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  • फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों के लिए जरूरी खबर, SBI ने छोटी अवधि की बल्क एफडी पर ब्याज दरें घटाईं

    फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों के लिए जरूरी खबर, SBI ने छोटी अवधि की बल्क एफडी पर ब्याज दरें घटाईं

    नई दिल्ली ।स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी घरेलू बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट की कुछ अवधि वाली ब्याज दरों में बदलाव किया है। बैंक ने 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की जमा राशि वाली चुनिंदा बल्क टर्म डिपॉजिट पर ब्याज दरों में कटौती की है। नई दरें 15 अगस्त 2026 से लागू हो गई हैं। यह बदलाव मुख्य रूप से कम अवधि वाली बल्क एफडी पर किया गया है, जबकि लंबी अवधि की कई जमाओं की दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

    बैंक की ओर से किए गए बदलाव के तहत 7 दिन से 179 दिन की अवधि वाली बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट की कमी की गई है। इसके अलावा 180 दिन से 210 दिन की अवधि वाली जमा पर ब्याज दर में 10 बेसिस प्वाइंट की कटौती की गई है। इससे इन अवधि में बड़ी राशि एफडी के रूप में रखने वाले ग्राहकों को पहले की तुलना में कम ब्याज मिलेगा।

    हालांकि 211 दिन से लेकर 10 साल तक की अवधि वाली 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट की ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। बैंक की नई बल्क एफडी दरें अलग-अलग अवधि के आधार पर 5.25 प्रतिशत से 6.50 प्रतिशत के बीच हैं। इसलिए बड़ी राशि को कम अवधि के लिए एफडी में लगाने वाले निवेशकों के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

    बल्क एफडी में किया गया यह बदलाव सामान्य एफडी ग्राहकों पर लागू नहीं होता। 3 करोड़ रुपये से कम की घरेलू जमा राशि पर बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। इसका मतलब है कि सामान्य ग्राहक जिनकी एफडी राशि इस सीमा से कम है, उनके मौजूदा ब्याज ढांचे पर इस फैसले का सीधा असर नहीं पड़ेगा।

    सामान्य एफडी में आम नागरिकों को अलग-अलग अवधि के आधार पर 3.05 प्रतिशत से 6.40 प्रतिशत तक ब्याज मिलता है। वहीं वरिष्ठ नागरिकों के लिए ब्याज दरें सामान्य ग्राहकों की तुलना में अधिक हैं। वरिष्ठ नागरिकों को अवधि के अनुसार 3.55 प्रतिशत से 7.05 प्रतिशत तक ब्याज मिल रहा है। इस वजह से कम राशि वाली नियमित एफडी करने वाले ग्राहकों के लिए मौजूदा दरों में तत्काल कोई बदलाव नहीं हुआ है।

    बल्क फिक्स्ड डिपॉजिट और सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट के बीच राशि की सीमा महत्वपूर्ण होती है। बड़ी राशि जमा करने वाले ग्राहकों के लिए बैंक अलग दरें निर्धारित कर सकता है। ऐसे में निवेश से पहले संबंधित अवधि और लागू ब्याज दर को देखना जरूरी होता है। खास तौर पर छोटी अवधि की एफडी में मामूली दर बदलाव भी बड़ी जमा राशि पर मिलने वाले कुल ब्याज को प्रभावित कर सकता है।

    एफडी को आमतौर पर निश्चित रिटर्न वाले निवेश विकल्प के रूप में देखा जाता है। ब्याज दर पहले से तय होने के कारण निवेशक को मैच्योरिटी तक संभावित रिटर्न का अनुमान लगाने में आसानी होती है। हालांकि अलग-अलग अवधि के लिए ब्याज दर अलग होती है और समय से पहले एफडी तोड़ने पर लागू नियमों के अनुसार ब्याज या जुर्माने में बदलाव हो सकता है।

    SBI की नई दरों का असर मुख्य रूप से उन ग्राहकों पर पड़ेगा जो 3 करोड़ रुपये या उससे अधिक की राशि को छोटी अवधि की घरेलू बल्क टर्म डिपॉजिट में रखने की योजना बना रहे हैं। ऐसे निवेशकों के लिए एफडी बुक करने से पहले नई दरों और अवधि की तुलना करना उपयोगी होगा।

    वहीं सामान्य ग्राहकों और 3 करोड़ रुपये से कम की जमा राशि रखने वालों के लिए इस बदलाव से राहत है, क्योंकि उनकी एफडी दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी मौजूदा नियमित एफडी दरें जारी हैं। इसलिए निवेशकों को अपनी जमा राशि, निवेश अवधि और लागू ब्याज दर के आधार पर फैसला लेना चाहिए।

  • PhonePe का बड़ा ऐलान, एक ही ऐप पर खुलेगी एफडी और 100 रुपये रोजाना से शुरू होगी डिजिटल आरडी

    PhonePe का बड़ा ऐलान, एक ही ऐप पर खुलेगी एफडी और 100 रुपये रोजाना से शुरू होगी डिजिटल आरडी


    नई दिल्ली ।
    डिजिटल भुगतान और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करते हुए फोनपे ने अपने प्लेटफॉर्म पर फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) डिस्ट्रीब्यूशन सेवा शुरू कर दी है। इस नई सुविधा के जरिए अब ग्राहक सीधे फोनपे ऐप पर विभिन्न बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों की एफडी योजनाओं की तुलना कर निवेश कर सकेंगे। इसके साथ ही कंपनी ने शिवालिक स्मॉल फाइनेंस बैंक के सहयोग से एक नया डिजिटल माइक्रो-सेविंग्स प्रोडक्ट ‘डेली रिकरिंग डिपॉजिट (डेली आरडी)’ भी लॉन्च किया है, जिसमें केवल 100 रुपये प्रतिदिन से बचत शुरू की जा सकती है।

    नई सुविधा का उद्देश्य निवेश प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और आसान बनाना है। अब ग्राहकों को अलग-अलग बैंकों की वेबसाइट या शाखाओं में जाने की आवश्यकता नहीं होगी। वे एक ही ऐप पर उपलब्ध विभिन्न एफडी विकल्पों की तुलना कर अपनी जरूरत और निवेश अवधि के अनुसार उपयुक्त योजना चुन सकेंगे। इससे निवेश की प्रक्रिया तेज, सुविधाजनक और अधिक पारदर्शी बनने की उम्मीद है।

    फोनपे के अनुसार, ऐप के माध्यम से खोली गई एफडी पर भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के तहत डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीआईसीजीसी) की व्यवस्था के अनुसार पात्र जमा राशि पर 5 लाख रुपये तक का बीमा कवर भी मिलेगा। इसके अलावा उपयोगकर्ता एक ही प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग बैंकों की एफडी को आसानी से ट्रैक और प्रबंधित कर सकेंगे।

    कंपनी ने छोटे निवेशकों, युवाओं, मिलेनियल्स, जेन-जी और नियमित बचत की आदत विकसित करने वाले ग्राहकों को ध्यान में रखते हुए डेली आरडी की शुरुआत की है। इस योजना में प्रतिदिन 100 रुपये से लेकर 1,000 रुपये तक का निवेश किया जा सकता है। यह सुविधा यूपीआई ऑटोपे आधारित है, जिससे तय राशि स्वतः निवेश होती रहेगी और ग्राहकों को बार-बार भुगतान करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

    डेली आरडी की एक विशेषता यह भी है कि निवेशक जरूरत पड़ने पर केवल सात दिन बाद ही अपनी जमा राशि निकाल सकते हैं। यदि कोई ग्राहक लगातार 15 दिनों तक निवेश नहीं कर पाता है, तब भी उस पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा। साथ ही, वह किसी भी समय अपना यूपीआई ऑटोपे मैंडेट बंद करने का विकल्प भी चुन सकता है। इससे यह योजना लचीली और उपयोगकर्ता के अनुकूल बनती है।

    फोनपे का कहना है कि उसका उद्देश्य देश के अधिक से अधिक लोगों तक सुरक्षित और सरल डिजिटल निवेश सुविधाएं पहुंचाना है। कंपनी का मानना है कि फिक्स्ड डिपॉजिट लंबे समय से भारतीय परिवारों की पसंदीदा बचत योजना रही है और अब इसे पूरी तरह डिजिटल बनाकर निवेशकों को बेहतर अनुभव उपलब्ध कराया जाएगा।

    एफडी या डेली आरडी शुरू करने के लिए ग्राहक फोनपे ऐप के होम स्क्रीन पर उपलब्ध “म्यूचुअल फंड्स एंड डिपॉजिट” सेक्शन में जाकर अपनी पसंद का विकल्प चुन सकते हैं। यहां सात दिन से लेकर दस वर्ष तक की अवधि वाली एफडी उपलब्ध होगी। निवेश प्रक्रिया के दौरान पैन और आधार के माध्यम से डिजिटल सत्यापन, नॉमिनी जोड़ने तथा यूपीआई या नेट बैंकिंग के जरिए भुगतान की सुविधा भी मिलेगी। कंपनी का कहना है कि जरूरत पड़ने पर निवेश की गई राशि को निर्धारित नियमों के अनुसार समय से पहले भी निकाला जा सकेगा।

  • RBI के नए FD नियम 1 अक्टूबर से लागू, अब हर बैंक शाखा में समान जमा पर मिलेगा एक जैसा ब्याज

    RBI के नए FD नियम 1 अक्टूबर से लागू, अब हर बैंक शाखा में समान जमा पर मिलेगा एक जैसा ब्याज

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक ने फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए बैंकिंग व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नए नियम 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे। इनके लागू होने के बाद एक ही बैंक की अलग-अलग शाखाओं में समान अवधि और समान राशि की फिक्स्ड डिपॉजिट पर अलग-अलग ब्याज दर देने की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। इससे ग्राहकों को बैंक की किसी भी शाखा में समान शर्तों पर एक जैसा ब्याज मिलने का अधिकार मिलेगा।

    RBI के नए निर्देश सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के साथ-साथ स्मॉल फाइनेंस बैंक, रीजनल रूरल बैंक, लोकल एरिया बैंक, पेमेंट बैंक और शहरी सहकारी बैंकों पर भी लागू होंगे। इसका उद्देश्य देशभर में जमा योजनाओं को अधिक पारदर्शी बनाना और ग्राहकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना है। इससे बैंकिंग प्रणाली में एकरूपता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

    नए नियमों के अनुसार यदि कोई ग्राहक किसी बैंक की किसी भी शाखा में समान दिन, समान अवधि और समान राशि की फिक्स्ड डिपॉजिट कराता है तो उस पर मिलने वाली ब्याज दर पूरे बैंक नेटवर्क में एक जैसी होगी। केवल शाखा बदलने के आधार पर ब्याज दर में अंतर नहीं रखा जा सकेगा। इससे ग्राहकों को बेहतर स्पष्टता मिलेगी और शाखा के अनुसार ब्याज दरों में अंतर की स्थिति समाप्त होगी।

    RBI ने बैंकों के लिए ब्याज दरों की जानकारी सार्वजनिक करना भी अनिवार्य किया है। अब सभी बैंक अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट योजनाओं की ब्याज दरों का विवरण पहले से अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराएंगे। इससे ग्राहक निवेश का निर्णय लेने से पहले विभिन्न अवधि की ब्याज दरों की आसानी से तुलना कर सकेंगे। यह व्यवस्था बैंकिंग सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ग्राहकों के विश्वास को भी मजबूत करेगी।

    बल्क डिपॉजिट से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया गया है। बैंकों को प्रत्येक कार्यदिवस सुबह निर्धारित समय तक अपनी वेबसाइट पर बल्क डिपॉजिट की ब्याज दरें अपडेट करनी होंगी। इससे बड़े निवेशकों को रोजाना उपलब्ध दरों की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी और निवेश संबंधी निर्णय अधिक जानकारी के आधार पर लिए जा सकेंगे।

    RBI ने बल्क डिपॉजिट और रुपये में किए गए एनआरआई डिपॉजिट के मामले में बैंकों को कुछ परिचालन संबंधी लचीलापन भी दिया है। बैंक अपनी तरलता की आवश्यकता, फंडिंग लागत और नियामकीय मानकों को ध्यान में रखते हुए इन श्रेणियों में ब्याज दर तय कर सकेंगे। हालांकि यह छूट केवल निर्धारित श्रेणियों तक सीमित रहेगी और सामान्य खुदरा ग्राहकों के लिए समान FD पर समान ब्याज का नियम प्रभावी रहेगा।

    महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नए नियमों का अर्थ यह नहीं है कि 1 अक्टूबर से सभी बैंकों की फिक्स्ड डिपॉजिट ब्याज दरें स्वतः बढ़ या घट जाएंगी। RBI ने केवल ब्याज निर्धारण की प्रक्रिया और पारदर्शिता से जुड़े नियमों में बदलाव किया है। ब्याज दरें तय करने का अधिकार पहले की तरह बैंकों के पास ही रहेगा और वे अपनी वित्तीय स्थिति, बाजार की परिस्थितियों तथा धन जुटाने की लागत के आधार पर दरों में परिवर्तन कर सकेंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों से ग्राहकों के लिए बैंकिंग सेवाएं अधिक स्पष्ट और भरोसेमंद बनेंगी। समान जमा पर समान ब्याज मिलने, ब्याज दरों की सार्वजनिक उपलब्धता और अलग-अलग शाखाओं के बीच असमानता समाप्त होने से निवेशकों को बेहतर निर्णय लेने में सुविधा होगी। इससे बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी और फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा।

  • चार वर्षों में न्यूनतम बैलेंस शुल्क से बैंकों ने वसूले 26,170 करोड़ रुपये, संसद में सरकार ने साझा किए आंकड़े

    चार वर्षों में न्यूनतम बैलेंस शुल्क से बैंकों ने वसूले 26,170 करोड़ रुपये, संसद में सरकार ने साझा किए आंकड़े

    नई दिल्ली । खातों में न्यूनतम औसत शेष राशि बनाए नहीं रखने पर ग्राहकों से वसूले जाने वाले शुल्क को लेकर सरकार ने संसद में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। सरकार के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से वित्त वर्ष 2026 के बीच देश के बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर ग्राहकों से कुल 26,170 करोड़ रुपये से अधिक की राशि शुल्क के रूप में वसूली है। यह जानकारी राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा दिए गए लिखित उत्तर में सामने आई।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में निजी क्षेत्र के बैंकों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में कहीं अधिक न्यूनतम बैलेंस शुल्क वसूला। केवल वित्त वर्ष 2026 की बात करें तो बैंकों ने कुल 7,086.63 करोड़ रुपये का न्यूनतम बैलेंस शुल्क एकत्र किया। इसमें निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी 4,948.71 करोड़ रुपये रही, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 2,137.92 करोड़ रुपये वसूले।

    आंकड़ों के मुताबिक, निजी क्षेत्र के बैंकों में एचडीएफसी बैंक ने वित्त वर्ष 2026 के दौरान सबसे अधिक 1,798.14 करोड़ रुपये न्यूनतम बैलेंस शुल्क के रूप में वसूले। इसके बाद एक्सिस बैंक का स्थान रहा, जिसने 1,081.33 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। दोनों बैंकों की संयुक्त हिस्सेदारी निजी क्षेत्र के कुल न्यूनतम बैलेंस शुल्क का लगभग 58 प्रतिशत रही।

    अन्य निजी बैंकों में आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, यस बैंक और आईडीबीआई बैंक ने भी इस मद में उल्लेखनीय राशि वसूली। दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक सबसे आगे रहा, जिसने 477.27 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन बैंक का स्थान रहा।

    हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बताई गई राशि केवल चालू खातों से संबंधित है। बैंक ने मार्च 2020 से बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर लगने वाली पेनाल्टी समाप्त कर दी थी। इस कारण बचत खाताधारकों पर यह शुल्क लागू नहीं होता।

    सरकार ने यह भी बताया कि हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश बैंकों ने बचत खातों पर न्यूनतम औसत बैलेंस बनाए रखने की अनिवार्यता को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से 10 बैंकों ने बचत खातों पर यह शुल्क पूरी तरह खत्म कर दिया है, जबकि शेष दो बैंकों ने अपनी नीतियों के अनुरूप इसे सीमित और तर्कसंगत बनाया है।

    वित्त मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट और प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खोले गए खाते न्यूनतम बैलेंस रखने की अनिवार्यता से पूरी तरह मुक्त हैं। ऐसे खातों पर न्यूनतम बैलेंस नहीं होने की स्थिति में किसी प्रकार का जुर्माना नहीं लगाया जाता। वर्तमान में देश में लगभग 73 करोड़ ऐसे खाते संचालित हैं, जिनके खाताधारकों को इस नियम से राहत प्राप्त है।

    सरकार की ओर से साझा किए गए ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब बैंकिंग सेवाओं की लागत, ग्राहकों के अधिकारों और बैंकिंग शुल्कों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। आने वाले समय में न्यूनतम बैलेंस संबंधी नियमों और शुल्क व्यवस्था पर भी नीति स्तर पर नजर बनी रह सकती है।

  • आरबीआई की विशेष योजना से विदेशी मुद्रा प्रवाह मजबूत, एफसीएनआर (बी) जमा में सार्वजनिक बैंकों की अहम भूमिका

    आरबीआई की विशेष योजना से विदेशी मुद्रा प्रवाह मजबूत, एफसीएनआर (बी) जमा में सार्वजनिक बैंकों की अहम भूमिका

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष जमा योजना के तहत विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) यानी एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिल रही है। हालिया आकलनों के अनुसार, केवल 45 दिनों के भीतर इन जमाओं का स्तर वर्ष 2013 में दर्ज 26 अरब डॉलर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पार कर चुका है। मौजूदा रुझानों को देखते हुए सितंबर के अंत तक एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट 65 से 70 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जबकि कुल जमा 80 से 85 अरब डॉलर के दायरे में रह सकती है।

    17 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग 20 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह दर्ज किया गया है। इसमें 17.4 अरब डॉलर का योगदान केवल एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट से आया है। यह संकेत देता है कि विशेष योजना को प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा निवेशकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि जमा में आई यह तेजी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, अगस्त और सितंबर 2026 के दौरान परिपक्व होने वाली बड़ी संख्या में मौजूदा एफसीएनआर (बी) जमाओं का नवीनीकरण होने की संभावना है। विशेष योजना के तहत उपलब्ध अपेक्षाकृत अधिक ब्याज दरें जमाकर्ताओं को अपनी राशि दोबारा निवेश करने के लिए आकर्षित कर सकती हैं। इससे कुल जमा राशि में और वृद्धि होने की उम्मीद है।

    रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि मौजूदा आधारभूत अनुमान के अतिरिक्त लगभग 10 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी भी देश में आ सकती है। यह अतिरिक्त निवेश मुख्य रूप से उन देशों से आने की संभावना है जहां कर संबंधी रियायतें उपलब्ध हैं और प्रवासी भारतीयों की अच्छी संख्या मौजूद है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो विदेशी मुद्रा प्रवाह अपेक्षा से अधिक मजबूत हो सकता है।

    एफसीएनआर (बी) जमा अभियान को आगे बढ़ाने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन बैंकों ने न केवल अपने व्यापक ग्राहक आधार का लाभ उठाया है, बल्कि विभिन्न देशों में रहने वाले भरोसेमंद और उच्च साख वाले ग्राहकों के साथ लंबे समय से बने संबंधों का भी प्रभावी उपयोग किया है। इसके साथ ही ऑनशोर और ऑफशोर बैंकिंग रणनीतियों के संतुलित उपयोग ने भी पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को गति दी है।

    हालांकि मजबूत पूंजी प्रवाह के बावजूद विदेशी मुद्रा बाजार में कुछ सवाल भी बने हुए हैं। वित्तीय बाजारों में यह चर्चा जारी है कि इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने के बाद भी रुपये पर दबाव क्यों बना हुआ है और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की स्थिति पर इसका वास्तविक प्रभाव किस प्रकार दिखाई देगा। यह विषय आने वाले समय में नीति निर्माताओं और बाजार विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण बना रह सकता है।

    विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप पूरी तरह नियमित नहीं रहा। इसके बावजूद यह आवश्यक माना गया है कि रुपये की मूलभूत मजबूती को बनाए रखा जाए, ताकि वह वैश्विक आर्थिक झटकों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके और भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर प्रतिकूल असर न पड़े। वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ते तनाव और असंतुलित पूंजी प्रवाह के दौर में विदेशी मुद्रा प्रबंधन और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

  • एनआरआई और एफसीएनआर-बी जमा से बैंकों को मिलेगा सहारा, रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मजबूत डिपॉजिट ग्रोथ का अनुमान

    एनआरआई और एफसीएनआर-बी जमा से बैंकों को मिलेगा सहारा, रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मजबूत डिपॉजिट ग्रोथ का अनुमान

    नई दिल्ली । देश के बैंकिंग क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2026-27 सकारात्मक रहने की उम्मीद जताई गई है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, गैर-निवासी भारतीयों (एनआरआई) से आने वाले निवेश और एफसीएनआर-बी जमा में बढ़ोतरी के कारण बैंकों की डिपॉजिट वृद्धि दर लगभग 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जमा राशि में सुधार के साथ-साथ ऋण वितरण की रफ्तार भी मजबूत बनी रहेगी, जिससे बैंकिंग प्रणाली की स्थिति और अधिक संतुलित हो सकती है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, एफसीएनआर-बी जमा योजनाओं के माध्यम से अब तक लगभग 13 से 14 अरब डॉलर की राशि बैंकिंग प्रणाली में आई है। इस पूंजी प्रवाह ने चालू वित्त वर्ष के दौरान बैंकों के जमा आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो आगामी वित्त वर्ष में भी बैंकिंग क्षेत्र को पर्याप्त वित्तीय मजबूती मिलेगी और जमा संग्रहण में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलेगा।

    हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि वित्त वर्ष 2023 से जो रुझान देखने को मिल रहा है, उसके अनुसार क्रेडिट ग्रोथ अभी भी डिपॉजिट ग्रोथ से अधिक बनी हुई है। जून के अंत तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बैंक ऋण में सालाना आधार पर 18.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि कुल जमा में 13.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इससे क्रेडिट और डिपॉजिट के बीच का अंतर बढ़कर 5.3 प्रतिशत अंक तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतर अस्थायी नहीं बल्कि महामारी के बाद बैंकिंग व्यवहार और वित्तीय प्राथमिकताओं में आए संरचनात्मक बदलाव का परिणाम है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़े महानगरों में पारंपरिक जमा बाजार अब काफी हद तक संतृप्त हो चुके हैं। ऐसे में बैंक अब अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ाकर जमा आधार मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं। इन क्षेत्रों में परिवारों की आय में वृद्धि, महिलाओं को केंद्र में रखकर संचालित कल्याणकारी योजनाएं और बैंकिंग सेवाओं का विस्तार जमा वृद्धि के प्रमुख कारण बताए गए हैं। इससे भविष्य में ग्रामीण और छोटे शहरों की भूमिका बैंकिंग क्षेत्र में और महत्वपूर्ण हो सकती है।

    दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में निवेशकों का रुझान बैंक जमा से हटकर म्यूचुअल फंड, इक्विटी और अन्य बाजार आधारित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। इसके कारण पारंपरिक बैंक जमा में घरेलू बचत का हिस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा है। इसके बावजूद एनआरआई जमा और अन्य संस्थागत स्रोत बैंकिंग प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण सहारा बने हुए हैं।

    रिपोर्ट में ऋण वितरण के बदलते स्वरूप का भी उल्लेख किया गया है। बिना गारंटी वाले व्यक्तिगत ऋणों पर नियामकीय सख्ती के बाद बैंक अब उद्योग, बुनियादी ढांचा, कार्यशील पूंजी और स्वर्ण आभूषण के बदले दिए जाने वाले ऋण जैसे क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इससे ऋण पोर्टफोलियो में विविधता बढ़ी है और जोखिम प्रबंधन को भी मजबूती मिली है।

    रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियां बैंकिंग क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन भारतीय बैंक फिलहाल मजबूत पूंजी आधार, पर्याप्त कैपिटल एडिक्वेसी और कम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के कारण अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। खपत में बढ़ोतरी और पूंजीगत निवेश के समर्थन से आने वाले समय में भी क्रेडिट ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद है, जबकि बैंक बैलेंस शीट अनुशासन बनाए रखते हुए वित्तीय स्थिरता को और मजबूत कर सकते हैं।

  • HDFC बैंक की पहली तिमाही शानदार, डिपॉजिट और लोन में दोहरे अंक की बढ़ोतरी, कारोबार ने पकड़ी मजबूत रफ्तार

    HDFC बैंक की पहली तिमाही शानदार, डिपॉजिट और लोन में दोहरे अंक की बढ़ोतरी, कारोबार ने पकड़ी मजबूत रफ्तार

    नई दिल्ली । देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंकों में शामिल एचडीएफसी बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मजबूत कारोबारी प्रदर्शन दर्ज किया है। अप्रैल से जून 2026 की अवधि के दौरान बैंक ने जमा राशि और कर्ज वितरण दोनों में दोहरे अंक की वृद्धि हासिल की। बैंक की ओर से जारी तिमाही कारोबारी अपडेट के अनुसार विभिन्न प्रमुख वित्तीय संकेतकों में लगातार मजबूती देखने को मिली है, जो बैंक के विस्तार और ग्राहक आधार में बढ़ोतरी का संकेत देती है।

    बैंक के आंकड़ों के अनुसार 30 जून 2026 तक कुल जमा राशि बढ़कर 31.70 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 14.7 प्रतिशत अधिक है। इस दौरान टर्म डिपॉजिट में सबसे अधिक मजबूती देखने को मिली और यह 17 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि के साथ 21.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं करंट अकाउंट और सेविंग अकाउंट (CASA) जमा भी लगभग 9 प्रतिशत बढ़कर 10.25 लाख करोड़ रुपये हो गया।

    कर्ज वितरण के मोर्चे पर भी बैंक का प्रदर्शन मजबूत रहा। पहली तिमाही के अंत तक कुल ग्रॉस एडवांस 30.61 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 15.4 प्रतिशत अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि खुदरा और कॉरपोरेट दोनों वर्गों में ऋण की मांग बनी हुई है तथा बैंक ने अपने ऋण पोर्टफोलियो का लगातार विस्तार किया है।

    बैंक के एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। जून तिमाही के अंत तक यह आंकड़ा 31.27 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 12.4 प्रतिशत अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि जमा और ऋण दोनों में संतुलित वृद्धि बैंक की वित्तीय स्थिति को और मजबूत बनाती है तथा भविष्य की विकास संभावनाओं को भी बेहतर करती है।

    हालांकि मजबूत कारोबारी प्रदर्शन के बीच बैंक हाल के महीनों में कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर भी चर्चा में रहा है। इस वर्ष बैंक के तत्कालीन पार्ट-टाइम चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद अंतरिम व्यवस्था के तहत नेतृत्व में बदलाव किया गया और बाद में केंद्र सरकार के पूर्व वित्त सचिव राजीव कुमार को तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए बैंक का नया पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त किया गया।

    इसी अवधि में बैंक के शीर्ष प्रबंधन और गवर्नेंस प्रक्रियाओं को लेकर भी विभिन्न स्तरों पर चर्चा हुई, लेकिन बैंक ने अपने नियमित कारोबारी संचालन को प्रभावित नहीं होने दिया। पहली तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि बैंक की मुख्य बैंकिंग गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं और ग्राहकों का भरोसा कायम है।

    शेयर बाजार में भी बैंक के शेयर ने सकारात्मक प्रदर्शन दर्ज किया। सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में एचडीएफसी बैंक का शेयर बढ़त के साथ बंद हुआ। हालांकि पिछले छह महीनों में इसमें सीमित गिरावट देखने को मिली, लेकिन बीते एक वर्ष के दौरान शेयर ने उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मजबूत कारोबारी वृद्धि और स्थिर वित्तीय प्रदर्शन आने वाले समय में बैंक की संभावनाओं को और मजबूती प्रदान कर सकते हैं।