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  • मच्छर को कैसे पता चलता है किस इंसान को काटना है IIT कानपुर की रिसर्च से खुलेगा राज

    मच्छर को कैसे पता चलता है किस इंसान को काटना है IIT कानपुर की रिसर्च से खुलेगा राज


    नई दिल्ली। बारिश और उमस के मौसम में मच्छरों की परेशानी बढ़ जाती है। अक्सर आपने भी महसूस किया होगा कि एक ही कमरे में कई लोग बैठे हों तो मच्छर किसी एक व्यक्ति के आसपास ज्यादा मंडराते हैं जबकि दूसरे व्यक्ति को लगभग छोड़ देते हैं। आखिर मच्छर किस आधार पर अपना शिकार चुनता है। क्या वह इंसानों के बीच अंतर कर सकता है। क्या शरीर की गंध उसे किसी खास व्यक्ति की तरफ खींचती है। इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए IIT कानपुर के वैज्ञानिक मच्छर के दिमाग और उसकी गंध पहचानने की क्षमता का अध्ययन कर रहे हैं।

    यह रिसर्च IIT कानपुर के मेहता फैमिली सेंटर फॉर इंजीनियरिंग इन मेडिसिन में प्रोफेसर नितिन गुप्ता की लैब में की जा रही है। वैज्ञानिक यह समझना चाहते हैं कि मच्छर इंसान के शरीर से निकलने वाली गंध को किस तरह पहचानता है। इसके बाद उस गंध से जुड़ी जानकारी उसके दिमाग तक कैसे पहुंचती है और मच्छर इसी सूचना के आधार पर किसी व्यक्ति की ओर जाने का फैसला कैसे करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य मच्छर के व्यवहार के पीछे काम करने वाली पूरी जैविक प्रक्रिया को समझना है।

    रिसर्च में खास तौर पर Aedes aegypti मच्छर पर ध्यान दिया जा रहा है। यह मच्छर डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक यह पता लगाना चाहते हैं कि कुछ लोग मच्छरों को ज्यादा आकर्षित क्यों करते हैं जबकि कुछ लोगों की ओर उनका आकर्षण अपेक्षाकृत कम होता है। इसके पीछे इंसान के शरीर से निकलने वाले अलग अलग रासायनिक संकेतों की भूमिका हो सकती है।

    इंसान के शरीर की गंध केवल पसीने से नहीं बनती। त्वचा पर रहने वाले सूक्ष्म जीव भी अलग अलग रसायन पैदा करते हैं और शरीर की कुल गंध को प्रभावित करते हैं। हर व्यक्ति की शरीर की गंध एक जैसी नहीं होती। यही अंतर मच्छरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन सी गंध मच्छर को इंसान की तरफ आकर्षित करती है और कौन से संकेत उसे किसी व्यक्ति से दूर कर सकते हैं।

    मच्छर के शरीर पर मौजूद विशेष सेंसर आसपास के रासायनिक संकेतों को पहचानते हैं। इन संकेतों की जानकारी उसके दिमाग तक पहुंचती है जहां गंध से जुड़ी सूचनाओं को प्रोसेस किया जाता है। वैज्ञानिक इसी कनेक्शन का अध्ययन कर रहे हैं। आसान भाषा में समझें तो शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि मच्छर क्या सूंघता है। उसका दिमाग उस गंध को कैसे समझता है और इसके बाद वह किस दिशा में उड़ने या इंसान के पास जाने का फैसला करता है।

    इस रिसर्च में CRISPR Cas9 जैसी जेनेटिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसकी मदद से मच्छर के कुछ खास जीन में बदलाव करके वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि उनका असर गंध पहचानने और मच्छर के व्यवहार पर किस तरह पड़ता है। इससे मच्छर की उस जैविक व्यवस्था को समझने में मदद मिल सकती है जिसके जरिए वह इंसान को खोजता है।

    अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मादा मच्छर के खून पीने के बाद होने वाले व्यवहारिक बदलाव को समझना भी है। मादा मच्छर को अंडे विकसित करने के लिए खून की जरूरत होती है। खून पीने के बाद उसकी प्राथमिकता बदल जाती है। इसके बाद वह इंसान की तलाश करने के बजाय अंडे देने के लिए उपयुक्त जगह खोजने पर अधिक ध्यान देती है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बदलाव के दौरान मच्छर के दिमाग में क्या परिवर्तन होता है।

    इस रिसर्च का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां बड़ी स्वास्थ्य चुनौती हैं। अगर वैज्ञानिक यह समझने में सफल होते हैं कि मच्छर इंसान तक पहुंचने के लिए किन गंधों और संकेतों का इस्तेमाल करता है तो भविष्य में ऐसे तरीके विकसित किए जा सकते हैं जो इन संकेतों को बदल दें या मच्छर की पहचान प्रक्रिया को बाधित करें। इससे केवल मच्छर को मारने या भगाने के बजाय उसकी इंसान तक पहुंचने की प्रक्रिया को ही निशाना बनाया जा सकेगा।

    IIT कानपुर की यह रिसर्च अभी मच्छर की गंध पहचानने की क्षमता और उसके दिमाग में होने वाली गतिविधियों को समझने पर केंद्रित है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस अध्ययन से मच्छर के व्यवहार की बेहतर समझ विकसित होगी और भविष्य में डेंगू चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए नए वैज्ञानिक उपाय खोजने में मदद मिल सकती है।

  • डेंगू मच्छर से बचाव के लिए बरसात में रखें विशेष सावधानी जानिए कैसे करें खुद और परिवार की सुरक्षा

    डेंगू मच्छर से बचाव के लिए बरसात में रखें विशेष सावधानी जानिए कैसे करें खुद और परिवार की सुरक्षा


    नई दिल्ली । बारिश का मौसम जहां गर्मी से राहत लेकर आता है वहीं कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। इनमें डेंगू सबसे गंभीर बीमारियों में से एक माना जाता है। हर साल मानसून के दौरान डेंगू के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इसका सबसे बड़ा कारण घरों और आसपास जमा होने वाला साफ पानी है जहां एडीज मच्छर आसानी से पनपता है। यही मच्छर डेंगू वायरस फैलाने का काम करता है। ऐसे में थोड़ी सी सतर्कता और सही आदतें अपनाकर इस बीमारी से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखा जा सकता है।

    डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर दिन के समय अधिक सक्रिय रहता है। यह सुबह और शाम के समय सबसे ज्यादा काटता है। इसलिए केवल रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी मच्छरों से बचाव करना जरूरी है। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें और बच्चों को भी फुल स्लीव्स के कपड़े पहनाएं ताकि मच्छरों के काटने का खतरा कम हो सके।

    घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। कूलर गमले टायर बाल्टी पानी की टंकी और पुराने बर्तनों में जमा पानी को नियमित रूप से खाली करें या बदलें। यदि पानी लंबे समय तक जमा रहेगा तो मच्छर तेजी से अंडे देंगे और उनकी संख्या बढ़ जाएगी। घर की छत बालकनी और आंगन की नियमित सफाई भी बेहद जरूरी है।

    मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें। साथ ही मच्छर भगाने वाली क्रीम स्प्रे या इलेक्ट्रिक वेपराइजर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाना भी एक प्रभावी उपाय माना जाता है जिससे मच्छर घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते।

    यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द शरीर और जोड़ों में तेज दर्द कमजोरी या त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई दें तो इसे सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज न करें। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और आवश्यक जांच कराएं। शुरुआती पहचान और समय पर इलाज से डेंगू के गंभीर खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    डेंगू होने पर पर्याप्त मात्रा में पानी नारियल पानी नींबू पानी और अन्य तरल पदार्थ लेते रहना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दर्द निवारक दवा लेने से बचें क्योंकि कुछ दवाएं रक्तस्राव का खतरा बढ़ा सकती हैं। केवल चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही दवा का सेवन करें।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों को पनपने से रोकना है। यदि हर व्यक्ति अपने घर और आसपास सफाई बनाए रखे तथा पानी जमा न होने दे तो डेंगू के मामलों में बड़ी कमी लाई जा सकती है। बरसात के मौसम में थोड़ी सी जागरूकता और नियमित सावधानी न केवल आपको बल्कि पूरे समाज को इस खतरनाक बीमारी से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • क्या अब डेंगू से नहीं जाएगी जान भारत की पहली QDENGA वैक्सीन पर जानिए कैसे करती है काम और कितनी है प्रभावी

    क्या अब डेंगू से नहीं जाएगी जान भारत की पहली QDENGA वैक्सीन पर जानिए कैसे करती है काम और कितनी है प्रभावी


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम अपने साथ राहत लेकर आता है लेकिन इसी दौरान डेंगू जैसी गंभीर बीमारी का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। हर वर्ष लाखों लोग डेंगू की चपेट में आते हैं और कई मरीजों की जान भी चली जाती है। ऐसे समय में भारत के लिए बड़ी राहत की खबर यह है कि देश में पहली बार डेंगू से बचाव के लिए QDENGA वैक्सीन को मंजूरी मिल गई है। विशेषज्ञ इसे डेंगू के खिलाफ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहे हैं क्योंकि यह बीमारी के गंभीर रूप और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को काफी हद तक कम करने की क्षमता रखती है।

    QDENGA जापान की दवा कंपनी टाकेडा द्वारा विकसित एक लाइव एटेन्यूएटेड वैक्सीन है। इसमें डेंगू वायरस के कमजोर स्वरूप का उपयोग किया जाता है ताकि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचानकर उसके खिलाफ सुरक्षा विकसित कर सके। बाद में यदि वास्तविक डेंगू वायरस शरीर पर हमला करता है तो प्रतिरक्षा तंत्र तेजी से सक्रिय होकर गंभीर संक्रमण की आशंका को कम करने में मदद करता है।

    इस वैक्सीन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह डेंगू वायरस के चारों प्रमुख प्रकारों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से विकसित की गई है। पहले उपलब्ध कुछ वैक्सीन में टीकाकरण से पहले यह जांच जरूरी होती थी कि व्यक्ति को पहले डेंगू हुआ है या नहीं। लेकिन QDENGA के लिए ऐसी जांच आवश्यक नहीं है जिससे बड़े स्तर पर टीकाकरण करना अधिक आसान हो सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह वैक्सीन 6 वर्ष से 60 वर्ष तक की आयु के लोगों के लिए उपयुक्त मानी गई है। इसे दो डोज में लगाया जाता है और दोनों डोज के बीच लगभग तीन महीने का अंतर रखा जाता है। पहली डोज शरीर में प्रारंभिक प्रतिरक्षा तैयार करती है जबकि दूसरी डोज लंबे समय तक सुरक्षा को मजबूत बनाती है।

    क्लिनिकल परीक्षणों में इस वैक्सीन के उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। अध्ययनों के अनुसार इससे डेंगू के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा लगभग 84 प्रतिशत तक कम देखा गया जबकि संक्रमण का जोखिम भी काफी हद तक घटा। हालांकि यह वैक्सीन संक्रमण की पूरी तरह गारंटी नहीं देती लेकिन गंभीर बीमारी और मृत्यु के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    भारत में इसकी कीमत का आधिकारिक ऐलान अभी नहीं हुआ है लेकिन शुरुआती अनुमान के अनुसार इसकी एक डोज की कीमत लगभग चार से पांच हजार रुपये के बीच हो सकती है। शुरुआत में यह निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में उपलब्ध होने की संभावना है। भविष्य में इसे सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा या नहीं इस पर निर्णय बाद में लिया जाएगा।

    अच्छी बात यह भी है कि भारत की दवा कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज के साथ हुए समझौते के तहत भविष्य में इस वैक्सीन का निर्माण भारत में भी किया जाएगा। इससे इसकी उपलब्धता बढ़ने और कीमत कम होने की संभावना जताई जा रही है।

    हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि केवल वैक्सीन ही डेंगू की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है। मच्छरों की रोकथाम साफ सफाई घर और आसपास पानी जमा न होने देना पूरी बाजू के कपड़े पहनना मच्छरदानी और रिपेलेंट का उपयोग करना तथा बुखार आने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना आज भी उतना ही जरूरी है।

    डेंगू के खिलाफ यह वैक्सीन भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर है लेकिन इसके साथ जागरूकता और बचाव के उपाय अपनाना भी आवश्यक है। यदि टीकाकरण और मच्छर नियंत्रण दोनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाए तो आने वाले वर्षों में डेंगू से होने वाले गंभीर मामलों और मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।