रहेगा। ट्रंप और जेलेंस्की की प्रस्तावित बैठक में युद्ध समाप्त करने के संभावित विकल्पों और कूटनीतिक प्रयासों पर चर्चा होने की संभावना है। अमेरिका का कहना है कि युद्ध को जल्द समाप्त करना मानवीय और वैश्विक सुरक्षा दोनों दृष्टि से आवश्यक है। बैठक के बाद ट्रंप की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बातचीत हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बदली है और इसी कारण नाटो अपने रणनीतिक ढांचे में व्यापक बदलाव कर रहा है। ऐसे समय में अंकारा समिट को गठबंधन की भविष्य की रक्षा नीति, सामूहिक सुरक्षा और सदस्य देशों की साझा जिम्मेदारियों को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण सम्मेलन माना जा रहा है।

  • नाटो की एकजुटता पर उठे सवाल, अंकारा बैठक से पहले रक्षा बजट, अमेरिकी रणनीति और यूरोपीय असहमति बनी बड़ी परीक्षा

    नाटो की एकजुटता पर उठे सवाल, अंकारा बैठक से पहले रक्षा बजट, अमेरिकी रणनीति और यूरोपीय असहमति बनी बड़ी परीक्षा

    नई दिल्ली । अंकारा में इस सप्ताह होने जा रहे नाटो शिखर सम्मेलन से पहले संगठन के भीतर बढ़ते मतभेद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के बीच गठबंधन जहां एकजुटता का संदेश देने की तैयारी कर रहा है, वहीं रक्षा खर्च, पश्चिम एशिया की स्थिति और भविष्य की रणनीतिक दिशा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के अलग-अलग रुख ने उसकी एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम ने सहयोगी देशों के बीच दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट कर दिया है। कई यूरोपीय देशों ने कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका के उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन किसी भी सैन्य अभियान में प्रत्यक्ष भागीदारी से दूरी बनाए रखी। इससे यह संकेत मिला कि सुरक्षा संबंधी मामलों में सभी सदस्य समान रणनीति अपनाने के पक्ष में नहीं हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय देशों की प्राथमिकताएं अमेरिका से अलग हैं। उनके लिए क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और संभावित शरणार्थी संकट जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना उनकी रणनीतिक आवश्यकता माना जा रहा है। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे संघर्षों के अनुभवों ने भी कई यूरोपीय सरकारों को सैन्य अभियानों को लेकर अधिक सतर्क बना दिया है।

    सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय रक्षा बजट बढ़ाने की योजना रहने की संभावना है। सदस्य देशों ने पहले 2035 तक रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद के पांच प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य स्वीकार किया था। हालांकि इस लक्ष्य को लागू करना कई देशों के लिए आसान नहीं माना जा रहा है। आर्थिक सुस्ती, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और सामाजिक कल्याण पर बढ़ते खर्च के कारण अनेक सरकारों के सामने संसाधनों का संतुलन बड़ी चुनौती बन सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कई यूरोपीय देशों में मतदाता स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी प्राथमिकताओं को रक्षा बजट से अधिक महत्व देते हैं। ऐसे में सरकारों के लिए सैन्य खर्च में बड़े स्तर की वृद्धि को राजनीतिक समर्थन दिलाना कठिन हो सकता है। यही कारण है कि लक्ष्य तय होने के बावजूद उसके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

    नाटो की रणनीतिक दिशा को लेकर भी बहस तेज होती जा रही है। अमेरिका लंबे समय से यूरोपीय देशों से अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अधिक वित्तीय और सैन्य योगदान की अपेक्षा करता रहा है। इसके पीछे उद्देश्य यह माना जा रहा है कि यूरोप अपनी पारंपरिक रक्षा जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा स्वयं संभाले, जबकि अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं को अन्य क्षेत्रों की ओर केंद्रित कर सके।

    सम्मेलन से पहले तुर्किए के कई शहरों में नाटो विरोधी प्रदर्शन भी देखने को मिले। प्रदर्शनकारियों ने रक्षा खर्च बढ़ाने के बजाय सार्वजनिक सेवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश की मांग की। उनका कहना है कि बढ़ते सैन्य बजट का असर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर पड़ सकता है। इसी प्रकार के विरोध प्रदर्शन हाल के वर्षों में यूरोप के अन्य देशों में भी सामने आए हैं।

    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा खरीद से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौतों पर चर्चा हो सकती है। इससे सदस्य देशों की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने का प्रयास होगा, लेकिन साथ ही यह बहस भी जारी रहेगी कि गठबंधन की भविष्य की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। ऐसे में अंकारा शिखर सम्मेलन केवल सुरक्षा सहयोग का मंच नहीं, बल्कि नाटो की आंतरिक एकजुटता और दीर्घकालिक भविष्य की भी अहम परीक्षा माना जा रहा है।