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  • लेबनान में हिंसा का भयावह असर, 7.7 लाख बच्चे मानसिक तनाव से जूझ रहे: यूनिसेफ की चेतावनी

    लेबनान में हिंसा का भयावह असर, 7.7 लाख बच्चे मानसिक तनाव से जूझ रहे: यूनिसेफ की चेतावनी

    नई दिल्ली ।  लेबनान में जारी हिंसा और अस्थिरता ने एक बार फिर मानवीय संकट को गहरा कर दिया है, जिसका सबसे गंभीर और दर्दनाक असर बच्चों पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाल संगठन यूनिसेफ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि देश में करीब 7.7 लाख बच्चे गंभीर मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए ही नहीं, बल्कि देश के भविष्य के लिए भी बेहद चिंताजनक मानी जा रही है।

    रिपोर्ट के अनुसार, लगातार जारी संघर्ष, विस्थापन और सुरक्षा की अनिश्चितता ने बच्चों के जीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। पिछले कुछ हफ्तों में स्थिति और अधिक खराब हुई है, जहां संघर्षविराम के बावजूद हिंसा की घटनाएं जारी हैं। इन घटनाओं में बच्चों के मारे जाने और घायल होने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, जिससे माहौल और अधिक भयपूर्ण बन गया है।

    लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हालात कितने गंभीर हैं। संघर्षविराम के बाद भी कई बच्चों की जान जा चुकी है और दर्जनों घायल हुए हैं। कुल मिलाकर पिछले महीनों में सैकड़ों बच्चों की मौत और घायल होने की घटनाओं ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। इसका मतलब यह है कि औसतन हर दिन कई बच्चे हिंसा का शिकार हो रहे हैं, जो इस संकट की भयावहता को स्पष्ट करता है।

    यूनिसेफ ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि लगातार हिंसा के बीच बच्चे न केवल शारीरिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि मानसिक रूप से भी गहरे आघात झेल रहे हैं। कई बच्चे अपने परिजनों को खो चुके हैं, बार-बार घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं और लगातार डर के माहौल में जी रहे हैं। इसका असर उनके मनोवैज्ञानिक विकास पर गंभीर रूप से पड़ रहा है, जो लंबे समय तक उनके जीवन को प्रभावित कर सकता है।

    संस्था के अनुसार बच्चों में अत्यधिक डर, चिंता, नींद की समस्या, बुरे सपने और अवसाद जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं। कई मामलों में यह स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि बच्चे सामान्य जीवन जीने की क्षमता खोते जा रहे हैं। यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुरक्षित माहौल और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई, तो यह संकट स्थायी मानसिक बीमारी का रूप ले सकता है।

    यूनिसेफ के क्षेत्रीय निदेशक ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि बच्चों को ऐसे माहौल में जीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जहां उनका बचपन पूरी तरह खत्म होता जा रहा है। जिन बच्चों को स्कूल जाना चाहिए, खेलना चाहिए और सुरक्षित जीवन जीना चाहिए, वे आज हिंसा और डर के बीच फंसे हुए हैं।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2024 में बढ़े सैन्य तनाव के बाद बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य में तेज गिरावट दर्ज की गई थी, और 2025 में स्थिति और खराब हो गई। बड़ी संख्या में देखभाल करने वालों ने बच्चों में चिंता, अवसाद और मानसिक अस्थिरता के लक्षणों की पुष्टि की है।

    लगातार जारी यह संकट इस बात का संकेत है कि लेबनान में केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानवता का एक बड़ा मानवीय संकट भी गहराता जा रहा है। बच्चों की बिगड़ती मानसिक स्थिति इस संघर्ष की सबसे गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली त्रासदी बन सकती है, जिसे रोकने के लिए तत्काल अंतरराष्ट्रीय ध्यान और सहायता की आवश्यकता है।

  • जबलपुर–दमोह फोरलेन पर बस्ती का बवाल, NHAI कार्यालय घेरा, करणी सेना ने 15 दिन में फैसला मांगा

    जबलपुर–दमोह फोरलेन पर बस्ती का बवाल, NHAI कार्यालय घेरा, करणी सेना ने 15 दिन में फैसला मांगा



    जबलपुर। जबलपुर–दमोह NH-34 को टू-लेन से फोरलेन करने की योजना के विरोध में बोरिया बस्ती के ग्रामीणों ने शुक्रवार को सड़क पर उतरकर NHAI कार्यालय का घेराव किया। करणी सेना के कार्यकर्ताओं के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं और स्थानीय नागरिक भी प्रदर्शन में शामिल रहे। ग्रामीणों का आरोप है कि बस्ती के 50 से अधिक घर फोरलेन के लिए ध्वस्त हो सकते हैं, जिससे 150 से अधिक लोग बेघर होने की कगार पर हैं।
    करणी सेना के प्रदेश अध्यक्ष अनुराग प्रताप राघव ने NHAI को 15 दिन का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी कि यदि इस अवधि में प्रभावितों के हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। उन्होंने कहा, जरूरत पड़ी तो सड़क से लेकर प्रशासनिक दफ्तरों तक आंदोलन बढ़ाया जाएगा। क्षेत्रीय विधायक और स्थानीय मंत्री ग्रामीणों के समर्थन में नहीं खड़े हुए, इसलिए करणी सेना ने मोर्चा संभाला है।

    ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें उजाड़ा जा रहा है, जो पूरी तरह अन्याय है। महिलाओं ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि वर्षों से बसे परिवारों को हटाने से पहले प्रशासन को पुनर्वास और वैकल्पिक इंतजामों की ठोस योजना प्रस्तुत करनी चाहिए।

    ग्रामीणों की मुख्य मांगें
    प्रभावित लोगों के लिए वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था हो
    जमीन अधिग्रहण पर तत्काल रोक
    प्रभावितों को साथ लेकर प्रोजेक्ट के विकल्पों पर चर्चा
    सड़क के सेंटर से दोनों तरफ बराबर भूमि अधिग्रहण किया जाए
    बोरिया गांव के सतिश पटेल ने कहा कि वर्तमान में 70 फीट की सड़क को 150 फीट करने की योजना है, लेकिन सड़क एक तरफ चौड़ी की जा रही है, जिससे 70 मकान प्रभावित हो रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि रोड सेंटर से दोनों तरफ बराबर अधिग्रहण किया जाए या बस्ती वाले क्षेत्र में सड़क चौड़ाई को घटाकर 120 फीट किया जाए। साथ ही प्रभावितों को मुआवजे के साथ घर बनाने के लिए जमीन भी दी जाए।

    सुनीता बर्मन ने कहा कि यदि उनका घर टूटता है तो वे पूरी तरह से बर्बाद हो जाएँगी, क्योंकि परिवार में बुजुर्ग ही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सड़क के विरोध में नहीं हैं, लेकिन सरकार को यह देखना चाहिए कि किसी को बेघर न किया जाए।

    NHAI का जवाब
    NHAI प्रोजेक्ट डायरेक्टर अमृत लाल साहू ने कहा कि फोरलेन के लिए 150 फीट भूमि अधिग्रहण का नियम है। बोरिया और आसपास के गांवों में बायपास का प्रावधान नहीं है, इसलिए मुख्य मार्ग को चौड़ा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस मार्ग पर फ्लाईओवर भी बनाया जाएगा। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि जनता की मांग पर विचार किया जाएगा और वैकल्पिक विकल्पों पर काम किया जाएगा।