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  • घर में किसी को रही है गंभीर बीमारी तो सावधान! डायबिटीज और कैंसर का खतरा समझें, वक्त पर स्क्रीनिंग से रहें सुरक्षित

    घर में किसी को रही है गंभीर बीमारी तो सावधान! डायबिटीज और कैंसर का खतरा समझें, वक्त पर स्क्रीनिंग से रहें सुरक्षित


    नई दिल्ली। किसी परिवार में अगर डायबिटीज कैंसर हृदय रोग या हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी का इतिहास रहा हो तो अक्सर परिवार के दूसरे सदस्यों के मन में भी चिंता पैदा हो जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या परिवार में किसी करीबी को बीमारी होने का मतलब यह है कि आने वाली पीढ़ियों में भी वही बीमारी होना तय है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा जरूरी नहीं है। परिवार में किसी बीमारी की हिस्ट्री होने से व्यक्ति में उसका जोखिम बढ़ सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि बीमारी निश्चित रूप से उसे भी होगी। आनुवंशिक कारणों के साथ जीवनशैली खानपान शारीरिक गतिविधि और पर्यावरण जैसे कई दूसरे कारक भी बीमारी के जोखिम को प्रभावित करते हैं।

    कुछ बीमारियों में आनुवंशिक संबंध अपेक्षाकृत स्पष्ट माना जाता है। उदाहरण के तौर पर कुछ परिवारों में कम उम्र में बहुत ज्यादा कोलेस्ट्रॉल की समस्या या हार्ट अटैक का इतिहास देखने को मिलता है। ऐसी स्थिति को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया एक ऐसी आनुवंशिक स्थिति है जिसमें खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल का स्तर बहुत ज्यादा हो सकता है। इसके कारण कम उम्र में कोरोनरी हार्ट डिजीज और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए यदि परिवार में किसी सदस्य को कम उम्र में हार्ट अटैक हुआ है या किसी करीबी व्यक्ति का बैड कोलेस्ट्रॉल लगातार बहुत ज्यादा रहता है तो परिवार के दूसरे सदस्यों को भी डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराने पर विचार करना चाहिए।

    कैंसर के मामले में भी पारिवारिक इतिहास महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि हर कैंसर आनुवंशिक नहीं होता और परिवार में किसी सदस्य को कैंसर होने का मतलब यह नहीं कि दूसरे सदस्य को भी कैंसर जरूर होगा। लेकिन कुछ आनुवंशिक बदलाव विशेष प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। BRCA1 और BRCA2 जैसे आनुवंशिक बदलाव वंशानुगत स्तन और अंडाशय कैंसर सिंड्रोम से जुड़े पाए गए हैं। इसी तरह लिंच सिंड्रोम कोलोरेक्टल और कुछ अन्य कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। ऐसे मामलों में परिवार की मेडिकल हिस्ट्री को डॉक्टर के साथ साझा करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

    डायबिटीज को लेकर भी परिवार का इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता है। अगर माता पिता या भाई बहन में डायबिटीज रही है तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। लेकिन केवल आनुवंशिक जोखिम के कारण बीमारी होना तय नहीं होता। वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और रोजमर्रा की जीवनशैली भी जोखिम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए परिवार में बीमारी होने पर घबराने के बजाय अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।


    डायबिटीज को लेकर भी परिवार का इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता है। अगर माता पिता या भाई बहन में डायबिटीज रही है तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। लेकिन केवल आनुवंशिक जोखिम के कारण बीमारी होना तय नहीं होता। वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और रोजमर्रा की जीवनशैली भी जोखिम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए परिवार में बीमारी होने पर घबराने के बजाय अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।

    विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक परिवार में गंभीर बीमारी की हिस्ट्री हो तो डॉक्टर को इसकी जानकारी जरूर दें। डॉक्टर आपकी उम्र स्वास्थ्य स्थिति और पारिवारिक इतिहास को ध्यान में रखते हुए जरूरी जांच या स्क्रीनिंग की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में जेनेटिक काउंसलिंग भी उपयोगी हो सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीमारी के पारिवारिक इतिहास को डर की वजह न बनाएं बल्कि इसे समय रहते सावधान होने का संकेत समझें। नियमित स्वास्थ्य जांच संतुलित खानपान पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्क्रीनिंग अपनाकर कई जोखिमों को समय पर पहचाना और नियंत्रित किया जा सकता है।

  • सावधान! बचपन का असामान्य वजन बढ़ा सकता है युवावस्था में बीमारियों का खतरा, नई स्टडी में बड़ा खुलासा

    सावधान! बचपन का असामान्य वजन बढ़ा सकता है युवावस्था में बीमारियों का खतरा, नई स्टडी में बड़ा खुलासा


    नई दिल्ली। हर माता पिता अपने बच्चे की लंबाई और वजन को लेकर चिंतित रहते हैं। अक्सर घरों में बच्चे के दुबलेपन या मोटापे को केवल खान पान और खराब लाइफस्टाइल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन हाल ही में आई एक नई रिसर्च ने इस धारणा को आंशिक रूप से बदल दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों के वजन और बॉडी मास इंडेक्स BMI में होने वाले बदलावों का एक बड़ा हिस्सा उनके जीन्स पर निर्भर करता है।

    ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित द्वारा की गई इस स्टडी में करीब 6 300 बच्चों और वयस्कों के 66 000 से अधिक BMI मापों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि 10 वर्ष की आयु तक बच्चे का वजन और 18 वर्ष तक उसकी ग्रोथ की रफ्तार भविष्य में होने वाली बीमारियों का संकेत दे सकती है। यदि बचपन में वजन असामान्य रूप से बढ़ता या घटता है तो आगे चलकर डायबिटीज हाई कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि अलग अलग उम्र में अलग जेनेटिक फैक्टर्स सक्रिय होते हैं। यानी छोटे बच्चों के शारीरिक आकार को प्रभावित करने वाले आनुवंशिक कारक किशोरावस्था में असर डालने वाले कारकों से अलग हो सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि बचपन में हल्का फुल्का मोटापा हमेशा भविष्य में गंभीर मोटापे का संकेत नहीं होता लेकिन लगातार असामान्य ग्रोथ चिंता का विषय हो सकती है।

    शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जीन्स ही जिम्मेदार नहीं हैं। पर्यावरण खान पान शारीरिक गतिविधि और पारिवारिक जीवनशैली भी बच्चे के विकास को प्रभावित करते हैं। यानी जेनेटिक प्रवृत्ति और जीवनशैली मिलकर स्वास्थ्य की दिशा तय करते हैं।

    यह अध्ययन आंशिक रूप से ब्रिटेन की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल के 90 के दशक के बच्चे स्टडी के डेटा पर भी आधारित है जिसे वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य डेटाबेस माना जाता है। इस लंबे समय तक चले अध्ययन ने बच्चों के विकास और भविष्य के स्वास्थ्य जोखिमों को समझने में अहम भूमिका निभाई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस उम्र में हस्तक्षेप सबसे अधिक प्रभावी हो सकता है। यदि सही समय पर पोषण व्यायाम और स्वास्थ्य निगरानी की जाए तो भविष्य में मोटापे और उससे जुड़ी गंभीर बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है।

    इस स्टडी का संदेश स्पष्ट है बच्चों के वजन को लेकर न तो अनावश्यक घबराहट जरूरी है और न ही लापरवाही। नियमित स्वास्थ्य जांच संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर बचपन से ही बेहतर स्वास्थ्य की नींव रखी जा सकती है।