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  • एशियन पैरा गेम्स : शीतल-तोमन की जोड़ी ने तीरंदाजी में जीता स्वर्ण, सुवर्णा को डिस्कस थ्रो में मिला गोल्ड

    एशियन पैरा गेम्स : शीतल-तोमन की जोड़ी ने तीरंदाजी में जीता स्वर्ण, सुवर्णा को डिस्कस थ्रो में मिला गोल्ड


    आइची नागोया।
    एशियन पैरा गेम्स 2026 (Asian Para Games 2026) के चौथे दिन भारत (India) ने सुवर्णा राज (Suvarna Raj) के स्वर्ण और स्वाति चौधरी (Swati Chaudhary) के ऐतिहासिक रजत के साथ शानदार शुरुआत की। सुवर्णा ने महिला डिस्कस थ्रो एफ54 में 15.66 मीटर के थ्रो से स्वर्ण जीता। वहीं, स्वाति महिला डब्ल्यू1 तीरंदाजी में भारत का पहला पदक जीतने वाली खिलाड़ी बनीं। पैरा बैडमिंटन में भी भारत ने दो कांस्य पदक जीते और एक जोड़ी फाइनल में पहुंची। इसके साथ ही शीतल देवी और तोमन कुमार ने पैरा कंपाउंड मिक्स्ड टीम में स्वर्ण जीता।

    शीतल देवी और तोमन कुमार ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। भारतीय जोड़ी ने पैरा कंपाउंड मिक्स्ड टीम के फाइनल में इंडोनेशिया को 151-148 से हराकर खिताब अपने नाम किया। कड़े मुकाबले में दोनों ने संयम बनाए रखा और भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। नागोया में भारत के खाते में एक और स्वर्ण पदक जुड़ गया। शीतल देवी ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी सफलता में नया अध्याय जोड़ा। इस स्वर्ण पदक के साथ दोनों का ऐतिहासिक अभियान पूरा हुआ। इससे पहले भारतीय जोड़ी ने रैंकिंग राउंड में 1,402 अंक का शानदार संयुक्त स्कोर बनाकर विश्व रिकॉर्ड तोड़ा था। फाइनल में जीत के साथ दोनों ने अपने दमदार प्रदर्शन पर स्वर्णिम मुहर लगा दी।

    सुवर्णा राज ने महिला डिस्कस थ्रो एफ54 स्पर्धा में 15.66 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करके स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने अपने पहले प्रयास में 13.68 मीटर की दूरी हासिल की, जबकि दूसरे प्रयास में 15.09 मीटर तक डिस्कस फेंका। इसके बाद पांचवें प्रयास में उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। ईरान की शाहिद हबीबी ने 15.45 मीटर के थ्रो के साथ रजत पदक जीता। वह सुवर्णा से महज 21 सेंटीमीटर पीछे रहीं। वियतनाम की गुयेन थी न्गोक थuy ने 14.65 मीटर के थ्रो के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया।

    सुवर्णा राज भारत की अनुभवी पैरा एथलीट हैं और व्हीलचेयर का इस्तेमाल करती हैं। वह तीन एशियन पैरा गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और 2017 से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। जनवरी 2026 में कैनबरा ट्रैक मीट में उन्होंने डिस्कस थ्रो में स्वर्ण और शॉट पुट में रजत पदक जीता था। इसके बाद दुबई वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स ग्रां प्री में भी उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया।

    खेल के अलावा सुवर्णा दिव्यांगजनों के अधिकारों और सुगम्यता के लिए भी काम करती हैं। वह भारत में 1,000 से अधिक सुगम्यता ऑडिट कर चुकी हैं और उन्हें 2015 में राष्ट्रीय युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

    भारत ने पैरा बैडमिंटन में दो और कांस्य पदक अपने नाम किए। पुरुष एकल एसएल4 स्पर्धा में सुहास यथिराज और अभिजीत सुखुजा ने कांस्य पदक जीते। सुहास ने इंडोनेशिया के पैरालंपिक पदक विजेता फ्रेडी सेतियावान को कड़ी टक्कर दी, लेकिन तीन गेम तक चले मुकाबले में उन्हें 21-23, 21-8, 15-21 से हार का सामना करना पड़ा। वहीं, अभिजीत को हमवतन नवीन शिवकुमार के खिलाफ 13-21, 15-21 से शिकस्त मिली। अब नवीन और सेतियावान फाइनल में आमने-सामने होंगे। इस तरह स्वर्ण पदक के मुकाबले में भारत का एक खिलाड़ी जरूर पहुंचेगा।

    भारत के खाते में बैडमिंटन का एक और कांस्य पदक जुड़ गया। संजना कुमारी ने महिला एकल एसएल3 स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। उन्हें सेमीफाइनल में जापान की शिनो कावाई के खिलाफ 7-21, 9-21 से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के साथ संजना का स्वर्ण पदक जीतने का सपना टूट गया, लेकिन उन्होंने कांस्य पदक के साथ प्रतियोगिता का समापन किया। नागोया में बैडमिंटन में भारत के पदकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।


    भारत के 70 पदक, छठे स्थान पर देश

    एशियन पैरा गेम्स 2026 की पदक तालिका में भारत 15 स्वर्ण, 22 रजत और 33 कांस्य सहित कुल 70 पदक जीतकर छठे स्थान पर है। भारत को सबसे ज्यादा 43 पदक पैरा एथलेटिक्स में मिले हैं, जिनमें 14 स्वर्ण, 13 रजत और 16 कांस्य शामिल हैं। पैरा बैडमिंटन और पैरा तैराकी में छह-छह, पैरा टेबल टेनिस में पांच और पैरा शूटिंग में चार पदक मिले हैं। वहीं, पैरा तीरंदाजी, पैरा जूडो और पैरा पावरलिफ्टिंग में भारत ने दो-दो पदक जीते हैं। पदक तालिका में चीन 249 पदकों (116 स्वर्ण) के साथ शीर्ष पर है, जबकि उज्बेकिस्तान 98 पदकों के साथ दूसरे और मेजबान जापान 106 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर है। दक्षिण कोरिया 52 पदकों के साथ चौथे और ईरान 66 पदकों के साथ पांचवें स्थान पर है। भारत के स्वर्ण पदकों की संख्या ईरान के बराबर 15 है, लेकिन रजत पदक एक कम होने के कारण भारत छठे स्थान पर है।

  • सीमा कालीरमन का बड़ा खुलासा, बोलीं- खेल का आनंद लिया, मेडल अपने आप मिल गया

    सीमा कालीरमन का बड़ा खुलासा, बोलीं- खेल का आनंद लिया, मेडल अपने आप मिल गया


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला डिस्कस थ्रो स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाने वाली सीमा कालीरमन ने अपनी सफलता के पीछे का राज साझा किया है। ग्लासगो में शानदार प्रदर्शन के बाद सीमा ने कहा कि प्रतियोगिता के दौरान उनका पूरा ध्यान केवल अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर था। उन्होंने बताया कि उन्होंने मेडल के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा, बल्कि खेल का आनंद लेते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की और यही सोच उनकी सफलता की सबसे बड़ी वजह बनी।

    समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में सीमा ने कहा कि पदक जीतने की खुशी शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि जब से उन्होंने परिणाम की चिंता छोड़कर खेल का आनंद लेना शुरू किया है, तभी से उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया है। उनके अनुसार यदि खिलाड़ी केवल अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर ध्यान दे तो सफलता अपने आप उसके कदम चूमती है।

    सीमा ने यह भी बताया कि इस बार वह अपने चार साल के बेटे से दूर रहकर कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेने आई थीं। उन्होंने स्वीकार किया कि बेटे की याद उन्हें लगातार आती रही और उसका जिक्र होते ही वह भावुक हो जाती हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए पूरे फोकस के साथ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और देश के लिए पदक जीतने में सफल रहीं।

    उन्होंने अपनी इस उपलब्धि का बड़ा श्रेय अपने पति और निजी कोच रविंदर कालीरमन को दिया। सीमा ने कहा कि पिछले वर्ष एशियन चैंपियनशिप में उनके पति साथ नहीं थे, जिसका असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा था। लेकिन इस बार ग्लासगो में रविंदर की मौजूदगी ने उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया। उन्होंने बताया कि उनके पति ने कभी उन पर पदक जीतने का दबाव नहीं बनाया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि खेल का आनंद लो और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करो। यही सलाह उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनी।

    सीमा ने कहा कि एक खिलाड़ी की सफलता केवल मैदान पर दिखाई देने वाले प्रदर्शन तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, त्याग और कठिन मेहनत छिपी होती है। उन्होंने बताया कि खिलाड़ियों को मानसिक दबाव, आर्थिक चुनौतियों और कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यदि सही समय पर सहयोग और सुविधाएं मिलें तो वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम और ऊंचा कर सकते हैं।

    उन्होंने सरकार से भी अपील की कि जिन युवाओं में खेलों के प्रति जुनून और प्रतिभा है, उन्हें शुरुआती स्तर से बेहतर प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। उनका मानना है कि समय पर मिला समर्थन कई खिलाड़ियों के सपनों को साकार कर सकता है और भारत को भविष्य में और अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक दिला सकता है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के महिला डिस्कस थ्रो फाइनल में सीमा कालीरमन ने 58.65 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो कर कांस्य पदक अपने नाम किया। यह उपलब्धि न केवल उनके करियर की बड़ी सफलता है, बल्कि भारतीय एथलेटिक्स के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। उनके संघर्ष, समर्पण और सकारात्मक सोच ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर हर चुनौती को पार किया जा सकता है।

  • चोट, मातृत्व और पढ़ाई के बीच नहीं टूटा हौसला, सीमा कालीरमन ने भारत को दिलाया ब्रॉन्ज

    चोट, मातृत्व और पढ़ाई के बीच नहीं टूटा हौसला, सीमा कालीरमन ने भारत को दिलाया ब्रॉन्ज


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला डिस्कस थ्रो स्पर्धा में भारत के लिए कांस्य पदक जीतने वाली सीमा कालीरमन की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि परिवार की जिम्मेदारियां, पढ़ाई और खेल तीनों को एक साथ निभाकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है।

    27 वर्षीय सीमा कालीरमन ने ग्लासगो में हुए महिला डिस्कस थ्रो फाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के नाम कांस्य पदक दर्ज कराया। यह उनके करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है, जिसने उन्हें देश की नई प्रेरणादायक खिलाड़ियों की सूची में शामिल कर दिया है।

    सीमा का सफर आसान नहीं रहा। घुटने की गंभीर चोट के कारण उन्हें तीन साल से अधिक समय तक प्रतियोगिताओं से दूर रहना पड़ा। इसके बाद मातृत्व की जिम्मेदारी आई और चार साल के बेटे रुद्र की परवरिश के साथ खेल में वापसी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत के दम पर फिर से खुद को साबित किया।

    सीमा सिर्फ एक एथलीट ही नहीं बल्कि चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय, भिवानी से फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी भी कर रही हैं। खेल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। उनके इस सफर में सबसे बड़ा साथ उनके पति और कोच रविंदर कालीरमन ने दिया। रविंदर स्वयं राष्ट्रीय स्तर के डिस्कस थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं और उनकी ट्रेनिंग ने सीमा की वापसी को नई दिशा दी।

    2022 में बेटे रुद्र के जन्म के बाद लगभग 11 महीने के ब्रेक के बावजूद सीमा ने जब मैदान पर वापसी की तो पहले से अधिक मजबूत नजर आईं। जहां पहले उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 48.08 मीटर था, वहीं वापसी के बाद उन्होंने इसे लगातार बेहतर करते हुए 57.19 मीटर तक पहुंचाया। इसके बाद भुवनेश्वर में आयोजित इंडियन चैंपियनशिप 2026 में उन्होंने 59.73 मीटर का शानदार थ्रो कर अपना नया व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड बनाया।

    कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल में सीमा के छह प्रयासों में से केवल दो थ्रो ही वैध रहे, क्योंकि कई बार डिस्कस साइड नेटिंग में फंस गया। इसके बावजूद उन्होंने धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखा और शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।

    पिछले दो वर्षों में सीमा ने लगातार शानदार प्रदर्शन किया है। उन्होंने 2025 के नेशनल गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, राष्ट्रीय चैंपियन बनीं और 2026 दक्षिण एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल हासिल किया। इन्हीं उपलब्धियों के दम पर उन्होंने एशियाई खेल 2026 और कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए भारतीय टीम में जगह बनाई।

    सीमा कालीरमन की कहानी सिर्फ एक मेडल जीतने की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की कहानी है। उन्होंने दिखा दिया कि अगर जुनून सच्चा हो तो चोट, जिम्मेदारियां और कठिन परिस्थितियां भी सफलता की राह नहीं रोक सकतीं। उनका कांस्य पदक भारतीय खेल जगत के लिए प्रेरणा का नया अध्याय है और आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए यह संदेश भी कि सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत और धैर्य सबसे बड़ी ताकत होते हैं।