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शिवपुरी में राशन की मांग पर बिफरे ज्योतिरादित्य सिंधिया; बोले- 'नेतागिरी नहीं चलेगी', फिर खुद को बताया परिवार का मुखिया
शिवपुरी। जिले की पिछोर तहसील अंतर्गत ग्राम राजपुर में आयोजित विकास कार्यों के शिलान्यास एवं लोकार्पण समारोह के दौरान उस समय असहज स्थिति बन गई, जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जनसमूह में मौजूद कुछ ग्रामीणों द्वारा राशन वितरण को लेकर की गई नारेबाजी पर उखड़ गए। हालांकि, स्थिति को भांपते हुए उन्होंने तत्काल अपने वक्तव्य को भावनात्मक मोड़ दिया और खुद को नेता के बजाय क्षेत्र का मुखिया बताया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है।राशन के मुद्दे पर नारेबाजी से बिगड़ा माहौलसमारोह के दौरान केंद्रीय मंत्री सिंधिया जब मंच से शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी और विकासात्मक परियोजनाओं का ब्यौरा दे रहे थे, तभी भीड़ में मौजूद कुछ ग्रामीणों ने राशन वितरण में आ रही दिक्कतों को लेकर आवाज उठाई और नारेबाजी शुरू कर दी। अचानक हुए इस विरोध से सिंधिया भाषण के बीच में ही नाराज हो गए। उन्होंने कड़े शब्दों में टोकते हुए कहा, “शांति बनाए रखिए… यहां नेतागिरी नहीं चलेगी। यदि नेतागिरी करनी है तो किसी नेता के पास जाइए।”नाराजगी के बाद तुरंत संभाला मंचमंच से दिखाई गई इस तल्खी के बाद सभा स्थल पर कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। इसके तुरंत बाद केंद्रीय मंत्री ने अपना रुख बदलते हुए संवाद को सहज बनाने की कोशिश की। उन्होंने मंच से कहा कि वे यहां किसी राजनेता की हैसियत से नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के एक अभिभावक और परिवार के मुखिया के नाते उपस्थित हैं, और हर नागरिक की समस्या का समाधान उनकी प्राथमिकता है।प्रीतम लोधी के बयान ने बढ़ाई सियासी हलचलकार्यक्रम के दौरान भाजपा नेता प्रीतम सिंह लोधी के एक बयान ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी। सभा को संबोधित करते हुए लोधी ने कहा कि महाराज (सिंधिया) की यह तो महज शुरुआत है, असली फिल्म एक साल बाद सामने आएगी। इस बयान के बाद स्थानीय राजनीतिक गलियारों में आगामी समीकरणों को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है।जनसभा में घटे इस घटनाक्रम और केंद्रीय मंत्री के तल्ख तेवरों की क्लिप अब इंटरनेट मीडिया पर जमकर साझा की जा रही है, जिस पर विभिन्न राजनीतिक दलों और आमजन की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। -

नेपाल में हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग हुई तेज…. सड़कों पर उतरे लोग
काठमांडू। नेपाल (Nepal) को हिन्दू राष्ट्र (Hindu Nation) घोषित करने की मांग तेज हो रही है। यह मुद्दा केवल संगठनों और प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आम लोग अपने जनप्रतिनिधियों से भी सीधे जवाब मांग रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में सांसदों का घेराव कर उनसे हिन्दू समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों के पक्ष में खुलकर बोलने की मांग की जा रही है।
सांसद के सामने विरोध
सिरहा जिले (Siraha District) में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसद बबलू गुप्ता (MP Bablu Gupta) को लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि उन्होंने परिवर्तन और नेपाल को पुन: हिन्दू राष्ट्र बनाने की उम्मीद के साथ अपने जनप्रतिनिधियों का समर्थन किया था, लेकिन अब उनकी अपेक्षाओं की अनदेखी की जा रही है।
ठंडी हुई सांप्रदायिक हिंसा की आंच
नेपाल में 26 जुलाई की रात से शुरू हुई हिंसा की आंच अब मंद पड़ चुकी है। कई जिलों में बने तनाव के हालात अब काबू में हैं। हालांकि, इस घटना के बाद अब हिंदूवादी संगठनों ने सरकार को 15 सूत्री मांगपत्र सौंपते हुए नेपाल को पुन: हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने समेत कई बड़े फैसले लेने की मांग की है।मांगपत्र में सुनसरी जिले के देवानगंज में हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच, घटना के दोषियों एवं साजिशकर्ताओं की शीघ्र गिरफ्तारी तथा जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई है। साथ ही गोली चलाने का आदेश देने वाले अधिकारियों की पहचान उजागर कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की भी मांग रखी गई है। प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
मांगपत्र में घटना में जान गंवाने वाले लोगों को शहीद का दर्जा देने, उनके परिजनों को उचित मुआवजा उपलब्ध कराने तथा घायलों का निशुल्क और प्रभावी इलाज सुनिश्चित करने की भी मांगें शामिल हैं। साथ ही नेपाल को बौद्ध एवं किरात परंपराओं के सम्मान के साथ ‘वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र’ के रूप में पुन:स्थापित करने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की मांग की गई है। संगठनों ने रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें निष्कासित करने, सीमा सुरक्षा को और मजबूत बनाने तथा वर्ष 1990 के बाद जारी नेपाली नागरिकताओं की जांच कराने की मांग भी उठाई है।
क्या बोले पीएम बालेन शाह
पीएम बालेन शाह का कहना है कि हिंदू राष्ट्र की बहाली के साथ राजशाही का मुद्दाभी जुड़ता है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा कोई भी फैसला लेना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार फेडरल व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध है और मजबूती से इसका पालन करेगी। उनका कहना है कि हिंदू राष्ट्र घोषित कर देने से संघीय व्यवस्था कमजोर हो जाएगी। -

मप्र में किसान आंदोन के बीच मूंग खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने की मांग, कृषि मंत्री ने शिवराज सिंह को लिखा पत्र
भोपाल। मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन के बीच ग्रीष्मकालीन मूंग की खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने की मांग तेज हो गई है। प्रदेश के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंषाना ने मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर प्रदेश के लिए तय मूंग खरीदी के लक्ष्य को 4.54 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन करने का अनुरोध किया है।कृषि मंत्री कंषाना ने अपने पत्र में लिखा है कि प्रदेश सरकार ने 14 मई और 3 जुलाई 2026 को ग्रीष्मकालीन मूंग उपार्जन के लिए केंद्र सरकार को 8.06 लाख मीट्रिक टन खरीदी का प्रस्ताव भेजा था। इसके मुकाबले केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश के लिए 4.54 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य निर्धारित किया है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग का रकबा करीब 14.30 लाख हेक्टेयर है। अनुमानित उत्पादकता 1410 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आधार पर कुल उत्पादन करीब 20.16 लाख मीट्रिक टन होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत यानी 8.06 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।
कृषि मंत्री के अनुसार, पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के लिए 4.19 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी का लक्ष्य तय किया था, जबकि प्रदेश में वास्तविक खरीदी 7.72 लाख मीट्रिक टन तक पहुंची थी। इस वर्ष मूंग उपार्जन का लाभ लेने के लिए 3.47 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है, लेकिन अब तक करीब 82 हजार किसानों से ही खरीदी हो सकी है।
उन्होंने कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का अधिकतम लाभ दिलाने और उन्हें भविष्य में दलहन उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए खरीदी सीमा बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने केंद्र से राष्ट्रीय स्तर पर तय लक्ष्य में अन्य मूंग उत्पादक राज्यों की बचत मात्रा का हिस्सा मध्यप्रदेश को देने की मांग की है।
इससे पहले मध्य प्रदेश सरकार की मूंग खरीदी सीमा बढ़ाने की मांग पर केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने पहले जवाब दिया था कि ग्रीष्मकालीन सीजन 2025-26 में देशभर के लिए मंजूर 5.23 लाख मीट्रिक टन मूंग में से 4.54 लाख मीट्रिक टन यानी करीब 87 प्रतिशत मात्रा मध्य प्रदेश को दी गई है। केंद्र का कहना है कि यह प्रदेश को अब तक दिया गया सबसे बड़ा मूंग खरीदी कोटा है। पीएम-आशा योजना के तहत किसानों को एमएसपी का लाभ दिलाने के लिए केंद्र सरकार लगातार सहयोग कर रही है। इससे पहले वर्ष 2024-25 में मध्य प्रदेश में 4.19 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी को मंजूरी दी गई थी।
भोपाल में बीच सड़क पर डटे हजारों किसान, बुधवार को सीएम हाउस कूच
इधर, प्रदेश में मूंग की शत-प्रतिशत खरीदी की मांग को लेकर करीब दो हजार किसान भोपाल पहुंच गए हैं और होशंगाबाद रोड पर डटे हुए हैं। मुख्यमंत्री आवास घेरने जा रहे किसानों को मंगलवार शाम को पुलिस ने काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च- एडवांस मैटेरियल एंड प्रोसेसेज रिसर्च इंस्टीट्यूट के सामने रोक दिया, जिसके बाद वे सड़क पर ही बैठ गए।किसान नेताओं ने ऐलान किया है कि वे रात सड़क पर ही गुजारेंगे और बुधवार सुबह मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करेंगे। उनका कहना है कि मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा। वहीं, एडिशनल एसपी अनिल शर्मा ने कहा कि किसानों को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और यह किसानों का आखिरी पॉइंट तय किया गया है।
संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में प्रदेश के 19 किसान संगठन इस आंदोलन में शामिल हैं। सोमवार को बरखेड़ा से शुरू हुई किसान क्रांति पैदल यात्रा मंगलवार को औबेदुल्लागंज, मंडीदीप और 11 मील होते हुए भोपाल पहुंची। रास्ते में कई जगह पुलिस ने किसानों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन किसान बैरिकेडिंग हटाते हुए आगे बढ़ते रहे।
भोपाल में प्रवेश के बाद किसान हाथों में तिरंगा लेकर आगे बढ़े। इस दौरान वे लगातार ‘जय जवान-जय किसान’ के नारे लगाते रहे। किसानों के साथ ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य वाहनों का काफिला भी शहर में आगे बढ़ता रहा, लेकिन 11 मील बायपास पर पुलिस और किसानों के बीच बैरिकेडिंग को लेकर धक्का-मुक्की हुई। पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए बैरिकेड लगाए थे, लेकिन किसान बैरिकेड हटाकर आगे बढ़ गए। इसके बाद किसान 11 मील से मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच कर गए। किसानों के साथ ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य वाहन भी चल रहे थे।
भोपाल कूच में शामिल किसान लंबी लड़ाई की तैयारी के साथ पहुंचे हैं। वे ट्रैक्टर-ट्रॉली में सात दिन का राशन और पानी लेकर आए हैं। कई किसान दाल-बाटी भी बनाकर साथ लाए हैं। किसानों का कहना है कि मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा और वे किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं।
मुख्यमंत्री ने अफसरों और कृषि मंत्री के साथ की बैठक
किसान आंदोलन को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंगलवार देश शाम अपने निवास पर अधिकारियों और कृषि मंत्री के साथ बैठक की। बैठक में किसानों की मांगों और आंदोलन की स्थिति को लेकर चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली और जरूरी व्यवस्थाओं को लेकर निर्देश दिए। -

सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक
नई दिल्ली। नीट पेपर लीक मामले को लेकर पिछले तीन सप्ताह से आंदोलन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और केंद्र सरकार के बीच शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की वार्ता किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। हालांकि CJP का दावा है कि सरकार ने उनकी तीन प्रमुख मांगों में से दो पर सकारात्मक रुख दिखाया है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सहमति नहीं बन पाई। इस मुद्दे पर सरकार ने शनिवार तक का समय मांगा है। अब दोनों पक्षों के बीच अगली बैठक शनिवार दोपहर करीब 12 बजे होगी।करीब 50 मिनट चली बैठक
दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई बैठक लगभग 50 मिनट तक चली। CJP की ओर से प्रवक्ता सौरभ दास और आशुतोष रंका मौजूद रहे, जबकि सरकार का प्रतिनिधित्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने किया।इस्तीफे की मांग पर कायम CJP
बैठक के बाद CJP प्रवक्ता सौरभ दास ने बताया कि मंत्रियों के साथ हुई चर्चा में सरकार उनकी तीन मांगों में से दो पर सकारात्मक नजर आई। उन्होंने कहा कि NEET की तैयारी के दौरान आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने और आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने के मुद्दे पर सरकार का रुख सकारात्मक रहा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर संगठन किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।दो मांगों पर मिली सैद्धांतिक सहमति
CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका ने कहा कि सरकार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से जुड़े मुद्दे पर फैसला लेने के लिए शनिवार दोपहर तक का समय मांगा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार जल्द इस पर निर्णय लेगी। रंका के मुताबिक, सरकार ने दो मांगों पर सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इनमें आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर व अन्य कानूनी कार्रवाई वापस लेने का प्रस्ताव शामिल है।20 जुलाई को भी हुई थी बातचीत
इससे पहले 20 जुलाई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के सरकारी आवास पर CJP प्रतिनिधियों और सरकार के बीच दो दौर की बैठक हुई थी, जिसमें भी सौरभ दास और आशुतोष रंका शामिल हुए थे। इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सरकार की ओर से प्रमुख मांगों पर आश्वासन मिलने के बाद 26 दिनों से जारी अपना अनशन समाप्त कर दिया था। इसके बाद शुक्रवार को कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के विठ्ठलभाई पटेल हाउस में दोनों पक्षों के बीच यह नई बैठक आयोजित की गई।आंदोलन जारी रखने का ऐलान
CJP ने पहले ही सरकार के मंत्रियों के आवास या कार्यालय में वार्ता करने से इनकार कर दिया था और किसी तटस्थ स्थान पर बातचीत की मांग की थी। संगठन का कहना है कि जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा, जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते।संगठन की प्रमुख मांगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जवाबदेही तय करना, शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा तथा आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर और कानूनी कार्रवाई वापस लेना शामिल है।
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Karnataka में राज्यसभा चुनाव के लिए मुसलमानों से मांग एक सीट…. बढ़ी कांग्रेस की टेंशन
नई दिल्ली। कर्नाटक (Karnataka) में आगामी राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha elections) को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य के मुस्लिम संगठनों (Muslim Organizations) के एक प्रमुख महासंघ ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी (Ruling Congress party) के सामने एक बड़ी मांग रख दी है। फेडरेशन ऑफ स्टेट मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन्स ने मंगलवार को कांग्रेस नेतृत्व से पुरजोर मांग की है कि वह कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव में कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार को आवंटित करे।कर्नाटक से राज्यसभा की चार सीटों के लिए आगामी 18 जून को मतदान होना है। राज्य विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या के बल पर यह साफ है कि इन चार में से 3 सीटों पर कांग्रेस की जीत तय है, जबकि 1 सीट भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के खाते में जाने की पूरी संभावना है।
यह चुनाव उन चार मौजूदा सांसदों का कार्यकाल 25 जून को समाप्त होने के कारण हो रहा है, जो रिटायर हो रहे हैं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एचडी देवेगौड़ा, भाजपा से इरण कडाडी और नारायण कोरा गप्पा शामिल हैं।
मुस्लिम महासंघ ने अपने बयान में कहा है, “चूंकि कांग्रेस पार्टी आसानी से तीन सीटें जीतने की स्थिति में है, इसलिए हमारी पुरजोर मांग है कि इन जीतने वाली सीटों में से कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि को दी जाए।” संगठन ने इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और केपीसीसी अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से इस मामले में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेने का आग्रह किया है।
मुस्लिम संगठन ने जताई चिंता
मुस्लिम संगठन ने राज्य से संसद में समुदाय के लगातार घटते प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर चिंता जताई है। आंकड़ों का हवाला देते हुए महासंघ ने कहा कि कर्नाटक से राज्यसभा के कुल 12 मौजूदा सदस्यों में से केवल एक सदस्य मुस्लिम समुदाय से है। अतीत में कर्नाटक से कांग्रेस के टिकट पर कम से कम दो मुस्लिम लोकसभा सांसद चुनकर दिल्ली जाते थे, लेकिन वर्तमान में राज्य से एक भी मुस्लिम लोकसभा सांसद नहीं है।कांग्रेस द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए जाने वाले लोकसभा टिकटों की संख्या भी घटकर अब सिर्फ एक रह गई है। महासंघ के अनुसार, “इन परिस्थितियों के कारण संसद में राज्य के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।”
किस बात की दिलाई याद
महासंघ ने कांग्रेस नेतृत्व को याद दिलाया कि कर्नाटक में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत से सत्ता में लाने में मुस्लिम समुदाय ने बेहद निर्णायक भूमिका निभाई थी। समुदाय ने एकजुट होकर और एकमुश्त तरीके से कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में मुस्लिमों ने सबसे अधिक अनुपात में कांग्रेस को वोट दिया, जो पार्टी की जीत का एक मुख्य आधार बना।महासंघ ने असंतोष जताते हुए कहा, “इतने भारी समर्थन के बावजूद राज्य कैबिनेट, नौकरशाही, प्रमुख सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और बोर्ड-निगमों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी और उनके द्वारा दिए गए समर्थन के मुकाबले बेहद कम है।” बयान में यह भी कहा गया कि समुदाय के भीतर अब यह धारणा घर करने लगी है कि कांग्रेस उन निर्वाचन क्षेत्रों में भी मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारने से हिचकती है, जहां जीत की संभावना सबसे ज्यादा होती है।
राहुल गांधी के विचारों का दिया हवाला
संगठन ने उम्मीद जताई है कि आगामी राज्यसभा चुनावों में इस कमी को दूर कर कांग्रेस नेतृत्व एक सकारात्मक संदेश दे सकता है। उन्होंने हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहुल गांधी ने पार्टी की अल्पसंख्यक शाखा को निर्देश दिए थे कि संगठन के भीतर मुस्लिम समुदाय की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाए।फेडरेशन ने कहा कि कर्नाटक की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को अपने शीर्ष नेतृत्व की इसी सोच और विचारधारा को मजबूत करते हुए राज्यसभा की एक सीट मुस्लिम उम्मीदवार को देनी चाहिए। अब देखना यह होगा कि दिल्ली और बेंगलुरु में बैठा कांग्रेस का आलाकमान इस मांग पर क्या फैसला लेता है।
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महिला ने तलाक के बाद पति से मांगा 170 करोड़ का सोना, भड़का SC…. बोला- ऐसे मामलों को तुरंत रोक देना चाहिए
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान झूठे घरेलू हिंसा के मामलों पर चिंता जताई है। इस दौरान SC ने तलाक (Divorce) के बाद अपने पति से 170 करोड़ रुपये का सोना (Gold worth Rs 170 crore) मांगने वाली महिला को फटकार भी लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जिन मामलों में यह साफ-साफ दिख रहा है कि कोई ठोस आरोप नहीं हैं, ऐसे घरेलू हिंसा के मामलों को शुरुआत में ही रोक देना चाहिए।एक रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला उस समय सामने आया जब पति ने दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के फैसले को SC में चुनौती दी। दोनों पक्षों के बीच समझौता पहले ही हो चुका था, लेकिन पत्नी की मांग पर हाईकोर्ट ने इस केस पर आगे की सुनवाई की इजाजत दी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया।
170 करोड़ का सोना!
महिला का दावा था कि तलाक के समझौते के बदले उसे 120 करोड़ रुपये के सोने के गहने और 50 करोड़ रुपये के सोने के बिस्किट देने का वादा किया गया था, यानी कुल 170 करोड़ रुपये का सोना। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस दावे का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला। SC ने पाया कि यह बात न तो लिखित समझौते में थी, न ही पहले के किसी कागज में इसका जिक्र था। यह दावा बाद में अचानक घरेलू हिंसा की शिकायत में सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि टैक्स से बचने के लिए इसे लिखित में नहीं डाला गया था और कहा कि यह कानून की अनदेखी दिखाता है।क्या था समझौता?
दरअसल इस जोड़े की शादी साल 2000 में हुई थी। बाद में दोनों के बीच दूरियां आ गईं और वे 2022-23 से अलग रहने लगे। पति ने 2023 में तलाक की मांग की। इसके बाद मामला सुलह के लिए भेजा गया और 16 मई 2024 को समझौता हुआ, जिसमें 1.5 करोड़ रुपये का पूरा और अंतिम निपटारा तय हुआ। इस समझौते के बाद तलाक की पहली प्रक्रिया भी पूरी हो गई और दोनों पक्षों ने पैसे और गहनों का लेन-देन भी कर लिया। लेकिन बाद में महिला ने तलाक की दूसरी प्रक्रिया से पीछे हटकर घरेलू हिंसा का केस दर्ज कर दिया।सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
हालांकि उच्चतम न्यायालय को घरेलू हिंसा के कोई सबूत नहीं मिले। SC ने अपने फैसले में कहा कि हिंसा को लेकर कोई खास घटना या ठोस विवरण नहीं दिया गया है और बस सामान्य आरोप लगाए गए थे। यह नहीं बताया गया कि पति या उसके परिवार के किस सदस्य ने क्या किया। SC ने यह भी नोट किया कि शादी के इतने लंबे समय तक कभी ऐसे आरोप नहीं लगाए गए थे और शिकायत तब दर्ज की गई जब समझौते का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका था। ऐसे में कोर्ट ने इसे बाद में सोच समझकर उठाया गया कदम बताया।
अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि शादी के विवाद भावनात्मक हो सकते हैं, लेकिन केवल भावनाओं के आधार पर आपराधिक केस नहीं चलाए जा सकते। अगर ऐसा होने दिया गया तो कानून का गलत इस्तेमाल होगा और लोगों को बेवजह परेशान किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब दोनों पक्ष अपनी मर्जी से समझौता करते हैं और उस पर अमल भी करते हैं, तो बिना ठोस कारण के बाद में उससे पीछे नहीं हट सकते। आखिर में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए शादी को खत्म कर दिया और कहा कि यह रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है और अब इसमें कोई उम्मीद नहीं बची है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि बाकी बची रकम तय समय में दी जाए, जमा पैसे वापस किए जाएं और दोनों के बीच चल रहे सभी केस खत्म माने जाएं। -

Trade Deal: अगले 5 साल में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा भारत… क्या US कंपनियां पूरी कर पाएंगी डिमांड?
नई दिल्ली। भारत और अमेरिका (India and America) के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते (Historic Trade Agreements) के तहत भारत (India) ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर लगभग 41 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के सामान आयात करने की जो प्रतिबद्धता जताई है वह वैश्विक व्यापार की दिशा बदल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य की सफलता केवल भारतीय कंपनियों (Indian Companies) के ऑर्डर देने पर नहीं, बल्कि अमेरिकी सप्लायर्स की सप्लाई क्षमता पर भी निर्भर करेगी। शनिवार को जारी संयुक्त बयान के बाद अब इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि आखिर किन क्षेत्रों में भारत अपनी खरीदारी बढ़ाएगा और अमेरिका के सामने क्या चुनौतियां होंगी।आयात के इस लक्ष्य को हासिल करने में ऊर्जा क्षेत्र सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा। आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत ने अमेरिका से करीब 40 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें से 11 अरब डॉलर केवल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद थे। यह पिछले साल की तुलना में 35% अधिक है।
भारत अब अपनी तेल जरूरतों के लिए रूस के बजाय अमेरिकी तेल को प्राथमिकता देने की ओर बढ़ रहा है। भारत अब इंडोनेशिया से आने वाले ‘कोकिंग कोल’ की जगह अमेरिकी कोयले को तरजीह दे सकता है। अधिकारियों के अनुसार, अमेरिकी कोयला न केवल गुणवत्ता में बेहतर है, बल्कि कीमत में भी प्रतिस्पर्धी है। भारतीय तेल कंपनियों ने पहले ही अधिक तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की खरीद के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
हाई-टेक और विमानन
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, चिप्स, सेमीकंडक्टर और हवाई जहाज जैसे हाई-टेक उत्पाद इस 500 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की कुंजी होंगे। भारत अकेले बोइंग को 70 से 80 अरब डॉलर के नए ऑर्डर देने की तैयारी में है। डेटा सेंटर्स और AI के लिए आवश्यक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स और हाई-एंड चिप्स की खरीद में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है।
सप्लाई चेन और पेंडिंग ऑर्डर्स जैसी अड़चनें
इस भव्य योजना की राह में कुछ तकनीकी अड़चनें भी हैं। उदाहरण के तौर पर, बोइंग जैसी कंपनियों के पास पहले से ही भारी ऑर्डर का बैकलॉग है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अमेरिकी कंपनियां समय पर डिलीवरी दे पाएंगी? इसी तरह, वैश्विक बाजार में सेमीकंडक्टर चिप्स की भारी मांग है। भारतीय खरीदारों को इन उत्पादों को हासिल करने के लिए वैश्विक कतार में लगना होगा। गोयल ने कहा, “यह अमेरिकी विक्रेताओं पर निर्भर करता है कि वे भारतीय खरीदारों को ऐसा प्रस्ताव दें जिसे वे ठुकरा न सकें। 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य पहले ही साल में शायद पूरा न हो, लेकिन हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।”
100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का रोडमैप
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत सालाना 100 अरब डॉलर का आयात अमेरिका से करता है तो अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार होने के साथ-साथ सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी बन सकता है। इससे भारत की रूस पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंध और गहरे होंगे। यह समझौता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक दांव है। जहां भारत को 18% कम टैरिफ का लाभ मिल रहा है, वहीं अमेरिका को 500 अरब डॉलर का सुनिश्चित बाजार मिल गया है। अब सफलता इस बात पर टिकी है कि अमेरिकी फैक्ट्रियां और तेल के कुएं भारत की इस विशाल मांग को कितनी तेजी से पूरा करते हैं। -

Gen Z दफ्तरों की जटिल अंग्रेजी से परेशान…. आसान भाषा अपनाने की उठी मांग
नई दिल्ली। ऑफिस (Office) में इस्तेमाल होने वाली भारी-भरकम अंग्रेजी (Heavy English.) आज की युवा पीढ़ी (Young Generation-Gen Z) के लिए परेशानी का कारण बनती जा रही है। जेन-जी (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) का कहना है कि ऐसे शब्द न सिर्फ भ्रम पैदा करते हैं, बल्कि कामकाजी संवाद को भी मुश्किल बना देते हैं। इसी को लेकर अमेरिका के भाषा शिक्षण प्लेटफॉर्म ‘प्रेपली’ ने एक रिपोर्ट जारी की है।रिपोर्ट के मुताबिक, जब मैनेजर मीटिंग में यह कहते हैं कि “इस प्रोजेक्ट के लिए सिनर्जी चाहिए” या “क्या आपके पास इसकी बैंडविड्थ है”, तो कई युवा कर्मचारियों को इन शब्दों का सही मतलब समझने में दिक्कत होती है। भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि हर महीने हजारों युवा इन कॉर्पोरेट शब्दों के अर्थ जानने के लिए गूगल का सहारा लेते हैं।
रिसर्च में सामने आया है कि ‘Synergy’ सबसे ज्यादा खोजा जाने वाला ऑफिस शब्द है, जिसे हर महीने करीब 40,500 बार सर्च किया जाता है। इसके बाद ‘Paradigm’ (लगभग 27,000 सर्च) और ‘Best Practice’ जैसे शब्द सूची में शामिल हैं।
युवाओं को कैसी भाषा चाहिए?
आज की पीढ़ी ऐसी भाषा को प्राथमिकता देती है जो साफ, सरल और सीधी हो। उनके अनुसार, दफ्तरों में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक अंग्रेजी मुहावरे अक्सर दिखावटी लगते हैं और बातचीत को जटिल बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी कर्मचारी को काम समझने के लिए शब्दों का मतलब अलग से ढूंढना पड़े, तो यह संचार की कमजोरी को दर्शाता है।
डिजिटल दौर से मेल नहीं खा रही कॉर्पोरेट भाषा
जेन-जी का कहना है कि पारंपरिक कॉर्पोरेट अंग्रेजी अब डिजिटल युग की बातचीत से तालमेल नहीं बैठा पा रही है। वे चाहते हैं कि दफ्तरों की भाषा भी रोजमर्रा की बातचीत जैसी स्वाभाविक हो। यह बदलाव सिर्फ कार्यस्थल तक सीमित नहीं है—निजी जीवन में भी पुराने और भारी शब्दों की जगह आसान भाषा लेती जा रही है। भाषा विशेषज्ञों के अनुसार, हर पीढ़ी अपने समय के अनुसार भाषा को ढालती है और जेन-जी के लिए स्पष्टता और सादगी सबसे अहम है। जैसे-जैसे इस पीढ़ी की भागीदारी कार्यक्षेत्र में बढ़ रही है, वैसे-वैसे दफ्तरों में भी संवाद का तरीका बदल रहा है।
कठिन शब्दों की जगह आसान विकल्प
Synergy → Teamwork
Bandwidth → Availability (समय/उपलब्धता)
Circle Back → दोबारा बात करनायुवाओं का मानना है कि इस तरह की सरल भाषा अपनाने से न सिर्फ काम आसान होगा, बल्कि संवाद भी ज्यादा प्रभावी बन सकेगा।
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MP : उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में गैर-हिन्दुओं की एंट्री पर लगे प्रतिबंध…. जानें क्यों उठी ऐसी मांग ?
उज्जैन। मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के उज्जैन (Ujjain) में स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर (Mahakaleshwar Temple) में गैर हिन्दुओं के प्रवेश को लेकर हिन्दू जागरण मंच (Hindu Jagran Manch) और मंदिर पुजारी ने प्रतिबंध लगाने की मांग उठाई है। यह मांग उत्तराखंड (Uttarakhand) के गंगोत्री धाम (Gangotri Dham) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की खबर सामने आने के बाद उठी है जिसमे देश के बारह ज्योतिर्लिंग में भी इस तरह की व्यवस्था लागू करने की मांग की जा रही है। इस पूरे मामले में हिन्दू जागरण मंच के पदाधिकारी का कहना है कि पिछले साल 25 के करीब गैर हिन्दू महाकाल मंदिर सहित आसपास से पकड़े गए थे। जो यहां घूमने आए थे। वंही महाकाल मंदिर के वरिष्ठ पुजारी का कहना है कि गैर-हिंदू सनातन धर्म में आस्था रखता है तो उसे मंदिर आने से नहीं रोका जाना चाहिए। उस पर रोक तब लगे जब वह घूमने की मंशा से आया हो।
इन मंदिरों में भी प्रतिबंध की मांग
माहेश्वरी ने दावा किया कि साल 2025 में हिंदू जागरण मंच ने महाकाल मंदिर परिसर से एक दर्जन से अधिक युवकों को पकड़ा है, जो लड़कियों के साथ मंदिर परिसर में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि महाकाल मंदिर क्षेत्र पहले से ही संवेदनशील रहा है, ऐसे में अतिरिक्त सतर्कता जरूरी है। इसी तरह काल भैरव, मंगलनाथ और सांदीपनि आश्रम जैसे शहर के प्रमुख मंदिरों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।देश के उत्तराखंड के गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की खबर सामने आने के बाद देश के बारह ज्योतिर्लिंग में भी इस तरह की व्यवस्था लागू करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। इसकी शुरुआत उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से होती नजर आ रही है। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा और उससे जुड़े मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग के बीच अब उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में भी इसी तरह की मांग उठने लगी है। महाकाल मंदिर के वरिष्ठ पुजारी महेश शर्मा और हिंदू जागरण मंच ने केंद्र और राज्य सरकार से महाकाल मंदिर सहित शहर के प्रमुख मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
महाकाल मंदिर के वरिष्ठ पुजारी महेश शर्मा ने कहा कि यदि कोई गैर-हिंदू सनातन धर्म में आस्था रखता है तो उसे मंदिर आने से नहीं रोका जाना चाहिए, लेकिन यदि कोई व्यक्ति केवल घूमने-फिरने या गलत मंशा के साथ मंदिर में प्रवेश करता है और इससे सनातन धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचती है, तो ऐसे लोगों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
हिंदू जागरण मंच के रितेश माहेश्वरी ने कहा कि यह व्यवस्था केवल महाकाल मंदिर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश के सभी 12 ज्योतिर्लिंग में लागू की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग घर वापसी कर चुके हैं, उन्हें छोड़कर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए।
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कीमतें आसमान पर… आम आदमी की पहुंच से दूर हुआ सोना, मांग में भारी गिरावट
नई दिल्ली। कीमतों के रिकॉर्ड स्तर (Record levels Prices) पर पहुंचने और उपभोक्ताओं के खरीद व्यवहार में बदलाव के कारण वर्ष 2025 में भारत (India) की सोने की मांग (Gold Demand) में 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council) की गुरुवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सोने की कुल मांग 2025 में गिरकर 710.9 टन रह गई, जो 2024 में 802.8 टन थी। परिषद का अनुमान है कि 2026 में देश में सोने की मांग 600 से 700 टन के बीच रह सकती है। हालांकि, कीमतों में भारी उछाल के कारण मूल्य के संदर्भ में सोने की मांग 30 प्रतिशत बढ़कर 7,51,490 करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जबकि पिछले वर्ष यह 5,75,930 करोड़ रुपये थी।डब्ल्यूजीसी ने बताया, ‘वर्ष, 2025 की चौथी तिमाही में सोने की मांग पर ऊंची कीमतों और उपभोक्ताओं के बदलते व्यवहार का असर स्पष्ट दिखा। मात्रा के आधार पर इस तिमाही में मांग नौ प्रतिशत गिरकर 241.3 टन रही, लेकिन मूल्य के आधार पर यह 49 प्रतिशत बढ़कर करीब 3,03,470 करोड़ रुपये हो गई।
वर्ष 2025 के दौरान आभूषणों की कुल मांग 24 प्रतिशत घटकर 430.5 टन रही, जो 2024 में 563.4 टन थी। हालांकि, मूल्य के लिहाज से यह 12 प्रतिशत बढ़कर 4,54,390 करोड़ रुपये रही, जो इससे पिछले साल 4,04,510 करोड़ रुपये रही थी। शादियों के सीजन के बावजूद ऊंची कीमतों और महंगाई के कारण आभूषणों की बिक्री में 23 प्रतिशत की कमी आई। 2025 में सोने ने 60 प्रतिशत से अधिक का रिटर्न दिया और 53 बार सर्वकालिक उच्च स्तर को छुआ। इसके विपरीत, निवेश के रूप में सोने की मांग बढ़ी है। चौथी तिमाही में निवेश मांग 26 प्रतिशत बढ़कर 96 टन रही, जबकि इसका मूल्य 108 प्रतिशत उछलकर 1,20,700 करोड़ रुपये हो गया।
सोने की वैश्विक मांग 5,000 टन से अधिक हुई
वैश्विक स्तर पर सोने की मांग 2025 में 5,000 टन से अधिक होकर एक नए सर्वकालिक उच्चस्तर पर पहुंच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल सोने की मांग 2025 में 5,002 टन के नए ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई, जो पिछले वर्ष 4,961.9 टन थी। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से निवेश मांग में तेज उछाल के कारण हुई, जो 2025 में बढ़कर 2,175.3 टन हो गई जबकि यह 2024 में 1,185.4 टन थी। चालू वित्त वर्ष की अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में उपभोक्ता मांग दो प्रतिशत बढ़कर 1,345.3 टन हो गई जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 1,318.5 टन थी।