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  • बची हुई चाय को बार-बार गर्म करके पीना पड़ सकता है भारी, स्वाद के साथ सेहत पर भी पड़ सकता है असर

    बची हुई चाय को बार-बार गर्म करके पीना पड़ सकता है भारी, स्वाद के साथ सेहत पर भी पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली ।भारत में बड़ी संख्या में लोग चाय पीना पसंद करते हैं और ज्यादातर लोग इसे गर्मागर्म पीना पसंद करते हैं। कई बार सुबह बनाई गई चाय बच जाती है, जिसे लोग चाय बर्बाद होने से बचाने या समय बचाने के लिए दोपहर या शाम को दोबारा गर्म करके पी लेते हैं। हालांकि, दी गई जानकारी के मुताबिक ठंडी हो चुकी चाय को बार-बार गर्म करना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। दोबारा गर्म करने से चाय का स्वाद प्रभावित होने के साथ उसमें मौजूद कुछ लाभकारी रासायनिक तत्वों पर भी असर पड़ सकता है।

    स्टडी के अनुसार ताजी चाय में कैटेचिन और पॉलीफेनोल्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। इन्हें हृदय स्वास्थ्य और शरीर में सूजन कम करने के लिए उपयोगी माना जाता है। चाय को दोबारा गर्म करने की प्रक्रिया में इन लाभकारी तत्वों के कम होने की बात कही गई है। इसके अलावा, चाय को बार-बार उबालने से उसमें टैनिन की मात्रा बढ़ सकती है। इसकी वजह से चाय का स्वाद कसैला और कड़वा हो सकता है। यानी दोबारा गर्म करने का असर केवल चाय के स्वाद तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसके कुछ घटकों में भी बदलाव हो सकता है।

    दूध वाली चाय को लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखना भी चिंता का विषय बताया गया है। ऐसी स्थिति में बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ सकता है। दी गई जानकारी के अनुसार दूध वाली चाय को कमरे के तापमान पर दो घंटे से अधिक समय तक रखने पर उसमें तेजी से बैक्टीरिया बढ़ सकते हैं। बाद में ऐसी चाय को दोबारा गर्म करने के बावजूद फूड पॉइजनिंग या पेट खराब होने का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता। वहीं, टैनिन की मात्रा बढ़ने से कुछ लोगों को एसिडिटी, सीने में जलन और बदहजमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

    चाय में टैनिन की मात्रा बढ़ने का असर शरीर में आयरन के अवशोषण पर भी पड़ सकता है। बढ़ा हुआ टैनिन शरीर द्वारा आयरन को ठीक से अवशोषित करने की प्रक्रिया में रुकावट डाल सकता है। यह खास तौर पर ऐसे लोगों के लिए चिंता का विषय हो सकता है जिनमें पहले से आयरन की कमी है। दी गई जानकारी में भारत में एनीमिया की समस्या को देखते हुए बासी चाय के सेवन को लेकर सावधानी बरतने की बात कही गई है। इसलिए बची हुई चाय को लंबे समय बाद दोबारा गर्म करके पीने के बजाय ताजी चाय बनाना बेहतर विकल्प बताया गया है।

    स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की सलाह है कि एक बार में उतनी ही चाय बनाई जाए, जितनी पीनी हो। यदि चाय को कुछ समय तक गर्म रखना जरूरी हो तो उसे बार-बार गैस पर उबालने के बजाय थर्मस का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे चाय को गर्म रखने में मदद मिल सकती है और बार-बार गर्म करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खासकर दूध वाली चाय को कमरे के तापमान पर लंबे समय तक रखने से बचना चाहिए। इस तरह ताजी बनी चाय का सेवन करना और बची हुई चाय को लंबे समय बाद दोबारा गर्म करके पीने से बचना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर माना गया है।

  • Lauki Juice Benefits: लौकी का जूस डाइट में शामिल करने से मिल सकते हैं ये 5 फायदे, लेकिन कड़वी लौकी से रहें सावधान

    Lauki Juice Benefits: लौकी का जूस डाइट में शामिल करने से मिल सकते हैं ये 5 फायदे, लेकिन कड़वी लौकी से रहें सावधान

    Lauki Juice Benefits: लौकी को सेहत के लिए फायदेमंद सब्जियों में शामिल किया जाता है। इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है और यह कुछ जरूरी पोषक तत्वों का स्रोत भी है। इसी वजह से कई लोग लौकी की सब्जी के अलावा इसका जूस भी अपनी डाइट में शामिल करते हैं। बिना चीनी और अतिरिक्त सामग्री के तैयार किया गया ताजा लौकी का जूस हल्का पेय विकल्प हो सकता है। हालांकि, इसे किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जाना चाहिए और न ही किसी एक जूस पर निर्भर रहना सही है। इसे संतुलित खानपान के हिस्से के तौर पर लेना बेहतर है। लौकी के जूस से जुड़े फायदों की बात करें तो इसमें मौजूद पानी और कुछ पोषक तत्व शरीर को पर्याप्त तरल पदार्थ उपलब्ध कराने और डाइट की पोषण गुणवत्ता बेहतर करने में योगदान दे सकते हैं।

    लौकी का जूस शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद कर सकता है। लौकी में पानी की मात्रा काफी अधिक होती है, इसलिए इससे तैयार ताजा जूस शरीर में तरल पदार्थ की पूर्ति में योगदान दे सकता है। गर्मी या शारीरिक गतिविधि के दौरान शरीर को पर्याप्त पानी की जरूरत होती है और इस स्थिति में सादा पानी सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है। इसलिए लौकी के जूस को पानी का विकल्प नहीं समझना चाहिए। इसके अलावा लौकी में मौजूद पानी और यदि जूस में कुछ गूदा शामिल रहे तो थोड़ी मात्रा में फाइबर भी मिल सकता है। संतुलित डाइट में फाइबर पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज के लिए महत्वपूर्ण होता है। हालांकि, पूरी लौकी खाने की तुलना में जूस में फाइबर की मात्रा कम हो सकती है।

    लौकी को आमतौर पर कम कैलोरी वाली सब्जियों में शामिल किया जाता है। बिना चीनी मिलाया गया लौकी का जूस भी कैलोरी के लिहाज से हल्का पेय हो सकता है। यदि इसे अधिक कैलोरी या मीठे पेय की जगह लिया जाए तो कुल कैलोरी सेवन को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, केवल लौकी का जूस पीने से वजन कम करने की उम्मीद करना सही तरीका नहीं है। वजन नियंत्रित रखने के लिए संतुलित खानपान पर ध्यान देना जरूरी है। इसी तरह लौकी को डाइट में शामिल करने से शरीर को कुछ विटामिन और मिनरल्स भी मिल सकते हैं। अलग-अलग सब्जियों और फलों को उनकी पूरी अवस्था में खाने से शरीर को विविध पोषण और पर्याप्त फाइबर मिल सकता है।

    बिना चीनी और अतिरिक्त सामग्री के तैयार किया गया ताजा लौकी का जूस उन लोगों के लिए हल्का पेय विकल्प हो सकता है, जो मीठे शीतल पेय या अधिक कैलोरी वाले ड्रिंक्स कम करना चाहते हैं। हालांकि, इसे डाइट में शामिल करने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह ली जा सकती है। खास तौर पर लौकी का जूस तैयार करते समय एक जरूरी सावधानी का ध्यान रखना चाहिए। यदि लौकी का स्वाद कड़वा हो तो उसका जूस बिल्कुल नहीं पीना चाहिए। कड़वी लौकी में विषैले कुकुर्बिटासिन की मात्रा अधिक हो सकती है। इसलिए जूस बनाने से पहले लौकी का स्वाद जांचना जरूरी है और कड़वी लौकी का सेवन नहीं करना चाहिए।

    कुल मिलाकर, लौकी का ताजा जूस हाइड्रेशन में योगदान देने, संतुलित डाइट में पोषक तत्व शामिल करने और मीठे या अधिक कैलोरी वाले पेय के विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकता है। पाचन के लिए भी इसमें मौजूद पानी और कुछ गूदे के कारण थोड़ी मात्रा में फाइबर मिल सकता है। फिर भी जूस की तुलना में पूरी सब्जी खाना अधिक फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि जूस बनाने की प्रक्रिया में फाइबर कम हो जाता है। इसलिए लौकी को संतुलित आहार का हिस्सा बनाना बेहतर है और किसी बीमारी के इलाज या वजन घटाने के लिए केवल इसके जूस पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

  • कितने घंटे पुरानी रोटी खाना सुरक्षित है, जानिए बासी रोटी खाने के फायदे और किन परिस्थितियों में इससे बचना चाहिए

    कितने घंटे पुरानी रोटी खाना सुरक्षित है, जानिए बासी रोटी खाने के फायदे और किन परिस्थितियों में इससे बचना चाहिए


    नई दिल्ली ।
    भारतीय भोजन में रोटी का खास स्थान है। लंच से लेकर डिनर तक ज्यादातर घरों में रोटी नियमित रूप से खाई जाती है। कई बार रात के खाने में जरूरत से ज्यादा रोटियां बन जाती हैं और कुछ रोटियां अगले दिन के लिए बच जाती हैं। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि रात की बची हुई रोटी कितनी देर तक खाने के लिए सुरक्षित रहती है और क्या बासी रोटी खाने से कोई फायदा भी हो सकता है।

    रोटी को लेकर सबसे जरूरी बात उसके सही तरीके से रखे जाने की है। अगर रोटी को बनाकर खुले में छोड़ दिया जाए, तो मौसम के अनुसार वह कुछ ही घंटों में खराब हो सकती है। खासतौर पर गर्म मौसम में भोजन के जल्दी खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में रात की बची रोटी को अगले दिन खाना जोखिम भरा हो सकता है।

    अगर रोटी को किसी साफ और बंद डिब्बे में रखकर फ्रिज में सुरक्षित तरीके से रखा गया है, तो इसे अगले दिन सुबह या दोपहर तक खाया जा सकता है। सामान्य तौर पर रोटी को 12 से 24 घंटे तक ही सुरक्षित माना जाता है। 24 घंटे से ज्यादा पुरानी रोटी खाने से बचने की सलाह दी जाती है। लंबे समय तक रखे गए भोजन में बैक्टीरिया या फंगस पनपने का खतरा बढ़ सकता है, जिससे पेट खराब होने जैसी परेशानी हो सकती है।

    सही तरीके से रखी गई और लगभग 12 से 15 घंटे पुरानी रोटी के कुछ संभावित फायदे भी बताए जाते हैं। रोटी ठंडी होने के बाद उसमें मौजूद स्टार्च का एक हिस्सा रेजिस्टेंट स्टार्च में बदल जाता है। इसे पचने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। इससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस हो सकता है और बार-बार भूख लगने की संभावना कम हो सकती है। इसी वजह से वजन नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए ठंडी रोटी को एक विकल्प माना जाता है।

    बासी रोटी में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए भी उपयोगी हो सकता है। सुबह पेट साफ नहीं होने जैसी समस्या से परेशान लोग ठंडी रोटी को दूध के साथ खाने का विकल्प अपना सकते हैं। इसके अलावा ठंडी रोटी को सुबह ठंडे दूध में मिलाकर खाने से शरीर की गर्मी कम महसूस होने और पेट को ठंडक मिलने की बात भी कही जाती है।

    हालांकि, बासी रोटी खाने से पहले उसकी स्थिति की जांच करना जरूरी है। अगर रोटी से अजीब या खराब गंध आ रही हो, उसका रंग बदल गया हो या उस पर फंगस अथवा सफेद धब्बे दिखाई दे रहे हों, तो उसे बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। ऐसी रोटी को तुरंत फेंक देना बेहतर है।

    फ्रिज में रखी रोटी खाने से पहले उसे हल्का गर्म किया जा सकता है। इससे रोटी नरम हो जाती है और उसे खाना आसान रहता है। इस तरह रात की बची रोटी को सुरक्षित तरीके से रखने और समय सीमा का ध्यान रखने पर ही अगले दिन इस्तेमाल करना बेहतर है।

  • रोज खाली पेट एंटासिड खाने की आदत पड़ सकती है भारी, शुरुआत में दिखने वाले इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    रोज खाली पेट एंटासिड खाने की आदत पड़ सकती है भारी, शुरुआत में दिखने वाले इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    नई दिल्ली । सुबह उठते ही खाली पेट सीने में जलन, खट्टी डकार या पेट में एसिडिटी महसूस होने पर तुरंत एंटासिड लेना कई लोगों की आदत बन जाती है। कभी-कभार एंटासिड का इस्तेमाल आम तौर पर परेशानी की बात नहीं होता, लेकिन यदि हर दिन इसकी जरूरत पड़ रही है तो इसे सामान्य गैस समझकर लगातार लेते रहना उचित नहीं है। बार-बार एसिडिटी होना किसी अन्य पाचन संबंधी समस्या का संकेत हो सकता है और ऐसे में केवल लक्षणों को दबाने के बजाय उसके कारण का पता लगाना जरूरी है।

    एंटासिड ऐसी दवाएं हैं जो पेट में मौजूद अतिरिक्त एसिड को निष्क्रिय करके कुछ समय के लिए जलन और असहजता से राहत देती हैं। अलग-अलग एंटासिड में अलग-अलग सक्रिय तत्व मौजूद हो सकते हैं। कैल्शियम या एल्यूमिनियम आधारित दवाओं के अधिक इस्तेमाल से कुछ लोगों को कब्ज की समस्या हो सकती है, जबकि मैग्नीशियम आधारित दवाओं से दस्त हो सकते हैं। लंबे समय तक या जरूरत से अधिक सेवन करने पर कुछ परिस्थितियों में शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन और किडनी के कामकाज पर भी असर पड़ सकता है।

    बार-बार एंटासिड या अन्य एसिड कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोगों में कुछ पोषक तत्वों के अवशोषण पर भी प्रभाव पड़ सकता है। लंबे समय तक एसिड कम करने वाली दवाओं के इस्तेमाल से कुछ लोगों में विटामिन बी12 या मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों की कमी का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि इसका खतरा दवा के प्रकार, मात्रा, इस्तेमाल की अवधि और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए लंबे समय तक दवा लेने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    रोज खाली पेट एंटासिड लेने की सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह है कि इससे बार-बार होने वाली एसिडिटी के वास्तविक कारण की पहचान में देरी हो सकती है। लगातार सीने में जलन या खट्टी डकार गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज यानी जीईआरडी, गैस्ट्राइटिस या पेप्टिक अल्सर जैसी स्थितियों से जुड़ी हो सकती है। ऐसे मामलों में केवल एंटासिड लेकर लक्षणों को दबाते रहना समस्या के उचित मूल्यांकन में देरी कर सकता है।

    शुरुआती तौर पर लंबे या बार-बार इस्तेमाल के दौरान कब्ज, दस्त, पेट में असहजता, मतली या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि इन लक्षणों का मतलब हमेशा एंटासिड से होने वाला नुकसान नहीं होता और इनके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसी तरह लगातार एसिडिटी बने रहना भी इस बात का संकेत हो सकता है कि दवा समस्या का पर्याप्त समाधान नहीं कर रही है।

    एसिडिटी से राहत के लिए खान-पान और दिनचर्या में बदलाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भोजन कम मात्रा में और नियमित समय पर लेना, बहुत तला-भुना तथा मसालेदार भोजन कम करना, खाने के तुरंत बाद न लेटना और रात में सोने से कुछ घंटे पहले भोजन कर लेना मददगार हो सकता है। अधिक वजन होने की स्थिति में वजन कम करने से भी रिफ्लक्स के लक्षणों में सुधार हो सकता है।

    यदि एसिडिटी लगातार कई सप्ताह से बनी हुई है या बार-बार एंटासिड लेने की जरूरत पड़ती है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। निगलने में कठिनाई, लगातार उल्टी, खून की उल्टी, काला मल, बिना कारण वजन कम होना या तेज सीने का दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। एंटासिड कभी-कभार राहत देने वाली दवा हो सकती है, लेकिन रोज खाली पेट इसकी जरूरत पड़ना समस्या के मूल कारण की जांच कराने का संकेत है।

  • पेट साफ न होने से त्वचा पर पड़ता है बुरा असर कब्ज के कारण मुंहासे और दाग-धब्बे संभव

    पेट साफ न होने से त्वचा पर पड़ता है बुरा असर कब्ज के कारण मुंहासे और दाग-धब्बे संभव

    नई दिल्ली । मानव स्वास्थ्य में पाचन तंत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालिया चिकित्सीय अध्ययनों और मेडिकल रिपोर्टों से यह स्पष्ट हुआ है कि क्रोनिक कब्ज यानी लंबे समय से चली आ रही पेट की समस्या केवल पाचन तंत्र को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि त्वचा के स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पाचन तंत्र में गड़बड़ी होने पर शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं। जब आंतें इन अपशिष्ट पदार्थों को प्रभावी ढंग से बाहर नहीं निकाल पातीं, तो शरीर अन्य माध्यमों से इन्हें बाहर करने का प्रयास करता है, जिससे त्वचा पर मुंहासे, दाग-धब्बे, काले घेरे और चकत्ते जैसी समस्याएं उभरने लगती हैं।

    ताइवान में किए गए एक व्यापक अध्ययन के आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि कब्ज से पीड़ित व्यक्तियों में सामान्य लोगों की तुलना में एक्जिमा जैसी त्वचा संबंधी बीमारी विकसित होने का जोखिम दो गुना तक अधिक देखा गया है। हालांकि इसके सटीक कारणों पर शोध अभी जारी है।

    चिकित्सकों के मुताबिक आंत और त्वचा दोनों ही शरीर में बाह्य तत्त्वों और एलर्जी के खिलाफ सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। जब आंतों के सामान्य कामकाज में रुकावट आती है, तो इसका प्रतिकूल असर चेहरे की चमक और त्वचा की रंगत पर साफ दिखाई देने लगता है।

    दिल्ली, मुंबई और मध्य प्रदेश के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सकों का मानना है कि असंतुलित खानपान और आधुनिक जीवनशैली के कारण कब्ज की समस्या आम होती जा रही है। महिलाओं और पुरुषों दोनों में ही यह समस्या त्वचा की नई जटिलताओं को जन्म दे रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस प्रकार की समस्याओं से बचने के लिए आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों और प्रोबायोटिक्स की मात्रा बढ़ानी चाहिए। भरपूर पानी का सेवन करने और नियमित दिनचर्या अपनाने से पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है जिससे त्वचा स्वस्थ बनी रहती है।

  • आंवला है पोषक तत्वों का खजाना, डाइट में सही तरीके से शामिल करने पर इम्युनिटी और पाचन समेत मिल सकते हैं कई फायदे

    आंवला है पोषक तत्वों का खजाना, डाइट में सही तरीके से शामिल करने पर इम्युनिटी और पाचन समेत मिल सकते हैं कई फायदे

    नई दिल्ली ।आंवला आकार में छोटा जरूर होता है, लेकिन पोषण के लिहाज से इसे बेहद उपयोगी फल माना जाता है। इसमें विटामिन C, फाइबर और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। भारतीय खान-पान में आंवले का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर शरीर को कई जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

    आंवले में मौजूद विटामिन C शरीर के सामान्य इम्यून फंक्शन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शरीर में एंटीऑक्सीडेंट की भूमिका भी निभाता है। इसलिए नियमित और संतुलित डाइट में आंवले को शामिल करना पोषण की दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को बीमारी से बचाव या इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    पाचन तंत्र के लिए भी आंवला उपयोगी हो सकता है। इसमें फाइबर मौजूद होता है, जो पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज में मदद करता है। पर्याप्त फाइबर का सेवन मल त्याग को नियमित रखने में सहायक हो सकता है। आंवले को सलाद, चटनी या भोजन के साथ शामिल करना डाइट में फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका हो सकता है।

    आंवले में मौजूद विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा के लिए भी महत्वपूर्ण पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। विटामिन C शरीर में कोलेजन बनाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। इसी वजह से संतुलित भोजन में आंवले को शामिल करना त्वचा की सामान्य सेहत के लिए उपयोगी हो सकता है।

    बालों की सेहत के संदर्भ में भी आंवले का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। आंवला खाने से मिलने वाले पोषक तत्व शरीर के समग्र पोषण में योगदान करते हैं। हालांकि केवल आंवला खाने से बालों से जुड़ी सभी समस्याएं दूर होने का दावा उचित नहीं है। बालों की अच्छी सेहत के लिए प्रोटीन, आयरन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा भी जरूरी होती है।

    आंवला विभिन्न एंटीऑक्सीडेंट यौगिकों का स्रोत भी है। शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का सामना करना पड़ सकता है। संतुलित आहार में शामिल फल और सब्जियां शरीर को अलग-अलग प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। आंवला इसी तरह के पौष्टिक खाद्य विकल्पों में शामिल किया जा सकता है।

    हृदय की सेहत के लिहाज से भी आंवले को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसमें फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि किसी एक फल को हृदय रोग से बचाव या उपचार का साधन मानना सही नहीं होगा। स्वस्थ हृदय के लिए संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और बेहतर जीवनशैली जरूरी है।

    आंवले को खाने का सबसे आसान तरीका इसे अच्छी तरह धोकर छोटे टुकड़ों में काटकर खाना है। स्वाद के लिए थोड़ी मात्रा में काला नमक या भुना जीरा मिलाया जा सकता है। इसे चटनी, सलाद या अन्य भोजन में भी शामिल किया जा सकता है।

    कई लोग आंवले का सेवन मुरब्बे और कैंडी के रूप में करते हैं, लेकिन ऐसे उत्पादों में अतिरिक्त चीनी हो सकती है। इसलिए रोजमर्रा की डाइट में ताजा आंवला या कम चीनी वाले विकल्पों को प्राथमिकता देना बेहतर हो सकता है। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या, एलर्जी या आहार संबंधी प्रतिबंध की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार इसका सेवन करना उचित रहेगा।

  • माइग्रेन के दर्द में क्यों फायदेमंद मानी जाती है अजवाइन? तनाव, गैस और सूजन के असर को समझिए, जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ

    माइग्रेन के दर्द में क्यों फायदेमंद मानी जाती है अजवाइन? तनाव, गैस और सूजन के असर को समझिए, जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ

    नई दिल्ली । माइग्रेन सामान्य सिरदर्द से अलग और अधिक जटिल न्यूरोलॉजिकल समस्या मानी जाती है। इस स्थिति में सिर के एक हिस्से में तेज धड़कन जैसा दर्द महसूस हो सकता है, जो कई घंटों से लेकर तीन दिनों तक भी बना रह सकता है। कई लोगों को इसके साथ मतली, उल्टी, तेज रोशनी या तेज आवाज से परेशानी जैसी समस्याएं भी होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि माइग्रेन के प्रभावी प्रबंधन के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि जीवनशैली, खानपान और संभावित ट्रिगर को पहचानना भी जरूरी है।

    माइग्रेन के पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। मानसिक तनाव, हार्मोनल बदलाव, पर्याप्त नींद न लेना, लंबे समय तक भूखे रहना, शरीर में पानी की कमी और कुछ विशेष खाद्य पदार्थ इसके प्रमुख ट्रिगर माने जाते हैं। इसके अलावा पाचन संबंधी समस्याएं, जैसे गैस, अपच और पेट फूलना भी कुछ लोगों में माइग्रेन की समस्या को बढ़ा सकती हैं। यही कारण है कि डॉक्टर माइग्रेन के मरीजों को संतुलित दिनचर्या अपनाने और ट्रिगर करने वाले कारणों से बचने की सलाह देते हैं।

    घरेलू उपायों की बात करें तो अजवाइन को लंबे समय से पाचन सुधारने वाले मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसमें थाइमोल नामक सक्रिय तत्व पाया जाता है, जिसे सूजन कम करने और शरीर को संक्रमण से बचाने वाले गुणों के लिए जाना जाता है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी संकेत मिले हैं कि थाइमोल शरीर में सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। चूंकि कई मामलों में सूजन माइग्रेन के दर्द की तीव्रता बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है, इसलिए अजवाइन कुछ लोगों में राहत देने में सहायक हो सकती है।

    आयुर्वेद में भी अजवाइन को पाचन तंत्र के लिए लाभकारी माना गया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पाचन तंत्र और मस्तिष्क के बीच गहरा संबंध होता है, जिसे गट-ब्रेन कनेक्शन कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति में गैस, अपच या पेट की अन्य समस्याएं माइग्रेन को ट्रिगर करती हैं, तो पाचन में सुधार से सिरदर्द की आवृत्ति या तीव्रता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि इसका असर हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता क्योंकि माइग्रेन के कारण अलग-अलग हो सकते हैं।

    अजवाइन में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी मौजूद होते हैं, जो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद कर सकते हैं। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कई स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए संतुलित मात्रा में अजवाइन का सेवन शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है, हालांकि इसे किसी बीमारी के निश्चित उपचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    कई लोग माइग्रेन के दौरान गर्म अजवाइन की पोटली या उसकी भाप का भी उपयोग करते हैं। माना जाता है कि इसकी तेज सुगंध कुछ लोगों में सिर के भारीपन और बेचैनी को कम करने में मदद कर सकती है। वहीं, अजवाइन का पानी भी पाचन बेहतर बनाने के लिए घरेलू उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यदि माइग्रेन का संबंध पाचन संबंधी गड़बड़ियों से है, तो इससे कुछ राहत मिल सकती है।

    विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि माइग्रेन एक चिकित्सकीय समस्या है और बार-बार होने वाले या गंभीर सिरदर्द की स्थिति में डॉक्टर से परामर्श लेना आवश्यक है। अजवाइन जैसे घरेलू उपाय केवल सहायक भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इन्हें दवा या चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। सही निदान, संतुलित जीवनशैली, पर्याप्त पानी, नियमित नींद और चिकित्सकीय सलाह का पालन ही माइग्रेन को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।

  • बारिश के मौसम में बढ़ जाता है पेट की बीमारियों का खतरा, इन आसान उपायों से रखें डाइजेशन बेहतर और शरीर फिट

    बारिश के मौसम में बढ़ जाता है पेट की बीमारियों का खतरा, इन आसान उपायों से रखें डाइजेशन बेहतर और शरीर फिट

    नई दिल्ली । मानसून का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ पाचन तंत्र से जुड़ी कई स्वास्थ्य चुनौतियां भी लेकर आता है। वातावरण में बढ़ी नमी के कारण बैक्टीरिया और वायरस तेजी से पनप सकते हैं, जिससे फूड पॉइजनिंग, गैस, अपच, दस्त, पेट दर्द और एसिडिटी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे समय में खानपान और व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान देकर इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, बारिश के मौसम में हमेशा ताजा और गर्म भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। लंबे समय तक खुले में रखा हुआ या बासी भोजन बैक्टीरिया की वृद्धि का कारण बन सकता है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। बाहर मिलने वाले खुले खाद्य पदार्थ, पहले से कटे फल और बिना ढके रखे भोजन से बचना बेहतर माना जाता है। घर पर ताजा तैयार किया गया भोजन पाचन तंत्र के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित होता है।

    मानसून में सुरक्षित पेयजल का सेवन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूषित पानी पेट संबंधी संक्रमण का प्रमुख कारण बन सकता है। इसलिए फिल्टर किया हुआ या अच्छी तरह उबाला गया पानी पीने की सलाह दी जाती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है और पाचन प्रक्रिया सामान्य रूप से काम करती है। यदि घर से बाहर जा रहे हों, तो अपने साथ साफ पानी की बोतल रखना एक अच्छी आदत हो सकती है।

    पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थों को भी आहार में शामिल किया जा सकता है। दही और छाछ जैसे खाद्य पदार्थ आंतों में लाभकारी बैक्टीरिया के संतुलन को बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं। इसके साथ ही खिचड़ी, दलिया, सूप, उबली सब्जियां और अन्य हल्के भोजन का सेवन पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव नहीं डालता और भोजन आसानी से पचने में मदद करता है।

    स्वच्छता का पालन मानसून में बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। भोजन करने से पहले और शौचालय के उपयोग के बाद साबुन से हाथ धोना, फल और सब्जियों को अच्छी तरह साफ करना तथा रसोई और बर्तनों की नियमित सफाई बनाए रखना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। छोटी-छोटी स्वच्छता संबंधी आदतें भी स्वास्थ्य की दृष्टि से बड़ा अंतर पैदा कर सकती हैं।

    बारिश के मौसम में तली-भुनी और अत्यधिक मसालेदार चीजें खाने की इच्छा बढ़ जाती है, लेकिन इनका अधिक सेवन पाचन संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है। अधिक तेल और मसाले वाला भोजन एसिडिटी, गैस और अपच जैसी परेशानियों का कारण बन सकता है। इसलिए संतुलित, पौष्टिक और हल्का भोजन चुनना अधिक लाभदायक माना जाता है।

    यदि लगातार पेट दर्द, दस्त, उल्टी, तेज बुखार या निर्जलीकरण जैसे लक्षण दिखाई दें, तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है। समय पर उपचार गंभीर जटिलताओं से बचाने में मदद कर सकता है। संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, स्वच्छता और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर मानसून के मौसम में पाचन तंत्र को बेहतर स्थिति में रखा जा सकता है और पूरे मौसम का आनंद स्वस्थ रहकर लिया जा सकता है।

  • बेली फैट कम करने के लिए कौन ज्यादा असरदार? जीरा पानी और मेथी पानी को लेकर एक्सपर्ट ने दूर किया बड़ा कन्फ्यूजन

    बेली फैट कम करने के लिए कौन ज्यादा असरदार? जीरा पानी और मेथी पानी को लेकर एक्सपर्ट ने दूर किया बड़ा कन्फ्यूजन

    नई दिल्ली। आजकल वजन कम करने के लिए लोग केवल जिम और डाइटिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि घरेलू उपायों और डिटॉक्स ड्रिंक्स की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी है। खासकर सुबह खाली पेट पी जाने वाली कुछ पारंपरिक ड्रिंक्स लोगों के बीच काफी चर्चा में रहती हैं। इनमें जीरा पानी और मेथी पानी का नाम सबसे ऊपर आता है। सोशल मीडिया और हेल्थ ट्रेंड्स के दौर में इन दोनों ड्रिंक्स को लेकर कई दावे किए जाते हैं कि ये तेजी से वजन कम करने, पेट की चर्बी घटाने और शरीर को डिटॉक्स करने में मदद कर सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों को लेकर लोगों के बीच कई गलतफहमियां भी मौजूद हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जीरा पानी और मेथी पानी दोनों के अपने-अपने फायदे हैं, लेकिन दोनों का काम करने का तरीका अलग है। इसलिए यह कहना कि इनमें से कोई एक सभी लोगों के लिए सबसे बेहतर है, पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता। व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, खानपान, पाचन क्षमता और लाइफस्टाइल के आधार पर इनके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।

    जीरा पानी को लंबे समय से पाचन सुधारने वाले घरेलू उपाय के रूप में देखा जाता रहा है। माना जाता है कि यह पेट से जुड़ी समस्याओं जैसे गैस, ब्लोटिंग और अपच में राहत पहुंचाने में मदद कर सकता है। जब पाचन बेहतर होता है तो शरीर भोजन को सही तरीके से प्रोसेस कर पाता है, जिससे वजन नियंत्रित रखने में अप्रत्यक्ष सहायता मिल सकती है। इसके अलावा शरीर में जमा अतिरिक्त पानी और भारीपन की समस्या कम होने से हल्कापन महसूस हो सकता है।

    दूसरी तरफ मेथी पानी का प्रभाव भूख नियंत्रण से जोड़कर देखा जाता है। इसमें मौजूद फाइबर पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करा सकता है, जिससे बार-बार खाने की इच्छा कम हो सकती है। जिन लोगों को अनावश्यक स्नैकिंग या ओवरईटिंग की आदत होती है, उनके लिए यह उपयोगी साबित हो सकता है। इसके अलावा ब्लड शुगर संतुलन में मदद मिलने से भी अचानक लगने वाली भूख कम हो सकती है।

    हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि इन ड्रिंक्स को वजन घटाने का जादुई उपाय मानना सही नहीं होगा। केवल जीरा या मेथी पानी पीने से तेजी से फैट लॉस होने की उम्मीद करना वास्तविकता से दूर हो सकता है। वजन घटाने के लिए संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, पानी का सही सेवन और तनाव नियंत्रण जैसे कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि इन ड्रिंक्स का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अधिक सेवन करने पर कुछ लोगों को पेट संबंधी दिक्कतें या अन्य परेशानियां हो सकती हैं। खासकर गर्भवती महिलाओं, मधुमेह की दवा लेने वालों और किसी पुरानी बीमारी से जूझ रहे लोगों को ऐसे घरेलू उपाय अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली की जगह कोई एक ड्रिंक नहीं ले सकती, बल्कि यह केवल अच्छी आदतों को सपोर्ट करने का काम करती है।

  • गर्मियों में खरबूजा खाने से पहले बरतें ये जरूरी सावधानियां, नहीं तो सेहत पर पड़ सकता है भारी असर

    गर्मियों में खरबूजा खाने से पहले बरतें ये जरूरी सावधानियां, नहीं तो सेहत पर पड़ सकता है भारी असर

    नई दिल्ली । गर्मियों के मौसम में जैसे ही तापमान बढ़ता है, बाजारों में रसीले और ठंडक देने वाले फलों की मांग भी तेजी से बढ़ जाती है। इन्हीं में खरबूजा एक ऐसा फल है जो अपनी मिठास, पानी की अधिक मात्रा और ठंडक देने वाले गुणों के कारण लोगों की पहली पसंद बन जाता है। यह फल शरीर को हाइड्रेट रखने, थकान दूर करने और गर्मी के प्रभाव को कम करने में मदद करता है, लेकिन इसके सेवन को लेकर सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि खरबूजा जितना फायदेमंद है, उतना ही कुछ परिस्थितियों में यह नुकसान भी पहुंचा सकता है। खासकर उन लोगों के लिए जो पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके लिए इसका सेवन सोच-समझकर करना आवश्यक है। शरीर की प्रकृति और पाचन क्षमता के अनुसार ही इस फल को आहार में शामिल करना उचित माना जाता है।

    डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए खरबूजा विशेष सावधानी की मांग करता है। इसमें प्राकृतिक शर्करा मौजूद होती है, जो रक्त में शुगर के स्तर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए ऐसे मरीजों को इसे सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए और अपने चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी तरह जिन लोगों का पाचन तंत्र कमजोर होता है, उन्हें भी खरबूजे के सेवन के बाद गैस, पेट फूलने और अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खाली पेट या अधिक मात्रा में इसका सेवन इन समस्याओं को और बढ़ा सकता है।

    इसके अलावा कुछ लोगों में खरबूजे से एलर्जी की समस्या भी देखी जाती है। ऐसे मामलों में इसे खाने के बाद गले में खुजली, त्वचा पर चकत्ते या होंठों में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत इसका सेवन बंद करना आवश्यक होता है। किडनी या लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी यह फल सीमित मात्रा में ही उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इसमें मौजूद पानी और पोटैशियम की अधिक मात्रा शरीर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

    आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार खरबूजा एक शीतल और पौष्टिक फल है, जो गर्मियों में शरीर को ऊर्जा और ठंडक दोनों प्रदान करता है। लेकिन इसके सेवन का सही समय भी महत्वपूर्ण होता है। भोजन के तुरंत बाद खरबूजा खाना पाचन क्रिया को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इसे खाने के बीच में या उचित अंतराल के बाद ही लेना बेहतर माना जाता है।

    विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सर्दी-खांसी जैसी स्थितियों में यदि किसी व्यक्ति को खरबूजा खाने के बाद असुविधा महसूस होती है, तो उसे अस्थायी रूप से इससे परहेज करना चाहिए। हालांकि सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के लिए यह फल बेहद लाभकारी और ताजगी देने वाला माना जाता है, बशर्ते इसका सेवन संतुलित मात्रा में किया जाए।

    गर्मी के मौसम में खरबूजा निश्चित रूप से एक बेहतरीन विकल्प है, लेकिन इसका सही उपयोग ही इसे स्वास्थ्य के लिए वरदान बनाता है, वरना यह लापरवाही में परेशानी का कारण भी बन सकता है।