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  • रूस के भीषण मिसाइल हमलों से यूक्रेन में मची तबाही…. 33 लोगों की मौत

    रूस के भीषण मिसाइल हमलों से यूक्रेन में मची तबाही…. 33 लोगों की मौत


    कीव।
    रूस- यूक्रन (Russia-Ukraine War) के बीच जंग जारी है। दोनों देश एक दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। इस बीच पूर्वी यूक्रेन (Ukraine) में रूस (Russia) की ओर से किए गए हवाई हमलों में 33 लोगों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि इस घटना 18 अन्य घायल हो गए। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की (President Volodymyr Zelenskyy) ने सोशल मीडिया पर यह जानकारी दी। गुरुवार सुबह क्रामाटोर्स्क शहर में एक सामान्य सार्वजनिक बस स्टॉप को निशाना बनाया गया, जिसमें 12 लोगों की जान चली गयी। बता दें कि रूस ने सर्दियों की शुरुआत से पहले यूक्रेन पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे राजधानी कीव में बिजली संकट गहरा गया है।

    क्षेत्रीय सैन्य प्रशासन के प्रमुख वादिम फिलाश्किन ने कहा कि दोनेत्स्क क्षेत्र के क्रामातोर्स्क और स्लोवियांस्क में सुरक्षा की स्थिति में तेजी से आई गिरावट के कारण सार्वजनिक परिवहन रोक दिया गया है। फिलाश्किन ने रूस पर नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में हमें यात्रियों और चालकों की जान जोखिम में डालने का कोई अधिकार नहीं है। क्रामातोर्स्क और स्लोवियांस्क के निवासियों की सुरक्षा सबसे अहम है।

    बता दें कि रूस ने इससे एक दिन पहले पूर्वी यूक्रेन के प्राइलुकी में मिसाइल हमले किए थे, जिनमें पांच बच्चों समेत 22 लोगों की मौत हो गई थी और 54 अन्य घायल हो गए थे। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा कि जैसे-जैसे सर्दी नजदीक आ रही है, रूस की ओर से रोजाना किए जाने वाले मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़ सकते हैं। उन्होंने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के सदस्य देशों से अतिरिक्त रक्षा सहायता की अपील की।

    यूक्रेनी नेतृत्व ने रूसी अपराधों के खिलाफ आवाज उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों का आभार व्यक्त किया है। यह भी कहा गया कि केवल शाब्दिक समर्थन काफी नहीं है और इसे तत्काल नये सैन्य रक्षा पैकेजों के रूप में जमीनी स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। एंटी-बैलिस्टिक क्षमताओं की आपूर्ति, लड़ाकू विमानों के लिए गोला-बारूद और इंटरसेप्टर तकनीक में निवेश प्रतिदिन निर्दोष नागरिकों की जान बचाने में सीधे तौर पर मददगार साबित हो रहा है।

  • नॉर ईस्टर तूफान ने अमेरिका में मचाई तबाही…. तेज हवा-बारिश से जनजीवन बेहाल, 425 उड़ानें रद्द

    नॉर ईस्टर तूफान ने अमेरिका में मचाई तबाही…. तेज हवा-बारिश से जनजीवन बेहाल, 425 उड़ानें रद्द


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के पूर्वी तट पर इस वीकेंड शक्तिशाली नॉर ईस्टर तूफान (Powerful Nor’easter storm) का असर देखने को मिला. वॉशिंगटन डीसी (Washington D.C.) से लेकर अमेरिका के उत्तर-पूर्वी राज्य मेन तक तेज हवाओं, भारी बारिश के साथ तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है. शनिवार को अमेरिका से जुड़ी करीब 425 फ्लाइट्स कैंसिल हुईं, जबकि 1,338 उड़ानों में देरी हुई।

    तूफान का असर सिर्फ उड़ानों पर नहीं पड़ा, बिजली सप्लाई भी प्रभावित हुई. न्यू जर्सी, कनेक्टिकट, न्यूयॉर्क और पेंसिल्वेनिया में हजारों घरों और कारोबारों की बिजली चली गई. शनिवार दोपहर 1:07 बजे तक इन चार राज्यों में 88 हजार से ज्यादा घरों, दुकानों और दफ्तरों की बिजली गुल थी. इससे पहले यह संख्या 1.19 लाख से ज्यादा थी।


    हजारों घरों में अब भी बिजली गुल

    कनेक्टिकट, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क में दोपहर करीब 1 बजे तक हर राज्य में 25 हजार से ज्यादा बिजली कनेक्शन प्रभावित थे. लॉन्ग आइलैंड में भी करीब 13,300 ग्राहक बिना बिजली के थे. तूफान में पेड़, शाखाएं और बिजली के तार गिरने से कई जगह सप्लाई बंद हो गई. बिजली कंपनी PSEG Long Island के मुताबिक, शुक्रवार सुबह से अब तक 34,600 से ज्यादा प्रभावित ग्राहकों की बिजली बहाल की जा चुकी है।


    425 फ्लाइट्स कैंसिल, 1,338 में देरी

    नॉर ईस्टर का असर अमेरिकी एयरपोर्ट्स पर भी साफ दिखा. फ्लाइटअवेयर के मुताबिक, शनिवार को अमेरिका से जुड़ी करीब 425 फ्लाइट्स रद्द हुईं. 1,338 उड़ानों में देरी दर्ज की गई. इससे वीकेंड पर सफर करने वाले यात्रियों की मुश्किल बढ़ गई. कई लोगों को अपनी उड़ान रद्द होने या लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा।

    अमेरिका की नेशनल वेदर सर्विस ने सोमवार तक मिड-अटलांटिक तथा न्यू इंग्लैंड में मौसम खराब रहने की चेतावनी दी है. इस दौरान तटीय बाढ़, समुद्र में खतरनाक धाराएं, तेज हवाओं के झोंके और भारी बारिश का खतरा बताया गया है. हालात को देखते हुए न्यूयॉर्क तथा न्यू जर्सी के उन इलाकों में इमरजेंसी घोषित की गई, जहां तूफान का असर ज्यादा होने की आशंका थी. इसमें न्यूयॉर्क सिटी भी शामिल है. कनेक्टिकट ने भी राज्य का इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर सक्रिय कर दिया है।

  • हिमालय में बार-बार क्यों आती है तबाही? बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का कनेक्शन समझिए

    हिमालय में बार-बार क्यों आती है तबाही? बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का कनेक्शन समझिए


    काठमांडू।
    नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। खूबसूरत पहाड़ों और घाटियों के लिए पहचाना जाने वाला हिमालय दरअसल प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है। यहां बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं समय-समय पर बड़े संकट में बदल जाती हैं।

    लेकिन आखिर हिमालय से सटे इलाकों में आपदाओं का खतरा इतना ज्यादा क्यों है? इसके पीछे भूगर्भीय बनावट, पहाड़ों की ढलान, भारी बारिश और तेजी से बदलती जलवायु जैसे कई कारण एक साथ काम करते हैं।

    भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर है बड़ी वजह

    हिमालय दुनिया की सबसे युवा प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका निर्माण भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की लगातार टक्कर से हुआ है। खास बात यह है कि दोनों प्लेटों की गति आज भी जारी है।

    इन प्लेटों की लगातार हलचल पृथ्वी के भीतर भूगर्भीय तनाव पैदा करती है। इसी कारण हिमालयी क्षेत्र तकनीकी रूप से बेहद सक्रिय है और यहां भूकंप का खतरा लगातार बना रहता है।

    हिमालय से जुड़े भारत के कई हिस्से भी उच्च भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं, खासकर भूकंपीय क्षेत्र IV और V में शामिल इलाके।

    पहाड़ों की युवा संरचना क्यों बढ़ाती है खतरा?

    हिमालय की अपेक्षाकृत युवा भूगर्भीय संरचना का एक परिणाम यह भी है कि यहां कई जगह मिट्टी, चट्टान और तलछट अपेक्षाकृत अस्थिर हैं। तेज बारिश होने पर यही सामग्री ढलानों से नीचे खिसकने लगती है।

    इससे भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। जब बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबा अचानक नीचे आता है तो सड़कें, पुल और बस्तियां इसकी चपेट में आ सकती हैं।

    खड़ी ढलानें पानी को बना देती हैं खतरनाक

    हिमालय का भूभाग बेहद खड़ा है। यहां गहरी घाटियां और तीखी ढलानें हैं। भारी बारिश के दौरान पानी पहाड़ों पर ज्यादा देर ठहरने के बजाय तेजी से नीचे की ओर बहता है और संकरी नदी घाटियों में पहुंच जाता है।

    तेज बहाव अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और दूसरे मलबे को भी बहाकर ले जा सकता है। यही प्रक्रिया अचानक आने वाली बाढ़ को और ज्यादा विनाशकारी बना देती है।

    संकरी घाटियों में पानी का वेग बहुत तेजी से बढ़ सकता है। इसका सीधा असर नदी किनारे बने घरों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे पर पड़ता है।

    जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल

    हिमालय की प्राकृतिक संवेदनशीलता के ऊपर अब जलवायु परिवर्तन का अतिरिक्त दबाव भी पड़ रहा है। हिमालय को कई बार ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है क्योंकि ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर यहां बड़ी मात्रा में बर्फ और ग्लेशियर मौजूद हैं।

    बढ़ते तापमान के कारण कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। इसके साथ ही जमी हुई जमीन और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।

    ग्लेशियर की झील फटी तो तबाही और तेज

    ग्लेशियरों के पिघलने से उनके आसपास बनी झीलों का आकार बढ़ सकता है। इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ, चट्टान या मलबे की दीवार अगर पानी के दबाव, भूस्खलन या किसी अन्य वजह से टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है।

    इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।

    ऐसी बाढ़ कुछ ही समय में निचली घाटियों में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती है। खासकर उन इलाकों में खतरा ज्यादा होता है जहां बस्तियां और बुनियादी ढांचा नदियों के बेहद करीब बना हुआ है।

    बादल फटने से कुछ मिनटों में बदल सकते हैं हालात

    हिमालयी इलाकों में बादल फटना भी अचानक बड़ी आपदा का कारण बन सकता है। इसमें बेहद कम समय में एक छोटे क्षेत्र में बहुत ज्यादा बारिश होती है।

    पहाड़ी इलाकों में इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। अचानक हुई मूसलाधार बारिश एक साथ भूस्खलन, मलबा प्रवाह और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं को जन्म दे सकती है।

    नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और अतिरिक्त पानी का भार पहले से कमजोर पहाड़ी ढलानों को अस्थिर कर सकता है।

    हिमालय में आपदाएं अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं

    हिमालयी क्षेत्रों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहां एक प्राकृतिक घटना दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है। भारी बारिश से ढलान कमजोर होता है, भूस्खलन नदी का रास्ता रोक सकता है और बाद में जमा पानी अचानक निकलकर बाढ़ ला सकता है। वहीं ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों के टूटने पर भी निचले इलाकों में अचानक जलप्रलय आ सकता है।

    यानी हिमालय में भूगर्भीय सक्रियता, खड़ी ढलान, अस्थिर चट्टानें, भारी बारिश, ग्लेशियरों में बदलाव और जलवायु परिवर्तन मिलकर आपदा का जोखिम बढ़ाते हैं।

    इसीलिए नेपाल, भारत, भूटान और हिमालय से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, नदी घाटियों में सुरक्षित निर्माण और संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

  • हिमाचल के चम्बा में मूसलाधार बारिश ने मचाई तबाही… घर में घुसा मलबा…कई वाहन दबे

    हिमाचल के चम्बा में मूसलाधार बारिश ने मचाई तबाही… घर में घुसा मलबा…कई वाहन दबे


    चंबा।
    हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के चंबा जिले (Chamba district) में सोमवार रात मूसलाधार बारिश (Torrential Rain) ने भारी तबाही मचाई। बारिश की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इसने व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाया। इस प्राकृतिक आपदा के बावजूद, राहत की बात यह रही कि किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई। हालांकि, जिले के कई इलाकों में आवासीय घरों, व्यावसायिक दुकानों और निजी वाहनों को भारी क्षति पहुंची है।

    जिले के उदयपुर, घोलटी, नवोदय मार्ग और भरियाड जैसे क्षेत्रों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर रही। इन इलाकों में भारी भूस्खलन हुआ, जिससे बड़ी मात्रा में मलबा सड़कों और आवासीय क्षेत्रों में आ गया। मलबे की चपेट में आकर करीब 12 वाहन दब गए।

    इन दबे हुए वाहनों में निजी कारें, मालवाहक ट्रक, दोपहिया बाइक और स्कूटियां शामिल थीं। भरमौर-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित तडोली नाला भी बारिश के कारण उफान पर आ गया। नाले का बहाव इतना तेज था कि वह अपने साथ बड़े-बड़े पत्थर और मिट्टी का मलबा बहाकर लाया।


    संपत्ति और बुनियादी ढांचे को नुकसान

    तडोली नाले के तेज बहाव में आया मलबा और पत्थर एक स्टोर में घुस गए। इससे वह स्टोर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। इसके अतिरिक्त, आसपास के कई घरों में भी मलबा घुस गया, जिससे निवासियों को काफी परेशानी हुई। सुल्तानपुर नाले ने भी रौद्र रूप धारण कर लिया, जिससे स्थानीय लोगों की मुश्किलें और बढ़ गईं।

    इस नाले के तेज बहाव में भी कई बाइक और स्कूटियां बहकर क्षतिग्रस्त हो गईं। भरियाड गांव में पानी का रुख अचानक बदल गया, जिससे स्थिति और भी भयावह हो गई। मलबा सीधे कई घरों तक पहुंच गया, जिससे पूरे गांव में दहशत का माहौल बन गया।


    जनजीवन पर गहरा असर

    बारिश और नाले के उफान से उत्पन्न खतरे को देखते हुए कई परिवारों ने अपने मकान खाली कर दिए। इन प्रभावित परिवारों ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रातों-रात पड़ोसियों के घरों में शरण ली। यह विस्थापन अचानक आई आपदा के कारण हुआ।


    चमोली

    घरों में मलबा घुसने से लोगों की दैनिक दिनचर्या बाधित हुई। संपत्ति के नुकसान से आर्थिक चुनौतियां भी पैदा हुई हैं। स्थानीय निवासियों को अब अपने घरों की मरम्मत और सफाई का सामना करना पड़ेगा।