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  • शिवपुरी में 68 डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का अटैचमेंट निरस्त, मूल अस्पतालों में लौटने के आदेश जारी

    शिवपुरी में 68 डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का अटैचमेंट निरस्त, मूल अस्पतालों में लौटने के आदेश जारी

    मध्य प्रदेश: के शिवपुरी जिले में स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों और कर्मचारियों के अटैचमेंट समाप्त करने की कार्रवाई की है। जिला मुख्यालय और अन्य शहरी कार्यालयों में अटैच होकर काम कर रहे 68 डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और दूसरे कर्मचारियों को उनकी मूल पदस्थापना वाले अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में वापस भेजने के आदेश जारी किए गए हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषीश्वर ने 19 से 21 अक्टूबर के बीच यह कार्रवाई की। इसके बाद जिले की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

    इस कार्रवाई में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसरों के अटैचमेंट भी समाप्त किए गए हैं। करैरा के बीएमओ डॉ. प्रदीप शर्मा जिला कार्यालय में जिला क्षय नियंत्रण अधिकारी (डीटीओ) का काम देख रहे थे। वहीं, कोलारस के बीएमओ डॉ. सुनील खण्डोलिया और खनियाधाना के बीएमओ डॉ. रोहित भदकारिया भी जिला मुख्यालय पर जिम्मेदारियां संभाल रहे थे। अब इन अधिकारियों को उनके मूल ब्लॉक में वापस जाकर बीएमओ के रूप में काम करने के निर्देश दिए गए हैं।

    स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रही। संविदा डॉक्टरों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों को भी उनकी मूल पदस्थापना पर भेजा गया है। इनमें 14 संविदा डॉक्टरों के साथ नर्सिंग ऑफिसर, फार्मासिस्ट, सहायक नर्स मिडवाइफ यानी एएनएम और डाटा एंट्री ऑपरेटर शामिल हैं। इन कर्मचारियों को शहरी कार्यालयों या अन्य स्थानों पर अटैच रखने के बजाय मूल कार्यस्थलों पर सेवाएं देने के लिए कहा गया है।

    इसके अतिरिक्त नेत्र सहायकों, मल्टीपर्पज वर्करों और सहायक ग्रेड-2 के 33 कर्मचारियों का अटैचमेंट भी समाप्त किया गया है। ये कर्मचारी जिला अस्पताल, कलेक्टर कार्यालय और कोल्ड चेन से संबंधित कामों में लगाए गए थे। आदेश के अनुसार, उन्हें वहां से हटाकर उनके मूल उप स्वास्थ्य केंद्रों में वापस भेजा गया है। विभाग ने पिछोर, करैरा और नरवर क्षेत्रों में डॉक्टरों को दिए गए दोहरे प्रभार भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिए हैं।

    पोहरी ब्लॉक में भी प्रशासनिक बदलाव किया गया है। यहां संविदा चिकित्सक डॉ. द्वारिका प्रसाद वर्मा से ब्लॉक का प्रभार वापस ले लिया गया है। उनकी जगह नियमित चिकित्सा अधिकारी डॉ. रजत साहू को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस बदलाव के जरिए ब्लॉक की स्वास्थ्य व्यवस्था में नियमित चिकित्सा अधिकारी की भूमिका बढ़ाई गई है।

    सीएमएचओ डॉ. संजय ऋषीश्वर के अनुसार, शासन की मंशा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों को उनके गांव और कस्बों के आसपास ही बेहतर इलाज मिल सके। इसके लिए जरूरी है कि डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी अपनी निर्धारित पदस्थापना पर मौजूद रहकर काम करें। विभाग का कहना है कि इसी उद्देश्य से अटैचमेंट समाप्त करने का फैसला लिया गया है।

    ग्रामीण अस्पतालों और उप स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों तथा कर्मचारियों की उपलब्धता स्थानीय मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि स्वीकृत पदों के अनुसार कर्मचारी अपने निर्धारित स्थानों पर सेवाएं देते हैं, तो मरीजों को इलाज के लिए जिला मुख्यालय तक आने की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, इस कार्रवाई का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कर्मचारी मूल स्थानों पर नियमित रूप से काम करते हैं और वहां जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं या नहीं।

    सीएमएचओ ने बताया कि पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट भोपाल भेजी जा रही है। अब विभाग के सामने आदेशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाए रखने की जिम्मेदारी होगी।

  • रिलीज से पहले सनी देओल की ‘सूर्या’ पर विवाद, डॉक्टरों की छवि और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर IMA ने उठाए सवाल

    रिलीज से पहले सनी देओल की ‘सूर्या’ पर विवाद, डॉक्टरों की छवि और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर IMA ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली । अभिनेता सनी देओल की आगामी फिल्म ‘सूर्या – अंत से आरंभ तक’ रिलीज से पहले विवादों में आ गई है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने फिल्म में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को जिस तरह दिखाए जाने की बात सामने आई है, उस पर गंभीर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि फिल्म की प्रचार सामग्री मेडिकल पेशे की छवि को प्रभावित कर सकती है। इस मामले में आईएमए ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर फिल्म के प्रचार से जुड़ी सामग्री की समीक्षा कराने की मांग की है।

    आईएमए के मुताबिक, फिल्म में चिकित्सा क्षेत्र में भ्रष्टाचार और स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, उससे पूरे मेडिकल पेशे के प्रति लोगों के मन में नकारात्मक धारणा बन सकती है। संगठन को आशंका है कि ऐसी प्रस्तुति डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की प्रतिष्ठा, सुरक्षा तथा जनता के भरोसे पर असर डाल सकती है। इसी वजह से एसोसिएशन चाहता है कि फिल्म की रिलीज से पहले संबंधित सामग्री की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।

    संगठन ने अपने पत्र में चार प्रमुख चिंताओं को सामने रखा है। पहली चिंता चिकित्सा पेशे को अनुचित रूप से बदनाम किए जाने और उसकी साख को नुकसान पहुंचने की है। दूसरी चिंता फिल्म में स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ हिंसा दिखाए जाने से जुड़ी है। तीसरा मुद्दा डॉक्टरों और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा का है। वहीं, चौथी चिंता डॉक्टरों और मरीजों के बीच लंबे समय से बने भरोसे पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर है।

    आईएमए का कहना है कि यदि प्रचार सामग्री के जरिए भ्रष्टाचार को पूरे चिकित्सा क्षेत्र की सामान्य स्थिति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे लोगों की धारणा प्रभावित हो सकती है। संगठन ने इस बात पर भी जोर दिया है कि स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति हिंसा को दिखाने के संभावित प्रभावों पर ध्यान देना जरूरी है। उसके अनुसार, चिकित्सा सेवाओं से जुड़े लोगों की सुरक्षा और मरीजों का डॉक्टरों पर विश्वास स्वास्थ्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

    मेडिकल संगठन ने केंद्रीय मंत्री से आग्रह किया है कि फिल्म में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के चित्रण के साथ-साथ उसके प्रचार से जुड़ी सामग्री की निष्पक्ष जांच कराई जाए। आईएमए ने यह भी कहा है कि यदि समीक्षा के दौरान उसकी आशंकाएं सही पाई जाती हैं, तो फिल्म निर्माताओं से आवश्यक बदलाव कराने पर विचार किया जाना चाहिए। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संगठन ने समीक्षा की मांग उठाई है। फिल्म में बदलाव को लेकर किसी अंतिम निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है।

    फिल्म का टीजर 19 अक्टूबर को सनी देओल के 69वें जन्मदिन के अवसर पर जारी किया गया था। इसमें अभिनेता एक पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं। कहानी में उनकी जिंदगी बेटी की मौत के बाद बदल जाती है। इसके बाद वह मामले की जांच शुरू करते हैं और इस प्रक्रिया में चिकित्सा व्यवस्था से जुड़ी कथित गड़बड़ियों का पर्दाफाश करने की कोशिश करते हैं। कहानी का यही पहलू चिकित्सा पेशे के चित्रण को लेकर उठे विवाद के केंद्र में है।

    ‘सूर्या – अंत से आरंभ तक’ का निर्देशन एम. पद्मकुमार ने किया है। फिल्म का निर्माण दीपक मुकुत, हेमंत मुकुत और लोकेश मुकुत ने किया है। यह वर्ष 2018 में आई मलयालम क्राइम थ्रिलर ‘जोसेफ’ का हिंदी रूपांतरण है, जिसकी कहानी शाही कबीर ने लिखी थी। फिल्म को वास्तविक घटनाओं पर आधारित बताया जा रहा है। इसमें सनी देओल मुख्य भूमिका में नजर आएंगे। फिल्म की निर्धारित रिलीज तारीख 20 नवंबर 2026 है। अब देखना होगा कि आईएमए की मांग पर क्या कदम उठाए जाते हैं और विवाद का फिल्म की रिलीज से पहले क्या असर पड़ता है।

  • महाराष्ट्र में इंटर्न डॉक्टरों का प्रदर्शन, 18 हजार का स्टाइपेंड बढ़ाकर 30 हजार करने की मांग, 2 नवंबर से हड़ताल की चेतावनी

    महाराष्ट्र में इंटर्न डॉक्टरों का प्रदर्शन, 18 हजार का स्टाइपेंड बढ़ाकर 30 हजार करने की मांग, 2 नवंबर से हड़ताल की चेतावनी

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र में इंटर्न डॉक्टरों ने मासिक स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है। गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को मुंबई के जे.जे. अस्पताल में एसोसिएशन ऑफ स्टेट मेडिकल इंटर्न्स (ASMI) के बैनर तले सैकड़ों इंटर्न डॉक्टरों ने प्रदर्शन किया। उनकी प्रमुख मांग है कि मौजूदा मासिक स्टाइपेंड 18,000 रुपये से बढ़ाकर 30,000 रुपये किया जाए। डॉक्टरों ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि यदि 1 नवंबर तक उनकी मांग पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो वे 2 नवंबर से हड़ताल शुरू कर देंगे। हालांकि, प्रस्तावित हड़ताल के दौरान आपातकालीन सेवाएं जारी रखने की बात कही गई है।

    प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि महाराष्ट्र में इंटर्न डॉक्टरों को मिलने वाला स्टाइपेंड दूसरे राज्यों की तुलना में कम है। उनके मुताबिक, उत्तर प्रदेश, बिहार और कई अन्य राज्यों में इंटर्न डॉक्टरों को 25,000 रुपये या उससे अधिक मासिक मानदेय दिया जा रहा है। इसके विपरीत, महाराष्ट्र में उन्हें 18,000 रुपये ही मिलते हैं। डॉक्टरों ने कहा कि मुंबई जैसे महंगे महानगर में आवास, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च काफी अधिक है। ऐसे में मौजूदा स्टाइपेंड से जीवनयापन करना मुश्किल हो रहा है। उनका तर्क है कि काम की जिम्मेदारियों और मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए मानदेय बढ़ाना जरूरी है।

    एसोसिएशन ऑफ स्टेट मेडिकल इंटर्न्स के महासचिव डॉ. रमन पवार ने बताया कि स्टाइपेंड बढ़ाने का मुद्दा वर्ष 2024 से लंबित है। उस समय भी इंटर्न डॉक्टरों ने प्रदर्शन कर मासिक स्टाइपेंड 30,000 रुपये करने की मांग उठाई थी, लेकिन उनके अनुसार सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब डॉक्टरों ने एक बार फिर इसी मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया है।

    डॉ. पवार के मुताबिक, संगठन ने अगस्त से अक्टूबर के बीच राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को कई पत्र भेजे। इनमें शिक्षा मंत्री, प्रधान सचिव, उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सहित अन्य अधिकारियों को मांग से अवगत कराया गया। सितंबर में भी अनुरोध पत्र भेजकर सरकार को जवाब देने के लिए 15 से 20 दिन का समय दिया गया था। इसके बाद 5 अक्टूबर को पुनर्विचार के लिए एक और पत्र सौंपा गया। संगठन का कहना है कि इसके बाद भी करीब 10 दिन तक इंतजार करने के बावजूद कोई ठोस जवाब नहीं मिला।

    डॉक्टरों ने बताया कि अधिकारियों से मुलाकात की कोशिश भी की गई और दो बार बातचीत हुई, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन मिले। किसी निश्चित बैठक या निर्णय की जानकारी नहीं दी गई। इसी वजह से मामला अब तक लंबित है। संगठन के अनुसार, यह आंदोलन सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों के इंटर्न डॉक्टर भी इसमें शामिल हैं।

    अस्पताल प्रशासन के स्तर पर भी इस मुद्दे को उठाया गया है। डॉ. पवार ने बताया कि पिछले तीन महीनों में डीन को तीन बार पत्र दिए गए। डीन की ओर से स्टाइपेंड बढ़ाने का प्रस्ताव चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान निदेशालय (DMER) को भेजा गया है। संगठन ने भी इसी अवधि में डीएमईआर को लगभग छह पत्र सौंपे हैं। डॉ. पवार के अनुसार, प्रस्ताव आगे भेजे जाने के बावजूद अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मामला वित्त मंत्रालय तक पहुंच चुका है, तो फैसला लेने में देरी क्यों हो रही है।

    फिलहाल इंटर्न डॉक्टरों ने अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखते हुए सरकार से 1 नवंबर तक निर्णय लेने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि तय समय सीमा तक स्टाइपेंड बढ़ाने पर ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो 2 नवंबर से हड़ताल शुरू की जाएगी। डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि आंदोलन के दौरान आपातकालीन सेवाएं चालू रहेंगी। अब इस मामले में राज्य सरकार के फैसले पर नजर है, क्योंकि समय सीमा समाप्त होने पर अस्पतालों की नियमित सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है।

  • मरीज के अटेंडर ने दीवार पर किया पेशाब, गुस्साए लोगों ने अस्पताल में घुसकर डॉक्टर-स्टाफ को पीटा

    मरीज के अटेंडर ने दीवार पर किया पेशाब, गुस्साए लोगों ने अस्पताल में घुसकर डॉक्टर-स्टाफ को पीटा


    ग्वालियर।
    मध्य प्रदेश के ग्वालियर के मुरार इलाके में दीवार पर पेशाब करने को लेकर शुरू हुआ विवाद अस्पताल में मारपीट और तोड़फोड़ तक पहुंच गया। आरोप है कि पड़ोसी के घर की दीवार पर पेशाब करने की घटना से नाराज चार लोगों ने श्री साईं मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में घुसकर डॉक्टर और कर्मचारियों के साथ मारपीट की। आरोपियों ने अस्पताल के मुख्य गेट का शीशा भी तोड़ दिया। घटना अस्पताल में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई। डॉक्टर की शिकायत पर पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    दीवार पर पेशाब करने से शुरू हुआ विवाद

    घटना 8 सितंबर की रात करीब 10:30 बजे की बताई जा रही है। पंचशील नगर निवासी डॉ. हिरदेश जाटव श्री साईं मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के संचालक हैं। उनकी शिकायत के मुताबिक, घटना के समय वह और विनोद शर्मा अस्पताल में मौजूद थे। इसी दौरान अस्पताल में भर्ती एक मरीज का अटेंडर पड़ोस में रहने वाले दीपक किरार के मकान की दीवार पर पेशाब करके आया।

    इस बात से नाराज होकर दीपक किरार, बंटी किरार, कालू किरार और अन्नू किरार अस्पताल के बाहर पहुंच गए। आरोप है कि चारों ने वहां मौजूद स्टाफ के साथ गाली-गलौज शुरू कर दी। इसके बाद अस्पताल के मुख्य गेट का शीशा तोड़कर वे अंदर घुस आए और विवाद करने लगे।

    विरोध करने पर डॉक्टर और स्टाफ से मारपीट का आरोप

    डॉ. हिरदेश जाटव के अनुसार, जब उन्होंने और अस्पताल के कर्मचारियों ने आरोपियों को गाली-गलौज करने से रोका, तो वे कथित तौर पर जातिसूचक गालियां देने लगे। विरोध करने पर चारों ने डॉक्टर और स्टाफ के साथ मारपीट शुरू कर दी। घटना के दौरान अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई।

    शिकायत के मुताबिक, मारपीट में अस्पताल कर्मचारी सुनील कुशवाह के सिर के पिछले हिस्से में चोट आई। विवेक अहिरवार की बाईं कलाई और पीठ पर चोट लगी, जबकि अभिषेक चौरसिया के बाएं कान के पीछे सिर में चोट आई। करन बाल्मीक की कमर में भी चोट लगने की बात कही गई है।

    घटना के दौरान मौके पर मौजूद ललित मोहन शुक्ला, सागर राजावत और आसपास के अन्य लोगों ने बीच-बचाव किया। इसके बाद स्थिति को संभाला जा सका। अस्पताल में हुई मारपीट और तोड़फोड़ की पूरी घटना सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड होने की बात कही गई है।

    चार आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज

    डॉ. हिरदेश जाटव की शिकायत पर मुरार थाना पुलिस ने दीपक किरार, बंटी किरार, कालू किरार और अन्नू किरार के खिलाफ मारपीट, गाली-गलौज, तोड़फोड़ तथा एससी-एसटी एक्ट सहित अन्य संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया है।

    पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज के आधार पर घटना की जांच कर रही है। ग्वालियर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) जयराज कुबेर ने भी मामले को लेकर बयान दिया है। पुलिस के अनुसार, जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

  • मध्य प्रदेश में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड पर बड़ा फैसला, 14,337 से बढ़कर अब 21,500 रुपये प्रतिमाह

    मध्य प्रदेश में इंटर्न डॉक्टरों के स्टाइपेंड पर बड़ा फैसला, 14,337 से बढ़कर अब 21,500 रुपये प्रतिमाह


    मध्य प्रदेश: के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्न डॉक्टरों के लिए स्टाइपेंड बढ़ाने का औपचारिक आदेश जारी कर दिया गया है। लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मासिक स्टाइपेंड 14,337 रुपये से बढ़ाकर 21,500 रुपये करने की प्रशासनिक स्वीकृति दी है। आदेश के अनुसार बढ़ी हुई राशि 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानी जाएगी। इससे प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्नशिप कर रहे छात्रों को बढ़ा हुआ स्टाइपेंड मिलेगा।

    विभाग की ओर से जारी आदेश में वर्तमान में प्रचलित 14,337 रुपये की राशि को संशोधित कर 21,500 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है। इस तरह इंटर्न डॉक्टरों के मासिक स्टाइपेंड में 7,163 रुपये की वृद्धि हुई है। सितंबर में सरकार और इंटर्न डॉक्टरों के बीच सहमति बनने के बाद अब विभागीय स्तर पर इसकी औपचारिक प्रक्रिया पूरी कर दी गई है।

    स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों के इंटर्न डॉक्टर लंबे समय से अपनी मांग उठा रहे थे। सितंबर में यह मामला आंदोलन तक पहुंच गया था। भोपाल में प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के बीच स्थिति तनावपूर्ण हुई और वाटर कैनन के इस्तेमाल की घटना भी सामने आई। इसके बाद डॉक्टरों की मांग और प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम को लेकर सरकार की ओर से हस्तक्षेप किया गया।

    इंटर्न डॉक्टरों की मांग पर उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के साथ प्रतिनिधिमंडल की बातचीत हुई थी। चर्चा के दौरान स्टाइपेंड बढ़ाने के मुद्दे पर सहमति बनी और 21,500 रुपये प्रतिमाह देने की घोषणा की गई। इसके बाद आंदोलन समाप्त हुआ और विभागीय आदेश का इंतजार किया जा रहा था। अब आदेश जारी होने के साथ बढ़े हुए स्टाइपेंड को लागू करने की प्रक्रिया स्पष्ट हो गई है।

    इससे पहले इंटर्न डॉक्टरों को हर महीने 14,337 रुपये स्टाइपेंड मिलता था। आंदोलन के दौरान डॉक्टरों की ओर से इससे काफी अधिक राशि की मांग रखी गई थी। सरकार और डॉक्टरों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के बाद 21,500 रुपये की राशि पर सहमति बनी। अब आदेश में इसे 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी किए जाने से अप्रैल से सितंबर तक की अवधि के भुगतान को लेकर भी बढ़ी हुई दर लागू होने का आधार तैयार हो गया है।

    स्टाइपेंड में यह संशोधन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण ले रहे इंटर्न डॉक्टरों के लिए सीधे आर्थिक लाभ से जुड़ा फैसला है। इंटर्नशिप के दौरान डॉक्टर अस्पतालों में मरीजों की देखभाल, विभिन्न विभागों में चिकित्सकीय कार्य और प्रशिक्षण से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाते हैं। ऐसे में स्टाइपेंड में बढ़ोतरी उनके प्रशिक्षण काल के दौरान मिलने वाली मासिक आर्थिक सहायता को बढ़ाएगी।

    सरकार और इंटर्न डॉक्टरों के बीच विवाद का एक प्रमुख मुद्दा स्टाइपेंड था, लेकिन आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई भी चर्चा में रही। प्रदर्शन के दौरान वाटर कैनन और बल प्रयोग के बाद मामला और गंभीर हुआ था। उप मुख्यमंत्री ने इस घटनाक्रम पर कार्रवाई की बात कही थी। इसके बाद स्टाइपेंड बढ़ाने के निर्णय के साथ आंदोलन समाप्त होने का रास्ता साफ हुआ।

    अब लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के आदेश के बाद 21,500 रुपये मासिक स्टाइपेंड की नई दर औपचारिक रूप से लागू हो गई है। 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होने के कारण यह निर्णय केवल आगे की अवधि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आदेश में निर्धारित प्रभावी तारीख के आधार पर भुगतान की गणना की जाएगी।

  • छिंदवाड़ा में गलत इलाज के बाद महिला की मौत, बिना डिग्री इलाज कर रहे दो झोलाछाप डॉक्टर गिरफ्तार होकर जेल भेजे गए

    छिंदवाड़ा में गलत इलाज के बाद महिला की मौत, बिना डिग्री इलाज कर रहे दो झोलाछाप डॉक्टर गिरफ्तार होकर जेल भेजे गए

    मध्य प्रदेश: के छिंदवाड़ा जिले में गलत इलाज के बाद एक महिला की मौत के मामले में पुलिस ने दो झोलाछाप डॉक्टरों को गिरफ्तार किया है। दोनों पर बिना किसी मान्य चिकित्सा डिग्री और पंजीयन के मरीजों का एलोपैथिक पद्धति से इलाज करने का आरोप है। पुलिस जांच में सामने आया कि दोनों मरीजों को दवाएं देने और इंजेक्शन लगाने का काम कर रहे थे। महिला की मौत के बाद जांच शुरू हुई, जिसमें दोनों के पास चिकित्सा शिक्षा से जुड़े आवश्यक दस्तावेज नहीं मिले।

    पुलिस के अनुसार घटना 18 जुलाई 2026 की है। ग्राम बम्होरी निवासी 43 वर्षीय आरती, पत्नी रामभगस साहू, को बुखार आया था। तब उसके परिजन इलाज के लिए महाराजा मार्केट स्थित एक क्लिनिक पर लेकर पहुंचे थे। यहां राजेश सिन्हा नाम का व्यक्ति इलाज करता था। महिला की जांच और उपचार के दौरान उसके भाई ज्योतिप्रकाश मंडल उर्फ काली ने फोन पर राजेश से बातचीत की।

    इसके बाद ज्योतिप्रकाश ने आरती को दो इंजेक्शन लगाए। इंजेक्शन लगाए जाने के बाद महिला की तबीयत अचानक और बिगड़ गई। हालत गंभीर होने पर परिजन उसे तत्काल हर्रई अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां चिकित्सकीय उपचार के दौरान आरती की मौत हो गई। घटना के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और उपचार से जुड़े तथ्यों की जानकारी जुटाई।

    जांच के दौरान पुलिस को राजेश सिन्हा और ज्योतिप्रकाश मंडल के पास चिकित्सा शिक्षा से संबंधित कोई प्रमाण पत्र, डिग्री या डिप्लोमा नहीं मिला। इसके अलावा दोनों के पास मेडिकल रजिस्ट्रेशन भी नहीं था। इसके बावजूद दोनों मरीजों का इलाज कर रहे थे और उन्हें दवाएं तथा इंजेक्शन दे रहे थे। पुलिस ने इसी आधार पर दोनों के खिलाफ कार्रवाई की।

    मामले की जांच के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या सहित संबंधित धाराओं में अपराध दर्ज किया। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 और 3(5) के साथ मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम की धारा 24 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है।

    पुलिस ने कार्रवाई करते हुए राजेश सिन्हा और ज्योतिप्रकाश मंडल दोनों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद दोनों को जेल भेज दिया गया है। पुलिस की जांच का मुख्य आधार महिला को दिए गए उपचार, दोनों आरोपियों की चिकित्सा योग्यता और घटना के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने से जुड़े तथ्य रहे।

    मामला बिना वैध चिकित्सा योग्यता के मरीजों का इलाज किए जाने से जुड़ा है। जांच में दोनों आरोपियों के पास इलाज करने के लिए जरूरी डिग्री, डिप्लोमा और मेडिकल रजिस्ट्रेशन नहीं मिलने की बात सामने आई है। इसके बावजूद वे मरीजों को दवाएं और इंजेक्शन दे रहे थे।

    आरती को बुखार की शिकायत के बाद इलाज के लिए क्लिनिक ले जाया गया था, लेकिन दो इंजेक्शन लगाए जाने के बाद उसकी हालत बिगड़ गई और अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर गिरफ्तारी की कार्रवाई की। फिलहाल दोनों आरोपी जेल में हैं और उनके खिलाफ दर्ज प्रकरण के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है।

  • उत्तराखंड सरकार का बड़ा फैसला, सरकारी डॉक्टर शाम को अस्पतालों में कर सकेंगे निजी प्रैक्टिस, माननी होंगी तीन शर्तें..

    उत्तराखंड सरकार का बड़ा फैसला, सरकारी डॉक्टर शाम को अस्पतालों में कर सकेंगे निजी प्रैक्टिस, माननी होंगी तीन शर्तें..

    नई दिल्ली । उत्तराखंड सरकार राज्य की स्वास्थ सेवाओं को अधिक सुदृढ़ और आम नागरिकों के लिए सुलभ बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेने जा रही है। नई व्यवस्था के तहत सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को शाम के समय अस्पताल परिसर के भीतर ही निजी प्रैक्टिस करने की सशर्त छूट प्रदान की जाएगी। सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य मरीजों को किफायती दर पर शाम के वक्त भी विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

    वर्तमान में राज्य के सरकारी डॉक्टरों के लिए निजी प्रैक्टिस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लागू है, जिसके एवज में सरकार उन्हें नियमित वेतन के साथ नॉन प्रैक्टिस अलाउंस का भुगतान करती है। हालांकि, कतिपय व्यावहारिक समस्याओं और मरीजों की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने शाम के समय अस्पतालों के बुनियादी ढांचे का उपयोग करते हुए यह सुविधा देने का मॉडल तैयार किया है।

    इस नई व्यवस्था को पूरी तरह से ऐच्छिक रखा जाएगा और इसके संचालन के लिए तीन प्रमुख शर्तें अनिवार्य की गई हैं। पहली शर्त के अनुसार डॉक्टरों को मरीजों से बेहद न्यूनतम परामर्श शुल्क लेने की अनुमति होगी। दूसरी शर्त यह है कि परामर्श के दौरान डॉक्टर बाहर की दवाइयां नहीं लिख सकेंगे, बल्कि अस्पताल में उपलब्ध या जेनेरिक दवाएं ही सुझानी होंगी। तीसरी शर्त के तहत यदि मरीज को किसी प्रकार के ऑपरेशन या गंभीर इलाज की आवश्यकता होती है, तो वह प्रक्रिया केवल सरकारी अस्पताल में ही पूरी की जाएगी।

    स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की गई है और जल्द ही इसे औपचारिक स्वीकृति के लिए राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से डॉक्टरों को अस्पताल परिसर के बाहर अनधिकृत क्लिनिक चलाने की आवश्यकता नहीं होगी और अस्पताल के संसाधनों का भी अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

    विशेष रूप से पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में दोपहर दो बजे के बाद सरकारी अस्पतालों में सेवाएं सीमित हो जाती थीं। नई नीति लागू होने से पर्वतीय जिलों के निवासियों को शाम के समय भी विशेषज्ञ डॉक्टरों का परामर्श अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल में ही प्राप्त हो सकेगा। इससे निजी अस्पतालों और महंगे क्लीनिकों पर मरीजों की निर्भरता काफी हद तक कम होगी।

    मध्य प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों के स्वास्थ्य विभागों द्वारा भी इस प्रकार के हाइब्रिड हेल्थकेयर मॉडल का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की दक्षता को बढ़ाया जा सके। उत्तराखंड में इस निर्णय के लागू होने से न केवल आम मरीजों को कम खर्च में बेहतर इलाज मिलेगा, बल्कि सरकारी डॉक्टरों की कार्यक्षमता का भी राज्य के स्वास्थ्य ढांचे के हित में सही उपयोग हो सकेगा।

  • ‘जय श्री राम’ बोलने पर 500 रुपये की छूट: कोलकाता के डॉक्टर के ऑफर पर सियासी बवाल

    ‘जय श्री राम’ बोलने पर 500 रुपये की छूट: कोलकाता के डॉक्टर के ऑफर पर सियासी बवाल

    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक हृदय रोग विशेषज्ञ (Cardiologist) के अनोखे ऑफर ने राजनीतिक गलियारों में विवाद खड़ा कर दिया है। डॉक्टर ने घोषणा की है कि जो भी मरीज उनके क्लिनिक में आकर ‘जय श्री राम’ कहेगा, उसे कंसल्टेशन फीस में 500 रुपये की भारी छूट दी जाएगी। डॉक्टर ने अपने इस कदम को राज्य में ‘राजनीतिक बदलाव’ की उम्मीद से जोड़ा है।
    इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पी.के. हाजरा ने यह छूट केवल दक्षिण कोलकाता स्थित अपने निजी चेंबर पर लागू की है। वे एक प्राइवेट अस्पताल में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी विभाग के निदेशक भी हैं, लेकिन वहां यह छूट लागू नहीं होगी।

    डॉ. हाजरा ने अपने क्लिनिक पर एक पोस्टर लगाया है, जिसमें वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दुपट्टा पहने नजर आ रहे हैं। उन्होंने यह जानकारी सोशल मीडिया पर भी शेयर की है। डॉक्टर के मुताबिक, यह पोस्टर उनके ही एक मरीज ने तैयार किया था।
    डॉ. हाजरा ने कहा कि यह पूरी तरह से उनके दिमाग की उपज है। उन्होंने अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा: पिछले कई वर्षों में एक डॉक्टर के तौर पर मैंने मरीजों के सवाल झेले हैं कि आखिर उन्हें इलाज के लिए दूसरे राज्यों में क्यों जाना पड़ता है। जब भी मैं बंगाल के मरीजों को इलाज के लिए असम, ओडिशा या दक्षिण भारत जाते देखता हूं, तो मुझे बहुत बुरा लगता है। इसके विपरीत दूसरे राज्यों से लोग यहां नहीं आते। मुझे लगता है कि इस चलन को बदलने की जरूरत है। डॉक्टर ने आगे कहा कि वह सीधे तौर पर भाजपा से नहीं जुड़े हैं, लेकिन वह भाजपा शासित अन्य राज्यों की प्रगति के प्रशंसक हैं।
    डॉ. हाजरा ने स्वीकार किया कि उन्हें अपने गृह जिले पश्चिम मेदिनीपुर के पिंगला से भाजपा का टिकट मिलने की उम्मीद थी। जब ऐसा नहीं हुआ, तो उन्होंने लोगों को राज्य में बदलाव के लिए वोट करने हेतु प्रेरित करने का यह अनोखा तरीका निकाला। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के काम की तारीफ भी की, लेकिन कहा कि अन्य राज्यों की विकास गति को देखते हुए बंगाल पिछड़ रहा है। उनके अनुसार, केंद्र और टीएमसी सरकार के बीच चल रही “खींचतान” का सीधा असर राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली पर पड़ा है।
    तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पेशे से चिकित्सक डॉ. निर्मल माझी ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया: डॉ. हाजरा अपनी जुटाई गई अपार संपत्ति की रक्षा करने के लिए भाजपा का पक्ष लेने की कोशिश कर रहे हैं। वह खुद को बचाने के लिए भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ में घुसकर अपनी छवि साफ करना चाहते हैं। माझी ने यह भी दावा किया कि ऐसे कदमों से भाजपा को चुनाव जीतने में कोई मदद नहीं मिलेगी क्योंकि जनता का समर्थन टीएमसी के साथ है।
    भाजपा के राज्यसभा सांसद और बंगाल के पूर्व भाजपा अध्यक्ष राहुल सिन्हा ने डॉ. हाजरा के इस कदम की सराहना की। उन्होंने कहा: मुझे लगता है कि यह पहल अन्य डॉक्टरों को भी आगे आने और ऐसे फैसले लेने के लिए प्रेरित करेगी, ताकि राज्य के स्वास्थ्य ढांचे की बेहतरी के लिए बदलाव लाया जा सके। बता दें कि पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है, और मतों की गिनती 4 मई को की जाएगी।

  • MP: इंदौर में MYH के डॉक्टरों का कमाल….1 साल के बच्चे के गले में फंसी जिंदा मछली, सर्जरी कर बचाई जान

    MP: इंदौर में MYH के डॉक्टरों का कमाल….1 साल के बच्चे के गले में फंसी जिंदा मछली, सर्जरी कर बचाई जान


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश के इंदौर (Indore) के एमवाय अस्पताल (MY Hospital) में एक बेहद हैरान कर देने वाला मामला सामने आया, जहां खेलते-खेलते एक साल के मासूम (One Year old Innocent) की जिंदगी पर संकट आ गया। बच्चे के गले में जिंदा मछली फंस (Live Fish Stuck Child’s Throat) गई, जिससे उसकी हालत गंभीर हो गई। डॉक्टरों की तत्परता और जटिल सर्जरी के बाद आखिरकार बच्चे की जान बचाई जा सकी।


    सफाई के दौरान मछलियों को बाहर निकालकर रखा

    परिजनों के अनुसार, घर में एक्वेरियम की सफाई के दौरान मछलियों को बाहर निकालकर रखा गया था। इसी दौरान पास में खेल रहे बच्चों में से एक ने मछली को हाथ में उठा लिया। यह देख एक वर्षीय बच्चा जोर-जोर से हंसने लगा। तभी हाथ में छटपटा रही मछली फिसलकर सीधे बच्चे के मुंह में चली गई और गले के अंदर जाकर फंस गई।


    बच्चे को होने लगी सांस लेने में तकलीफ

    घटना के बाद बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। वह बेचैनी और घबराहट से जूझने लगा। उसके मुंह से खून भी निकलने लगा, जिससे परिजन घबरा गए और तुरंत उसे एमवाय अस्पताल लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने जांच में पाया कि मछली गले के पिछले हिस्से में फंसी हुई है और जिंदा होने के कारण लगातार हलचल कर रही है, जिससे अंदरूनी अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा था।


    सबसे बड़ी चुनौती, मछली जीवित

    ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. यामिनी गुप्ता के नेतृत्व में तुरंत आपातकालीन टीम गठित की गई और बिना देर किए सर्जरी का निर्णय लिया गया। ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मछली जीवित थी और उसके पंख व गलफड़े हिल रहे थे, जिससे स्वर-यंत्र और भोजन नली को नुकसान पहुंचने का खतरा बना हुआ था। करीब तीन इंच लंबी और डेढ़ इंच चौड़ी गोरामी मछली को सावधानीपूर्वक बाहर निकाला गया। सर्जरी सफल रही और उपचार के बाद बच्चे की सांस सामान्य हो गई। फिलहाल उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।


    मामला बेहद दुर्लभ

    विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी कम उम्र में इस तरह का मामला बेहद दुर्लभ है और मध्य भारत में यह पहला मामला माना जा रहा है। समय पर इलाज मिलने से एक बड़ी अनहोनी टल गई। डॉक्टरों ने अभिभावकों से अपील की है कि छोटे बच्चों को हमेशा निगरानी में रखें और उन्हें छोटी या जीवित वस्तुओं से दूर रखें, क्योंकि इस तरह की लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।

  • मप्र में 8 हजार डॉक्टर आज से हड़ताल पर… बिगड़ सकती है स्वास्थ्य व्यवस्था

    मप्र में 8 हजार डॉक्टर आज से हड़ताल पर… बिगड़ सकती है स्वास्थ्य व्यवस्था


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश में आज स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत करीब 8 हजार रेजिडेंट डॉक्टर, सीनियर रेजिडेंट और इंटर्न सोमवार सुबह 9 बजे से हड़ताल पर चले गए हैं। मध्य प्रदेश में आज स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत करीब 8 हजार रेजिडेंट डॉक्टर, सीनियर रेजिडेंट और इंटर्न सोमवार सुबह 9 बजे से हड़ताल पर चले गए हैं। हड़ताल के चलते डॉक्टर ओपीडी में मरीज नहीं देखेंगे और सामान्य ऑपरेशन भी नहीं करेंगे। केवल अति गंभीर मरीजों का इलाज जारी रहेगा।

    जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के नेतृत्व में यह हड़ताल लंबित स्टाइपेंड संशोधन को लागू करने की मांग को लेकर की जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि शासन के आदेश के अनुसार सीपीआई आधारित स्टाइपेंड संशोधन 1 अप्रैल 2025 से लागू होना था, लेकिन अब तक इसे लागू नहीं किया गया और न ही बकाया एरियर का भुगतान हुआ है।

    डॉक्टरों के अनुसार इस संबंध में कई बार शासन और संबंधित विभागों से निवेदन किया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इससे डॉक्टरों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

    हड़ताल के कारण प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में हर्निया, रॉड इंप्लांट सहित कई सामान्य ऑपरेशन टल सकते हैं, जिससे मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि आपातकालीन सेवाएं और गंभीर मरीजों का इलाज पहले की तरह जारी रहेगा।

    जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के डॉ. ब्रिजेंद्र ने बताया कि हड़ताल की सूचना प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों के डीन और विभागाध्यक्षों को दे दी गई है। इसके तहत ओपीडी और अन्य इलेक्टिव सेवाओं का बहिष्कार किया जाएगा।

    गौरतलब है कि जूनियर डॉक्टर पिछले तीन दिनों से काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। डॉक्टरों का कहना है कि उनका आंदोलन केवल शासन द्वारा जारी आदेश के क्रियान्वयन और लंबित एरियर के भुगतान की मांग को लेकर है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार जल्द फैसला नहीं करती है तो आंदोलन को और तेज किया जा सकता है।