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  • तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    नई दिल्ली ।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने बुधवार को विधानसभा में परिसीमन के मुद्दे पर प्रस्ताव पेश करते हुए लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने की मांग की। प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा की कुल 543 सीटों को बरकरार रखने और इनके आधार पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की अपील की गई है।

    मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया के कारण राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव की आशंका को देखते हुए मौजूदा सीट व्यवस्था को बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र से मांग की कि लोकसभा की 543 सीटों की वर्तमान संख्या को स्थायी रूप से बरकरार रखा जाए और राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात भी सुरक्षित रखा जाए।

    विजय ने महिला आरक्षण को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में अब और देरी नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने पर इसके लागू होने में अतिरिक्त समय लग सकता है। इसलिए मौजूदा 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाना चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण को किसी प्रकार की रियायत मानने के बजाय संवैधानिक अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण को जल्द लागू किया जाना आवश्यक है। विजय ने तमिलनाडु में महिलाओं की चुनावी भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने मतदान किया है।

    विधानसभा में पेश प्रस्ताव का एक प्रमुख हिस्सा परिसीमन के संभावित प्रभावों से जुड़ा है। तमिलनाडु की ओर से यह मांग रखी गई है कि राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का वर्तमान अनुपात प्रभावित नहीं होना चाहिए। प्रस्ताव में कहा गया है कि 543 सीटों की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए ही भविष्य में प्रतिनिधित्व से जुड़े बदलावों पर विचार किया जाना चाहिए।

    विजय की इस मांग के बीच विपक्षी दल ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता ईपीएस ने परिसीमन के मुद्दे पर अलग रुख रखा। उन्होंने कहा कि परिसीमन में अपने आप में कुछ गलत नहीं है, लेकिन तमिलनाडु का लोकसभा में मौजूदा 7.18 प्रतिशत हिस्सा किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए।

    इस तरह विधानसभा में परिसीमन को लेकर राज्य के प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण दोनों मुद्दे एक साथ सामने आए। मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बनाए रखने, राज्यों के बीच वर्तमान सीट अनुपात को सुरक्षित रखने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को जल्द लागू करने की मांग शामिल है।

    विजय ने विशेष रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव को महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा के रूप में सामने रखा। उनका तर्क है कि यदि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया गया तो इसके प्रभावी होने में देरी हो सकती है। इसलिए मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही इसे लागू किया जाना चाहिए।

    प्रस्ताव के जरिए तमिलनाडु सरकार ने केंद्र के सामने परिसीमन को लेकर अपनी राजनीतिक और संवैधानिक चिंताएं रखी हैं। अब इस मुद्दे पर केंद्र और अन्य राज्यों के रुख के साथ आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। साथ ही महिला आरक्षण को 2029 के चुनाव से लागू करने की मांग राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व और चुनावी व्यवस्था से जुड़े विमर्श को भी प्रभावित कर सकती है।

  • BJP-कांग्रेस ने सांसदों को जारी किया व्हिप: संसद में अगले हफ्ते क्या होगा? FCRA से परिसीमन तक हलचल तेज

    BJP-कांग्रेस ने सांसदों को जारी किया व्हिप: संसद में अगले हफ्ते क्या होगा? FCRA से परिसीमन तक हलचल तेज


    नई दिल्ली।
    संसद के मानसून सत्र का आखिरी चरण शुरू होने के साथ ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने अपने लोकसभा और राज्यसभा सांसदों को 10, 11 और 12 अगस्त को सदन में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने का निर्देश दिया है। वहीं NDA के सांसदों को भी सोमवार से दिल्ली में रहने को कहा गया है। दोनों खेमों की इस सक्रियता से संसद में अगले सप्ताह किसी बड़े विधायी कदम की अटकलें तेज हो गई हैं।

    चर्चा है कि सरकार FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) में संशोधन या परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को सदन में ला सकती है। हालांकि, अगले सप्ताह के सरकारी कामकाज की सूची में इन दोनों प्रस्तावित विधेयकों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। ऐसे में विपक्ष सरकार के संभावित अंतिम समय के कदम को लेकर सतर्क है।

    कांग्रेस ने तीन दिन के लिए जारी किया सख्त व्हिप

    कांग्रेस ने अपने सांसदों को 10 से 12 अगस्त तक सदन में मौजूद रहने के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी किया है। पार्टी ने सांसदों से सुबह 11 बजे से लेकर सदन की कार्यवाही स्थगित होने तक उपस्थित रहने और पार्टी के रुख का समर्थन करने को कहा है।

    कांग्रेस के अलावा INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों ने भी अपने सांसदों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की तैयारी शुरू कर दी है। दूसरी तरफ NDA सांसदों को सोमवार से दिल्ली में रहने का निर्देश दिए जाने की खबरों ने संसद में किसी बड़े घटनाक्रम की संभावना को और बढ़ा दिया है।

    सरकारी एजेंडे में अभी FCRA और परिसीमन का जिक्र नहीं

    संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की ओर से अगले सप्ताह के संभावित सरकारी कामकाज की जो सूची पेश की गई है, उसमें FCRA संशोधन विधेयक या परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक का सीधा उल्लेख नहीं है।

    हालांकि, संसदीय प्रक्रिया में सप्लीमेंट्री एजेंडे के जरिए अंतिम समय में किसी विधेयक को सदन के पटल पर लाने का विकल्प सरकार के पास रहता है। यही वजह है कि विपक्ष अपने सांसदों की उपस्थिति को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।

    FCRA विधेयक आया तो क्या होगा?

    FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट में संशोधन से जुड़ा विधेयक अगर संसद में आता है तो इसे पारित कराने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त होगा। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में सरकार के लिए इस तरह के विधेयक को पारित कराना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है।

    यही कारण है कि विपक्ष सरकार की रणनीति पर नजर बनाए हुए है और अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने का निर्देश दिया गया है।

    परिसीमन वाला विधेयक क्यों ज्यादा अहम?

    अगर सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में पेश करती है तो मामला ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। ऐसे में एक-एक सांसद की मौजूदगी और मतदान का महत्व बढ़ जाता है।

    परिसीमन का मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इसका सीधा संबंध भविष्य में लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से है। इसे लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं।

    2029 से पहले लागू करने की चुनौती

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक इस मानसून सत्र में नहीं आता है, तो सरकार के पास इसे आगामी सत्रों में लाने का विकल्प रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू करने के लिए पर्याप्त समय बचा हुआ है।

    फिलहाल सरकार की ओर से FCRA या परिसीमन संबंधी विधेयक को अगले सप्ताह पेश करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन BJP और कांग्रेस दोनों की ओर से सांसदों को दिल्ली में रहने और सदन में मौजूद रहने के निर्देशों ने संसद के अगले सप्ताह के एजेंडे को लेकर सियासी अटकलें जरूर तेज कर दी हैं।

  • परिसीमन बिल पर बढ़ी सियासी हलचल, मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच निर्णायक टकराव के आसार

    परिसीमन बिल पर बढ़ी सियासी हलचल, मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच निर्णायक टकराव के आसार

    नई दिल्ली ।संसद के मानसून सत्र में अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र संभावित परिसीमन बिल बनता दिखाई दे रहा है। शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर प्रारंभिक बहस के बाद अब लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नए राजनीतिक समीकरण उभरते नजर आ रहे हैं। माना जा रहा है कि 27 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाला सत्र इस विषय पर आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    परिसीमन प्रक्रिया का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और लोकसभा सीटों का पुनर्गठन करना है। प्रस्तावित बदलावों के तहत लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की संवैधानिक प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति अभी तक बनती दिखाई नहीं दे रही है।

    संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। इसी कारण सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त समर्थन सुनिश्चित करने की मानी जा रही है। राजनीतिक दलों के बीच लगातार संवाद और समर्थन जुटाने की कोशिशों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर विपक्ष भी साझा रुख अपनाकर अपनी रणनीति तैयार करने में जुटा हुआ है।

    परिसीमन को लेकर सबसे अधिक चिंता दक्षिण भारत के कई राज्यों ने व्यक्त की है। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने लंबे समय से जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्रभावी प्रयास किए हैं। ऐसे में यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है तो उनका संसदीय प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इसी कारण कई क्षेत्रीय दल इस विषय पर विस्तृत चर्चा और संतुलित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार विभिन्न दलों से संवाद के जरिए व्यापक समर्थन जुटाने का प्रयास कर सकती है। वहीं कुछ क्षेत्रीय दलों ने संकेत दिए हैं कि यदि सभी राज्यों के हितों को संतुलित करने वाला समाधान सामने आता है तो वे अपने रुख पर विचार कर सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी व्यापक सहमति की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

    संसद के मौजूदा सत्र को लेकर राजनीतिक हलकों में कई संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। पहली संभावना यह मानी जा रही है कि यदि पर्याप्त समर्थन सुनिश्चित नहीं होता तो सरकार विधेयक को फिलहाल पेश करने से बच सकती है। दूसरी संभावना यह है कि विधेयक सदन में प्रस्तुत हो, लेकिन पर्याप्त बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित न हो सके। तीसरी संभावना यह मानी जा रही है कि आवश्यक समर्थन मिलने की स्थिति में विधेयक आगे बढ़े और संवैधानिक प्रक्रिया अगले चरण में प्रवेश करे।

    भारत में लोकसभा सीटों के परिसीमन का इतिहास कई दशकों पुराना है। पिछले लंबे समय से संसदीय सीटों की संख्या स्थिर बनी हुई है, जबकि इस अवधि में देश की जनसंख्या और जनसांख्यिकीय स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में नए परिसीमन की आवश्यकता पर चर्चा लगातार होती रही है। यदि भविष्य में इस दिशा में कोई संवैधानिक निर्णय लिया जाता है तो उसका प्रभाव देश की चुनावी राजनीति, राज्यों के प्रतिनिधित्व और संसदीय व्यवस्था पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें संसद के मानसून सत्र और आगे बनने वाले राजनीतिक समीकरणों पर टिकी हुई हैं।

  • परिसीमन विधेयक पर कांग्रेस ने किया रुख स्पष्ट, जयराम रमेश बोले- समर्थन की खबरें पूरी तरह झूठी और भ्रामक

    परिसीमन विधेयक पर कांग्रेस ने किया रुख स्पष्ट, जयराम रमेश बोले- समर्थन की खबरें पूरी तरह झूठी और भ्रामक

    नई दिल्ली । संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से पहले प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। आगामी सत्र में इस विधेयक को पेश किए जाने की संभावनाओं के बीच कांग्रेस ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि पार्टी इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं कर रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने उन दावों का खंडन किया है जिनमें कहा जा रहा था कि सर्वदलीय बैठक के दौरान कांग्रेस ने परिसीमन विधेयक के पक्ष में अपनी सहमति दे दी है। उन्होंने ऐसे सभी दावों को पूरी तरह निराधार और भ्रामक बताया है।

    जयराम रमेश ने कहा कि कुछ माध्यमों में कांग्रेस के रुख को लेकर गलत जानकारी प्रसारित की जा रही है। उनके अनुसार पार्टी ने न तो सर्वदलीय बैठक में इस विधेयक का समर्थन किया और न ही ऐसा कोई संकेत दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का आधिकारिक रुख वही है जो पार्टी की ओर से सार्वजनिक रूप से रखा गया है और किसी भी प्रकार की भ्रामक खबर पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। इस बयान के बाद परिसीमन विधेयक को लेकर विपक्ष की रणनीति पर चल रही अटकलों को नया मोड़ मिल गया है।

    राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्र सरकार मॉनसून सत्र के दौरान महिला आरक्षण से जुड़े प्रावधानों के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन के उद्देश्य से परिसीमन विधेयक को फिर से सदन में ला सकती है। माना जा रहा है कि इस बार सभी राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ाने से संबंधित संशोधित प्रस्ताव भी शामिल किया जा सकता है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    संविधान संशोधन से जुड़े ऐसे किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। वर्तमान लोकसभा की कुल 543 सीटों में कुछ स्थान रिक्त होने के बावजूद विधेयक को पारित कराने के लिए लगभग 360 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता मानी जा रही है। इसी कारण सरकार और विपक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटे हुए हैं।

    संसद के भीतर बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने भी इस विषय को और महत्वपूर्ण बना दिया है। विभिन्न दलों के सांसदों के समर्थन, संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण और गठबंधनों में बदलाव की चर्चाओं के बीच यह आकलन लगाया जा रहा है कि यदि कुछ क्षेत्रीय दल सरकार के साथ आते हैं तो सत्ता पक्ष का संख्याबल पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो सकता है। दूसरी ओर विपक्षी दल भी साझा रणनीति बनाकर इस मुद्दे पर एकजुट रहने का प्रयास कर रहे हैं।

    परिसीमन का विषय लंबे समय से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र रहा है क्योंकि इसका सीधा संबंध संसदीय प्रतिनिधित्व, राज्यों के बीच सीटों के वितरण और लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा माना जाता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की अलग-अलग राय सामने आती रही है। मॉनसून सत्र के दौरान यदि सरकार यह विधेयक पेश करती है तो संसद में इस पर व्यापक चर्चा और तीखी राजनीतिक बहस होने की संभावना है। फिलहाल कांग्रेस ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए यह संकेत दे दिया है कि परिसीमन विधेयक पर विपक्ष की रणनीति को लेकर फैल रही अटकलों को सही नहीं माना जाना चाहिए। आने वाले दिनों में सरकार की आधिकारिक घोषणा और संसद में होने वाली कार्यवाही के बाद ही इस महत्वपूर्ण विधेयक की दिशा और राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

  • मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित

    मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित


    नई दिल्ली ।
    संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर अपना आत्मविश्वास जाहिर किया है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के प्रमुख रामदास अठावले ने दावा किया है कि अब एनडीए के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत है, जिसके आधार पर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने का रास्ता पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो गया है।

    अठावले ने कहा कि पिछले संसदीय सत्र में इन विधेयकों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका था, जिसके कारण वे पारित नहीं हो पाए। उनके अनुसार उस समय विपक्षी दलों ने एकजुट होकर संविधान संशोधन प्रस्तावों का विरोध किया था। अब राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव आया है और सरकार को पहले की तुलना में अधिक समर्थन मिलने की संभावना है।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद के दोनों सदनों से पारित कराया जा सकता है। उनका कहना है कि सरकार इन महत्वपूर्ण प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है और गठबंधन के सहयोगी दल भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाएंगे।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि संसद में मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए पहले से अधिक मजबूत स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि कुछ दलों और सांसदों के समर्थन से गठबंधन का आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत तक पहुंच गया है। इसी आधार पर उन्होंने उम्मीद जताई कि संविधान संशोधन से जुड़े लंबित विधेयकों को इस बार आवश्यक समर्थन प्राप्त होगा।

    अठावले ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण लागू होने से वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें संवैधानिक रूप से निर्धारित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। उनके अनुसार यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

    परिसीमन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि समय-समय पर जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना आवश्यक होता है। उनका कहना था कि परिसीमन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नियमित हिस्सा है और लंबे अंतराल के बाद इसे लागू करना आवश्यक माना जाता है ताकि प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित और प्रभावी बन सके।

    उन्होंने विपक्षी दलों से भी अपील की कि राष्ट्रीय महत्व के इन विधेयकों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देखा जाए। उनके अनुसार महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और निर्वाचन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने जैसे विषय व्यापक जनहित से जुड़े हैं, इसलिए इन पर सकारात्मक सहयोग मिलना चाहिए।

    उल्लेखनीय है कि पिछले संसदीय सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन प्रस्ताव अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा सके थे। इसके बाद से इन विधेयकों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं लगातार जारी हैं। अब मानसून सत्र से पहले केंद्रीय मंत्री के इस दावे ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

    आगामी संसद सत्र में सरकार की रणनीति, विपक्ष का रुख और सदन में संख्या बल की वास्तविक स्थिति पर सभी की नजरें रहेंगी। यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में निर्णायक प्रगति देखने को मिल सकती है।

  • संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    नई दिल्ली । देश की चुनावी और संसदीय व्यवस्था से जुड़े बड़े सुधारों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय हो गई है। परिसीमन विधेयक को संसद में पहले मिले झटके के बाद सरकार इसे नए रूप में दोबारा पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की दिशा में भी तेजी से काम किया जा रहा है। इन दोनों प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और विपक्षी दलों ने सरकार से व्यापक परामर्श और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।

    सरकारी स्तर पर गृह मंत्रालय द्वारा परिसीमन से संबंधित नए विधेयक का मसौदा तैयार किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इस पहल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़े नियमों को अद्यतन करना बताया जा रहा है, ताकि जनसंख्या बदलाव और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। इससे पहले संसद में इस विधेयक को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी, जिसके बाद सरकार ने रणनीति में बदलाव करते हुए इसे फिर से पेश करने का निर्णय लिया है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि हाल के विधानसभा चुनावों में कुछ राज्यों में मिले परिणामों के बाद सत्ता पक्ष अपने संसदीय समीकरणों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इस बीच प्रमुख विपक्षी दल Indian National Congress ने सरकार पर आरोप लगाया है कि बिना व्यापक सहमति और सभी दलों से विचार-विमर्श के किसी भी बड़े चुनावी सुधार को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

    वहीं सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक और संसदीय रणनीति को और मजबूत करने में जुटा है। पार्टी नेतृत्व, जिसमें Narendra Modi और Amit Shah जैसे शीर्ष नेता शामिल हैं, चुनावी सुधारों को दीर्घकालिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बता रहे हैं। सरकार का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से न केवल खर्च कम होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक प्रभावी बनेगी।

    इसके समानांतर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ प्रस्ताव पर भी काम तेज कर दिया गया है। इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है और इसके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया है। समिति द्वारा किए जा रहे अध्ययन में चुनावी प्रक्रियाओं के समन्वय, राज्यों और केंद्र के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवहारिकता और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन दोनों प्रस्तावों का असर केवल चुनावी प्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की संघीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों, जिनमें All India Trinamool Congress और Dravida Munnetra Kazhagam शामिल हैं, ने भी इन प्रस्तावों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं और कहा है कि क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों के अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, परिसीमन विधेयक और एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे प्रस्तावों के चलते देश की राजनीतिक दिशा एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आने वाले महीनों में संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर और अधिक बहस और निर्णय की संभावना है, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकता है।

  • परिसीमन पर विदेश में छिड़ी बड़ी बहस: थरूर बोले दक्षिण भारत को नुकसान, अन्नामलाई ने बताया जनसंख्या आधारित सिस्टम जरूरी

    परिसीमन पर विदेश में छिड़ी बड़ी बहस: थरूर बोले दक्षिण भारत को नुकसान, अन्नामलाई ने बताया जनसंख्या आधारित सिस्टम जरूरी



    नई दिल्ली। अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित एक चर्चा के दौरान परिसीमन और संसदीय सीटों के बंटवारे को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद देखने को मिला। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने चेतावनी दी कि अगर लोकसभा सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो दक्षिण भारत के राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान महसूस हो सकता है और उनके अधिकारों पर असर पड़ सकता है।

    थरूर ने कहा कि उत्तर भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे वहां एक सांसद पर ज्यादा आबादी आ जाती है, जबकि दक्षिण भारत में स्थिति अलग है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर इसी आधार पर सीटें बढ़ीं तो उत्तर भारत संसद में बहुमत के जरिए नीतियों को दक्षिण पर थोप सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बड़े राज्यों के पुनर्गठन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के विभाजन पर।

    वहीं बीजेपी नेता के. अन्नामलाई ने थरूर की बातों का विरोध करते हुए कहा कि संसदीय प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या ही होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में हर नागरिक की बराबर भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो तमिलनाडु जैसी राज्यों की सीटें भी बढ़ती हैं, जो प्रक्रिया को संतुलित बनाती है।

    अन्नामलाई ने यह भी कहा कि लगातार यह चिंता करना कि किसी राज्य को फायदा या नुकसान होगा, समाधान नहीं है, बल्कि एक ऐसा मॉडल चाहिए जो सभी राज्यों के लिए संतुलित और व्यावहारिक हो।

    इस चर्चा में शशि थरूर ने महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इसे परिसीमन प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

    गौरतलब है कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों में लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण देने की बात शामिल थी, लेकिन इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी। विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया, लेकिन परिसीमन के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताई।

  • लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

    लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

    नई दिल्ली:लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक संसद में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका और 54 वोट से गिर गया। इस प्रस्ताव के तहत मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने की योजना थी, लेकिन मतदान के दौरान सरकार को अपेक्षित दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। इस असफलता के बाद यह विधेयक आगे नहीं बढ़ सका और राजनीतिक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    मतदान प्रक्रिया में कुल 528 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें 298 ने पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि विधेयक को पारित करने के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो सरकार पूरी नहीं कर सकी। लंबे समय तक चली चर्चा के बाद हुए इस मतदान ने संसद में बने राजनीतिक समीकरणों को स्पष्ट कर दिया।

    यह विधेयक केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध परिसीमन और महिला आरक्षण की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन के बाद लोकसभा में महिला आरक्षण को 33 प्रतिशत तक लागू करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। लेकिन इसके गिरने के बाद इस प्रक्रिया में और देरी की संभावना बढ़ गई है।

    करीब 21 घंटे चली बहस में सरकार और विपक्ष दोनों ने अपने तर्क रखे। सरकार का कहना था कि सीटों में वृद्धि से देश के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनेगा। वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है और कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

    विपक्ष ने परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या आंकड़ों के बदलाव करना उचित नहीं होगा। उनका तर्क था कि यह निर्णय राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इससे कुछ राज्यों को नुकसान हो सकता है।

    सरकार की ओर से इस सत्र में जुड़े अन्य संबंधित विधेयकों को अलग से मतदान के लिए पेश नहीं किया गया। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सभी प्रस्ताव एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग मतदान की आवश्यकता नहीं समझी गई।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि बहुमत होने के बावजूद आवश्यक समर्थन न मिल पाना संसद में सहमति की कमी को दर्शाता है। मतदान से पहले सरकार की ओर से विपक्ष से समर्थन जुटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।

    इस घटनाक्रम के बाद अब यह संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस विधेयक में संशोधन कर दोबारा पेश कर सकती है या विपक्ष के साथ व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करेगी। फिलहाल इस असफलता के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अनिश्चितता बनी हुई है।

  • राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    नई दिल्ली:भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। हाल ही में सदन की कार्यवाही के दौरान देश के भविष्य की राजनीतिक दिशा और संघीय ढांचे की स्थिरता को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की गईं। इस चर्चा का मुख्य केंद्र आगामी परिसीमन और उसके संभावित परिणाम रहे जो आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकते हैं।
    यह तर्क दिया गया कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या वृद्धि के मानकों पर किया जाता है तो इससे उन राज्यों के राजनीतिक प्रभाव में भारी कमी आने की आशंका है जिन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्यों जैसे परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में यह एक गंभीर विषय बन गया है क्योंकि उनके बेहतर सामाजिक और शैक्षिक प्रदर्शन का परिणाम उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

    संसदीय पटल पर प्रस्तुत किए गए तर्कों और विश्लेषण के अनुसार यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है। आंकड़ों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि यदि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दर और प्रस्तावित परिसीमन का मेल होता है तो भविष्य में उत्तर भारत के केवल छह या सात प्रमुख राज्यों के सहयोग से ही केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गठन संभव हो जाएगा।

    ऐसी स्थिति में देश के अन्य हिस्सों विशेषकर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक भागीदारी और उनकी आवाज का महत्व केंद्र सरकार के निर्णयों में काफी कम हो सकता है। यह संभावना न केवल क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा दे सकती है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना के लिए भी चुनौती बन सकती है जो विविधता में एकता और सभी क्षेत्रों की समान भागीदारी पर आधारित है।

    चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से रखी गई कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून निर्माण की प्रक्रिया में हर भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का समान महत्व होना चाहिए। संघीय शासन प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक और हर राज्य स्वयं को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व पाता हुआ महसूस करे।

    यदि सीटों के पुनर्गठन के बाद राजनीतिक सत्ता का केंद्र पूरी तरह से कुछ विशिष्ट राज्यों तक सीमित हो जाता है तो इससे उन राज्यों के भीतर असुरक्षा और उपेक्षा की भावना पैदा हो सकती है जिन्होंने विकास के मानकों पर शानदार कार्य किया है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह अनिवार्य माना गया कि परिसीमन को केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया के रूप में न देखकर इसे एक न्यायसंगत वितरण प्रणाली के रूप में विकसित किया जाए।

    इस विषय पर विचार करते हुए यह सुझाव दिया गया कि नीति निर्माताओं को परिसीमन के नियमों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए न कि उनकी संसदीय शक्ति को कम करके उन्हें दंडित किया जाए।

    सदन में इस विचार पर बल दिया गया कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केवल संख्या बल ही सत्ता का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए बल्कि क्षेत्रीय योगदान और विकास के पैमानों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में एक गहरा विभाजन देखने को मिल सकता है जो संघीय सहयोग और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

    अंततः यह संपूर्ण चर्चा इस निष्कर्ष की ओर इशारा करती है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस जटिल मुद्दे के समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं को सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे।

    संघीय ढांचे को अटूट रखने के लिए ऐसे समाधान खोजने की आवश्यकता है जो जनसंख्या के संतुलन के साथ-साथ क्षेत्रीय अस्मिता और राज्यों के विशिष्ट योगदान को भी सुरक्षित रख सकें। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत का नेतृत्व इस संवेदनशील मुद्दे पर किस प्रकार की आम सहमति बनाता है ताकि देश का हर हिस्सा स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का एक सशक्त और अपरिहार्य अंग समझता रहे।
  • लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल

    लोकसभा में बोले PM मोदी, 'परिसीमन में किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं, ये मेरी गारंटी', विपक्ष ने उठाए कई सवाल


    नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र की शुरुआत गुरुवार को जोरदार हंगामे और तीखी बहस के साथ हुई। जैसे ही सरकार की ओर से संबंधित विधेयक सदन में पेश किए गए विपक्ष ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार संवैधानिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रही है। वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे देश के भविष्य और महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा ऐतिहासिक कदम बताया।

    महिला शक्ति को लेकर नीयत पर जोर

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं केवल फैसलों को ही नहीं बल्कि सरकार की नीयत को भी परखेंगी। अगर नीयत में खोट होगी तो देश की नारी शक्ति उसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। प्रधानमंत्री ने सभी दलों से अपील की कि वे इस पहल का समर्थन करें और विकसित भारत के निर्माण में योगदान दें।

    विपक्ष को पीएम की चेतावनी
    प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग इस मुद्दे में राजनीति तलाश रहे हैं उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब जब महिलाओं को अधिकार देने के प्रयासों का विरोध हुआ है उसका खामियाजा विरोध करने वालों को उठाना पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सभी दल मिलकर आगे बढ़ते हैं तो इसका लाभ पूरे लोकतंत्र को मिलेगा न कि किसी एक पार्टी को। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा “यह मेरी गारंटी है मेरा वादा है कि हर राज्य को न्याय मिलेगा।” साथ ही उन्होंने विपक्ष से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीतिक नजरिए से न देखें और देशहित में सहयोग करें।

    निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी जरूरी

    अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश की आधी आबादी अब निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए तैयार है। उन्होंने याद दिलाया कि पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण पहले ही दिया जा चुका है और अब समय आ गया है कि उन्हें संसद और विधानसभाओं में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। उन्होंने कहा कि लाखों महिलाएं जमीनी स्तर पर काम कर चुकी हैं और अब वे नीति निर्धारण में अपनी भूमिका चाहती हैं।

    विकसित भारत की परिभाषा में महिला भागीदारी अहम

    प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत केवल बुनियादी ढांचे या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनेगा बल्कि इसमें महिलाओं की बराबर भागीदारी भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि देश इस दिशा में पहले ही काफी देर कर चुका है और अब और देरी करना उचित नहीं होगा। उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे इस अवसर को गंवाएं नहीं।

    देश की दिशा तय करने वाला कदम

    पीएम मोदी ने इस विधेयक को देश के भविष्य के लिए निर्णायक बताते हुए कहा कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा तय करने वाला कदम है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास शासन व्यवस्था को अधिक संवेदनशील बनाएगा और इससे निकला परिणाम देश की राजनीति को नई दिशा देगा।

    विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

    समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है लेकिन इसे लागू करने के तरीके पर आपत्ति है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर जनगणना और परिसीमन को इससे जोड़कर इसे लागू करने में देरी कर रही है। उनका कहना था कि अगर जातीय जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे तो आरक्षण की मांग और बढ़ेगी जिससे सरकार बचना चाहती है।

    महिला प्रतिनिधित्व पर भाजपा से जवाब मांग

    अखिलेश यादव ने भाजपा पर हमला करते हुए पूछा कि जिन राज्यों में उनकी सरकारें हैं वहां कितनी महिला मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी अभी भी सीमित है और भाजपा को पहले अपने संगठन में महिलाओं को पर्याप्त स्थान देना चाहिए।

    मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण पर विवाद

    सदन में मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण को लेकर भी तीखी बहस हुई। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि अगर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा तो यह अधूरा कदम होगा। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है। उन्होंने विपक्ष को चुनौती देते हुए कहा कि वे अपनी पार्टी में मुस्लिम महिलाओं को टिकट दे सकते हैं सरकार को इससे कोई आपत्ति नहीं है।

    परिसीमन को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप

    भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह परिसीमन को लेकर खासकर दक्षिण भारत में भ्रम फैला रहा है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया संविधान के तहत हो रही है और इससे किसी राज्य का नुकसान नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिसीमन के बाद कुछ राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ सकती है जिससे उनका प्रतिनिधित्व और मजबूत होगा।

    सरकार का दावा किसी राज्य को नुकसान नहीं

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सदन को बताया कि प्रस्तावित बदलावों से लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि होगी और महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिलेगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी राज्य की वर्तमान स्थिति को नुकसान नहीं होगा और सभी को समान रूप से लाभ मिलेगा।

    महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग

    कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण का समर्थन करती है लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना सही नहीं है। उनका सुझाव था कि इस कानून को तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को जल्द से जल्द इसका लाभ मिल सके।

    तीनों विधेयकों पर आगे की प्रक्रिया

    लोकसभा में इन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो चुकी है और मतदान 17 अप्रैल को शाम 4 बजे कराया जाएगा। सरकार ने इस पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय निर्धारित किया है। शुरुआती वोटिंग में विधेयकों को पेश करने के पक्ष में बहुमत मिला जिससे आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया।

    हंगामे के बीच जारी रही कार्यवाही


    सदन में पूरे दिन हंगामे का माहौल बना रहा। विपक्ष ने जहां सरकार पर गंभीर आरोप लगाए वहीं सत्ता पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे ऐतिहासिक सुधार बताया। अब सभी की नजरें आगामी मतदान पर टिकी हैं जो इस पूरे मुद्दे की दिशा तय करेगा।