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  • भोजशाला विवाद: चालीस पीर वाले प्रस्ताव पर आपत्ति के बाद प्रशासन ने तलाशे दो नए स्थान, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अहम

    भोजशाला विवाद: चालीस पीर वाले प्रस्ताव पर आपत्ति के बाद प्रशासन ने तलाशे दो नए स्थान, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अहम


    धार । धार स्थित भोजशाला परिसर में जुम्मे की नमाज के लिए वैकल्पिक स्थान तय करने को लेकर प्रशासन ने अपनी कवायद तेज कर दी है। मुस्लिम समाज की ओर से पहले प्रस्तावित स्थान पर आपत्ति दर्ज कराए जाने के बाद अब जिला प्रशासन ने नए विकल्पों की तलाश शुरू कर दी है। इसी क्रम में सोमवार को अधिकारियों ने डिसलरी रोड क्षेत्र में दो अलग-अलग भूखंडों का निरीक्षण किया, जिन्हें संभावित वैकल्पिक स्थल के रूप में देखा जा रहा है।

    प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार डिसलरी रोड स्थित सर्वे नंबर 509 और सर्वे नंबर 639 की लगभग एक-एक एकड़ जमीन का निरीक्षण किया गया है। इन स्थानों को इसलिए देखा जा रहा है ताकि भविष्य में जुम्मे की नमाज के लिए एक उपयुक्त और व्यवस्थित वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके। दोनों स्थल भोजशाला परिसर से लगभग 500 मीटर की दूरी पर बताए जा रहे हैं।

    इससे पहले चालीस पीर के समीप प्रस्तावित स्थान को लेकर मुस्लिम समाज ने आपत्ति जताई थी। इसके बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच गया और अब इस संबंध में दायर याचिका पर 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत के निर्देशों के बाद ही जुम्मे की नमाज के लिए अंतिम वैकल्पिक स्थान तय किया जाएगा।

    कमाल मौलाना सोसायटी के सदर अब्दुल समद का कहना है कि प्रशासन द्वारा जिन नए स्थानों का निरीक्षण किया गया है, उनकी जानकारी अभी समाज को औपचारिक रूप से नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए अदालत के निर्णय का इंतजार किया जा रहा है।

    वहीं जिला प्रशासन का कहना है कि संभावित विकल्पों का निरीक्षण केवल वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारियों के तहत किया गया है। अधिकारियों के अनुसार डिसलरी रोड स्थित सर्वे नंबर 509 और 639 की जमीन का मौके पर जाकर निरीक्षण किया गया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन के पास उपयुक्त विकल्प उपलब्ध रहे।

    अब पूरे मामले में 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अहम मानी जा रही है। अदालत के निर्देशों के बाद ही आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया और जुम्मे की नमाज के लिए अंतिम स्थान को लेकर निर्णय लिया जाएगा।

  • महोबा में एसडीएम और अधिवक्ता विवाद ने पकड़ा तूल कलेक्ट्रेट में वकीलों का प्रदर्शन कार्रवाई नहीं हुई तो कोर्ट बहिष्कार की चेतावनी

    महोबा में एसडीएम और अधिवक्ता विवाद ने पकड़ा तूल कलेक्ट्रेट में वकीलों का प्रदर्शन कार्रवाई नहीं हुई तो कोर्ट बहिष्कार की चेतावनी


    महोबा । उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में प्रशासन और अधिवक्ताओं के बीच विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। सदर एसडीएम पर एक अधिवक्ता से फोन पर अभद्र व्यवहार करने तथा कथित रूप से उन्हें कोर्ट में न आने और वकालत का लाइसेंस रद्द कराने की धमकी देने के आरोपों के बाद जिला मुख्यालय का माहौल गरमा गया। मामले के विरोध में जिला अधिवक्ता समिति के बैनर तले बड़ी संख्या में वकीलों ने कलेक्ट्रेट परिसर में प्रदर्शन किया और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए निष्पक्ष कार्रवाई की मांग उठाई।

    विवाद की शुरुआत बीजानगर निवासी अधिवक्ता परशुराम कुशवाहा के रास्ते से जुड़े विवाद से हुई। अधिवक्ता का आरोप है कि समस्या का समाधान कराने के बजाय सदर एसडीएम ने उनसे फोन पर अनुचित भाषा का प्रयोग किया और कथित तौर पर गंभीर धमकियां दीं। उनका कहना है कि उन्होंने प्रशासनिक लापरवाही की शिकायत जनसुनवाई पोर्टल पर दर्ज कराई थी जिसके बाद उनके साथ यह व्यवहार किया गया। अधिवक्ता ने दावा किया है कि बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी मौजूद है और इसी आधार पर उन्होंने पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।

    घटना के बाद जिला अधिवक्ता समिति ने इसे अधिवक्ताओं के सम्मान से जुड़ा मामला बताते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि यदि अधिवक्ताओं के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाएगा तो न्यायिक व्यवस्था की गरिमा प्रभावित होगी। प्रदर्शन के दौरान वकीलों ने मांग की कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आरोप सही पाए जाएं तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

    अधिवक्ता समिति के पदाधिकारियों ने यह भी कहा कि यदि पीड़ित अधिवक्ता की समस्या का शीघ्र समाधान नहीं हुआ और आरोपों पर उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे एसडीएम न्यायालय का पूर्ण बहिष्कार करने के साथ व्यापक आंदोलन शुरू करेंगे। उनका कहना है कि अधिवक्ताओं को दबाव में लेने या डराने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन की ओर से अतिरिक्त जिला अधिकारी ने अधिवक्ताओं से मुलाकात कर उनका ज्ञापन प्राप्त किया। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और तहसील स्तर पर लंबित समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। प्रशासन का कहना है कि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

    फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर जिले में प्रशासन और अधिवक्ताओं के बीच तनाव बना हुआ है। दोनों पक्ष अपने अपने रुख पर कायम हैं। एक ओर अधिवक्ता संगठन कार्रवाई की मांग पर अड़ा है तो दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच के बाद ही तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। अब सभी की निगाहें जांच रिपोर्ट और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं क्योंकि यही तय करेगी कि यह विवाद जल्द सुलझेगा या आगे और गहराएगा।

  • एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की हकीकत: शाजापुर में 7 माह में सूख गए 151 पौधे, लाखों खर्च फिर भी नतीजा शून्य

    एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की हकीकत: शाजापुर में 7 माह में सूख गए 151 पौधे, लाखों खर्च फिर भी नतीजा शून्य


    शाजापुर । विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा शुरू किए गए एक पेड़ मां के नाम अभियान का उद्देश्य लोगों को अपनी मां के सम्मान में एक पौधा लगाकर पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना था। यह पहल धरती माता की रक्षा और जनभागीदारी को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई थी लेकिन मध्यप्रदेश के शाजापुर में इस अभियान की जमीनी तस्वीर निराशाजनक नजर आई।

    जुलाई 2025 में प्रदेशभर में इस अभियान की शुरुआत बड़े स्तर पर की गई। शाजापुर के भैरव डूंगरी में जिला प्रशासन जनप्रतिनिधियों और विभिन्न संगठनों की मौजूदगी में पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित हुआ। लगभग एक लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन हकीकत में सिर्फ 151 पौधे ही लगाए जा सके। इनमें क्षेत्रीय सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी विधायक अरुण भीमावद भाजपा पदाधिकारी सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय नागरिक शामिल हुए थे।

    कार्यक्रम को भव्य बनाने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां की गईं। स्थानीय लोगों के मुताबिक आयोजन पर लाखों रुपये खर्च किए गए। मंच बैनर प्रचार और व्यवस्थाओं में कोई कमी नहीं छोड़ी गई लेकिन पौधारोपण के बाद रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया गया।

    सात महीने बाद जब मीडिया ने मौके का निरीक्षण किया तो वहां एक भी पौधा जीवित नहीं मिला। जिन पौधों को बड़े उत्साह के साथ रोपा गया था वे अब सूखी लकड़ियों में तब्दील हो चुके हैं। स्थल पर न तो हरियाली दिखी और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा या सिंचाई व्यवस्था। आरोप है कि पौधारोपण के बाद न प्रशासनिक अधिकारियों ने दोबारा निरीक्षण किया और न ही जनप्रतिनिधियों ने देखरेख की जिम्मेदारी निभाई।

    नगर पालिका अधिकारी भूपेंद्र कुमार दीक्षित ने पानी की समस्या को पौधों के सूखने का कारण बताया। उन्होंने कहा कि अब उस स्थान को अमृत 2 ट्री योजना के तहत लिया गया है और स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के माध्यम से पौधों की देखभाल कराई जाएगी।

    हालांकि सवाल यह उठता है कि जब 151 पौधों की भी देखभाल नहीं हो सकी तो यदि लक्ष्य के अनुरूप एक लाख पौधे लगाए जाते तो उनका क्या हाल होता? यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण जैसे गंभीर विषय पर दिखावे की राजनीति पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

  • बोर्ड परीक्षा में लापरवाही पर जीरो टॉलरेंस: कलेक्टर ने दिए सख्त निर्देश, नकल पर कड़ी नजर, छात्रों की सुविधा और पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता

    बोर्ड परीक्षा में लापरवाही पर जीरो टॉलरेंस: कलेक्टर ने दिए सख्त निर्देश, नकल पर कड़ी नजर, छात्रों की सुविधा और पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता



    भिंड। जिले में आगामी 10वीं एवं 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं को शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है। इसी क्रम में कलेक्टर भिंड की अध्यक्षता में कलेक्ट्रेट सभागार में केंद्राध्यक्ष एवं सहायक केंद्राध्यक्षों की समीक्षा बैठक आयोजित की गई।

    बैठक में कलेक्टर ने दो टूक शब्दों में कहा कि बोर्ड परीक्षा विद्यार्थियों के जीवन का अहम पड़ाव होती है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्रों की सुविधा, परीक्षा की पारदर्शिता और नकलमुक्त वातावरण प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    कलेक्टर ने माध्यमिक शिक्षा मंडल भोपाल द्वारा आयोजित 10वीं एवं 12वीं की परीक्षाओं की व्यवस्थाओं की विस्तार से समीक्षा करते हुए निर्देश दिए कि प्रत्येक परीक्षा केंद्र पर बैठने की समुचित व्यवस्था, निर्बाध बिजली, स्वच्छ पेयजल एवं शौचालय की व्यवस्था अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी केंद्र नहीं होना चाहिए, जहां विद्यार्थियों को किसी प्रकार की परेशानी हो।

    नकल पर सख्ती दिखाते हुए कलेक्टर ने कहा कि नकल चाहे किसी भी रूप में हो, उसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके लिए केंद्राध्यक्षों को स्वयं सतर्क रहने और परीक्षा ड्यूटी में लगे समस्त स्टाफ को पूरी तरह अलर्ट रखने के निर्देश दिए गए। प्रश्न पत्र वितरण से लेकर उत्तर पुस्तिकाओं के संकलन तक प्रत्येक चरण में कड़ी निगरानी रखने के आदेश दिए गए।

    उन्होंने उत्तर पुस्तिकाओं की सीलिंग और अनसीलिंग प्रक्रिया को पूर्णतः पारदर्शी रखने पर विशेष जोर दिया। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी को निर्देशित किया कि केंद्राध्यक्षों की सूची का पुनः परीक्षण कर केवल योग्य, अनुभवी और जिम्मेदार अधिकारियों को ही यह दायित्व सौंपा जाए।

    कलेक्टर ने सहायक केंद्राध्यक्षों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वे मुख्य केंद्राध्यक्ष के साथ बेहतर समन्वय बनाकर कार्य करें। परीक्षा केंद्रों पर मोबाइल फोन एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।

    उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी परीक्षा केंद्र से यदि लापरवाही या अनियमितता की शिकायत प्राप्त होती है, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी।बैठक में जिला शिक्षा अधिकारी, परीक्षा प्रभारी सहित अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे।

  • कलेक्टर–CEO के दावों की परतें खुलीं: राष्ट्रपति अवॉर्ड के पीछे का सच, जांच टीम के सामने बेनकाब हुआ ‘जल संरक्षण’ का फर्जीवाड़ा

    कलेक्टर–CEO के दावों की परतें खुलीं: राष्ट्रपति अवॉर्ड के पीछे का सच, जांच टीम के सामने बेनकाब हुआ ‘जल संरक्षण’ का फर्जीवाड़ा



    खंडवा। खंडवा जिले को जल संरक्षण के नाम पर मिले राष्ट्रपति पुरस्कार को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। जहां एक चर्चित अखबार के पड़ताल के बाद भोपाल से सीनियर आईएएस दिनेश कुमार जैन के नेतृत्व में दो सदस्यीय जांच दल मंगलवार को खंडवा पहुंचा और मौके पर जाकर तथाकथित जल संरचनाओं का ‘रियलिटी चेक’ किया। जांच के दौरान जो सामने आया, उसने प्रशासन के दावों की पोल खोल दी।

    जांच दल चर्चित अखबार के रिपोर्ट के आधार परहरसूद जनपद समेत कई गांवों में पहुंचा।

    कहीं कागजों में तालाब मिले, तो जमीन पर सिर्फ मिट्टी का ढेर। कहीं 6 फीट गहरे सोख्ता गड्ढों का दावा था, लेकिन हकीकत में 1 फीट से भी कम गहराई निकली। टीम ने किसानों और ग्रामीणों से बात की, खुद गड्ढे खुदवाकर देखे और कई जगह देखकर चौंक गई।

    डोटखेड़ा गांव में खेत के बीच कागजों में तालाब दिखाया गया था, लेकिन मौके पर कोई जल संरचना नहीं मिली। सिर्फ मिट्टी फैलाकर तालाब का रूप देने की कोशिश की गई थी।

    पलानी माल गांव में ग्रामीणों ने खुद अधिकारियों को उन जगहों पर ले जाकर दिखाया, जहां सरकारी रिकॉर्ड और जमीन की सच्चाई बिल्कुल अलग थी। आंगनवाड़ी भवन में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अधूरा मिला, पाइप ही गायब था। आरोग्य केंद्र में सोख्ता गड्ढा नाममात्र का निकला, जिसे बारिश में ओवरफ्लो के बाद तोड़ दिया गया था।

    सबसे चौंकाने वाला मामला शाहपुरा माल गांव में सामने आया, जहां जांच दल के आने की सूचना मिलते ही पंचायत सचिव ने सुबह-सुबह जेसीबी से नया गड्ढा खुदवा दिया।

    जबकि रिकॉर्ड में उसका भुगतान पहले ही हो चुका था। तय साइज 10×10 फीट था, लेकिन मौके पर सिर्फ 1 फीट गहरा गड्ढा मिला, वो भी खेत के ऐसे कोने में जहां उसका कोई मतलब नहीं था।

    पूरा मामला तब उजागर हुआ जब 11 नवंबर को केंद्र सरकार ने खंडवा जिले को जल संरक्षण के लिए नेशनल वाटर अवॉर्ड और 2 करोड़ रुपये देने की घोषणा की। प्रशासन ने 1.29 लाख जल संरचनाओं के निर्माण का दावा किया था। लेकिन जांच में सामने आया कि कई तालाब, डक वैल और स्टॉप डैम सिर्फ कागजों में थे। कुछ तस्वीरें तो एआई द्वारा जनरेटेड पाई गईं। कहीं 150 सोख्ता गड्ढे दिखाए गए, तो जमीन पर 1–2 फीट के गड्ढे या सिर्फ पाइप नजर आए। कहीं 11 तालाबों का दावा था, लेकिन एक भी मौजूद नहीं था।

    अखबार के खुलासे के बाद अब भोपाल की टीम इन फर्जीवाड़ों की आधिकारिक तस्दीक कर रही है।

    साफ है कि खंडवा को मिला यह पुरस्कार जल संरक्षण की सफलता नहीं, बल्कि कागजी आंकड़ों और झूठे दावों पर खड़ा किया गया अब तक का सबसे बड़ा सरकारी भ्रम साबित हो रहा है।

    खंडवा के नारायण नगर इलाके में सामने आया मामला जल संरक्षण के नाम पर किए गए फर्जीवाड़े की एक और बानगी बन गया है।

    यहां रहने वाली शिक्षिका संध्या राजपूत को उच्च अधिकारियों की ओर से निर्देश दिया गया था कि वह अपने घर पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाएं। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली।

    जांच में सामने आया कि संध्या राजपूत के घर पर कोई वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम मौजूद नहीं था। इसके बजाय उनके घर से कुछ मकान दूर स्थित एक अन्य घर की छत से लगी पाइप को ही वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बताकर पेश कर दिया गया। यह पाइप दरअसल छत का पानी सीधे नाली में पहुंचाने के लिए लगाई गई थी, जिसका जल संरक्षण या रिचार्ज से कोई लेना-देना नहीं था।

    इसके बावजूद उसी मकान की फोटो खींचकर प्रशासन को सौंप दी गई और कागजों में इसे वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के रूप में दर्ज कर दिया गया। यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि कैसे जमीनी हकीकत को दरकिनार कर सिर्फ फोटो और फाइलों के सहारे योजनाओं की सफलता दिखाई गई, जबकि वास्तविकता में जल संरक्षण का कोई काम नहीं हुआ।