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  • यूपी पुलिस वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना के लिए कर रही हाफ एनकाउंटर, हाईकोर्ट ने DGP को किया तलब

    यूपी पुलिस वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना के लिए कर रही हाफ एनकाउंटर, हाईकोर्ट ने DGP को किया तलब


    नई दिल्ली । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में कथित हाफ एनकाउंटर की बढ़ती घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने आरोपियों के पैरों में गोली मारकर बाद में उसे मुठभेड़ बताने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि दंड देने का अधिकार केवल न्यायालयों के पास है, पुलिस के पास नहीं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा न्यायिक अधिकार क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण अस्वीकार्य है, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां शासन कानून के तहत चलता है.

    हाईकोर्ट ने राज्य के डीजीपी और गृह सचिव से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि क्या पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के पैरों या शरीर के अन्य हिस्सों में गोली मारने के संबंध में कोई मौखिक या लिखित निर्देश जारी किए गए हैं. अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मुठभेड़अब एक नियमित घटना बनते जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है.

    इन घटनाओं में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई- हाईकोर्ट

    कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके सामने अक्सर ऐसे मामले आते हैं, जिनमें मामूली अपराधों में भी पुलिस अंधाधुंध गोलीबारी कर घटनाओं को मुठभेड़ का रूप दे देती है. यह टिप्पणी अदालत ने मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार और दो अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की जो अलग-अलग पुलिस मुठभेड़ों में घायल हुए थे. अदालत ने नोट किया कि इन घटनाओं में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, जिससे बल प्रयोग की आवश्यकता और अनुपातिकता पर सवाल उठते हैं.

    एक मामले में अदालत ने पहले राज्य सरकार से पूछा था कि क्या कथित मुठभेड़ को लेकर एफआईआर दर्ज हुई और क्या घायल का बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी के सामने दर्ज किया गया. राज्य की ओर से बताया गया कि एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन घायल का बयान न तो मजिस्ट्रेट और न ही किसी डॉक्टर के समक्ष दर्ज किया गया. साथ ही यह भी जानकारी दी गई कि पहले एक सब-इंस्पेक्टर को जांच सौंपी गई थी, जिसे बाद में एक इंस्पेक्टर को स्थानांतरित कर दिया गया.

    स्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ में हुई सुनवाई

    दलीलों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मुठभेड़ संबंधी दिशानिर्देशों का पालन होता नहीं दिख रहा है. यह सुनवाई जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ में हुई.

  • न्यायालय ने कहा केवल अदालत को है सजा देने का अधिकार पुलिस नहीं कर सकती एनकाउंटर

    न्यायालय ने कहा केवल अदालत को है सजा देने का अधिकार पुलिस नहीं कर सकती एनकाउंटर

    नई दिल्ली। प्रयागराज में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की हाफ एनकाउंटर प्रथा पर गहरी चिंता और तीखी नाराजगी व्यक्त की है। न्यायालय ने इस मामले में प्रदेश के डीजीपी और गृह सचिव को तलब किया है और स्पष्ट जवाब देने को कहा है। हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के पैरों या शरीर के किसी अन्य हिस्से में गोली मारने के संबंध में कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिए गए हैं।

    जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने यह आदेश मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार समेत अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी मुठभेड़ अब नियमित होती जा रही हैं और कथित तौर पर इसका उद्देश्य वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करना या आरोपियों को सबक सिखाना हो सकता है।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस आरोपी के पैरों में गोली मारकर इसे मुठभेड़ बताती है और यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति को सजा देने का अधिकार केवल अदालत के पास है पुलिस के पास नहीं है। कोर्ट ने चिंता जताई कि छोटे मोटे अपराधों जैसे चोरी के मामलों में भी पुलिस एनकाउंटर का सहारा ले रही है।

    कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसे निर्देश जारी किए गए और उनका पालन किया गया तो संबंधित जिले के पुलिस प्रमुख यानी SP SSP या कमिश्नर व्यक्तिगत रूप से कोर्ट की अवमानना के लिए जिम्मेदार होंगे। इस स्थिति में उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे निर्देश और प्रथाएं कानून व्यवस्था के नाम पर अनुचित और असंवैधानिक हैं।अदालत ने यह भी कहा कि हाफ एनकाउंटर प्रथा से न केवल आरोपी का जीवन खतरे में पड़ता है बल्कि यह पुलिस के प्रति आम जनता के विश्वास को भी प्रभावित करती है। न्यायालय ने डीजीपी और गृह सचिव से पूछा कि इस तरह के निर्देश किसी प्रकार से नीति या प्रशिक्षण का हिस्सा तो नहीं बन गए।

    हाईकोर्ट के आदेश के बाद यूपी पुलिस में हलचल मची है और सभी वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में लिखित रूप से स्पष्ट जवाब देने की तैयारी में हैं। पुलिस विभाग का कहना है कि कानून का पालन किया जाएगा और भविष्य में किसी भी प्रकार की असंवैधानिक कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी।इस आदेश को पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका के बीच जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों की सीमा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।