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  • खंडहर से शिखर तक पहुंचा करौली, शिक्षा में बना देश का नंबर वन जिला…

    खंडहर से शिखर तक पहुंचा करौली, शिक्षा में बना देश का नंबर वन जिला…


    नई दिल्ली ।
    राजस्थान के Karauli जिले ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए पूरे देश में अपनी पहचान मजबूत कर ली है। कभी कमजोर आधारभूत ढांचे और जर्जर स्कूलों के लिए जाना जाने वाला यह जिला अब शिक्षा सुधार की एक प्रेरणादायक मिसाल बनकर उभरा है। हाल ही में NITI Aayog द्वारा जारी रैंकिंग में करौली ने शिक्षा क्षेत्र में देशभर में पहला स्थान प्राप्त किया है, जिससे पूरे राज्य में उत्साह का माहौल है।

    यह सफलता किसी एक दिन का परिणाम नहीं है, बल्कि लंबे समय से चल रहे योजनाबद्ध सुधारों और प्रशासनिक प्रयासों का नतीजा है। जिले को आकांक्षी जिलों की श्रेणी में शामिल किए जाने के बाद शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। धीरे धीरे स्कूलों की स्थिति में सुधार किया गया और शिक्षा को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए।

    पहले जहां कई सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद खराब थी, वहीं अब उनमें बड़े स्तर पर सुधार देखने को मिल रहा है। भवनों की मरम्मत, नई कक्षाओं का निर्माण और आवश्यक सुविधाओं का विस्तार किया गया। इसके साथ ही शिक्षकों की नियमित उपस्थिति और पढ़ाई की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे छात्रों के सीखने के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

    डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। स्कूलों में तकनीकी संसाधनों को शामिल किया गया, जिससे छात्रों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने में मदद मिली। इससे न केवल पढ़ाई का तरीका बदला, बल्कि छात्रों में सीखने की रुचि भी बढ़ी।

    प्रशासन ने लगातार निगरानी और मूल्यांकन की व्यवस्था को मजबूत किया, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सुधार योजनाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें। नियमित निरीक्षण और फीडबैक सिस्टम के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाया गया।

    इस उपलब्धि के लिए करौली जिले को तीन करोड़ रुपये की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की गई है। इस राशि का उपयोग स्कूलों के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने, नई कक्षाओं के निर्माण और शैक्षणिक संसाधनों को बढ़ाने में किया जाएगा। विशेष रूप से उन विद्यालयों की मरम्मत को प्राथमिकता दी जाएगी, जो हाल ही में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हुए थे।

    जिला प्रशासन ने इस उपलब्धि को सामूहिक प्रयास और मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम बताया है। अधिकारियों का कहना है कि आगे भी शिक्षा की गुणवत्ता को और बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास जारी रहेंगे।

    इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि सही योजना, निरंतर प्रयास और मजबूत नेतृत्व के जरिए किसी भी क्षेत्र में बड़ा बदलाव संभव है। करौली की यह सफलता अब देश के अन्य जिलों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है और शिक्षा सुधार की दिशा में एक नई उम्मीद जगाती है।

  • जबलपुर ग्वारीघाट पर 200 बच्चों की अनोखी क्लास: दिन में दुकान, शाम को पढ़ाई

    जबलपुर ग्वारीघाट पर 200 बच्चों की अनोखी क्लास: दिन में दुकान, शाम को पढ़ाई


    जबलपुर । गुरुवार की शाम करीब 6 बजे जब नर्मदा घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ नर्मदा आरती देखने जुटी थी उसी समय घाट किनारे छोटे छोटे बच्चे अपनी दुकानों पर बैठे थे। फूल प्रसाद खिलौने और अन्य सामान बेचते ये बच्चे कंधों पर स्कूल बैग टंगे हुए थे। परंतु जैसे ही शाम की आरती खत्म हुई घाट की सीढ़ियों पर बच्चों की आवाज़ें गूंजने लगीं। भारत माता की जय।

    देखते ही देखते करीब 300 बच्चे घाट की सीढ़ियों पर बैठ गए और वही बच्चे कुछ देर पहले दुकानों पर सामान बेच रहे थे। सामने लगे डिजिटल बोर्ड और छोटे साउंड सिस्टम के माध्यम से पराग भैया बच्चों को पढ़ा रहे थे। माहौल ऐसा था कि घाट पर मौजूद श्रद्धालु भी रुककर इस अनोखी क्लास को देखने लगे। छोटे छोटे बच्चे मैथ्स और विज्ञान के कठिन सवाल हल कर रहे थे।

    पराग भैया बताते हैं कि यह विचार उनकी मां के निधन के बाद आया। 2016 में मां की अस्थियां नर्मदा में विसर्जित करने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि अब उनका परिवार यही बच्चे हैं। शुरुआत सिर्फ 5 बच्चों से हुई थी लेकिन धीरे धीरे संख्या बढ़कर 200 से अधिक हो गई। शुरुआत में बच्चों को पढ़ाने के लिए 10 20 रुपए देने पड़ते थे लेकिन अब बच्चे स्वयं नियमित पढ़ाई के लिए घाट पर आते हैं।

    इस प्रयास में कई लोग मदद कर रहे हैं। लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने डिजिटल बोर्ड उपलब्ध कराया वहीं 26 जनवरी को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा ने 60 बच्चों को टैबलेट दिए जिससे डिजिटल पढ़ाई आसान हो गई।

    इन बच्चों के माता पिता अक्सर नाव चलाते हैं या घाट किनारे दुकाने लगाते हैं। कई बच्चे खुद भी दिनभर 60 70 रुपए तक कमाते हैं। 8वीं कक्षा की परी यादव बताती हैं कि वह दिनभर नारियल प्रसाद बेचती हैं शाम को बैग लेकर पढ़ने आती हैं। पहले पराग भैया उन्हें 20 रुपए देकर पढ़ाते थे अब वह बिना किसी पैसे के नियमित पढ़ाई में शामिल होती हैं।

    तीसरी कक्षा की खुशी खिलौनों की दुकान संभालती है और चौथी कक्षा की आराधना रिमोट कार चलवाती है। फिर भी दोनों शाम को पढ़ाई के लिए घाट पर जुटती हैं। इसी तरह 10वीं की छात्रा सान्या उईके जिसकी फीस न जमा होने के कारण एडमिट कार्ड नहीं मिला था पराग भैया के प्रयास से परीक्षा दे पाने में सफल हुई।

    पराग भैया की पराग ट्यूटोरियल कोचिंग 9वीं से 12वीं तक के छात्रों के लिए चलती है और आईआईटी नीट की तैयारी भी कराई जाती है। उनका लक्ष्य आगे ऐसा स्कूल खोलने का है जहां बड़े छात्र छोटे छात्रों को पढ़ाएं जिससे परिवारिक सैलरी और शिक्षा का लाभ सीधे छात्रों और उनके परिवार तक पहुंचे। यह अनोखी पहल न केवल बच्चों की शिक्षा के लिए प्रेरक है बल्कि यह साबित करती है कि कठिन परिस्थितियों में भी उत्साह अनुशासन और समर्पण से शिक्षा को आगे बढ़ाया जा सकता है।