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  • टेस्टोस्टेरोन कम होने पर पुरुषों के शरीर में दिख सकते हैं कई बदलाव, जानिए कमी के कारण, लक्षण और जांच का सही तरीका

    टेस्टोस्टेरोन कम होने पर पुरुषों के शरीर में दिख सकते हैं कई बदलाव, जानिए कमी के कारण, लक्षण और जांच का सही तरीका


    नई दिल्ली ।पुरुषों की सेहत की बात आते ही टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की चर्चा शुरू हो जाती है। इसे आमतौर पर मेल हार्मोन के तौर पर जाना जाता है। मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि टेस्टोस्टेरोन यौन शक्ति के साथ स्पर्म बनाने, मांसपेशियों- हड्डियों को मजबूत रखने और शरीर में ऊर्जा के स्तर को बढ़ाने के लिए जरूरी होता है। जब किसी में इसका स्तर कम हो जाता है, तो इसका शरीर के कामकाज पर सीधा असर दिखने लगता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन शारीरिक विकास और ऊर्जा के लिए जरूरी होता है, लेकिन केवल थकान-कमजोरी या यौन की इच्छा कम होने का मतलब यह नहीं है कि आपमें टेस्टोस्टेरोन कम है। लो टेस्टोस्टेरोन यानी हाइपोगोनाडिज्म की स्थिति कई बार गंभीर समस्याओं का कारण भी बन सकती है, इसलिए इसके लक्षणों पर निरंतर ध्यान देते रहना और टेस्टोस्टेरोन को बढ़ाने के लिए उपाय करते रहना जरूरी है।

    आइए जानते हैं कि कैसे पता किया जाए कि कहीं आपमें इसकी कमी तो नहीं?

    पुरुषों के लिए जरूरी हार्मोन- टेस्टोस्टेरोन

    टेस्टोस्टेरोन पुरुषों का मुख्य हार्मोन है, जिसका निर्माण मुख्य रूप से अंडकोष में होता है। यह पुरुषों में चेहरे और शरीर के बाल, मांसपेशियों के विकास, यौन इच्छा, स्पर्म उत्पादन और हड्डियों के स्वास्थ्य में भूमिका निभाता है।

    टेस्टोस्टेरोन का स्तर दिनभर एक जैसा नहीं रहता। आमतौर पर सुबह इसका स्तर सबसे अधिक होता है। जिन पुरुषों में अंडकोष की समस्या, पिट्यूटरी ग्रंथि से जुड़ी परेशानी, मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज या कुछ क्रॉनिक बीमारियां होती हैं, उनमें टेस्टोस्टेरोन की कमी का खतरा अधिक हो सकता है। इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ भी टेस्टोस्टेरोन में धीरे-धीरे कमी आ सकती है।

    टेस्टोस्टेरोन कम होने के क्या कारण हैं?

    टेस्टोस्टेरोन की कमी केवल उम्र बढ़ने से नहीं होती। अंडकोष में चोट या संक्रमण, कैंसर के इलाज में रेडिएशन या कीमोथेरेपी, पिट्यूटरी ग्रंथि की बीमारी और कुछ दवाएं भी लो टेस्टोस्टेरोन का कारण हो सकती हैं।

    इसके अलावा अगर आप मोटापे, टाइप-2 डायबिटीज, किडनी या लिवर की पुरानी बीमारी का शिकार हैं या फिर नींद से जुड़ी समस्याएं रहती हैं तो इसके कारण भी टेस्टोस्टेरोन की कमी हो सकती है।

    कैसे पता चलेगा कि टेस्टोस्टेरोन कम तो नहीं?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, थकान या यौन इच्छा में कमी को देखकर खुद से टेस्टोस्टेरोन की कमी मान लेना सही नहीं है।

    इसका पता लगाने के लिए लक्षणों के साथ डॉक्टर कुछ जांच की सलाह दे सकते हैं। आमतौर पर सुबह जब टेस्टोस्टेरोन का स्तर अपेक्षाकृत अधिक होता है तब खून की जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ अन्य हार्मोन की जांच करने की भी सलाह दे सकते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर टेस्टोस्टेरोन की कमी का कारण मोटापा, कोई बीमारी या ऐसी स्थिति है जिसे सुधारा जा सकता है, तो उसका इलाज जरूरी है। हाइपोगोनाडिज्म में कुछ लोगों को डॉक्टर टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी की सलाह दे सकते हैं।

    लाइफस्टाइल और खान-पान में सुधार के साथ पौष्टिक चीजों का नियमित सेवन भी टेस्टोस्टेरोन के स्तर को बढ़ाने में मददगार हो सकता है।

  • डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    नई दिल्ली । मौसम में बदलाव और संक्रामक बीमारियों के प्रसार के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में डेंगू और स्वाइन फ्लू अर्थात एच1एन1 इन्फ्लूएंजा के मामले सामने आ रहे हैं। दोनों ही बीमारियों में तेज बुखार, सिरदर्द और शारीरिक दर्द जैसे शुरुआती लक्षण एक समान प्रतीत होते हैं। इस कारण आम नागरिकों के लिए शुरुआती चरण में इनके बीच अंतर समझ पाना कठिन हो जाता है। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों बीमारियों के फैलने के कारण और इनके संक्रमण का माध्यम पूरी तरह से भिन्न हैं।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के बीच सबसे बड़ा बुनियादी अंतर इनके संचरण की प्रक्रिया में निहित है। डेंगू का प्रसार संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है, जो मुख्य रूप से साफ और ठहरे हुए पानी में पनपते हैं। इसके विपरीत, स्वाइन फ्लू एक श्वसन संबंधी वायरस संक्रमण है जो किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने अथवा छींकने से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से हवा में आसानी से फैलता है। इसी वजह से दोनों बीमारियों की रोकथाम के लिए अलग-अलग सावधानियां बरतनी आवश्यक होती हैं।

    स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, डेंगू के मुख्य लक्षणों में अचानक तेज बुखार आना, आंखों के पिछले हिस्से में तीव्र दर्द, मांसपेशियों तथा जोड़ों में ऐंठन, उल्टी आना और त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ना शामिल हैं। इसके लक्षण आमतौर पर मच्छर के काटने के चार से दस दिनों के भीतर दिखाई देने लगते हैं और यह स्थिति एक सप्ताह तक बनी रह सकती है। गंभीर स्थिति में पेट दर्द, मसूड़ों या नाक से रक्तस्राव और सांस लेने में तकलीफ जैसे चेतावनी संकेत भी उभर सकते हैं।

    दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू के लक्षणों में अचानक बुखार के साथ सूखी खांसी, गले में खराश, ठंड लगना, अत्यधिक थकान और नाक बहना शामिल हैं। कुछ मरीजों में पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे उल्टी या दस्त भी देखे जा सकते हैं। यदि समय पर इस स्थिति का प्रबंधन न किया जाए तो यह बढ़कर निमोनिया का रूप ले सकती है, जिससे श्वसन तंत्र पर गंभीर असर पड़ता है।

    दोनों ही बीमारियों के उपचार में सटीक चिकित्सीय परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेंगू की पुष्टि के लिए विशिष्ट रक्त जांच की आवश्यकता होती है, जिससे प्लेटलेट्स की संख्या और एंटीजन की स्थिति का पता चलता है। वहीं स्वाइन फ्लू का निदान रोगी के क्लिनिकल मूल्यांकन और स्वाब टेस्ट के आधार पर किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रकार का लक्षण उभरने पर स्वयं दवा लेने के बजाय तत्काल योग्य चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

    संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत और पर्यावरणीय स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी है। डेंगू से बचने के लिए घरों और आसपास जलभराव न होने देना और मच्छर रोधी उपायों का प्रयोग करना प्रभावी होता है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। स्वाइन फ्लू से सुरक्षा के लिए हाथों की नियमित सफाई, भीड़भाड़ वाले स्थानों पर सावधानी और चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार टीकाकरण कराने की सलाह दी जाती है।

  • बरसात के मौसम में बढ़ा बुखार का खतरा, जानिए कब सामान्य फीवर है और कब तुरंत डेंगू की जांच कराना बन जाता है जरूरी

    बरसात के मौसम में बढ़ा बुखार का खतरा, जानिए कब सामान्य फीवर है और कब तुरंत डेंगू की जांच कराना बन जाता है जरूरी

    नई दिल्ली । मानसून के आगमन के साथ देश के कई हिस्सों में बुखार और संक्रमण से जुड़े मामलों में तेजी देखी जाती है। बारिश का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है, वहीं यह मच्छरों और वायरस जनित बीमारियों के फैलने के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करता है। ऐसे समय में अधिकांश लोगों को होने वाला बुखार सामान्य वायरल संक्रमण का परिणाम होता है, लेकिन कई मामलों में यही बुखार डेंगू जैसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। इसलिए केवल बुखार को देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके साथ दिखाई देने वाले अन्य लक्षणों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

    सामान्य मौसमी बुखार की शुरुआत प्रायः हल्के लक्षणों के साथ होती है। इसमें हल्का या मध्यम बुखार, शरीर में दर्द, गले में खराश, हल्की खांसी, थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है। पर्याप्त आराम, पर्याप्त पानी पीने, हल्का भोजन और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवाओं से अधिकांश लोगों की स्थिति दो से तीन दिनों में बेहतर होने लगती है। इस दौरान भूख कम लगना और सामान्य कमजोरी महसूस होना भी आम बात है, लेकिन गंभीर लक्षण आमतौर पर नहीं दिखाई देते।

    इसके विपरीत डेंगू का बुखार अक्सर अचानक और तेज तापमान के साथ शुरू होता है। मरीज को तेज सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में अत्यधिक पीड़ा महसूस हो सकती है। कई मामलों में शरीर पर लाल रंग के छोटे-छोटे दाने दिखाई देने लगते हैं, जो डेंगू का महत्वपूर्ण संकेत माने जाते हैं। बीमारी बढ़ने पर अत्यधिक कमजोरी, उल्टी, मसूड़ों या नाक से खून आना और प्लेटलेट्स की संख्या में कमी जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि बुखार लगातार तीन दिन से अधिक बना रहे, बार-बार तेज हो जाए, शरीर पर दाने उभर आएं या खून आने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना देरी किए चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। ऐसे मामलों में रक्त जांच और प्लेटलेट्स की निगरानी से बीमारी की समय पर पहचान संभव होती है, जिससे जटिलताओं का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    मानसून के दौरान बीमारी से बचाव के लिए साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। घर और आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छरों का प्रजनन न हो सके। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें, मच्छरदानी या रिपेलेंट का उपयोग करें और स्वच्छ भोजन व पर्याप्त पानी का सेवन करें। यदि बुखार हो जाए तो स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक सुरक्षित रहता है, क्योंकि समय पर सही उपचार ही डेंगू जैसी गंभीर बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।