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  • पोस्टल असिस्टेंट हत्याकांड: पति के शव पर सस्पेंस बरकरार, DNA रिपोर्ट करेगी सबसे बड़े राज का खुलासा

    पोस्टल असिस्टेंट हत्याकांड: पति के शव पर सस्पेंस बरकरार, DNA रिपोर्ट करेगी सबसे बड़े राज का खुलासा


    इंदौर । इंदौर की पोस्टल असिस्टेंट उर्मिला सैनी हत्याकांड में एक नया और बेहद रहस्यमयी मोड़ सामने आया है। आरोपी पति अखिलेश सैनी के कथित सिरकटे शव की पहचान को लेकर अब भी सस्पेंस बरकरार है। एक ओर पिता और भाई ने शव को अखिलेश का बताते हुए उसकी पहचान कर ली है, वहीं दूसरी ओर उसकी 15 वर्षीय बेटी प्रेक्षा ने बिना सिर के शव को अपने पिता का मानने से साफ इनकार कर दिया है। ऐसे में पुलिस अब किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय वैज्ञानिक जांच का इंतजार कर रही है। पूरे मामले की सच्चाई अब DNA रिपोर्ट पर टिकी हुई है, जिसके आने में करीब 10 दिन लग सकते हैं।

    मामला 11 जुलाई को हुई पोस्टल असिस्टेंट उर्मिला सैनी की हत्या से जुड़ा है। पत्नी की हत्या के बाद से ही अखिलेश सैनी फरार था। शनिवार रात गंजबासौदा-पवई रेलवे स्टेशन के बीच रेलवे ट्रैक पर एक सिरकटा शव मिला। शव की पैंट की जेब से अखिलेश के आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेज और तीन कथित सुसाइड नोट बरामद हुए। इसके बाद पुलिस ने परिजनों को बुलाकर पहचान कराई।

    सोमवार सुबह अखिलेश के पिता सीताराम सैनी और भाई चित्रेश सैनी ने शव की पहचान अखिलेश के रूप में की। पिता ने बताया कि बेटे की नाभि में बीमारी के कारण सूजन थी और शरीर पर सफेद दाग थे, जिनके आधार पर उन्होंने उसकी पहचान की। पोस्टमार्टम के बाद शव उन्हें सौंप दिया गया और अंतिम संस्कार भोपाल के टीला जमालपुरा में किए जाने की तैयारी की गई।

    हालांकि कहानी में नया मोड़ तब आया जब अखिलेश की बेटी प्रेक्षा ने शव को पहचानने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि सिर नहीं होने की स्थिति में वह यह नहीं मान सकती कि यह उसके पिता का शव है। पुलिस ने उसे आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों की जानकारी भी दी, लेकिन उसने केवल धड़ देखकर पहचान स्वीकार नहीं की। गौरतलब है कि मां की हत्या के बाद से प्रेक्षा लगातार अपने पिता की गिरफ्तारी और कड़ी सजा की मांग करती रही थी।

    फोरेंसिक विशेषज्ञों का कहना है कि DNA जांच से शव की पहचान तो स्पष्ट हो जाएगी, लेकिन मौत किन परिस्थितियों में हुई, इसका सही निष्कर्ष तभी निकलेगा जब शव के सभी महत्वपूर्ण अंगों की जांच संभव हो। सिर नहीं मिलने से यह पता लगाना कठिन होगा कि मौत आत्महत्या, दुर्घटना या किसी अन्य कारण से हुई।

    जांच के दौरान शव के पास से मिले तीन कथित सुसाइड नोट भी पुलिस के लिए अहम सबूत बने हुए हैं। एक नोट पिता के नाम लिखा गया है, जिसमें बच्चों का ध्यान रखने और बेटे प्रायु से मुखाग्नि दिलाने की इच्छा जताई गई है। दूसरा नोट बेटे के नाम और तीसरा पुलिस के नाम बताया जा रहा है, जिसमें वैवाहिक विवाद और कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पुलिस इन नोटों की सत्यता और उनमें किए गए दावों की भी जांच कर रही है।

    पुलिस के सामने कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। आखिर पत्नी की हत्या के बाद अखिलेश आठ दिन तक कहां रहा? रेलवे ट्रैक पर मिला शव वास्तव में उसी का है या नहीं? उसकी मौत आत्महत्या है, हादसा है या किसी साजिश का हिस्सा? यही नहीं, पत्नी की हत्या के बाद उसका सामान्य व्यवहार, मोबाइल, एटीएम और स्कूटी छोड़कर गायब होना भी जांच के दायरे में है।

    फिलहाल इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड की सबसे अहम कड़ी DNA रिपोर्ट बन गई है। पुलिस का कहना है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा। रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रेलवे ट्रैक पर मिला सिरकटा शव वास्तव में अखिलेश सैनी का है या इस पूरे मामले में अभी कोई और बड़ा रहस्य सामने आना बाकी है।

  • अस्पताल की कथित गलती ने बदल दी दो परिवारों की किस्मत 38 साल बाद डीएनए टेस्ट से खुला जन्म का सबसे बड़ा राज

    अस्पताल की कथित गलती ने बदल दी दो परिवारों की किस्मत 38 साल बाद डीएनए टेस्ट से खुला जन्म का सबसे बड़ा राज


    नई दिल्ली। अमेरिका के नॉर्थ डकोटा राज्य से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने चिकित्सा व्यवस्था और अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि वर्ष 1988 में एक अस्पताल की कथित लापरवाही के कारण जन्म के तुरंत बाद दो नवजात बच्चों की अदला-बदली हो गई और दोनों अपने जैविक माता-पिता की बजाय दूसरे परिवारों के साथ बड़े हुए। करीब 38 वर्ष तक किसी को इस गलती का पता नहीं चला। आखिरकार एक सामान्य डीएनए टेस्ट ने ऐसा सच उजागर किया जिसने दो परिवारों की पूरी दुनिया बदल दी।

    रिपोर्ट के अनुसार यह मामला नॉर्थ डकोटा के ग्राफ्टन शहर स्थित यूनिटी मेडिकल सेंटर से जुड़ा है। परिवारों का कहना है कि 26 जनवरी 1988 को अस्पताल में केवल दो बच्चों का जन्म हुआ था। आरोप है कि अस्पताल से छुट्टी के समय दोनों नवजातों को गलत परिवारों के साथ भेज दिया गया। इसके बाद दोनों बच्चे अपने नए परिवारों में पले बढ़े और उन्हें कभी इस बात का अंदाजा नहीं हुआ कि उनके जैविक माता-पिता कोई और हैं।

    समय के साथ दोनों ने सामान्य जीवन जिया। पढ़ाई की नौकरी की परिवार बसाया और अपने रिश्तों को उसी रूप में स्वीकार किया जैसा उन्हें बचपन से बताया गया था। हालांकि उनमें से एक व्यक्ति को बचपन से ही यह महसूस होता था कि उसका चेहरा और शारीरिक बनावट परिवार के अन्य सदस्यों से काफी अलग है। उस समय इसे सामान्य संयोग मान लिया गया लेकिन वर्षों बाद यही संदेह एक बड़े खुलासे की वजह बना।

    करीब दो वर्ष पहले दूसरे व्यक्ति ने अपने पारिवारिक इतिहास के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने के उद्देश्य से डीएनए टेस्ट कराया। जांच रिपोर्ट में सामने आए परिणाम पूरी तरह अप्रत्याशित थे। रिपोर्ट ने ऐसे जैविक रिश्तों की ओर संकेत किया जिनके बारे में उन्हें पहले कोई जानकारी नहीं थी। इसके बाद आगे की जांच और पारिवारिक रिकॉर्ड की पड़ताल में कथित अदला-बदली की पूरी कहानी सामने आने लगी। परिवारों का दावा है कि जन्म के समय अस्पताल की पहचान पट्टी में दर्ज विवरण भी उनकी आशंकाओं को मजबूत करता है।

    सच्चाई सामने आने के बाद दोनों परिवारों के लिए भावनात्मक स्थिति बेहद कठिन हो गई। जिन लोगों को वे जीवनभर अपना माता-पिता और भाई-बहन मानते रहे थे उनके साथ रिश्ते तो बने रहे लेकिन अचानक यह जानना कि जैविक परिवार कोई और है किसी बड़े मानसिक आघात से कम नहीं था। दोनों पक्षों ने अपने वास्तविक परिवारों से मुलाकात की लेकिन लगभग चार दशक बाद नए रिश्तों को स्वीकार करना आसान नहीं रहा।

    परिवारों का आरोप है कि उन्होंने पहले अस्पताल के साथ बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश की लेकिन सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद अस्पताल के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया गया। उनका कहना है कि अस्पताल की कथित लापरवाही ने दो परिवारों का जीवन पूरी तरह बदल दिया और उन्हें दशकों तक अपने वास्तविक रिश्तों से दूर रखा।

    वहीं अस्पताल ने इस मामले में परिवारों की भावनात्मक पीड़ा पर संवेदना जताई है लेकिन अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। अस्पताल ने अदालत से मामला खारिज करने की मांग की है। अब अंतिम निर्णय न्यायालय में पेश किए जाने वाले सबूतों और सुनवाई के आधार पर होगा।

    यह मामला केवल एक संभावित प्रशासनिक गलती का नहीं बल्कि पहचान रिश्तों और परिवार जैसी गहरी मानवीय भावनाओं का भी है। यदि अदालत में आरोप साबित होते हैं तो यह मामला चिकित्सा इतिहास के सबसे गंभीर लापरवाही के मामलों में गिना जा सकता है और भविष्य में अस्पतालों की सुरक्षा प्रक्रियाओं को और सख्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण भी बन सकता है।

  • एक ही मां, एक ही जन्म… फिर भी अलग-अलग पिता! DNA टेस्ट ने खोला अनोखा राज

    एक ही मां, एक ही जन्म… फिर भी अलग-अलग पिता! DNA टेस्ट ने खोला अनोखा राज

    नई दिल्ली। यूनाइटेड किंगडम से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने मेडिकल साइंस को भी हैरान कर दिया। 49 वर्षीय जुड़वा बहनों ने जब अपना डीएनए टेस्ट कराया, तो खुलासा हुआ कि एक ही मां की कोख से जन्म लेने के बावजूद उनके बायोलॉजिकल पिता अलग-अलग हैं।

    यह दुर्लभ घटना विज्ञान में हेटरोपैटरनल सुपरफेकंडेशन (Heteropaternal Superfecundation) कहलाती है, जिसमें एक महिला के दो अंडों का निषेचन अलग-अलग पुरुषों के शुक्राणुओं से होता है।

    कैसे सामने आई सच्चाई?
    मिशेल और लवीनिया ऑस्बॉर्न नाम की इन बहनों को लंबे समय से अपने पिता की पहचान को लेकर संदेह था। मिशेल को शक था कि जिन जेम्स को वह अपना पिता मानती हैं, उनसे उनकी शक्ल नहीं मिलती। इसी संदेह को दूर करने के लिए उन्होंने घर पर डीएनए टेस्ट कराया।

    रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया—जेम्स उनके बायोलॉजिकल पिता नहीं हैं। इसके बाद लवीनिया ने भी टेस्ट कराया, जिससे पता चला कि दोनों बहनों के पिता अलग-अलग व्यक्ति हैं।

    49 साल तक छुपा रहा सच
    दोनों बहनों की मां ने यह राज जीवनभर छुपाए रखा। साल 2022 में जब डीएनए रिपोर्ट सामने आई, उसी दौरान उनकी मां का निधन हो गया। बाद में BBC Radio 4 के कार्यक्रम “The Gift” में बहनों ने अपनी कहानी साझा की।

    मिशेल के असली पिता एलेक्स निकले, जबकि लवीनिया के पिता आर्थर हैं। दोनों बहनों ने अपने-अपने जैविक पिताओं को खोज लिया है और उनसे मुलाकात भी कर चुकी हैं।

    ‘हम किसी चमत्कार से कम नहीं’
    इस अनोखे खुलासे के बाद भी बहनों के रिश्ते में कोई बदलाव नहीं आया। उनका कहना है कि भले ही उनके पिता अलग हों, लेकिन उनके बीच का प्यार और जुड़ाव पहले जैसा ही मजबूत है।

    यह मामला न सिर्फ इंसानी रिश्तों की जटिलता को दिखाता है, बल्कि विज्ञान के उन दुर्लभ पहलुओं को भी सामने लाता है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

  • DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला


    अहमदाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि डीएनए जांच से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के पालन-पोषण के लिए गुजारा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता—even अगर बच्चे का जन्म विवाह के दौरान ही क्यों न हुआ हो।

    क्या है मामला?

    यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया।

    अदालत महिला की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

    कोर्ट ने क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि:

    डीएनए टेस्ट से यदि पितृत्व खारिज हो जाता है, तो गुजारा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता
    वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA) को कानूनी अनुमान से अधिक महत्व मिलेगा
    संबंधित व्यक्ति ने खुद टेस्ट के लिए सहमति दी थी और रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं उठाई
    पुराने फैसलों का भी जिक्र

    अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण मामलों का हवाला दिया, जैसे:

    अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया
    इवान रतिनम बनाम मिलान जोसेफ
    नंदलाल बडवाइक बनाम लता बडवाइक

    इन मामलों में कोर्ट ने पहले भी कहा था कि डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत सावधानी से दिया जाना चाहिए।

    हालांकि, मौजूदा केस में टेस्ट पहले ही हो चुका था और उसकी रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए इसे निर्णायक माना गया।

    कानून बनाम विज्ञान

    अदालत ने माना कि जब वैज्ञानिक प्रमाण और कानूनी अनुमान (जैसे विवाह के दौरान जन्मे बच्चे का पिता पति माना जाना) के बीच टकराव हो, तो विज्ञान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    महिला को क्या राहत मिली?

    हालांकि महिला की अपील खारिज कर दी गई, लेकिन कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि बच्चे की स्थिति का आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराई जाए।

    पूरा मामला समझिए
    दंपति की शादी 2016 में हुई
    विवाद के बाद महिला ने बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांगा
    पति ने डीएनए टेस्ट की मांग की
    रिपोर्ट में वह बच्चे का जैविक पिता नहीं निकला
    ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने गुजारा देने से इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे साफ संदेश गया है कि पितृत्व से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।