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  • फिल्मफेयर 1962 की वह रात जब दिलीप कुमार रह गए पीछे राज कपूर ने मारी बाजी

    फिल्मफेयर 1962 की वह रात जब दिलीप कुमार रह गए पीछे राज कपूर ने मारी बाजी


    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसे मौके आए जब दर्शकों की पसंद और अवॉर्ड के फैसलों में अंतर देखने को मिला। ऐसा ही एक यादगार किस्सा साल 1962 के फिल्मफेयर अवॉर्ड से जुड़ा है। उस समय दिलीप कुमार और राज कपूर दोनों ही अपने करियर के शिखर पर थे और दोनों की फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी थी। यह मुकाबला केवल दो कलाकारों के बीच नहीं था बल्कि दो अलग अलग तरह की फिल्मों और सोच के बीच भी था।

    साल 1961 में दिलीप कुमार की फिल्म गंगा जमुना ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की। इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ मुख्य भूमिका निभाई बल्कि इसकी कहानी और पटकथा में भी योगदान दिया। यह फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित थी और इसमें भाईचारे सामाजिक संघर्ष और पारिवारिक भावनाओं को गहराई से दिखाया गया था। दिलीप कुमार ने गंगा नाम के किरदार में ऐसा अभिनय किया जिसे आज भी उनके सबसे मजबूत प्रदर्शनों में गिना जाता है। वैजयंती माला ने भी इस फिल्म में अहम भूमिका निभाई और कहानी को और प्रभावशाली बनाया। यह फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही और इसे आलोचकों की भी खूब सराहना मिली।

    इसी दौरान राज कपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है भी चर्चा में थी। इस फिल्म में राज कपूर ने राजू नाम के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया था जो अनाथ होता है और बाद में डाकुओं के समूह में पहुंच जाता है। कहानी में वह देखता है कि यह समूह अमीरों से लूटकर गरीबों की मदद करता है। धीरे धीरे उसका नजरिया बदलता है और वह अहिंसा और सुधार की राह पर चलता है। इस फिल्म का सामाजिक संदेश बहुत मजबूत था और यह आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई।

    जब फिल्मफेयर अवॉर्ड 1962 में घोषणा हुई तो सभी को उम्मीद थी कि बेस्ट एक्टर का पुरस्कार दिलीप कुमार को मिलेगा क्योंकि गंगा जमुना को एक मास्टरपीस माना जा रहा था। लेकिन नतीजा चौंकाने वाला रहा और यह अवॉर्ड राज कपूर को मिल गया। उनके किरदार की सामाजिक न्याय की भावना और बदलाव की कहानी को निर्णायक माना गया। उस समय जूरी ने माना कि राज कपूर का किरदार समाज में सकारात्मक संदेश देने वाला था और यही उन्हें बढ़त दिला गया।

    इस फैसले ने फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक चर्चा पैदा की। एक तरफ दिलीप कुमार की गहरी भावनात्मक अभिनय शैली थी और दूसरी तरफ राज कपूर का सामाजिक संदेश से भरा चरित्र था। अंत में पुरस्कार उस किरदार को मिला जिसने सामाजिक बदलाव की सोच को दर्शाया।

    यह घटना आज भी बॉलीवुड इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में याद की जाती है जब कला की श्रेष्ठता केवल अभिनय से नहीं बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से भी तय हुई।

  • देवदास: एक प्रेम कहानी जिसने दर्द को अमर बना दिया, 16 साल तक लिखने से डरते रहे लेखक

    देवदास: एक प्रेम कहानी जिसने दर्द को अमर बना दिया, 16 साल तक लिखने से डरते रहे लेखक


    नई दिल्ली। भारतीय साहित्य और सिनेमा के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो समय की सीमाओं को पार कर लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस जाते हैं। ऐसा ही एक नाम है ‘देवदास’। एक ऐसा किरदार, जिसके दर्द को दर्शकों ने अपना दर्द समझा, जिसकी अधूरी मोहब्बत ने लाखों दिलों को छुआ और जिसकी त्रासदी ने उसे अमर बना दिया।

    देवदास का जन्म वर्ष 1901 में महान साहित्यकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की कल्पना में हुआ था। कहा जाता है कि यह कहानी कहीं न कहीं उनके अपने जीवन के अनुभवों और भावनाओं से प्रेरित थी। लेकिन लेखक को इस किरदार को लेकर एक डर था। उन्हें लगता था कि उनका नायक आदर्शवादी नहीं है। वह प्रेम में असफल होता है, शराब का सहारा लेता है और अंततः दुखद मृत्यु को प्राप्त होता है। शायद इसी वजह से शरत चंद्र ने इस रचना को करीब 16 वर्षों तक प्रकाशित नहीं किया।

    आखिरकार 1917 में जब ‘देवदास’ उपन्यास प्रकाशित हुआ, तो उसने साहित्य जगत में तहलका मचा दिया। लोगों को इस कहानी में अपना दर्द दिखाई देने लगा। देवदास की अधूरी प्रेम कहानी, पारो के प्रति उसका समर्पण और समाज की बंदिशों के आगे उसकी हार ने पाठकों को भावुक कर दिया।

    साहित्य से निकलकर जब देवदास सिनेमा के पर्दे पर पहुंचा, तो उसकी लोकप्रियता कई गुना बढ़ गई। वर्ष 1928 में इस पर पहली मूक फिल्म बनी। इसके बाद 1936 में महान गायक-अभिनेता के.एल. सहगल ने देवदास को पर्दे पर जीवंत कर दिया। लेकिन 1955 में दिलीप कुमार ने जिस गहराई और संवेदनशीलता से इस किरदार को निभाया, उसने देवदास को भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर बना दिया।

    साल 2002 में निर्देशक संजय लीला भंसाली ने इस क्लासिक कहानी को भव्य अंदाज में पेश किया। फिल्म में शाहरुख खान ने देवदास, ऐश्वर्या राय ने पारो और माधुरी दीक्षित ने चंद्रमुखी का किरदार निभाया। फिल्म के भावनात्मक दृश्यों और भव्य प्रस्तुति ने दर्शकों को भावुक कर दिया। इसके बाद 2009 में अनुराग कश्यप ने आधुनिक अंदाज में ‘देव डी’ बनाकर इस कहानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।

    आज तक ‘देवदास’ पर 14 से अधिक फिल्में और रूपांतरण बन चुके हैं। शायद यही उसकी सबसे बड़ी सफलता है कि एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह किरदार लोगों के दिलों में जिंदा है। प्रेम, विरह, त्याग और आत्मसंघर्ष का यह प्रतीक भारतीय साहित्य और सिनेमा की सबसे अमर धरोहरों में गिना जाता है।

    देवदास सिर्फ एक पात्र नहीं, बल्कि एक ऐसी भावना है, जो हर उस इंसान को छूती है जिसने कभी प्रेम किया हो, खोया हो या दर्द को करीब से महसूस किया हो।

  • कारगिल युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने क्यों कराई थी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की दिलीप कुमार से बात

    कारगिल युद्ध के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने क्यों कराई थी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की दिलीप कुमार से बात

    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1999 में लड़ा गया कारगिल युद्ध न केवल सैन्य शौर्य बल्कि कूटनीतिक रणनीतियों के लिए भी जाना जाता है। इस युद्ध के दौरान पर्दे के पीछे का एक ऐसा ऐतिहासिक और बेहद चौंकाने वाला किस्सा सामने आया था, जब हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने देश के प्रति अपनी वफादारी निभाते हुए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को फोन पर खरी-खरी सुना दी थी।
    पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब ‘नाइदर ए हॉक नॉर ए डव’ में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से जिक्र किया है। यह वाकया उस समय का है जब पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के इस धोखे से बेहद आहत थे, क्योंकि कुछ ही समय पहले वे शांति का पैगाम लेकर खुद बस से लाहौर गए थे।

    किताब के अनुसार, एक दिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने कार्यालय में बैठे थे, तभी उनके एडीसी ने आकर सूचना दी कि भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनसे बेहद जरूरी बात करना चाहते हैं।

    फोन लाइन कनेक्ट होते ही वाजपेयी जी ने बेहद तल्ख और निराश आवाज में नवाज शरीफ से सीधे सवाल किया कि मियाां साहब, एक तरफ आप लाहौर में मुझसे गर्मजोशी से गले मिल रहे थे और दूसरी तरफ आपकी सेना ने हमारे कारगिल पर कब्जा कर लिया, यह कैसी दोस्ती है। इस अचानक हुए सीधे हमले से नवाज शरीफ पूरी तरह सकपका गए और उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्हें कारगिल की इस सैन्य कार्रवाई के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी और यह सब उनकी मर्जी के बिना हुआ है।

    अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ की इस सफाई पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया और अपनी कूटनीतिक रणनीति के तहत उनसे कहा कि अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है, तो जरा उस शख्स से बात कीजिए जो इस वक्त मेरे पास ही बैठा है। इसके बाद वाजपेयी जी ने फोन की कमान बॉलीवुड के ‘ट्रैजेडी किंग’ कहे जाने वाले अभिनेता दिलीप कुमार के हाथों में सौंप दी।

    जैसे ही फोन के दूसरी तरफ से दिलीप कुमार की आवाज गूंजी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पूरी तरह दंग रह गए। चूंकि दिलीप कुमार का जन्म विभाजन से पहले पेशावर में हुआ था, इसलिए पाकिस्तान की आवाम और वहां के हुक्मरानों के बीच भी उनके प्रति बेहद सम्मान और गहरी दीवानगी थी।

    फोन हाथ में लेते ही दिलीप कुमार ने बिना किसी संकोच के नवाज शरीफ को एक कड़ा और भावुक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मियाां साहब, हमें आपसे इस तरह के कदम की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी क्योंकि आपने हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति व्यवस्था बनाए रखने का दावा किया है।

    उन्होंने आगे एक हिंदुस्तानी मुस्लिम के दर्द को बयां करते हुए कहा कि जब भी दोनों देशों के बीच सरहद पर तनाव बढ़ता है, तो भारत के मुस्लिम खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और उनके लिए घरों से बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से खुदा के वास्ते इस गंभीर स्थिति को संभालने और तुरंत कुछ ठोस कदम उठाने की अपील की।

    हालांकि, इस ऐतिहासिक फोन कॉल के तुरंत बाद जमीनी स्तर पर युद्ध पूरी तरह तो नहीं रुका, लेकिन माना जाता है कि इससे कुछ समय के लिए कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हुई और सीमा पर तनाव को समझने में मदद मिली। यह युद्ध पूरे तीन महीने तक जारी रहा, जिसमें भारतीय सेना ने अपने वीर जवानों की शहादत और अदम्य साहस की बदौलत कारगिल की चोटियों से दुश्मनों को खदेड़कर दोबारा तिरंगा फहराया था।

    देश के प्रति दिलीप कुमार का यह जज्बा हमेशा से अटूट था, जिसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि साल 1947 में विभाजन के समय जब उनके परिवार को किसी ने पाकिस्तान लौटने की सलाह दी थी, तो उन्होंने दोटूक जवाब दिया था कि उनका वतन हिंदुस्तान ही है और वे यहीं जिएंगे और यहीं मरेंगे।
  • बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत जोड़ी की दर्दभरी कहानी, कोर्ट रूम में बिखर गया मधुबाला का सप

    बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत जोड़ी की दर्दभरी कहानी, कोर्ट रूम में बिखर गया मधुबाला का सप


    नई दिल्ली:भारतीय सिनेमा की एक आइकॉनिक अभिनेत्री Madhubala ने अपने करियर और खूबसूरती से दर्शकों के दिलों पर राज किया। 14 फरवरी 1933 को जन्मी मधुबाला का असली नाम मुमताज जहां देहलवी था। फिल्मों में रोमांटिक किरदार निभाने वाली मधुबाला असल जिंदगी में भी प्यार की तलाश में थीं। उनके जीवन की सबसे चर्चित लव स्टोरी Dilip Kumar के साथ जुड़ी रही, लेकिन इसका अंत बेहद दुखद और अप्रत्याशित रहा।

    मधुबाला और दिलीप कुमार की कहानी 1951 में आई फिल्म ‘तराना’ के सेट से शुरू हुई। इस रोमांस की शुरुआत उन्होंने ही की। मधुबाला ने अपने पर्सनल हेयरड्रेसर के माध्यम से दिलीप कुमार के कमरे में एक उर्दू खत और गुलाब का फूल भेजा। खत में लिखा था कि अगर दिलीप के दिल में भी वही भावनाएं हैं जो उनके अंदर हैं तो यह फूल स्वीकार कर लें। दिलीप कुमार ने भी यह फूल स्वीकार किया और दोनों के बीच प्यार की शुरुआत हुई।

    इनका रिश्ता सार्वजनिक तौर पर भी कई बार देखा गया। पहली बार दोनों को हाथ पकड़कर एक प्रीमियर में एंट्री करते देखा गया। एक पत्रकार ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखा कि यह दृश्य उनकी यादों से कभी धुंधला नहीं होगा। इस प्रकार उनका प्यार धीरे-धीरे सार्वजनिक भी हुआ।

    लेकिन साल 1956 में मधुबाला की जिंदगी में तूफान आया। बीआर चोपड़ा ने फिल्म ‘नया दौर’ लॉन्च की और मधुबाला को लीड रोल में लिया। दस दिन की शूटिंग के बाद आउटडोर शूट होना था, लेकिन मधुबाला के पिता ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने पैसे लौटाने से भी मना कर दिया और मामला कोर्ट तक पहुँच गया। इस विवाद में दिलीप कुमार ने मधुबाला का साथ न देकर बीआर चोपड़ा के पक्ष में गवाही दी। माना जाता है कि दिलीप कुमार और मधुबाला के पिता के बीच तालमेल बिल्कुल नहीं था।

    कोर्ट में जो हुआ उसने मधुबाला को तोड़कर रख दिया। वह अपने प्यार को न्यायिक बहस के बीच देख रही थीं। दिलीप कुमार ने कहा कि वह हमेशा मधुबाला को प्यार करते रहेंगे लेकिन पिता और केस के बीच उनका रिश्ता बिखर गया। मधुबाला ने बाद में कहा कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि वही व्यक्ति है जिसे उन्होंने इतना प्यार किया। उनकी बहन ने बताया कि मधुबाला की मौत दो बार हुई, पहली बार कोर्ट रूम में और दूसरी बार वास्तविक जीवन में।

    मधुबाला और दिलीप कुमार की कहानी केवल बॉलीवुड की एक रोमांटिक कहानी नहीं बल्कि यह उस दौर की सामाजिक और पारिवारिक बाधाओं की झलक भी है। पिता की रोकथाम, फिल्म इंडस्ट्री के दबाव और कोर्ट ड्रामे ने उनके नौ साल के प्यार को अधूरा छोड़ दिया। आज भी मधुबाला की खूबसूरती और दिलीप कुमार संग उनका प्यार दर्शकों के दिलों में अमिट है।

    इस लव स्टोरी से यह साफ होता है कि सिनेमा की दुनिया में सिर्फ ऑन-स्क्रीन रोमांस ही नहीं बल्कि असल जिंदगी में भी प्यार को कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मधुबाला और दिलीप कुमार की अधूरी मोहब्बत आज भी बॉलीवुड प्रेम कहानियों में सबसे दुखद और यादगार कहानी मानी जाती है।