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  • भारत के सर्विसेज सेक्टर की गतिविधियां सितंबर में तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंचीं, पीएमआई बढ़कर 55.2 रहा

    भारत के सर्विसेज सेक्टर की गतिविधियां सितंबर में तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंचीं, पीएमआई बढ़कर 55.2 रहा

    नई दिल्ली ।भारत के सर्विसेज सेक्टर में सितंबर के दौरान गतिविधियों में तेजी देखने को मिली और पीएमआई तीन महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। सितंबर में सर्विसेज पीएमआई बढ़कर 55.2 रहा, जबकि अगस्त में यह 54.1 पर था। यह जून के बाद पीएमआई का सबसे ऊंचा स्तर है। आंकड़ों के मुताबिक, सेवा क्षेत्र में गतिविधियों को मजबूत घरेलू मांग और नए ऑर्डर्स में तेज बढ़ोतरी से समर्थन मिला।

    सितंबर में नए बिजनेस में पिछले तीन महीनों की तुलना में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। कंपनियों को डिजिटल समाधान, खाने-पीने की चीजों, इंश्योरेंस, लोन, सॉफ्टवेयर, ट्रांसपोर्टेशन और टूर-एंड-ट्रैवल जैसी सेवाओं के लिए ज्यादा मांग मिली। फाइनेंस, इंश्योरेंस और कंज्यूमर सर्विस सेक्टर में बिक्री में सबसे अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे सेवा क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों को सितंबर में बेहतर गति मिली।

    सितंबर के दौरान भारतीय सेवाओं की अंतरराष्ट्रीय मांग में भी सुधार दर्ज किया गया। कंपनियों ने जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, यूके और अमेरिका से बेहतर कारोबार मिलने की जानकारी दी। हालांकि नए निर्यात बिजनेस में बढ़ोतरी की रफ्तार अगस्त की तुलना में धीमी रही। इसके बावजूद बेहतर ऑर्डर बुक और पाइपलाइन में मौजूद प्रोजेक्ट्स ने कंपनियों को कारोबार बढ़ाने और अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित किया।

    रोजगार के मोर्चे पर भी सेवा क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई। सितंबर में नौकरियों में वृद्धि की रफ्तार ठीक-ठाक रही, हालांकि रोजगार पैदा होने की दर अगस्त के मुकाबले थोड़ी कम रही। कंपनियों के पास मौजूद ऑर्डर्स और आगे आने वाले प्रोजेक्ट्स के कारण कर्मचारियों की जरूरत बनी रही। इस तरह नए कारोबार में बढ़ोतरी के साथ रोजगार में भी वृद्धि का सिलसिला जारी रहा।

    इनपुट लागत के मोर्चे पर सेवा कंपनियों को कुछ राहत मिली। सितंबर में इनपुट कीमतों में महंगाई नवंबर 2025 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई। लागत दबाव कम होने से सर्विस प्रोवाइडर्स पर अपनी बिक्री कीमतें बढ़ाने की जरूरत भी कम हुई। घरेलू मांग में मजबूती के बीच लागत दबाव में कमी ने सेवा कंपनियों के लिए कारोबारी परिस्थितियों को कुछ बेहतर बनाया।

    भारत में सेवा क्षेत्र की मजबूती को लेकर अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा कि पीएमआई सर्वेक्षण से घरेलू मांग बढ़ने के कारण सर्विस सेक्टर में लगातार सुधार का संकेत मिलता है। उनके मुताबिक, निर्यात कारोबार में भी वृद्धि जारी रही, हालांकि उसकी रफ्तार धीमी हुई। उन्होंने यह भी कहा कि सितंबर में इनपुट लागत का दबाव कम रहने से सेवा प्रदाताओं को बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की जरूरत कम पड़ी।

    हालांकि मासिक स्तर पर सितंबर का प्रदर्शन बेहतर रहा, लेकिन जुलाई-सितंबर तिमाही में सर्विसेज पीएमआई का औसत पिछली तिमाही की तुलना में कम रहा। इस तिमाही ने मार्च 2022 को समाप्त हुई तिमाही के बाद से अपना सबसे कमजोर तिमाही प्रदर्शन दर्ज किया। दूसरी ओर, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों को शामिल करने वाला एचएसबीसी इंडिया कंपोजिट पीएमआई आउटपुट इंडेक्स अगस्त के 54.3 से बढ़कर सितंबर में 55.9 हो गया। इससे सितंबर में निजी क्षेत्र की कुल कारोबारी गतिविधियों में बढ़ोतरी का संकेत मिला।

  • चांदी में तेजी का अनुमान, अगली दिवाली तक 4 लाख रुपये किलो तक पहुंचने की संभावना

    चांदी में तेजी का अनुमान, अगली दिवाली तक 4 लाख रुपये किलो तक पहुंचने की संभावना

    नई दिल्ली ।चांदी की कीमतों को लेकर आने वाले समय के लिए एक बड़ा अनुमान सामने आया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, औद्योगिक मांग में लगातार बढ़ोतरी और खदानों से सीमित आपूर्ति के कारण वैश्विक बाजार में चांदी की कीमतों में आगे भी तेजी देखने को मिल सकती है। अनुमान के अनुसार अगले छह महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत 85 से 90 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है, जबकि दिवाली 2027 तक यह 120 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक जाने की संभावना जताई गई है।

    सितंबर 2026 में घरेलू बाजार में चांदी का बेंचमार्क भाव करीब 2.34 लाख रुपये प्रति किलोग्राम बताया गया है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि रुपये-डॉलर की विनिमय दर, आयात शुल्क और प्रीमियम जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए घरेलू बाजार में चांदी की कीमत दिवाली 2027 तक करीब 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर तक पहुंच सकती है। यह मौजूदा स्तर की तुलना में लगभग 71 फीसदी तक की संभावित बढ़ोतरी का संकेत देता है। हालांकि यह एक अनुमान है और वास्तविक कीमत बाजार की परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।

    चांदी में संभावित तेजी के पीछे सबसे प्रमुख कारण औद्योगिक मांग को माना गया है। चांदी का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, तकनीकी उपकरणों और कई औद्योगिक उत्पादों में होता है। तकनीकी क्षेत्र के विस्तार के साथ इसकी मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। दूसरी ओर, खदानों से चांदी की आपूर्ति उसी गति से बढ़ाना आसान नहीं है।

    वैश्विक बाजार में 2026 के दौरान चांदी की मांग और आपूर्ति के बीच करीब 4.63 करोड़ औंस का अंतर रहने का अनुमान लगाया गया है। यह लगातार छठा वर्ष हो सकता है जब चांदी की वैश्विक आपूर्ति मांग से कम रहेगी। मांग और आपूर्ति के इस अंतर को कीमतों पर दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया जा रहा है।

    चांदी के उत्पादन की संरचना भी इसकी आपूर्ति को प्रभावित करती है। अनुमान के अनुसार 2026 में वैश्विक चांदी उत्पादन करीब 84.41 करोड़ औंस रह सकता है। खास बात यह है कि कुल चांदी उत्पादन का केवल लगभग एक चौथाई हिस्सा प्राथमिक चांदी की खदानों से आता है। चांदी की बड़ी मात्रा तांबा, जस्ता और सीसा जैसी दूसरी धातुओं के खनन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है।

    इस वजह से चांदी की कीमत बढ़ने के बावजूद इसका उत्पादन उसी अनुपात में बढ़ाना चुनौतीपूर्ण रहता है। यदि औद्योगिक मांग आगे भी मजबूत बनी रहती है और खनन से मिलने वाली आपूर्ति सीमित रहती है, तो बाजार में मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ सकता है।

    रिपोर्ट में अगले छह महीनों के लिए अंतरराष्ट्रीय चांदी की कीमत 85 से 90 डॉलर प्रति औंस और दिवाली 2027 तक 120 डॉलर प्रति औंस का अनुमान दिया गया है। घरेलू बाजार के लिए करीब 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम का संभावित स्तर बताया गया है। हालांकि चांदी की कीमतों पर वैश्विक बाजार, मुद्रा विनिमय दर, आयात शुल्क, औद्योगिक मांग, निवेश मांग और उपलब्ध आपूर्ति जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। इसलिए ये आंकड़े बाजार का अनुमान हैं, निश्चित कीमत नहीं।

  • जीएसटी 2.0 के बाद ऑटो रिटेल की रफ्तार चार गुना बढ़ी, सस्ती कीमतों से वाहन खरीदने वालों की संख्या बढ़ी

    जीएसटी 2.0 के बाद ऑटो रिटेल की रफ्तार चार गुना बढ़ी, सस्ती कीमतों से वाहन खरीदने वालों की संख्या बढ़ी

    नई दिल्ली ।जीएसटी 2.0 लागू होने के बाद भारतीय ऑटो रिटेल बाजार में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग के अनुसार, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच 11 महीनों में देश में तीन करोड़ से अधिक वाहनों का पंजीकरण हुआ। इस अवधि में वाहनों की बिक्री और पंजीकरण की वृद्धि दर करीब 20 प्रतिशत रही, जबकि इससे एक साल पहले समान अवधि में यह पांच प्रतिशत से भी कम थी।

    ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष साई गिरिधर के अनुसार, जीएसटी 2.0 के बाद ऑटो रिटेल की वृद्धि दर करीब चार गुना तक बढ़ी है। उनके मुताबिक, वाहन खरीदने की क्षमता बढ़ना यानी अफोर्डेबिलिटी मौजूदा समय में मांग को आगे बढ़ाने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारण बनकर सामने आया है।

    उनका कहना है कि जीएसटी में बदलाव के बाद छोटे कारों, कम्यूटर दोपहिया वाहनों, ट्रैक्टरों और वाणिज्यिक वाहनों की ऑन-रोड लागत में स्थायी कमी आई। इन वाहन श्रेणियों पर बड़ी संख्या में उपभोक्ता निर्भर हैं। कीमतों में कमी का असर सिर्फ पहले से तय खरीद को आगे लाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे बाजार में नए ग्राहकों की भागीदारी भी बढ़ी।

    साई गिरिधर के मुताबिक, इस बदलाव के बाद पहली बार वाहन खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों के साथ लंबे समय से खरीद टाल रहे ग्राहक भी दोबारा शोरूम पहुंचने लगे। इससे ऑटो बाजार में मांग का दायरा बढ़ा है और कई श्रेणियों में बिक्री के मजबूत आंकड़े सामने आए हैं।

    उन्होंने पिछले त्योहारी सीजन में दिखाई दी मजबूत मांग को भी इसी बदलाव से जोड़ते हुए कहा कि यह तेजी केवल मौसमी गतिविधि नहीं रही। उनके अनुसार, मांग में आया बदलाव अब उद्योग के लिए नई सामान्य स्थिति का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

    ऑटो क्षेत्र में जीएसटी 2.0 के असर को उन्होंने मौसमी के बजाय संरचनात्मक बताया। इसी वजह से बीते एक साल में उद्योग की अलग-अलग वाहन श्रेणियों ने अपने मजबूत बिक्री महीनों का रिकॉर्ड दर्ज किया। इससे बाजार में उपभोक्ता मांग के विस्तार के संकेत मिले हैं।

    दोपहिया वाहनों को व्यापक जन-आधारित मांग का प्रमुख संकेतक माना जाता है। गिरिधर ने बताया कि इस श्रेणी ने 2018 के बाद का अपना सर्वोच्च स्तर फिर हासिल किया है। इससे बड़े उपभोक्ता वर्ग के बीच वाहन खरीदने की क्षमता और रुचि में सुधार का संकेत मिलता है।

    यात्री वाहन बाजार में भी बदलाव देखने को मिला है। उनके अनुसार, पहली बार वैकल्पिक ईंधन आधारित वाहनों ने पेट्रोल वाहनों को पीछे छोड़ दिया। इसके अलावा कई वाहन श्रेणियों में ग्रामीण बाजारों की वृद्धि शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक तेज रही।

    उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों को भी ऑटो क्षेत्र में बढ़ती खपत से जोड़ा और कहा कि किफायती वाहन उपलब्ध कराने पर जोर देने से मांग और विकास का नया चक्र शुरू हुआ है। हालांकि, उद्योग के सामने चुनौतियां अभी बनी हुई हैं।

    वाहन निर्माता कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कमोडिटी लागत और मुद्रा विनिमय दरों से जुड़े दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में उद्योग के लिए बढ़ी हुई मांग को बनाए रखना कीमतों और लागत के संतुलन पर भी निर्भर करेगा।

    पिछले एक साल के अनुभव को लेकर उद्योग का कहना है कि वाहन बाजार में मांग बढ़ाने के लिए किफायती कीमत सबसे प्रभावी कारकों में से एक साबित हुई है। जीएसटी 2.0 के बाद बढ़ी खरीद क्षमता ने ऑटो रिटेल को नई गति दी है।

  • भारत की बिजली मांग एक दशक में दोगुनी, पीक डिमांड 270.8 गीगावाट पहुंची; स्थापित क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हुई

    भारत की बिजली मांग एक दशक में दोगुनी, पीक डिमांड 270.8 गीगावाट पहुंची; स्थापित क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हुई

    नई दिल्ली । भारत के बिजली क्षेत्र में पिछले एक दशक के दौरान तेजी से विस्तार हुआ है। बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और घरेलू स्तर पर बिजली की बढ़ती खपत के बीच देश की अधिकतम बिजली मांग करीब दोगुनी हो गई है। सरकार के अनुसार, इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन क्षमता के साथ-साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी बड़े स्तर पर विस्तार किया गया है।

    वर्ष 2013-14 में भारत की अधिकतम बिजली मांग 135.9 गीगावाट थी। यह मांग 21 मई 2026 को बढ़कर 270.8 गीगावाट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। सरकार के मुताबिक, बिजली मांग में यह वृद्धि देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, शहरीकरण, उद्योगों के विस्तार और घरों में बिजली के लगातार बढ़ते उपयोग से जुड़ी है।

    बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मार्च 2014 में भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 249 गीगावाट थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 552 गीगावाट हो गई। इस दौरान जोड़ी गई क्षमता ने मौजूदा बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य की मांग के लिए बिजली व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है।

    उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ बिजली के पारेषण ढांचे का भी विस्तार किया गया। अप्रैल 2014 में देश के ट्रांसमिशन नेटवर्क की लंबाई 2,91,336 सर्किट किलोमीटर थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 5,10,594 सर्किट किलोमीटर हो गई। नेटवर्क के विस्तार से राष्ट्रीय ग्रिड को अधिक एकीकृत बनाने और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बिजली के प्रवाह को सुगम करने में मदद मिली है। इससे बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाने में भी योगदान मिला है।

    भारत ने पारंपरिक बिजली ढांचे के विस्तार के साथ स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी की रिन्यूएबल एनर्जी स्टैटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट के अनुसार, स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।

    31 मार्च 2026 तक भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता 283.46 गीगावाट थी। इसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता शामिल थी। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 55.3 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता जोड़ी। यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक इजाफा बताया गया है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग दोगुना है।

    ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने जलवायु लक्ष्यों के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। जून 2025 में देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इस तरह भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 के लिए निर्धारित इस लक्ष्य को तय समय सीमा से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

  • नेपाल के फ्लैश फ्लड पर मुआवजे की मांग, भारत बोला- जलवायु संकट साझा चुनौती, विकसित देश करें मदद

    नेपाल के फ्लैश फ्लड पर मुआवजे की मांग, भारत बोला- जलवायु संकट साझा चुनौती, विकसित देश करें मदद


    नई दिल्ली। नेपाल में फ्लैश फ्लड से हुई भारी तबाही के बाद जलवायु संकट के लिए भारत, चीन और अमेरिका से मुआवजा देने की मांग को लेकर उठे विवाद पर भारत ने अपना रुख साफ किया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने साझा चुनौती है और इससे निपटने की जिम्मेदारी भी इसी आधार पर तय होनी चाहिए।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत का हमेशा से मानना रहा है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े कदम ‘साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं’ के सिद्धांत पर आधारित होने चाहिए।

    नेपाल ने उठाया था ऐतिहासिक जिम्मेदारी का मुद्दा

    नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने फ्लैश फ्लड के बाद कहा था कि उनके देश का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग शून्य है, इसके बावजूद नेपाल को जलवायु संकट की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

    उन्होंने दुनिया के तीन प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों—चीन, अमेरिका और भारत—से ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करने की अपील की थी। उनका कहना था कि इन देशों को नेपाल जैसे जलवायु संकट से प्रभावित और कमजोर देशों को मुआवजा देना चाहिए।

    नेपाल के विदेश मंत्री ने इसे किसी तरह की ‘दान’ की मांग नहीं, बल्कि इन देशों का कानूनी और नैतिक दायित्व बताया था।

    भारत बोला- विकसित देशों को आगे आना चाहिए

    भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार विकसित देशों को जलवायु संकट से प्रभावित विकासशील देशों की मदद में आगे आना चाहिए।

    रणधीर जायसवाल ने कहा कि जिन विकसित देशों का ऐतिहासिक उत्सर्जन सबसे ज्यादा रहा है और जिन्होंने जलवायु संकट को बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है, उन्हें उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ विकासशील देशों को वित्तीय सहायता और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के जरिए मदद करनी चाहिए।

    नेपाल ने बाद में दी थी सफाई

    विवाद बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्री ने अपने बयान पर स्पष्टीकरण भी दिया था। उन्होंने कहा था कि न तो उन्होंने और न ही नेपाल सरकार ने भारत, चीन या अमेरिका से विशेष रूप से मुआवजा मांगा है। उनकी अपील पूरी वैश्विक बिरादरी से थी कि जलवायु परिवर्तन के असर को गंभीरता से समझा जाए और प्रभावित देशों को लंबे समय तक सहयोग दिया जाए।

    त्रासदी में 1200 से ज्यादा मौतें

    नेपाल में आई इस प्राकृतिक आपदा में अब तक 1200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। आपदा के बाद नेपाल में राहत और बचाव कार्य जारी हैं।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि संकट की इस घड़ी में भारत नेपाल की सरकार और वहां के लोगों के साथ मजबूती से खड़ा है। मंत्रालय के मुताबिक, करीबी दोस्त और साझेदार होने के नाते भारत ने तत्काल प्रतिक्रिया दी और नेपाल में राहत, रिकवरी तथा पुनर्निर्माण के प्रयासों में सहयोग जारी रखेगा।

  • शिवपुरी में राशन की मांग पर बिफरे ज्योतिरादित्य सिंधिया; बोले- 'नेतागिरी नहीं चलेगी', फिर खुद को बताया परिवार का मुखिया

    शिवपुरी में राशन की मांग पर बिफरे ज्योतिरादित्य सिंधिया; बोले- 'नेतागिरी नहीं चलेगी', फिर खुद को बताया परिवार का मुखिया

    ​शिवपुरी। जिले की पिछोर तहसील अंतर्गत ग्राम राजपुर में आयोजित विकास कार्यों के शिलान्यास एवं लोकार्पण समारोह के दौरान उस समय असहज स्थिति बन गई, जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जनसमूह में मौजूद कुछ ग्रामीणों द्वारा राशन वितरण को लेकर की गई नारेबाजी पर उखड़ गए। हालांकि, स्थिति को भांपते हुए उन्होंने तत्काल अपने वक्तव्य को भावनात्मक मोड़ दिया और खुद को नेता के बजाय क्षेत्र का मुखिया बताया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है।
    ​राशन के मुद्दे पर नारेबाजी से बिगड़ा माहौल
    समारोह के दौरान केंद्रीय मंत्री सिंधिया जब मंच से शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी और विकासात्मक परियोजनाओं का ब्यौरा दे रहे थे, तभी भीड़ में मौजूद कुछ ग्रामीणों ने राशन वितरण में आ रही दिक्कतों को लेकर आवाज उठाई और नारेबाजी शुरू कर दी। अचानक हुए इस विरोध से सिंधिया भाषण के बीच में ही नाराज हो गए। उन्होंने कड़े शब्दों में टोकते हुए कहा, “शांति बनाए रखिए… यहां नेतागिरी नहीं चलेगी। यदि नेतागिरी करनी है तो किसी नेता के पास जाइए।”
    ​नाराजगी के बाद तुरंत संभाला मंच
    मंच से दिखाई गई इस तल्खी के बाद सभा स्थल पर कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। इसके तुरंत बाद केंद्रीय मंत्री ने अपना रुख बदलते हुए संवाद को सहज बनाने की कोशिश की। उन्होंने मंच से कहा कि वे यहां किसी राजनेता की हैसियत से नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के एक अभिभावक और परिवार के मुखिया के नाते उपस्थित हैं, और हर नागरिक की समस्या का समाधान उनकी प्राथमिकता है।

    ​प्रीतम लोधी के बयान ने बढ़ाई सियासी हलचल
    कार्यक्रम के दौरान भाजपा नेता प्रीतम सिंह लोधी के एक बयान ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी। सभा को संबोधित करते हुए लोधी ने कहा कि महाराज (सिंधिया) की यह तो महज शुरुआत है, असली फिल्म एक साल बाद सामने आएगी। इस बयान के बाद स्थानीय राजनीतिक गलियारों में आगामी समीकरणों को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है।
    ​जनसभा में घटे इस घटनाक्रम और केंद्रीय मंत्री के तल्ख तेवरों की क्लिप अब इंटरनेट मीडिया पर जमकर साझा की जा रही है, जिस पर विभिन्न राजनीतिक दलों और आमजन की ओर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

  • नेपाल में हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग हुई तेज…. सड़कों पर उतरे लोग

    नेपाल में हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग हुई तेज…. सड़कों पर उतरे लोग


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) को हिन्दू राष्ट्र (Hindu Nation) घोषित करने की मांग तेज हो रही है। यह मुद्दा केवल संगठनों और प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आम लोग अपने जनप्रतिनिधियों से भी सीधे जवाब मांग रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में सांसदों का घेराव कर उनसे हिन्दू समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों के पक्ष में खुलकर बोलने की मांग की जा रही है।


    सांसद के सामने विरोध

    सिरहा जिले (Siraha District) में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसद बबलू गुप्ता (MP Bablu Gupta) को लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि उन्होंने परिवर्तन और नेपाल को पुन: हिन्दू राष्ट्र बनाने की उम्मीद के साथ अपने जनप्रतिनिधियों का समर्थन किया था, लेकिन अब उनकी अपेक्षाओं की अनदेखी की जा रही है।


    ठंडी हुई सांप्रदायिक हिंसा की आंच

    नेपाल में 26 जुलाई की रात से शुरू हुई हिंसा की आंच अब मंद पड़ चुकी है। कई जिलों में बने तनाव के हालात अब काबू में हैं। हालांकि, इस घटना के बाद अब हिंदूवादी संगठनों ने सरकार को 15 सूत्री मांगपत्र सौंपते हुए नेपाल को पुन: हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने समेत कई बड़े फैसले लेने की मांग की है।

    मांगपत्र में सुनसरी जिले के देवानगंज में हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच, घटना के दोषियों एवं साजिशकर्ताओं की शीघ्र गिरफ्तारी तथा जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई है। साथ ही गोली चलाने का आदेश देने वाले अधिकारियों की पहचान उजागर कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की भी मांग रखी गई है। प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।

    मांगपत्र में घटना में जान गंवाने वाले लोगों को शहीद का दर्जा देने, उनके परिजनों को उचित मुआवजा उपलब्ध कराने तथा घायलों का निशुल्क और प्रभावी इलाज सुनिश्चित करने की भी मांगें शामिल हैं। साथ ही नेपाल को बौद्ध एवं किरात परंपराओं के सम्मान के साथ ‘वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र’ के रूप में पुन:स्थापित करने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की मांग की गई है। संगठनों ने रोहिंग्या, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें निष्कासित करने, सीमा सुरक्षा को और मजबूत बनाने तथा वर्ष 1990 के बाद जारी नेपाली नागरिकताओं की जांच कराने की मांग भी उठाई है।


    क्या बोले पीएम बालेन शाह

    पीएम बालेन शाह का कहना है कि हिंदू राष्ट्र की बहाली के साथ राजशाही का मुद्दाभी जुड़ता है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा कोई भी फैसला लेना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार फेडरल व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध है और मजबूती से इसका पालन करेगी। उनका कहना है कि हिंदू राष्ट्र घोषित कर देने से संघीय व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।

  • मप्र में किसान आंदोन के बीच मूंग खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने की मांग, कृषि मंत्री ने शिवराज सिंह को लिखा पत्र

    मप्र में किसान आंदोन के बीच मूंग खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने की मांग, कृषि मंत्री ने शिवराज सिंह को लिखा पत्र


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन के बीच ग्रीष्मकालीन मूंग की खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने की मांग तेज हो गई है। प्रदेश के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंषाना ने मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर प्रदेश के लिए तय मूंग खरीदी के लक्ष्य को 4.54 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन करने का अनुरोध किया है।

    कृषि मंत्री कंषाना ने अपने पत्र में लिखा है कि प्रदेश सरकार ने 14 मई और 3 जुलाई 2026 को ग्रीष्मकालीन मूंग उपार्जन के लिए केंद्र सरकार को 8.06 लाख मीट्रिक टन खरीदी का प्रस्ताव भेजा था। इसके मुकाबले केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश के लिए 4.54 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य निर्धारित किया है।

    उन्होंने बताया कि इस वर्ष प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग का रकबा करीब 14.30 लाख हेक्टेयर है। अनुमानित उत्पादकता 1410 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आधार पर कुल उत्पादन करीब 20.16 लाख मीट्रिक टन होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत यानी 8.06 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।

    कृषि मंत्री के अनुसार, पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के लिए 4.19 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी का लक्ष्य तय किया था, जबकि प्रदेश में वास्तविक खरीदी 7.72 लाख मीट्रिक टन तक पहुंची थी। इस वर्ष मूंग उपार्जन का लाभ लेने के लिए 3.47 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है, लेकिन अब तक करीब 82 हजार किसानों से ही खरीदी हो सकी है।

    उन्होंने कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का अधिकतम लाभ दिलाने और उन्हें भविष्य में दलहन उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए खरीदी सीमा बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने केंद्र से राष्ट्रीय स्तर पर तय लक्ष्य में अन्य मूंग उत्पादक राज्यों की बचत मात्रा का हिस्सा मध्यप्रदेश को देने की मांग की है।

    इससे पहले मध्य प्रदेश सरकार की मूंग खरीदी सीमा बढ़ाने की मांग पर केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने पहले जवाब दिया था कि ग्रीष्मकालीन सीजन 2025-26 में देशभर के लिए मंजूर 5.23 लाख मीट्रिक टन मूंग में से 4.54 लाख मीट्रिक टन यानी करीब 87 प्रतिशत मात्रा मध्य प्रदेश को दी गई है। केंद्र का कहना है कि यह प्रदेश को अब तक दिया गया सबसे बड़ा मूंग खरीदी कोटा है। पीएम-आशा योजना के तहत किसानों को एमएसपी का लाभ दिलाने के लिए केंद्र सरकार लगातार सहयोग कर रही है। इससे पहले वर्ष 2024-25 में मध्य प्रदेश में 4.19 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी को मंजूरी दी गई थी।

    भोपाल में बीच सड़क पर डटे हजारों किसान, बुधवार को सीएम हाउस कूच

    इधर, प्रदेश में मूंग की शत-प्रतिशत खरीदी की मांग को लेकर करीब दो हजार किसान भोपाल पहुंच गए हैं और होशंगाबाद रोड पर डटे हुए हैं। मुख्यमंत्री आवास घेरने जा रहे किसानों को मंगलवार शाम को पुलिस ने काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च- एडवांस मैटेरियल एंड प्रोसेसेज रिसर्च इंस्टीट्यूट के सामने रोक दिया, जिसके बाद वे सड़क पर ही बैठ गए।

    किसान नेताओं ने ऐलान किया है कि वे रात सड़क पर ही गुजारेंगे और बुधवार सुबह मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करेंगे। उनका कहना है कि मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा। वहीं, एडिशनल एसपी अनिल शर्मा ने कहा कि किसानों को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और यह किसानों का आखिरी पॉइंट तय किया गया है।

    संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में प्रदेश के 19 किसान संगठन इस आंदोलन में शामिल हैं। सोमवार को बरखेड़ा से शुरू हुई किसान क्रांति पैदल यात्रा मंगलवार को औबेदुल्लागंज, मंडीदीप और 11 मील होते हुए भोपाल पहुंची। रास्ते में कई जगह पुलिस ने किसानों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन किसान बैरिकेडिंग हटाते हुए आगे बढ़ते रहे।

    भोपाल में प्रवेश के बाद किसान हाथों में तिरंगा लेकर आगे बढ़े। इस दौरान वे लगातार ‘जय जवान-जय किसान’ के नारे लगाते रहे। किसानों के साथ ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य वाहनों का काफिला भी शहर में आगे बढ़ता रहा, लेकिन 11 मील बायपास पर पुलिस और किसानों के बीच बैरिकेडिंग को लेकर धक्का-मुक्की हुई। पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए बैरिकेड लगाए थे, लेकिन किसान बैरिकेड हटाकर आगे बढ़ गए। इसके बाद किसान 11 मील से मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच कर गए। किसानों के साथ ट्रैक्टर-ट्रॉली और अन्य वाहन भी चल रहे थे।

    भोपाल कूच में शामिल किसान लंबी लड़ाई की तैयारी के साथ पहुंचे हैं। वे ट्रैक्टर-ट्रॉली में सात दिन का राशन और पानी लेकर आए हैं। कई किसान दाल-बाटी भी बनाकर साथ लाए हैं। किसानों का कहना है कि मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा और वे किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं।

    मुख्यमंत्री ने अफसरों और कृषि मंत्री के साथ की बैठक

    किसान आंदोलन को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंगलवार देश शाम अपने निवास पर अधिकारियों और कृषि मंत्री के साथ बैठक की। बैठक में किसानों की मांगों और आंदोलन की स्थिति को लेकर चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली और जरूरी व्यवस्थाओं को लेकर निर्देश दिए।

  • सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक

    सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक


    नई दिल्ली। नीट पेपर लीक मामले को लेकर पिछले तीन सप्ताह से आंदोलन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और केंद्र सरकार के बीच शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की वार्ता किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। हालांकि CJP का दावा है कि सरकार ने उनकी तीन प्रमुख मांगों में से दो पर सकारात्मक रुख दिखाया है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सहमति नहीं बन पाई। इस मुद्दे पर सरकार ने शनिवार तक का समय मांगा है। अब दोनों पक्षों के बीच अगली बैठक शनिवार दोपहर करीब 12 बजे होगी।

    करीब 50 मिनट चली बैठक
    दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई बैठक लगभग 50 मिनट तक चली। CJP की ओर से प्रवक्ता सौरभ दास और आशुतोष रंका मौजूद रहे, जबकि सरकार का प्रतिनिधित्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने किया।

    इस्तीफे की मांग पर कायम CJP
    बैठक के बाद CJP प्रवक्ता सौरभ दास ने बताया कि मंत्रियों के साथ हुई चर्चा में सरकार उनकी तीन मांगों में से दो पर सकारात्मक नजर आई। उन्होंने कहा कि NEET की तैयारी के दौरान आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने और आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने के मुद्दे पर सरकार का रुख सकारात्मक रहा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर संगठन किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।

    दो मांगों पर मिली सैद्धांतिक सहमति
    CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका ने कहा कि सरकार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से जुड़े मुद्दे पर फैसला लेने के लिए शनिवार दोपहर तक का समय मांगा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार जल्द इस पर निर्णय लेगी। रंका के मुताबिक, सरकार ने दो मांगों पर सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इनमें आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर व अन्य कानूनी कार्रवाई वापस लेने का प्रस्ताव शामिल है।

    20 जुलाई को भी हुई थी बातचीत
    इससे पहले 20 जुलाई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के सरकारी आवास पर CJP प्रतिनिधियों और सरकार के बीच दो दौर की बैठक हुई थी, जिसमें भी सौरभ दास और आशुतोष रंका शामिल हुए थे। इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सरकार की ओर से प्रमुख मांगों पर आश्वासन मिलने के बाद 26 दिनों से जारी अपना अनशन समाप्त कर दिया था। इसके बाद शुक्रवार को कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के विठ्ठलभाई पटेल हाउस में दोनों पक्षों के बीच यह नई बैठक आयोजित की गई।

    आंदोलन जारी रखने का ऐलान
    CJP ने पहले ही सरकार के मंत्रियों के आवास या कार्यालय में वार्ता करने से इनकार कर दिया था और किसी तटस्थ स्थान पर बातचीत की मांग की थी। संगठन का कहना है कि जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा, जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते।

    संगठन की प्रमुख मांगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जवाबदेही तय करना, शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा तथा आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर और कानूनी कार्रवाई वापस लेना शामिल है।

  • Karnataka में राज्यसभा चुनाव के लिए मुसलमानों से मांग एक सीट…. बढ़ी कांग्रेस की टेंशन

    Karnataka में राज्यसभा चुनाव के लिए मुसलमानों से मांग एक सीट…. बढ़ी कांग्रेस की टेंशन


    नई दिल्ली।
    कर्नाटक (Karnataka) में आगामी राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha elections) को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य के मुस्लिम संगठनों (Muslim Organizations) के एक प्रमुख महासंघ ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी (Ruling Congress party) के सामने एक बड़ी मांग रख दी है। फेडरेशन ऑफ स्टेट मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन्स ने मंगलवार को कांग्रेस नेतृत्व से पुरजोर मांग की है कि वह कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव में कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार को आवंटित करे।

    कर्नाटक से राज्यसभा की चार सीटों के लिए आगामी 18 जून को मतदान होना है। राज्य विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या के बल पर यह साफ है कि इन चार में से 3 सीटों पर कांग्रेस की जीत तय है, जबकि 1 सीट भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के खाते में जाने की पूरी संभावना है।

    यह चुनाव उन चार मौजूदा सांसदों का कार्यकाल 25 जून को समाप्त होने के कारण हो रहा है, जो रिटायर हो रहे हैं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एचडी देवेगौड़ा, भाजपा से इरण कडाडी और नारायण कोरा गप्पा शामिल हैं।

    मुस्लिम महासंघ ने अपने बयान में कहा है, “चूंकि कांग्रेस पार्टी आसानी से तीन सीटें जीतने की स्थिति में है, इसलिए हमारी पुरजोर मांग है कि इन जीतने वाली सीटों में से कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि को दी जाए।” संगठन ने इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और केपीसीसी अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से इस मामले में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेने का आग्रह किया है।


    मुस्लिम संगठन ने जताई चिंता

    मुस्लिम संगठन ने राज्य से संसद में समुदाय के लगातार घटते प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर चिंता जताई है। आंकड़ों का हवाला देते हुए महासंघ ने कहा कि कर्नाटक से राज्यसभा के कुल 12 मौजूदा सदस्यों में से केवल एक सदस्य मुस्लिम समुदाय से है। अतीत में कर्नाटक से कांग्रेस के टिकट पर कम से कम दो मुस्लिम लोकसभा सांसद चुनकर दिल्ली जाते थे, लेकिन वर्तमान में राज्य से एक भी मुस्लिम लोकसभा सांसद नहीं है।

    कांग्रेस द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए जाने वाले लोकसभा टिकटों की संख्या भी घटकर अब सिर्फ एक रह गई है। महासंघ के अनुसार, “इन परिस्थितियों के कारण संसद में राज्य के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।”


    किस बात की दिलाई याद

    महासंघ ने कांग्रेस नेतृत्व को याद दिलाया कि कर्नाटक में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत से सत्ता में लाने में मुस्लिम समुदाय ने बेहद निर्णायक भूमिका निभाई थी। समुदाय ने एकजुट होकर और एकमुश्त तरीके से कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में मुस्लिमों ने सबसे अधिक अनुपात में कांग्रेस को वोट दिया, जो पार्टी की जीत का एक मुख्य आधार बना।

    महासंघ ने असंतोष जताते हुए कहा, “इतने भारी समर्थन के बावजूद राज्य कैबिनेट, नौकरशाही, प्रमुख सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और बोर्ड-निगमों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी और उनके द्वारा दिए गए समर्थन के मुकाबले बेहद कम है।” बयान में यह भी कहा गया कि समुदाय के भीतर अब यह धारणा घर करने लगी है कि कांग्रेस उन निर्वाचन क्षेत्रों में भी मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारने से हिचकती है, जहां जीत की संभावना सबसे ज्यादा होती है।


    राहुल गांधी के विचारों का दिया हवाला

    संगठन ने उम्मीद जताई है कि आगामी राज्यसभा चुनावों में इस कमी को दूर कर कांग्रेस नेतृत्व एक सकारात्मक संदेश दे सकता है। उन्होंने हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहुल गांधी ने पार्टी की अल्पसंख्यक शाखा को निर्देश दिए थे कि संगठन के भीतर मुस्लिम समुदाय की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाए।

    फेडरेशन ने कहा कि कर्नाटक की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को अपने शीर्ष नेतृत्व की इसी सोच और विचारधारा को मजबूत करते हुए राज्यसभा की एक सीट मुस्लिम उम्मीदवार को देनी चाहिए। अब देखना यह होगा कि दिल्ली और बेंगलुरु में बैठा कांग्रेस का आलाकमान इस मांग पर क्या फैसला लेता है।