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  • अभिजीत दीपके के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर ने एफआईआर और गिरफ्तारी की मांग की

    अभिजीत दीपके के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर ने एफआईआर और गिरफ्तारी की मांग की

    नई दिल्ली । कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ दिल्ली पुलिस में एक आवेदन प्रस्तुत किया गया है। सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर फैजान अंसारी ने राष्ट्रीय राजधानी पहुंचकर अभिजीत दीपके के विरुद्ध प्राथमिक दर्ज करने और उन्हें हिरासत में लेने की मांग उठाई है। शिकायत आवेदन में कई संगीन आरोप लगाए गए हैं, यद्यपि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और पुलिस प्रशासन की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक वक्तव्य जारी नहीं हुआ है।

    शिकायतकर्ता फैजान अंसारी ने दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों को सौंपे पत्र में कहा कि उन पर अभिजीत दीपके के समर्थकों द्वारा दो अलग-अलग मौकों पर हमला किया गया। उनके अनुसार पहली घटना पुणे में और दूसरी औरंगाबाद में घटित हुई, जिनके संदर्भ में स्थानीय थानों में पूर्व में ही सूचना दी जा चुकी है। उन्होंने इन घटनाओं से जुड़े साक्ष्य होने का दावा करते हुए दिल्ली पुलिस से त्वरित वैधानिक कदम उठाने का अनुरोध किया है।

    आवेदन में अभिजीत दीपके पर कई अन्य गंभीर आक्षेप भी मढ़े गए हैं। इसमें उन्हें पाकिस्तान का एजेंट बताने के साथ-साथ उमर खालिद का समर्थन करने का आरोप लगाया गया है। इसके अतिरिक्त यह दावा भी किया गया है कि विगत आंदोलनों में कुछ नामचीन हस्तियों को धनराशि देकर आमंत्रित किया गया था। हालांकि, किसी भी प्रशासनिक या न्यायिक संस्था ने इन आरोपों का समर्थन नहीं किया है और न ही अभिजीत दीपके की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान आया है।

    फैजान अंसारी ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वे विशेष रूप से मुंबई से दिल्ली केवल इस आवेदन को सौंपने आए हैं। उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए चेतावनी दी कि समय पर उचित कार्रवाई न होने से स्थिति बिगड़ सकती है। मध्य प्रदेश समेत देशभर के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी इस पूरे घटनाक्रम की चर्चाएं तेज हो गई हैं, लेकिन यह पूरी तरह से एकपक्षीय आरोपों पर आधारित मामला है।

    यह विवाद ऐसे वक्त सामने आया है जब सीजेपी और अभिजीत दीपके पूर्व में आयोजित आंदोलनों के कारण सार्वजनिक रूप से चर्चा का केंद्र रहे हैं। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान भी उनके संगठन की भूमिका पर बात हुई थी। फिलहाल दिल्ली पुलिस को प्राप्त शिकायत की समीक्षा की जा रही है और प्राथमिक जांच के पश्चात ही अगली विधिक प्रक्रिया तय होगी। जांच पूर्ण होने तक इन दावों को अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता।

  • कॉकरोच प्रोटेस्ट से जुड़े कथित आपत्तिजनक पोस्ट पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई, पीएम मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा मामले में एफआईआर दर्ज

    कॉकरोच प्रोटेस्ट से जुड़े कथित आपत्तिजनक पोस्ट पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई, पीएम मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा मामले में एफआईआर दर्ज


    नई दिल्ली । कॉकरोच प्रोटेस्ट से जुड़े कथित आपत्तिजनक पोस्ट और वीडियो को लेकर दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से अभद्र और आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल के आरोप में पुलिस ने मामला दर्ज किया है। इस कार्रवाई के तहत कुछ न्यूज पोर्टलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सक्रिय कई हैंडल को नोटिस जारी कर संबंधित जानकारी मांगी गई है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच कानून के प्रावधानों के तहत आगे बढ़ाई जा रही है।

    पुलिस के अनुसार दर्ज एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि कथित आपत्तिजनक वीडियो और पोस्ट सबसे पहले किस माध्यम से प्रसारित किए गए, उन्हें किन-किन सोशल मीडिया खातों से साझा किया गया और उनका मूल स्रोत क्या था। इस संबंध में संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं से आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए नोटिस भी भेजे गए हैं।

    प्राथमिक जानकारी के अनुसार आरोप है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़े एक विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद उससे जुड़े वीडियो और अन्य सामग्री सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुई। जांच के दौरान पुलिस ने संबंधित प्लेटफॉर्म से ऐसे वीडियो हटाने और उनके प्रसार से जुड़ी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि संबंधित सामग्री किन खातों के माध्यम से व्यापक स्तर पर साझा की गई।

    दिल्ली पुलिस की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टीम लगातार विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री की निगरानी कर रही है। अधिकारियों के अनुसार यदि किसी पोस्ट या वीडियो में कानून का उल्लंघन या आपत्तिजनक सामग्री पाए जाने की आशंका होती है, तो संबंधित सोशल मीडिया इंटरमीडियरी को नोटिस जारी कर आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा जाता है। अधिकारियों का दावा है कि ऐसे कई पोस्ट और वीडियो पहले ही हटाए जा चुके हैं, जिनमें प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया था।

    इसी क्रम में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े एक अन्य मामले का भी उल्लेख सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 23 जुलाई को साझा की गई एक सेल्फी वीडियो कुछ समय के लिए प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने संबंधित कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा था। कंपनी ने इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए खेद व्यक्त किया, लेकिन सरकार ने उपलब्ध कराए गए जवाब को पर्याप्त नहीं माना और विस्तृत जानकारी की मांग की।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित कंपनी के अधिकारी को भी तलब किया गया है। सरकार का कहना है कि वह इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी चाहती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संबंधित सामग्री हटाने की परिस्थितियां क्या थीं और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस का कहना है कि कॉकरोच प्रोटेस्ट से जुड़े कथित आपत्तिजनक पोस्ट और वीडियो की जांच तथ्यों एवं उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई नियमानुसार की जाएगी।

  • प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में आठ राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच पर दिया जोर

    प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में आठ राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच पर दिया जोर

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज और बल प्रयोग के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाओं में तथ्यों की जांच होना आवश्यक है ताकि यह तय किया जा सके कि हिंसा किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार करना भी जरूरी है।

    मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था, लेकिन बाद में हिंसा की स्थिति कैसे बनी, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके पीछे दो संभावनाएं हो सकती हैं। पहली यह कि पुलिस की ओर से आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया हो और दूसरी यह कि प्रदर्शनकारियों के बीच ऐसे तत्व शामिल हो गए हों जिन्होंने जानबूझकर हिंसा भड़काने का प्रयास किया हो। अदालत ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग कानून का उल्लंघन करते हैं तो पुलिस उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन जहां तक संभव हो बल प्रयोग से बचा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे पुलिसकर्मी मौजूद थे जो वर्दी में नहीं थे और उनके पास हथियार भी थे। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इन लोगों ने भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का इस्तेमाल किया।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग भी रखी गई कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रदर्शन में शामिल लोगों की डिजिटल तकनीक के माध्यम से पहचान कर उसे सार्वजनिक करने पर रोक लगाई जानी चाहिए, क्योंकि प्रदर्शन में कई छात्र और नाबालिग भी शामिल थे। अदालत ने इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लेते हुए व्यापक पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता जताई।

    सुनवाई के दौरान बिहार में प्रदर्शन से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया। एक अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वहां कई नाबालिगों, यहां तक कि कम उम्र के बच्चों को भी हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आए हैं। इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जुनैद से जुड़े मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें प्रताड़ित किए जाने की शिकायत है। इस पर केंद्र की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह अलग विषय है और इसे वर्तमान मामले से अलग देखा जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सहित आठ राज्यों को नोटिस जारी किया। इन राज्यों में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, असम, केरल और अन्य संबंधित राज्य शामिल हैं। अदालत ने कहा कि उसके समक्ष विभिन्न राज्यों से ऐसे मामले आए हैं जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन के अधिकार और प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि लाठीचार्ज, पैलेट गन और आंसू गैस के इस्तेमाल से कुछ लोगों, जिनमें मीडिया कर्मी भी शामिल हैं, के घायल होने की बातें सामने आई हैं।

    सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित मामलों की जांच जारी रह सकती है, लेकिन फिलहाल किसी प्रकार की जल्दबाजी में कार्रवाई करने के बजाय पहले तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट मानक और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित करना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

  • CJP प्रदर्शन के बीच वायरल दावे पर दिल्ली पुलिस का स्पष्टीकरण, NSA डिटेंशन शक्तियों की खबर को बताया भ्रामक

    CJP प्रदर्शन के बीच वायरल दावे पर दिल्ली पुलिस का स्पष्टीकरण, NSA डिटेंशन शक्तियों की खबर को बताया भ्रामक

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में जारी CJP प्रदर्शन के बीच सोशल मीडिया पर एक दावा तेजी से वायरल हुआ, जिसमें कहा गया कि विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली पुलिस आयुक्त को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत विशेष डिटेंशन की शक्तियां प्रदान की गई हैं। इस दावे के व्यापक प्रसार के बाद दिल्ली पुलिस ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करते हुए इसे भ्रामक बताया और लोगों से केवल प्रमाणित जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है।

    दिल्ली पुलिस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि जिस आदेश का हवाला देकर सोशल मीडिया पर दावे किए जा रहे हैं, वह किसी विशेष प्रदर्शन या मौजूदा घटनाक्रम से संबंधित नहीं है। पुलिस के अनुसार यह आदेश नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे निर्धारित अंतराल पर जारी किया जाता है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि संबंधित आदेश 7 जुलाई को जारी किया गया था और इसकी प्रभावी अवधि 19 जुलाई से 18 अक्टूबर तक निर्धारित है।

    पुलिस का कहना है कि यह आदेश CJP के विरोध प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही जारी किया जा चुका था। इसलिए इसे वर्तमान प्रदर्शन या किसी विशेष कार्रवाई से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में कोई नया या विशेष आदेश जारी नहीं किया गया है और वायरल दावों का वास्तविक स्थिति से कोई संबंध नहीं है।

    पुलिस ने नागरिकों से अपील की कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी भी सूचना को बिना सत्यापन के साझा न करें। अधिकारियों ने कहा कि अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए लोगों को केवल आधिकारिक माध्यमों से जारी जानकारी पर ही भरोसा करना चाहिए। पुलिस ने यह भी कहा कि किसी भी संवेदनशील विषय पर गलत जानकारी का प्रसार कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।

    इधर राजधानी में CJP का विरोध प्रदर्शन जारी है और कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच तनाव की स्थिति भी देखने को मिली है। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल की तैनाती जारी है। प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।

    इस बीच केंद्र सरकार और CJP प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का सिलसिला भी जारी है। दोनों पक्षों के बीच अब तक कई दौर की चर्चा हो चुकी है, हालांकि अभी किसी अंतिम सहमति की घोषणा नहीं हुई है। सरकार का कहना है कि संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश जारी रहेगी, जबकि CJP ने अपने रुख को लेकर अलग बयान दिया है।

    राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनी हुई है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दावों और वीडियो के बीच प्रशासन बार-बार लोगों से संयम बरतने और अपुष्ट सूचनाओं से बचने की अपील कर रहा है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि संवेदनशील परिस्थितियों में केवल आधिकारिक और सत्यापित जानकारी पर भरोसा करना ही अफवाहों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।

    दिल्ली पुलिस ने दोहराया है कि वायरल दावे और वास्तविक प्रशासनिक आदेश अलग-अलग विषय हैं। ऐसे में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक स्पष्टीकरण को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि गलत सूचना के प्रसार को रोका जा सके और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित न हो।

  • CJP प्रदर्शन से जुड़े मौत के दावों की पड़ताल, वायरल वीडियो को लेकर सामने आई आधिकारिक जानकारी

    CJP प्रदर्शन से जुड़े मौत के दावों की पड़ताल, वायरल वीडियो को लेकर सामने आई आधिकारिक जानकारी

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो और पोस्ट तेजी से वायरल हुए, जिनमें प्रदर्शन के दौरान लोगों की मौत होने और शवों को छिपाए जाने जैसे गंभीर दावे किए गए। इन दावों के व्यापक प्रसार के बीच प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक इकाई और दिल्ली पुलिस ने आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी करते हुए वायरल दावों को भ्रामक बताया है। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अपुष्ट जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सत्यता अवश्य जांचें।

    सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर साझा किए गए पोस्ट में दावा किया गया कि प्रदर्शन के दौरान कई लोगों की जान गई। कुछ पोस्ट में एक युवती की मौके पर मौत होने का भी दावा किया गया, जबकि कुछ वीडियो में घायल लोगों के दृश्य दिखाकर उन्हें मौत की घटना से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। इन पोस्टों के वायरल होने के बाद मामले ने व्यापक चर्चा का रूप ले लिया।

    प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो की फैक्ट चेक इकाई ने इन दावों की जांच के बाद स्पष्ट किया कि प्रदर्शन के दौरान किसी भी व्यक्ति की मौत होने संबंधी दावा सही नहीं है। फैक्ट चेक इकाई ने कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसारित की जा रही ऐसी जानकारी तथ्यों पर आधारित नहीं है। इसके साथ ही लोगों से अपील की गई कि वे केवल आधिकारिक और सत्यापित स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही भरोसा करें तथा भ्रामक सामग्री को आगे साझा करने से बचें।

    दिल्ली पुलिस ने भी इस संबंध में अपना पक्ष स्पष्ट किया है। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान किसी भी व्यक्ति की मृत्यु की सूचना दर्ज नहीं हुई है। पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर मौत और शव छिपाने जैसे दावे तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर विश्वास न करने और किसी भी सूचना की पुष्टि आधिकारिक माध्यमों से करने की सलाह दी है।

    हालांकि प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस कार्रवाई के दौरान कई प्रदर्शनकारी घायल हुए। उनका कहना है कि कुछ लोगों को सिर में चोट, फ्रैक्चर और अन्य गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। लेकिन इन घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में घायल होने की घटनाओं को मौत की खबरों के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई।

    इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कुछ लोगों ने आधिकारिक स्पष्टीकरण का समर्थन किया, जबकि कुछ ने वायरल वीडियो में दिखाई देने वाले लोगों की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठाए। कई उपयोगकर्ताओं ने यह भी मांग की कि वायरल वीडियो और उसमें दिखाई देने वाली घटनाओं के बारे में अधिक स्पष्ट और प्रमाणिक जानकारी सार्वजनिक की जाए ताकि भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील घटनाओं के दौरान सोशल मीडिया पर अपुष्ट दावे और पुराने या संदर्भ से हटकर वीडियो तेजी से फैलते हैं, जिससे गलत सूचना का प्रसार होता है। ऐसे मामलों में आधिकारिक पुष्टि का इंतजार करना और तथ्यात्मक जानकारी साझा करना बेहद आवश्यक होता है। इससे न केवल अफवाहों पर रोक लगती है, बल्कि सामाजिक तनाव और भ्रम की स्थिति भी कम होती है।

    इस पूरे मामले में आधिकारिक एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि वायरल दावों की सत्यता स्थापित नहीं हुई है। ऐसे में नागरिकों से अपील की गई है कि वे किसी भी वीडियो, तस्वीर या संदेश को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करें और केवल प्रमाणित जानकारी पर ही भरोसा करें।

  • सपा के प्रदर्शन पर सियासी संग्राम डिंपल यादव समेत कई सांसदों को पुलिस ने रोका यूपी से दिल्ली तक हंगामा

    सपा के प्रदर्शन पर सियासी संग्राम डिंपल यादव समेत कई सांसदों को पुलिस ने रोका यूपी से दिल्ली तक हंगामा


    उत्तर प्रदेश । दिल्ली और उत्तर प्रदेश में सोमवार को समाजवादी पार्टी के विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया। पार्टी ने दावा किया कि सांसद डिंपल यादव इकरा हसन प्रिया सरोज और रुचि वीरा समेत कई सांसदों को संसद से जंतर मंतर तक निकाले जा रहे पैदल मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने रोककर कुछ समय के लिए हिरासत में रखा। बाद में सभी सांसदों को छोड़ दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद सपा ने केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन पर लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन का आरोप लगाया।

    समाजवादी पार्टी के अनुसार सांसद छात्रों से जुड़े मुद्दों और विरोध प्रदर्शन के समर्थन में संसद से जंतर मंतर तक मार्च निकाल रहे थे। पार्टी का कहना है कि पुलिस ने बीच रास्ते में सभी को रोक लिया और करीब दो घंटे तक पार्लियामेंट थाना परिसर में बैठाए रखा। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने दावा किया कि सभी सांसदों को बाद में बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया गया।

    इस पूरे घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच के माध्यम से कड़ी प्रतिक्रिया दी। पार्टी ने आरोप लगाया कि छात्रों की आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों को रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और छात्रों की आवाज दबाना उचित नहीं है।

    उधर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए। राजधानी लखनऊ में विधानसभा की ओर बढ़ रहे सपा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया। विरोध स्वरूप कई कार्यकर्ता सड़क पर बैठ गए और नारेबाजी करने लगे। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हटाकर वाहनों के माध्यम से निर्धारित स्थान पर पहुंचाया। वाराणसी में भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सपा कार्यकर्ताओं के बीच धक्का मुक्की और तीखी बहस देखने को मिली।

    बीएचयू और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में भी कुछ छात्र समूहों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर नारे लगाए और अपनी मांगों के समर्थन में पोस्टर लेकर मार्च निकाला। कुछ विदेशी छात्र भी प्रदर्शन में शामिल दिखाई दिए।

    इस बीच डिंपल यादव ने मीडिया से बातचीत में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने और निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था के तहत आवश्यक कदम उठाए गए।

    फिलहाल पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्ष जहां इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश बता रहा है वहीं प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।

  • सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में हंगामा और मुख्य न्यायाधीश से अभद्रता करने वाले लॉ के दो छात्र गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की प्राथमिकी

    सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में हंगामा और मुख्य न्यायाधीश से अभद्रता करने वाले लॉ के दो छात्र गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की प्राथमिकी

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत के भीतर एक बेहद चौंकाने वाली घटना में न्यायिक कार्यवाही को बाधित करने, फाइलों को हवा में उछालने और देश के मुख्य न्यायाधीश के प्रति अत्यंत अभद्र व असंसदीय भाषा का प्रयोग करने वाले कानून के दो छात्रों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। सुरक्षाकर्मियों के साथ हाथापाई और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में इन छात्रों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी के तिलक मार्ग थाने में एक आपराधिक प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों आरोपियों को हिरासत में लेकर आगे की वैधानिक कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है।

    सुरक्षा अधिकारियों द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों की पहचान लखनऊ विश्वविद्यालय में विधि संकाय के छात्रों के रूप में की गई है। इनमें से एक आरोपी का नाम प्रबल प्रताप सिंह है, जो कानून के तीसरे वर्ष का छात्र है और मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा का निवासी है। वहीं, दूसरे आरोपी की पहचान चंद्र भान के रूप में हुई है, जो इसी विश्वविद्यालय में विधि द्वितीय वर्ष का छात्र है। दिल्ली पुलिस ने बताया कि यह पूरी कानूनी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट परिसर की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा स्टाफ के लिखित बयान और शिकायत के आधार पर अमल में लाई गई है।

    यह अभूतपूर्व घटना सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर 13 के भीतर घटित हुई, जब अदालत में एक विशेष अनुमति याचिका पर नियमित सुनवाई चल रही थी। अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस याचिका का शीर्षक ‘प्रबल प्रताप व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ था। इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी प्रबल प्रताप सिंह किसी अधिवक्ता के माध्यम से पेश होने के बजाय खुद ही याचिकाकर्ता-इन-पर्सन के रूप में न्यायाधीशों के समक्ष उपस्थित होकर अपनी दलीलें रख रहा था।

    दर्ज की गई प्राथमिकी के विवरण के मुताबिक, न्यायिक कार्यवाही के दौरान दलीलें खारिज होने या किसी अन्य कारण से आरोपी प्रबल प्रताप सिंह अचानक उग्र हो गया और उसने पूरी तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाना शुरू कर दिया। उसने जजों के सामने बेहद अमर्यादित, अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। अपना आपा खोते हुए उसने कोर्ट रूम के भीतर मौजूद महत्वपूर्ण अदालती कागजात और कानूनी फाइलों को हवा में उछाल दिया, जिससे वे पूरे कोर्ट रूम में बिखर गईं। इस हिंसक आचरण से अदालत कक्ष के भीतर पूरी तरह से अव्यवस्था और अशांति का माहौल पैदा हो गया।

    घटना के वक्त कोर्ट रूम में मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों और सुरक्षाकर्मियों के अनुसार, आरोपी छात्र यहीं नहीं रुका, बल्कि उसने देश के मुख्य न्यायाधीश के प्रति भी सीधे तौर पर अमर्यादित शब्दों और गालियों का प्रयोग किया। जब कोर्ट रूम की सुरक्षा में तैनात ऑन-ड्यूटी सुरक्षाकर्मियों और प्रशासनिक स्टाफ ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसे पकड़ने तथा शांत करने का प्रयास किया, तो दोनों आरोपी छात्र और अधिक हिंसक हो गए। उन्होंने सुरक्षा स्टाफ के साथ धक्का-मुक्की और हाथापाई शुरू कर दी, जिससे ऑन-ड्यूटी कर्मचारियों को अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में गंभीर बाधा का सामना करना पड़ा।

    न्यायालय परिसर के भीतर इस प्रकार के अप्रत्याशित हंगामे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल को तुरंत मौके पर बुलाया गया, जिन्होंने कड़ी मशक्कत के बाद दोनों उपद्रवी छात्रों को काबू में किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की लिखित शिकायत पर तिलक मार्ग थाना पुलिस ने विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर लिया। इस घटना ने देश की सबसे बड़ी अदालत की सुरक्षा व्यवस्था और कोर्ट रूम के भीतर वकीलों व याचिकाकर्ताओं के आचरण को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिस पर आने वाले दिनों में और सख्त रुख अपनाए जाने की संभावना है।

  • दिल्ली में बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़, चार आरोपी हथियारों समेत गिरफ्तार

    दिल्ली में बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़, चार आरोपी हथियारों समेत गिरफ्तार


    नई दिल्ली।
    राजधानी दिल्ली में संभावित आतंकी साजिश को समय रहते विफल करते हुए पुलिस ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़े बताए जा रहे एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। इस कार्रवाई में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन पंजाब और एक दिल्ली से पकड़ा गया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में हिंसक वारदात को अंजाम देने की तैयारी में थे। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से विदेशी हथियार, जिंदा कारतूस और कई मोबाइल फोन बरामद किए हैं, जिनकी फोरेंसिक जांच कराई जा रही है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए संदिग्ध एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा थे, जो सीमा पार बैठे संचालकों के संपर्क में रहकर गतिविधियों को अंजाम देने की तैयारी कर रहा था। पुलिस का दावा है कि आरोपियों को राजधानी में संवेदनशील स्थानों की निगरानी करने और हमले की योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इस नेटवर्क की गतिविधियों पर लंबे समय से नजर रखी जा रही थी और पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद समन्वित कार्रवाई की गई।

    पूछताछ के दौरान सामने आया कि नेटवर्क का एक प्रमुख सदस्य पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए भेजी जाने वाली हथियारों और मादक पदार्थों की खेप प्राप्त करने में सक्रिय भूमिका निभाता था। जांच में यह भी पता चला कि विदेशी नंबरों के माध्यम से सीमा पार मौजूद संचालकों से लगातार संपर्क बनाए रखा जाता था। पुलिस अब इन संचार माध्यमों, डिजिटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल का विश्लेषण कर नेटवर्क की पूरी श्रृंखला तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

    जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार किए गए कुछ आरोपी पहले भी मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में कानून के शिकंजे में आ चुके हैं। पुलिस का मानना है कि संगठित अपराध, हथियारों की तस्करी और आतंकी गतिविधियों के बीच संभावित संबंधों की भी जांच की जाएगी। इसी आधार पर विभिन्न राज्यों की एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया गया है ताकि नेटवर्क के अन्य सदस्यों की पहचान की जा सके।

    दिल्ली से गिरफ्तार आरोपी के मोबाइल फोन की जांच में कई महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य मिलने का दावा किया गया है। प्रारंभिक जांच के अनुसार, उसे राजधानी के धार्मिक स्थलों, पुलिस थानों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों की रेकी करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा उसे दिल्ली में फायरिंग जैसी वारदात को अंजाम देने के निर्देश मिलने के संकेत भी मिले हैं। पुलिस इन डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच कर यह पता लगाने में जुटी है कि साजिश कितनी व्यापक थी और इसमें अन्य कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

    पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आतंक से संबंधित प्रावधानों, हथियार रखने और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियों का कहना है कि बरामद हथियारों की उत्पत्ति, वित्तीय लेनदेन, सीमा पार संपर्क और डिजिटल नेटवर्क की विस्तृत पड़ताल की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला मानते हुए सभी पहलुओं की गहन जांच कर रही हैं, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते निष्प्रभावी बनाया जा सके।

  • किराये के बहाने जुटाई संपत्ति की जानकारी, फर्जी पहचान से 18 करोड़ का लोन; दिल्ली का चौंकाने वाला बैंक फ्रॉड उजागर

    किराये के बहाने जुटाई संपत्ति की जानकारी, फर्जी पहचान से 18 करोड़ का लोन; दिल्ली का चौंकाने वाला बैंक फ्रॉड उजागर

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय राजधानी के विवेक विहार इलाके से सामने आए कथित बैंक ऋण घोटाले ने संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों की सुरक्षा और किरायेदारी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में आरोप है कि किराए पर रहने आए दो व्यक्तियों ने मकान मालकिन की संपत्ति और पहचान से जुड़े दस्तावेजों का दुरुपयोग कर करीब 18 करोड़ रुपये का ऋण हासिल कर लिया। वर्षों बाद जब बैंक से जुड़े कानूनी नोटिस पहुंचे, तब पूरे मामले का खुलासा हुआ और जांच एजेंसियों ने व्यापक स्तर पर पड़ताल शुरू की।

    पुलिस के अनुसार यह मामला वर्ष 2012 से जुड़ा है। विवेक विहार निवासी ऊषा रानी ने अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से अपने दो फ्लैट किराए पर दिए थे। किराएदारों ने स्वयं को कारोबारी बताकर विधिवत किरायेदारी समझौता किया और कुछ समय तक सामान्य रूप से वहां रहे। इसके बाद दोनों फ्लैट खाली कर चले गए। मकान मालकिन ने भी इसे सामान्य घटना मानते हुए आगे कोई संदेह नहीं जताया।

    करीब एक वर्ष बाद स्थिति तब बदली जब बैंक ऋण से जुड़े मामले में कानूनी प्रतिनिधि उनके घर पहुंचे और बकाया ऋण के संबंध में जानकारी मांगी। इस सूचना से हैरान मकान मालकिन ने पुलिस से संपर्क किया। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि उनके नाम पर केवल एक नहीं, बल्कि लगभग 18 करोड़ रुपये के कई ऋण दर्ज हैं, जिनके लिए उनकी संपत्तियों को आधार बनाया गया था। जांच के दौरान यह भी पता चला कि ऋण प्राप्त करने के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेज और जाली हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया।

    पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि कथित रूप से संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर उन्हें बैंक में प्रस्तुत किया गया। जांच एजेंसियों के अनुसार मकान मालकिन के परिवार से संबंधित पहचान दस्तावेजों की प्रतियां इस्तेमाल की गईं, जबकि हस्ताक्षर वास्तविक नहीं थे। इसके अलावा एक महिला द्वारा स्वयं को संपत्ति की वास्तविक मालिक बताकर उप-पंजीयक कार्यालय में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने की भी जानकारी सामने आई, जिससे फर्जीवाड़े की आशंका और गहरी हो गई।

    जांच में यह भी आरोप सामने आया कि ऋण के माध्यम से प्राप्त धनराशि को कई अलग-अलग शेल कंपनियों के जरिए स्थानांतरित किया गया, ताकि लेनदेन की वास्तविक श्रृंखला को छिपाया जा सके। वित्तीय रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद विभिन्न एजेंसियों ने इस पूरे नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल शुरू की। मामले में पुलिस के साथ अन्य जांच एजेंसियां भी शामिल हुईं और वित्तीय लेनदेन के कई पहलुओं की जांच की गई।

    जांच के दौरान एक आरोपी की गिरफ्तारी भी की गई। पुलिस का कहना है कि वह लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचता रहा और उसके खिलाफ पहले भी धोखाधड़ी से जुड़े मामले दर्ज रहे हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस कथित फर्जीवाड़े में और किन लोगों की भूमिका रही तथा बैंकिंग और दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया में कहां-कहां चूक हुई।

    यह मामला संपत्ति मालिकों के लिए भी महत्वपूर्ण सीख माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि किरायेदारी के दौरान पहचान और संपत्ति संबंधी दस्तावेज साझा करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतना आवश्यक है। किसी भी प्रकार के दस्तावेज देने से पहले उनकी आवश्यकता, उपयोग और सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही समय-समय पर संपत्ति के रिकॉर्ड, बैंकिंग गतिविधियों और आधिकारिक दस्तावेजों की निगरानी करते रहना ऐसे मामलों से बचाव का महत्वपूर्ण उपाय माना

  • दिल्ली में बड़ा खुलासा बच्चे खरीद-बिक्री रैकेट का पर्दाफाश, 5 नवजात बरामद, अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े तार

    दिल्ली में बड़ा खुलासा बच्चे खरीद-बिक्री रैकेट का पर्दाफाश, 5 नवजात बरामद, अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े तार

    नई द‍िल्‍ली । देश की राजधानी दिल्ली में एक सनसनीखेज मामले का खुलासा हुआ है, जहां पुलिस ने नवजात बच्चों की तस्करी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस कार्रवाई में अस्पताल की संचालिका सहित कुल 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि पुलिस ने पांच नवजात शिशुओं को सुरक्षित बरामद कर आश्रय गृह भेज दिया है। यह गिरोह पिछले लंबे समय से कई राज्यों में सक्रिय था और अब तक करीब 30 बच्चों की खरीद-फरोख्त कर चुका है।

    पुलिस जांच में सामने आया है कि यह गिरोह बेहद संगठित तरीके से काम करता था। आरोपी राजस्थान और गुजरात के गरीब परिवारों को लालच देकर उनसे नवजात बच्चों को मात्र 10 से 15 हजार रुपये में खरीद लेते थे। इसके बाद इन्हीं बच्चों को बेऔलाद दंपतियों को 5 से 10 लाख रुपये तक में बेच दिया जाता था। इस पूरे रैकेट में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात तक के नेटवर्क जुड़े हुए थे।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब जून के पहले सप्ताह में दिल्ली के पहाड़गंज इलाके से पुलिस को सूचना मिली कि एक महिला अलग-अलग बच्चों के साथ संदिग्ध रूप से घूम रही है। पुलिस ने एक नकली ग्राहक बनाकर महिला से संपर्क किया। सौदा तय होने और 20 हजार रुपये की टोकन मनी दिए जाने के बाद जब आरोपियों ने नवजात को सौंपा, तभी पुलिस ने कार्रवाई करते हुए ज्योति उर्फ कमलेश को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उसी दिन उसकी साथी शालू और ललित को भी हिरासत में ले लिया गया।

    पूछताछ के दौरान इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलती गईं और जांच बेगमपुर स्थित एक निजी अस्पताल तक पहुंची। पुलिस ने छापा मारकर अस्पताल की संचालिका डॉ. विवेकी को भी गिरफ्तार किया, जो इस गिरोह की कथित मास्टरमाइंड बताई जा रही है। जांच में यह भी सामने आया कि इस रैकेट में लैब टेक्निशियन और वाहन चालक की भूमिका भी अहम थी, जो बच्चों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और दस्तावेज तैयार करने में मदद करते थे।

    गिरोह का संचालन कई स्तरों पर किया जाता था। राजस्थान और गुजरात से बच्चों की व्यवस्था साएबा भाई घमर उर्फ कालिया करता था, जिन्हें कार चालक विपिन दिल्ली तक पहुंचाता था। इसके बाद अस्पताल में ही फर्जी जन्म प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे ताकि बच्चों को कानूनी रूप से गोद लेने जैसा दिखाया जा सके। इस नेटवर्क में लड़कियों की कीमत 4 से 5 लाख रुपये और लड़कों की कीमत 8 से 10 लाख रुपये तक तय थी।

    पुलिस ने आगे की कार्रवाई में ग्वालियर और पानीपत से भी कई खरीदारों को गिरफ्तार किया है, जिन्होंने लाखों रुपये देकर नवजात खरीदे थे। जांच में यह भी सामने आया है कि बरामद पांच बच्चों में से चार आदिवासी समुदाय से हैं, जबकि एक बच्चा दिल्ली का बताया जा रहा है। सभी बच्चों की उम्र 27 दिन से लेकर चार महीने के बीच है।

    फिलहाल पुलिस बच्चों के जैविक माता-पिता की पहचान में जुटी है और पुष्टि के बाद उन्हें उनके असली परिवारों को सौंपा जाएगा। इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि कैसे संगठित अपराध गरीब और असहाय वर्ग को निशाना बनाकर मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देते हैं।