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  • संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    नई दिल्ली । देश की चुनावी और संसदीय व्यवस्था से जुड़े बड़े सुधारों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय हो गई है। परिसीमन विधेयक को संसद में पहले मिले झटके के बाद सरकार इसे नए रूप में दोबारा पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की दिशा में भी तेजी से काम किया जा रहा है। इन दोनों प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और विपक्षी दलों ने सरकार से व्यापक परामर्श और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।

    सरकारी स्तर पर गृह मंत्रालय द्वारा परिसीमन से संबंधित नए विधेयक का मसौदा तैयार किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इस पहल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़े नियमों को अद्यतन करना बताया जा रहा है, ताकि जनसंख्या बदलाव और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। इससे पहले संसद में इस विधेयक को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी, जिसके बाद सरकार ने रणनीति में बदलाव करते हुए इसे फिर से पेश करने का निर्णय लिया है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि हाल के विधानसभा चुनावों में कुछ राज्यों में मिले परिणामों के बाद सत्ता पक्ष अपने संसदीय समीकरणों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इस बीच प्रमुख विपक्षी दल Indian National Congress ने सरकार पर आरोप लगाया है कि बिना व्यापक सहमति और सभी दलों से विचार-विमर्श के किसी भी बड़े चुनावी सुधार को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

    वहीं सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक और संसदीय रणनीति को और मजबूत करने में जुटा है। पार्टी नेतृत्व, जिसमें Narendra Modi और Amit Shah जैसे शीर्ष नेता शामिल हैं, चुनावी सुधारों को दीर्घकालिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बता रहे हैं। सरकार का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से न केवल खर्च कम होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक प्रभावी बनेगी।

    इसके समानांतर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ प्रस्ताव पर भी काम तेज कर दिया गया है। इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है और इसके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया है। समिति द्वारा किए जा रहे अध्ययन में चुनावी प्रक्रियाओं के समन्वय, राज्यों और केंद्र के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवहारिकता और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन दोनों प्रस्तावों का असर केवल चुनावी प्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की संघीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों, जिनमें All India Trinamool Congress और Dravida Munnetra Kazhagam शामिल हैं, ने भी इन प्रस्तावों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं और कहा है कि क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों के अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, परिसीमन विधेयक और एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे प्रस्तावों के चलते देश की राजनीतिक दिशा एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आने वाले महीनों में संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर और अधिक बहस और निर्णय की संभावना है, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकता है।

  • परिसीमन पर विदेश में छिड़ी बड़ी बहस: थरूर बोले दक्षिण भारत को नुकसान, अन्नामलाई ने बताया जनसंख्या आधारित सिस्टम जरूरी

    परिसीमन पर विदेश में छिड़ी बड़ी बहस: थरूर बोले दक्षिण भारत को नुकसान, अन्नामलाई ने बताया जनसंख्या आधारित सिस्टम जरूरी



    नई दिल्ली। अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित एक चर्चा के दौरान परिसीमन और संसदीय सीटों के बंटवारे को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद देखने को मिला। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने चेतावनी दी कि अगर लोकसभा सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो दक्षिण भारत के राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान महसूस हो सकता है और उनके अधिकारों पर असर पड़ सकता है।

    थरूर ने कहा कि उत्तर भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे वहां एक सांसद पर ज्यादा आबादी आ जाती है, जबकि दक्षिण भारत में स्थिति अलग है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर इसी आधार पर सीटें बढ़ीं तो उत्तर भारत संसद में बहुमत के जरिए नीतियों को दक्षिण पर थोप सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बड़े राज्यों के पुनर्गठन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के विभाजन पर।

    वहीं बीजेपी नेता के. अन्नामलाई ने थरूर की बातों का विरोध करते हुए कहा कि संसदीय प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या ही होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में हर नागरिक की बराबर भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो तमिलनाडु जैसी राज्यों की सीटें भी बढ़ती हैं, जो प्रक्रिया को संतुलित बनाती है।

    अन्नामलाई ने यह भी कहा कि लगातार यह चिंता करना कि किसी राज्य को फायदा या नुकसान होगा, समाधान नहीं है, बल्कि एक ऐसा मॉडल चाहिए जो सभी राज्यों के लिए संतुलित और व्यावहारिक हो।

    इस चर्चा में शशि थरूर ने महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इसे परिसीमन प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

    गौरतलब है कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों में लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण देने की बात शामिल थी, लेकिन इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी। विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया, लेकिन परिसीमन के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताई।

  • लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

    लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

    नई दिल्ली:लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक संसद में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका और 54 वोट से गिर गया। इस प्रस्ताव के तहत मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने की योजना थी, लेकिन मतदान के दौरान सरकार को अपेक्षित दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। इस असफलता के बाद यह विधेयक आगे नहीं बढ़ सका और राजनीतिक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    मतदान प्रक्रिया में कुल 528 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें 298 ने पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि विधेयक को पारित करने के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो सरकार पूरी नहीं कर सकी। लंबे समय तक चली चर्चा के बाद हुए इस मतदान ने संसद में बने राजनीतिक समीकरणों को स्पष्ट कर दिया।

    यह विधेयक केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध परिसीमन और महिला आरक्षण की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन के बाद लोकसभा में महिला आरक्षण को 33 प्रतिशत तक लागू करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। लेकिन इसके गिरने के बाद इस प्रक्रिया में और देरी की संभावना बढ़ गई है।

    करीब 21 घंटे चली बहस में सरकार और विपक्ष दोनों ने अपने तर्क रखे। सरकार का कहना था कि सीटों में वृद्धि से देश के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनेगा। वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है और कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

    विपक्ष ने परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या आंकड़ों के बदलाव करना उचित नहीं होगा। उनका तर्क था कि यह निर्णय राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इससे कुछ राज्यों को नुकसान हो सकता है।

    सरकार की ओर से इस सत्र में जुड़े अन्य संबंधित विधेयकों को अलग से मतदान के लिए पेश नहीं किया गया। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सभी प्रस्ताव एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग मतदान की आवश्यकता नहीं समझी गई।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि बहुमत होने के बावजूद आवश्यक समर्थन न मिल पाना संसद में सहमति की कमी को दर्शाता है। मतदान से पहले सरकार की ओर से विपक्ष से समर्थन जुटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।

    इस घटनाक्रम के बाद अब यह संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस विधेयक में संशोधन कर दोबारा पेश कर सकती है या विपक्ष के साथ व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करेगी। फिलहाल इस असफलता के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अनिश्चितता बनी हुई है।

  • राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    नई दिल्ली:भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। हाल ही में सदन की कार्यवाही के दौरान देश के भविष्य की राजनीतिक दिशा और संघीय ढांचे की स्थिरता को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की गईं। इस चर्चा का मुख्य केंद्र आगामी परिसीमन और उसके संभावित परिणाम रहे जो आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकते हैं।
    यह तर्क दिया गया कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या वृद्धि के मानकों पर किया जाता है तो इससे उन राज्यों के राजनीतिक प्रभाव में भारी कमी आने की आशंका है जिन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्यों जैसे परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में यह एक गंभीर विषय बन गया है क्योंकि उनके बेहतर सामाजिक और शैक्षिक प्रदर्शन का परिणाम उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

    संसदीय पटल पर प्रस्तुत किए गए तर्कों और विश्लेषण के अनुसार यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है। आंकड़ों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि यदि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दर और प्रस्तावित परिसीमन का मेल होता है तो भविष्य में उत्तर भारत के केवल छह या सात प्रमुख राज्यों के सहयोग से ही केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गठन संभव हो जाएगा।

    ऐसी स्थिति में देश के अन्य हिस्सों विशेषकर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक भागीदारी और उनकी आवाज का महत्व केंद्र सरकार के निर्णयों में काफी कम हो सकता है। यह संभावना न केवल क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा दे सकती है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना के लिए भी चुनौती बन सकती है जो विविधता में एकता और सभी क्षेत्रों की समान भागीदारी पर आधारित है।

    चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से रखी गई कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून निर्माण की प्रक्रिया में हर भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का समान महत्व होना चाहिए। संघीय शासन प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक और हर राज्य स्वयं को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व पाता हुआ महसूस करे।

    यदि सीटों के पुनर्गठन के बाद राजनीतिक सत्ता का केंद्र पूरी तरह से कुछ विशिष्ट राज्यों तक सीमित हो जाता है तो इससे उन राज्यों के भीतर असुरक्षा और उपेक्षा की भावना पैदा हो सकती है जिन्होंने विकास के मानकों पर शानदार कार्य किया है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह अनिवार्य माना गया कि परिसीमन को केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया के रूप में न देखकर इसे एक न्यायसंगत वितरण प्रणाली के रूप में विकसित किया जाए।

    इस विषय पर विचार करते हुए यह सुझाव दिया गया कि नीति निर्माताओं को परिसीमन के नियमों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए न कि उनकी संसदीय शक्ति को कम करके उन्हें दंडित किया जाए।

    सदन में इस विचार पर बल दिया गया कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केवल संख्या बल ही सत्ता का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए बल्कि क्षेत्रीय योगदान और विकास के पैमानों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में एक गहरा विभाजन देखने को मिल सकता है जो संघीय सहयोग और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

    अंततः यह संपूर्ण चर्चा इस निष्कर्ष की ओर इशारा करती है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस जटिल मुद्दे के समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं को सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे।

    संघीय ढांचे को अटूट रखने के लिए ऐसे समाधान खोजने की आवश्यकता है जो जनसंख्या के संतुलन के साथ-साथ क्षेत्रीय अस्मिता और राज्यों के विशिष्ट योगदान को भी सुरक्षित रख सकें। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत का नेतृत्व इस संवेदनशील मुद्दे पर किस प्रकार की आम सहमति बनाता है ताकि देश का हर हिस्सा स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का एक सशक्त और अपरिहार्य अंग समझता रहे।
  • लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल

    लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल


    नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र की शुरुआत गुरुवार को जोरदार हंगामे और तीखी बहस के साथ हुई। जैसे ही सरकार की ओर से संबंधित विधेयक सदन में पेश किए गए विपक्ष ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार संवैधानिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रही है। वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे देश के भविष्य और महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा ऐतिहासिक कदम बताया।

    महिला शक्ति को लेकर नीयत पर जोर

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं केवल फैसलों को ही नहीं बल्कि सरकार की नीयत को भी परखेंगी। अगर नीयत में खोट होगी तो देश की नारी शक्ति उसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की कि वे इस पहल का समर्थन करें और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें।

    विपक्ष को पीएम की चेतावनी
    प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग इस मुद्दे में राजनीति तलाश रहे हैं उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब जब महिलाओं को अधिकार देने के प्रयासों का विरोध हुआ है उसका खामियाजा विरोध करने वालों को उठाना पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सभी दल मिलकर आगे बढ़ते हैं तो इसका लाभ पूरे लोकतंत्र को मिलेगा न कि किसी एक पार्टी को। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा “यह मेरी गारंटी है मेरा वादा है कि हर राज्य को न्याय मिलेगा।” साथ ही उन्होंने विपक्ष से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से न देखें और देशहित में सहयोग करें।

    निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी जरूरी

    अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश की आधी आबादी अब निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार है। उन्होंने याद दिलाया कि पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण पहले ही दिया जा चुका है और अब समय आ गया है कि उन्हें संसद और विधानसभाओं में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। उन्होंने कहा कि लाखों महिलाएं जमीनी स्तर पर काम कर चुकी हैं और अब वे नीति निर्धारण में अपनी भूमिका चाहती हैं।

    विकसित भारत की परिभाषा में महिला भागीदारी अहम

    प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत केवल बुनियादी ढांचे या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनेगा बल्कि इसमें महिलाओं की बराबर भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश इस दिशा में पहले ही काफी देर कर चुका है और अब और देरी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे इस अवसर को गंवाएं नहीं।

    देश की दिशा तय करने वाला कदम

    पीएम मोदी ने इस विधेयक को देश के भविष्य के लिए निर्णायक बताते हुए कहा कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा तय करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास शासन व्यवस्था को अधिक संवेदनशील बनाएगा और इससे निकला परिणाम देश की राजनीति को नई दिशा देगा।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

    समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है लेकिन इसे लागू करने के तरीके पर आपत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर जनगणना और परिसीमन को इससे जोड़कर इसे लागू करने में देरी कर रही है। उनका कहना था कि अगर जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे तो आरक्षण की मांग और बढ़ेगी जिससे सरकार बचना चाहती है।

    महिला प्रतिनिधित्व पर भाजपा से जवाब मांग

    अखिलेश यादव ने भाजपा पर हमला करते हुए पूछा कि जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं वहां कितनी महिला मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी अभी भी सीमित है और भाजपा को पहले अपने संगठन में महिलाओं को पर्याप्त स्थान देना चाहिए।

    मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर विवाद

    सदन में मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण को लेकर भी तीखी बहस हुई। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि अगर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा तो यह अधूरा कदम होगा। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा कि वे अपनी पार्टी में मुस्लिम महिलाओं को टिकट दे सकते हैं सरकार को इससे कोई आपत्ति नहीं है।

    परिसीमन को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप

    भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह परिसीमन को लेकर खासकर दक्षिण भारत में भ्रम फैला रहा है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान के तहत हो रही है और इससे किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिसीमन के बाद कुछ राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ सकती है जिससे उनका प्रतिनिधित्व और मजबूत होगा।

    सरकार का दावा किसी राज्य को नुकसान नहीं

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन को बताया कि प्रस्तावित बदलावों से लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि होगी और महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिलेगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी राज्य की वर्तमान स्थिति को नुकसान नहीं होगा और सभी को समान रूप से लाभ मिलेगा।

    महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग

    कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना सही नहीं है। उनका सुझाव था कि इस कानून को तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके।

    तीनों विधेयकों पर आगे की प्रक्रिया

    लोकसभा में इन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो चुकी है और मतदान 17 अप्रैल को शाम 4 बजे कराया जाएगा। सरकार ने इस पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय निर्धारित किया है। शुरुआती वोटिंग में विधेयकों को पेश करने के पक्ष में बहुमत मिला जिससे आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया।

    हंगामे के बीच जारी रही कार्यवाही


    सदन में पूरे दिन हंगामे का माहौल बना रहा। विपक्ष ने जहां सरकार पर गंभीर आरोप लगाए वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे ऐतिहासिक सुधार बताया। अब सभी की नजरें आगामी मतदान पर टिकी हैं जो इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करेगा।