Tag: DiljitDosanjh

  • दिलजीत दोसांझ की सतलुज पर सियासी संग्राम तेज अकाली दल ने हर गांव में स्क्रीनिंग का किया ऐलान

    दिलजीत दोसांझ की सतलुज पर सियासी संग्राम तेज अकाली दल ने हर गांव में स्क्रीनिंग का किया ऐलान


    नई दिल्ली । पंजाबी अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। फिल्म को रिलीज के कुछ समय बाद ही प्लेटफॉर्म से हटाए जाने पर कई संगठनों ने सवाल उठाए हैं। इसी बीच शिरोमणि अकाली दल ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि वह इस फिल्म को पंजाब के हर गांव और हर क्षेत्र में लोगों तक पहुंचाएगा ताकि नई पीढ़ी राज्य के इतिहास के उस दौर से परिचित हो सके जिसे लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है।

    शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि फिल्म में जिन घटनाओं और परिस्थितियों को दिखाया गया है उन्हें समाज के सामने आना चाहिए। उनका कहना है कि पंजाब के कठिन दौर को समझना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है और इसी उद्देश्य से पार्टी गांव गांव में फिल्म की स्क्रीनिंग करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास से जुड़े विषयों को लोगों तक पहुंचने से रोकना उचित नहीं माना जा सकता।

    यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष से प्रेरित बताई जा रही है। फिल्म में 1990 के दशक के दौरान पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों से जुड़े मामलों की पृष्ठभूमि को दिखाया गया है। खालड़ा ने उस समय कथित तौर पर ऐसे मामलों की जांच कर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखने का दावा किया था। यही विषय फिल्म के केंद्र में है और इसी कारण यह चर्चा का विषय बनी हुई है।

    फिल्म के ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर व्यापक बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग उठाई जबकि कुछ संगठनों ने सार्वजनिक प्रदर्शन की घोषणा की। इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं जिससे मामला और अधिक चर्चा में आ गया।

    इसी क्रम में सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने भी 14 जुलाई को विशेष अरदास आयोजित करने की घोषणा की है। यह कार्यक्रम हरीके पत्तन स्थित सतलुज नदी के किनारे आयोजित किया जाएगा जहां उन लोगों की आत्मा की शांति और उनके परिवारों के लिए न्याय की प्रार्थना की जाएगी जिनका उल्लेख उस दौर की घटनाओं के संदर्भ में किया जाता है। धार्मिक सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

    दूसरी ओर फिल्म को हटाने के फैसले को लेकर भी अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्मों की समीक्षा जरूरी है जबकि अन्य इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं। इसी बीच यह भी जानकारी सामने आई है कि संबंधित मामले की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित किए जाने की बात कही गई है ताकि पूरे घटनाक्रम की जांच की जा सके।

    फिलहाल सतलुज फिल्म केवल मनोरंजन का विषय नहीं रह गई है बल्कि यह इतिहास राजनीति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर होने वाले फैसले और घटनाक्रम पर पूरे देश की नजर बनी रहेगी।

  • OTT से हटने के बाद गुरुद्वारों तक पहुंची दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’, पांच राज्यों में कम्युनिटी स्क्रीनिंग की तैयारी, जसवंत सिंह खालरा की कहानी फिर बनेगी चर्चा का केंद्र

    OTT से हटने के बाद गुरुद्वारों तक पहुंची दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’, पांच राज्यों में कम्युनिटी स्क्रीनिंग की तैयारी, जसवंत सिंह खालरा की कहानी फिर बनेगी चर्चा का केंद्र

    नई दिल्ली । दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ एक बार फिर चर्चा में है। डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अब इस फिल्म को देश के विभिन्न गुरुद्वारों में सामुदायिक स्क्रीनिंग के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने की तैयारी शुरू हो गई है। सिख धार्मिक संस्थाओं की इस पहल का उद्देश्य मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके संघर्ष को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना बताया जा रहा है। इसके तहत पंजाब के साथ हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और जम्मू में भी विशेष स्क्रीनिंग आयोजित करने की योजना बनाई गई है।

    फिल्म के प्रदर्शन को लेकर कई गुरुद्वारा प्रबंधन समितियां एकजुट होकर कार्यक्रम तैयार कर रही हैं। जम्मू में 10 से 13 जुलाई के बीच अलग-अलग गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग का कार्यक्रम प्रस्तावित है, जबकि जयपुर में भी विशेष आयोजन की तैयारी की गई है। दिल्ली में भी सिख समुदाय से जुड़े संगठन इस पहल का समर्थन कर रहे हैं और फिल्म को फिर से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि फिल्म डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध नहीं है तो सामुदायिक स्तर पर लोगों को इसे देखने का अवसर मिलना चाहिए।

    सामुदायिक संगठनों का मानना है कि जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित यह कहानी केवल एक फिल्म नहीं बल्कि इतिहास और मानवाधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को सामने लाने का माध्यम है। उनका कहना है कि किसी भी कारण से यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी पहुंच सीमित हो जाती है तो समाज के स्तर पर ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि यह कहानी लोगों तक पहुंचती रहे। इसी सोच के साथ विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं स्क्रीनिंग की तैयारियों में जुटी हैं।

    फिल्म का सफर भी काफी लंबा और चुनौतीपूर्ण रहा है। निर्माण पूरा होने के बाद इसे प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान कई स्तरों पर बदलाव और कटौती के सुझावों का सामना करना पड़ा। शुरुआती चरण में फिल्म का शीर्षक बदला गया और कई संशोधनों की बात सामने आई। बाद में समीक्षा प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में अतिरिक्त बदलाव सुझाए गए, जिनमें प्रमुख पात्र से जुड़े परिवर्तन भी शामिल थे। फिल्म निर्माताओं ने इन संशोधनों को स्वीकार नहीं किया, जिसके चलते इसकी रिलीज लंबे समय तक टलती रही।

    इसके बाद फिल्म का संस्करण डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया, लेकिन रिलीज के कुछ ही समय बाद इसे हटा दिया गया। इस फैसले के बाद कई सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। फिल्म को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक विषयों की प्रस्तुति और सार्वजनिक पहुंच जैसे मुद्दों पर भी चर्चा तेज हो गई। इस बीच अब गुरुद्वारों में होने वाली सामुदायिक स्क्रीनिंग ने फिल्म को एक नया मंच प्रदान कर दिया है।

    हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ के साथ अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओल्यान प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए हैं। सामुदायिक स्क्रीनिंग की इस पहल से फिल्म एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है और आने वाले दिनों में इसके जरिए बड़ी संख्या में दर्शकों तक इसकी कहानी पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।

  • 'सतलुज' हटने पर पंजाब में सियासी संग्राम, दिलजीत दोसांझ की फिल्म की बहाली को BJP, कांग्रेस, AAP और अकाली दल एकजुट

    'सतलुज' हटने पर पंजाब में सियासी संग्राम, दिलजीत दोसांझ की फिल्म की बहाली को BJP, कांग्रेस, AAP और अकाली दल एकजुट

    नई दिल्ली । अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस छिड़ गई है। रिलीज के कुछ ही समय बाद फिल्म के भारत में उपलब्ध नहीं रहने से विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। कई नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऐतिहासिक तथ्यों से जुड़े विमर्श का विषय बताते हुए फिल्म को तत्काल बहाल करने की मांग की है।

    फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। इसमें पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध हत्याओं से जुड़े मामलों को दर्शाया गया है। इसी कारण फिल्म के अचानक हटने के बाद यह मामला केवल मनोरंजन जगत तक सीमित न रहकर राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

    पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल सहित कई दलों के नेताओं ने अलग-अलग बयान जारी कर फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित किसी रचना को सार्वजनिक विमर्श से हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

    कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि फिल्म में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनसे जुड़े कई मामलों पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। उनके अनुसार इस प्रकार की फिल्म को हटाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से फिल्म को पुनः उपलब्ध कराने की मांग की।

    शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी इस कदम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास से जुड़े संवेदनशील विषयों पर खुली चर्चा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने भी कहा कि फिल्म एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन पर आधारित है और इस मामले पर संबंधित पक्षों को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए।

    आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी फिल्म हटाने के निर्णय पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति को स्वतंत्र वातावरण मिलना चाहिए तथा ऐसे मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। वहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रतिनिधियों ने भी ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को सार्वजनिक चर्चा का माध्यम बताते हुए प्रतिबंध के बजाय संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।

    इस विवाद पर कानूनी क्षेत्र से भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़े मामलों में कार्य कर चुके कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि फिल्म में प्रस्तुत कई घटनाएं न्यायिक और जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड का हिस्सा रही हैं। उनके अनुसार किसी फिल्म को हटाने से इतिहास से जुड़े प्रश्न समाप्त नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक बहस और अधिक तेज हो सकती है।

    दूसरी ओर कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से भी इस विषय को देखने की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि संवेदनशील विषयों पर आधारित सामग्री के प्रसारण के दौरान सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे विषयों पर तथ्यात्मक चर्चा लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    फिल्म की रिलीज से पहले भी इसे लंबी सेंसर प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। बताया जाता है कि शुरुआती चरण में फिल्म के शीर्षक और सामग्री को लेकर कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। बाद में संशोधित शीर्षक के साथ इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसकी उपलब्धता समाप्त हो गई, जिससे विवाद और गहरा गया।

    फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व और उनके संघर्ष से जुड़े विचारों को दबाया नहीं जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम के बाद ‘सतलुज’ एक फिल्म से आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक विमर्श और सार्वजनिक संवाद से जुड़ा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।

  • फिल्म, विवाद और सियासत के बीच दिलजीत दोसांझ चर्चा में, क्या 'सतलुज' के बाद बदलने वाली है पंजाब की राजनीति?

    फिल्म, विवाद और सियासत के बीच दिलजीत दोसांझ चर्चा में, क्या 'सतलुज' के बाद बदलने वाली है पंजाब की राजनीति?

    नई दिल्ली । अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ एक बार फिर अपनी फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। लंबे समय तक विवादों और इंतजार के बाद ओटीटी पर रिलीज हुई यह फिल्म पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और 1990 के दशक की घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के सामने आने के साथ ही पंजाब में फिल्मों और राजनीति के पुराने रिश्ते पर नई बहस शुरू हो गई है। साथ ही, दिलजीत के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी अटकलों का दौर तेज हो गया है।

    फिल्म में पंजाब के उस दौर को दिखाया गया है जब राज्य उग्रवाद और सुरक्षा अभियानों के कारण लगातार सुर्खियों में था। कहानी कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और उन मामलों की पड़ताल पर केंद्रित है, जिन्होंने वर्षों तक सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया। इसी संवेदनशील विषय के कारण फिल्म लंबे समय तक विवादों में रही और इसके शीर्षक तथा अन्य पहलुओं को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई।

    पंजाब में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्मों की चर्चा चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती है। हालांकि इस बात पर राय अलग-अलग है कि फिल्म का सीधा चुनावी असर कितना होगा। कुछ लोगों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित रहेगा, जबकि अन्य इसे जनभावनाओं और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाला मान रहे हैं।

    पंजाब में फिल्मों और राजनीतिक विवादों का इतिहास नया नहीं है। राज्य के इतिहास, धार्मिक भावनाओं, सामाजिक मुद्दों और राजनीतिक घटनाओं पर आधारित कई फिल्मों को पहले भी विरोध और विवाद का सामना करना पड़ा है। विभिन्न अवसरों पर सेंसर प्रक्रिया, प्रदर्शन और सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं ने इन फिल्मों को चर्चा का विषय बनाया है। ऐसे मामलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन पर भी सवाल खड़े किए हैं।

    दिलजीत दोसांझ भी पिछले कुछ वर्षों में कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने के कारण चर्चा में रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने किसानों के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी थी। हालांकि उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और खुद को केवल एक कलाकार मानते हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि राजनीति में आने की उनकी कोई योजना नहीं है।

    बीते समय में देश और विदेश में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान भी दिलजीत कई बार सुर्खियों में रहे। उन्होंने विभिन्न मंचों पर पंजाबी संस्कृति और प्रवासी समुदाय की उपलब्धियों का उल्लेख किया, वहीं विवादित राजनीतिक प्रतीकों और अलगाववादी विचारों से दूरी बनाए रखने की भी कोशिश की। उनके इन बयानों को कई लोगों ने संतुलित सार्वजनिक रुख के रूप में देखा।

    राजनीतिक गलियारों में समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि लोकप्रिय कलाकार भविष्य में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन सकते हैं। दिलजीत के मामले में भी ऐसी अटकलें लगती रही हैं, लेकिन उन्होंने अब तक किसी राजनीतिक दल से जुड़ने या चुनाव लड़ने का संकेत नहीं दिया है। उनके हालिया बयान भी यही दर्शाते हैं कि फिलहाल उनका पूरा ध्यान अभिनय, संगीत और सामाजिक विषयों पर आधारित रचनात्मक कार्यों पर है।

    फिलहाल ‘सतलुज’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास, सामाजिक विमर्श और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई चर्चा का माध्यम बन गई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म को दर्शकों का कितना व्यापक समर्थन मिलता है और क्या इससे जुड़ी राजनीतिक चर्चाएं चुनावी माहौल तक कोई प्रभाव छोड़ पाती हैं।

  • दिलजीत दोसांझ हमेशा साथ रखते हैं गुटका साहिब, जानिए सिख परंपरा में क्यों माना जाता है इसे आस्था और अनुशासन का प्रतीक

    दिलजीत दोसांझ हमेशा साथ रखते हैं गुटका साहिब, जानिए सिख परंपरा में क्यों माना जाता है इसे आस्था और अनुशासन का प्रतीक

    नई दिल्ली । प्रसिद्ध गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने हाल ही में साझा किया कि वह जब भी घर से बाहर निकलते हैं, अपने साथ गुटका साहिब अवश्य रखते हैं। उनका यह वक्तव्य एक बार फिर सिख परंपरा में गुटका साहिब के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को चर्चा का विषय बना रहा है। सिख समुदाय में इसे केवल एक प्रार्थना पुस्तिका नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में ईश्वर के स्मरण, अनुशासन और आध्यात्मिक संतुलन का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।

    गुटका साहिब आकार में छोटा और साथ रखने में सुविधाजनक धार्मिक ग्रंथ है। इसमें सिख धर्म की प्रमुख वाणियों और दैनिक पाठों का संकलन होता है। इसकी पोर्टेबल संरचना के कारण श्रद्धालु इसे यात्रा, कार्यस्थल या घर से बाहर रहते हुए भी आसानी से अपने साथ रख सकते हैं। यही कारण है कि अनेक सिख श्रद्धालुओं की तरह दिलजीत दोसांझ भी इसे अपने दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।

    गुटका साहिब में सामान्यतः जापजी साहिब, जाप साहिब, तव-प्रसाद सवैये, रेहरास साहिब, कीर्तन सोहिला तथा अन्य महत्वपूर्ण वाणियों का संकलन शामिल होता है। अलग-अलग प्रकाशनों में इसकी सामग्री में कुछ अंतर हो सकता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य श्रद्धालुओं को दैनिक प्रार्थनाओं के लिए एक सुविधाजनक और सम्मानजनक संकलन उपलब्ध कराना होता है। इससे व्यक्ति नियमित रूप से गुरबाणी का पाठ कर अपने आध्यात्मिक जीवन से जुड़ा रह सकता है।

    सिख परंपरा में प्रार्थना को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संयम, सेवा, विनम्रता और सकारात्मक सोच के साथ जीने का मार्ग माना जाता है। सुबह, शाम और रात्रि के निर्धारित पाठ श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुशासन बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। गुटका साहिब इन्हीं दैनिक पाठों को सरल और व्यवस्थित रूप में उपलब्ध कराता है, जिससे व्यस्त जीवन और यात्रा के दौरान भी नियमित प्रार्थना जारी रखी जा सके।

    सिख समुदाय में गुटका साहिब को अत्यंत सम्मान के साथ रखा जाता है। इसे हमेशा स्वच्छ स्थान पर रखने, आदरपूर्वक स्पर्श करने और पाठ के समय पूर्ण श्रद्धा बनाए रखने की परंपरा है। धार्मिक ग्रंथ के प्रति सम्मान को सिख आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है और श्रद्धालु इसके रख-रखाव से जुड़े धार्मिक मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखते हैं।

    दिलजीत दोसांझ का गुटका साहिब को हमेशा अपने साथ रखना उनकी व्यक्तिगत आस्था और आध्यात्मिक जुड़ाव का प्रतीक माना जा सकता है। लगातार यात्राओं और व्यस्त कार्यक्रमों के बावजूद धार्मिक मूल्यों से जुड़े रहने की यह परंपरा अनेक सिख श्रद्धालुओं के जीवन में भी दिखाई देती है। गुटका साहिब उनके लिए केवल प्रार्थना का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और गुरु परंपरा से निरंतर जुड़े रहने का एक महत्वपूर्ण आधार भी है। इसी कारण यह सिख जीवनशैली और धार्मिक आचरण का एक सम्मानित एवं महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।

  • मुझे राजनीति से दूर रहने दो', जंतर-मंतर प्रदर्शन पर दिलजीत दोसांझ की दोटूक प्रतिक्रिया, बोले- मैं कलाकार हूं, नेता नहीं

    मुझे राजनीति से दूर रहने दो', जंतर-मंतर प्रदर्शन पर दिलजीत दोसांझ की दोटूक प्रतिक्रिया, बोले- मैं कलाकार हूं, नेता नहीं

    नई दिल्ली। पंजाबी गायक और अभिनेता दिलजीत दोसांझ एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे कथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन पर टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया। सोशल मीडिया पर लाइव बातचीत के दौरान जब उनसे इस प्रदर्शन को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह राजनीति से दूरी बनाए रखना चाहते हैं और खुद को केवल एक कलाकार मानते हैं।

    दिलजीत हाल ही में अपने प्रशंसकों के साथ इंस्टाग्राम लाइव के माध्यम से जुड़े थे। इस दौरान उन्होंने अपने आगामी प्रोजेक्ट्स, संगीत और फिल्मों से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए। बातचीत के बीच जब एक दर्शक ने उनसे जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के बारे में प्रतिक्रिया मांगी, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है और वह किसी राजनीतिक विवाद का हिस्सा नहीं बनना चाहते।

    उन्होंने बातचीत में कहा कि उन्हें ऐसे मामलों से दूर ही रखा जाए क्योंकि वह किसी राजनीतिक भूमिका में नहीं हैं। उनका कहना था कि वह एक कलाकार हैं और उनका काम लोगों का मनोरंजन करना है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जूझ रहा है और जीवन में सभी परिस्थितियां कभी पूरी तरह अनुकूल नहीं हो सकतीं।

    दिलजीत ने अपने अंदाज में यह भी कहा कि जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, वे भी अपनी बात रखने का अधिकार रखते हैं और जिनके खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है, उनका भी अपना पक्ष हो सकता है। उन्होंने किसी भी पक्ष का समर्थन या विरोध करने से बचते हुए कहा कि बिना पूरी जानकारी के किसी मुद्दे पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। इसी कारण उन्होंने पूरे विवाद पर तटस्थ रुख अपनाया।

    उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गया। कई लोगों ने उनके इस रुख को एक कलाकार की पेशेवर सोच बताया, जबकि कुछ लोगों ने सार्वजनिक जीवन से जुड़े चर्चित चेहरों की सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भूमिका को लेकर अलग-अलग राय भी व्यक्त की। हालांकि दिलजीत ने अपने बयान में किसी संगठन, व्यक्ति या प्रदर्शन की प्रकृति पर कोई टिप्पणी नहीं की और केवल राजनीति से दूरी बनाए रखने की बात दोहराई।

    दिलजीत दोसांझ पिछले कुछ समय से अपनी फिल्मों, अंतरराष्ट्रीय कॉन्सर्ट्स और संगीत परियोजनाओं को लेकर लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। देश और विदेश में उनकी बड़ी प्रशंसक संख्या है और सोशल मीडिया पर भी उनकी सक्रिय मौजूदगी रहती है। ऐसे में उनके किसी भी बयान पर लोगों की नजर रहती है।

    फिलहाल उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी प्राथमिकता कला और मनोरंजन है तथा वह राजनीतिक या विवादित विषयों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचना पसंद करते हैं। इसी वजह से उन्होंने जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन को लेकर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।