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  • दिवाली से पहले सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, जानिए किन वजहों से टूटा भाव और कब लौट सकती है तेजी

    दिवाली से पहले सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, जानिए किन वजहों से टूटा भाव और कब लौट सकती है तेजी


    नई दिल्ली ।
    दिवाली और त्योहारी सीजन से पहले सोने की कीमतों में आई बड़ी गिरावट ने खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारत के वायदा और खुदरा बाजार तक सोने के भाव में कमजोरी दर्ज की गई है। महंगे कच्चे तेल, मजबूत अमेरिकी डॉलर और ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता ने कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, कीमतों में आई इस नरमी को त्योहारों और शादी के सीजन के लिए खरीदारी के संभावित अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर इस सप्ताह सोने का वायदा भाव करीब 3.50 प्रतिशत गिर गया। खुदरा बाजार में भी कीमतों में उल्लेखनीय कमी आई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने का भाव पहले 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो 23 अक्टूबर तक घटकर 1,41,630 रुपये रह गया। इस तरह एक सप्ताह में इसकी कीमत 4,796 रुपये प्रति 10 ग्राम कम हो गई।

    इसी अवधि में 22 कैरेट सोने के दाम भी नीचे आए। इसका भाव 1,34,207 रुपये प्रति 10 ग्राम से गिरकर 1,29,566 रुपये रह गया। यानी 22 कैरेट सोना 4,641 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हुआ। कीमतों में इस गिरावट से उन ग्राहकों को राहत मिल सकती है, जो दिवाली या आगामी शादी समारोहों के लिए आभूषण खरीदने की योजना बना रहे हैं।

    वैश्विक बाजार में भी सोने की स्थिति कमजोर बनी हुई है। शुक्रवार को इसकी कीमत करीब तीन महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई। पूरे सप्ताह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में लगभग चार प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो जून के बाद इसका सबसे कमजोर साप्ताहिक प्रदर्शन बताया गया है। इस गिरावट के बाद निवेशकों की नजर 4,000 डॉलर प्रति औंस के महत्वपूर्ण स्तर पर टिकी है। यह स्थिति अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली नीतिगत बैठक से ठीक पहले बनी है।

    सोने की कीमतों में गिरावट की एक प्रमुख वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। सऊदी अरब में हूती हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी, जिससे ब्रेंट क्रूड पांच महीने से अधिक के उच्च स्तर पर पहुंच गया। महंगा तेल महंगाई को बढ़ा सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रख सकते हैं, जिससे सोने जैसी बिना ब्याज वाली संपत्तियों की मांग प्रभावित होती है।

    अमेरिका में उपभोक्ता और उत्पादक महंगाई के आंकड़े भी बाजार की चिंता बढ़ाने वाले रहे हैं। कारोबारियों को आगामी बैठक में फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में बदलाव नहीं होने की उम्मीद है, लेकिन साल के अंत में मौद्रिक नीति सख्त रहने की आशंका बनी हुई है। डॉलर इंडेक्स में कुछ नरमी के बावजूद इसका स्तर करीब 101.5 बना हुआ है। फरवरी के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के समय से सोने में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट का भी उल्लेख किया गया है।

    तकनीकी संकेतों के मुताबिक, निकट अवधि में सोने पर दबाव बना रह सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 4,000 डॉलर प्रति औंस के नीचे टिकती है, तो 3,950 डॉलर तक गिरावट की आशंका जताई गई है। दूसरी ओर, 3,950 से 4,000 डॉलर का दायरा संभावित खरीदारी और समर्थन का क्षेत्र माना जा रहा है। चांदी के लिए 50 से 55 डॉलर के स्तर को अहम समर्थन बताया गया है। कुछ विशेषज्ञों ने आने वाले हफ्तों में 10 से 15 प्रतिशत तक सुधार की संभावना जताई है, जबकि सोने में तेजी का रुझान मजबूत होने के लिए 4,200 डॉलर के ऊपर टिकना महत्वपूर्ण माना गया है।

    दिवाली के दौरान सोने और आभूषणों की मांग मजबूत रहने की उम्मीद है। भारतीय खरीदार सोने को निवेश और पारंपरिक खरीदारी, दोनों के लिहाज से महत्व देते हैं। बाजार में हल्के वजन के आभूषणों और पुराने सोने के बदले नए आभूषण खरीदने की योजनाओं की मांग भी बढ़ रही है। ग्राहक अब डिजाइन के साथ शुद्धता, प्रामाणिकता और पारदर्शिता पर भी ध्यान दे रहे हैं। हालांकि, दिवाली से पहले कीमतों में दोबारा उछाल आएगा या गिरावट जारी रहेगी, यह वैश्विक बाजार, डॉलर की चाल और अमेरिकी मौद्रिक नीति के संकेतों पर निर्भर करेगा।

  • सोने की कीमत में 3,004 रुपये और चांदी में 10,191 रुपये की गिरावट, जानें अब 10 ग्राम गोल्ड और किलो सिल्वर के भाव

    सोने की कीमत में 3,004 रुपये और चांदी में 10,191 रुपये की गिरावट, जानें अब 10 ग्राम गोल्ड और किलो सिल्वर के भाव


    नई दिल्ली ।
    सोने और चांदी की कीमतों में इस सप्ताह बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। दोनों कीमती धातुओं के भाव में कमी आने से खरीदारों और निवेशकों का ध्यान बाजार के नए रुख पर है। सप्ताह के दौरान सोने की कीमत 3,000 रुपये से अधिक और चांदी का भाव 10,000 रुपये से ज्यादा नीचे आया। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम घटकर 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गया, जबकि चांदी की कीमत कम होकर 2,10,918 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों धातुओं के भाव दबाव में रहे।

    बुलियन बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत इस सप्ताह 3,004 रुपये घट गई। सप्ताह की शुरुआत में इसका भाव 1,49,430 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो गिरकर 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया। इस बदलाव के साथ सोने की कीमत में उल्लेखनीय साप्ताहिक कमी दर्ज की गई है।

    अन्य शुद्धता वाले सोने के भाव में भी गिरावट देखने को मिली। 22 कैरेट सोने की कीमत पहले 1,36,878 रुपये प्रति 10 ग्राम थी, जो घटकर 1,34,126 रुपये रह गई। इसी तरह 18 कैरेट सोने का भाव 1,12,073 रुपये से कम होकर 1,09,820 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। इस तरह अलग-अलग श्रेणियों में सोने की कीमतों में कमी दर्ज की गई है।

    सप्ताह के दौरान 24 कैरेट सोने का सबसे ऊंचा भाव 12 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 1,48,425 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया था। वहीं, सबसे कम भाव 15 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 1,45,564 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। इन आंकड़ों से पता चलता है कि सप्ताह के भीतर सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहा और कुल मिलाकर भाव नीचे आए।

    चांदी की कीमत में भी सोने के मुकाबले बड़ी रकम की गिरावट दर्ज की गई। सप्ताह के दौरान चांदी 10,191 रुपये प्रति किलोग्राम सस्ती हुई। इसका भाव पहले 2,21,109 रुपये प्रति किलो था, जो घटकर 2,10,918 रुपये प्रति किलो रह गया। चांदी का उच्चतम भाव 12 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 2,20,874 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया था। इसके बाद कीमत में गिरावट आई और 15 अक्टूबर को सुबह के सत्र में भाव घटकर 2,07,098 रुपये प्रति किलो के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया।

    सोने और चांदी की कीमतें जारी करने वाली व्यवस्था के तहत दिन में दो बार, सुबह और शाम के सत्र में भाव घोषित किए जाते हैं। इससे बाजार में कीमतों के बदलाव पर नजर रखने में मदद मिलती है। हालांकि, ग्राहकों को ध्यान रखना चाहिए कि आभूषण खरीदते समय अंतिम कीमत में शुद्धता, स्थानीय बाजार के भाव, मेकिंग चार्ज और लागू करों के कारण अंतर हो सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,186 डॉलर प्रति औंस और चांदी लगभग 57 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर कारोबार कर रही थी। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण डॉलर मजबूत होने से कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ा है। इसके अलावा, महंगाई बढ़ने की आशंका से ब्याज दरों में इजाफे की संभावना भी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर रही है।

    ब्याज दरें बढ़ने की आशंका के बीच कुछ निवेशक सोने और चांदी में बिकवाली कर रहे हैं। इससे दोनों धातुओं की कीमतों में गिरावट को बल मिला है। आने वाले दिनों में इनके भाव पर डॉलर की चाल, कच्चे तेल की कीमतों और ब्याज दरों से जुड़े संकेतों का असर बना रह सकता है।

  • आरबीआई के सख्त विदेशी मुद्रा नियमों का असर, डॉलर के मुकाबले रुपया 95.76 पर खुला, एक प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हुई भारतीय मुद्रा

    आरबीआई के सख्त विदेशी मुद्रा नियमों का असर, डॉलर के मुकाबले रुपया 95.76 पर खुला, एक प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हुई भारतीय मुद्रा

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने और कारोबार को व्यवस्थित करने के लिए उठाए गए सख्त कदमों के बाद सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में रुपया एक प्रतिशत से अधिक मजबूत होकर 95.76 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ था और यह 97 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गई थी। ऐसे में केंद्रीय बैंक के नए उपायों के बाद रुपये में आई मजबूती को विदेशी मुद्रा बाजार के घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

    रुपये की मजबूती का असर ऑफशोर कारोबार में भी दिखाई दिया। एक महीने के नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाजार में भारतीय मुद्रा एक समय 94.17 प्रति डॉलर तक पहुंच गई थी। इस स्तर पर रुपये में लगभग 2.7 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि, बाद में इसमें कुछ नरमी आई और बढ़त घटकर करीब 0.7 प्रतिशत रह गई। इससे स्पष्ट हुआ कि शुरुआती मजबूती के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहा।

    अक्टूबर की शुरुआत में आरबीआई ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन को लेकर कई नियामकीय बदलावों की घोषणा की थी। इन उपायों के तहत बिना हेजिंग वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (एफईआरआर) नाम से एक नई व्यवस्था लागू की। इन कदमों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में अनियंत्रित गतिविधियों पर रोक लगाना और कारोबार को अधिक व्यवस्थित बनाना है।

    नए निर्देशों के अनुसार, अधिकृत डीलर भारतीय रुपये से संबंधित ऐसे विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध को दोबारा बुक नहीं कर सकेंगे, जिसे पहले रद्द किया जा चुका है। हालांकि, अनुबंध की निर्धारित अवधि पूरी होने पर उसके रोलओवर की अनुमति बनी रहेगी। इस व्यवस्था के जरिए पहले रद्द किए गए अनुबंधों को दोबारा बुक करने से जुड़ी गतिविधियों पर नियंत्रण रखने का प्रयास किया गया है।

    आरबीआई ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध करने वाले ग्राहकों के लिए भी नियम सख्त किए हैं। अब अधिकृत डीलरों को ग्राहकों से लिखित घोषणा लेनी होगी कि जिस मूल जोखिम से बचाव के लिए हेजिंग की जा रही है, उसके लिए किसी अन्य अधिकृत डीलर के साथ पहले से हेजिंग नहीं की गई है। इस शर्त का उद्देश्य एक ही जोखिम के लिए अलग-अलग जगहों पर दोहरी हेजिंग की संभावना को नियंत्रित करना है।

    एफईआरआर व्यवस्था के तहत 20 लाख डॉलर से अधिक मूल्य वाले कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए अधिकृत डीलरों को अनुबंध मूल्य के रुपये में समतुल्य का 20 प्रतिशत नकद रिजर्व आरबीआई के पास रखना होगा। यह रिजर्व अनुबंध की समाप्ति तक प्रतिदिन बनाए रखना अनिवार्य है। केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई उपयोगकर्ता कई लेनदेन के माध्यम से नियामकीय नियमों को दरकिनार करने का प्रयास करता है, तो इसे नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।

    शनिवार को आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विशेष व्यवस्था शुरू करने समेत कई अन्य कदम उठाए थे। ये उपाय ऐसे समय में किए गए, जब रुपया 97 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया था। इससे पहले पिछले सप्ताह केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में भी बढ़ोतरी की थी और संकेत दिया था कि आवश्यकता पड़ने पर मौद्रिक नीति को और सख्त किया जा सकता है। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की आगे की चाल पर इन उपायों का असर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर भविष्य की दिशा को निश्चित नहीं कहा जा सकता।

  • रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI के नए कदम, तेल कंपनियों को सीधे डॉलर और फॉरेक्स सौदों पर सख्ती

    रुपये की गिरावट रोकने के लिए RBI के नए कदम, तेल कंपनियों को सीधे डॉलर और फॉरेक्स सौदों पर सख्ती

    नई दिल्ली ।डॉलर के मुकाबले रुपये में जारी कमजोरी को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार से जुड़े कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य डॉलर की अतिरिक्त मांग कम करना और रुपये पर पड़ रहे दबाव को नियंत्रित करना है। इसके तहत सरकारी तेल कंपनियों को सीधे डॉलर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के साथ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों के नियम भी सख्त किए गए हैं। इन उपायों से रुपये को राहत मिलने की उम्मीद है, हालांकि इसकी मजबूती की गारंटी नहीं दी जा सकती।

    रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे महंगे कच्चे तेल, डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी निवेशकों की ओर से भारतीय बाजार से पैसा निकालने जैसे कारण बताए गए हैं। भारत को विदेशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। ऐसे में तेल कंपनियों की डॉलर मांग का असर विदेशी मुद्रा बाजार पर पड़ सकता है। RBI की नई व्यवस्था इसी मांग को सीधे पूरा करने और बाजार में अतिरिक्त दबाव घटाने की कोशिश है।

    इस व्यवस्था के तहत इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां अपनी रोजाना की डॉलर जरूरत सीधे RBI से पूरी कर सकेंगी। यह व्यवस्था 12 अक्टूबर 2026 से लागू होने की जानकारी दी गई है। अब तक तेल कंपनियां विदेशों से कच्चा तेल खरीदने के भुगतान के लिए बाजार से डॉलर खरीदती थीं। बड़ी कंपनियों की एक साथ बढ़ी मांग से डॉलर की उपलब्धता और रुपये की विनिमय दर पर दबाव पड़ सकता है। केंद्रीय बैंक से सीधे डॉलर मिलने पर बाजार में उनकी खरीद की जरूरत कम हो सकती है।

    RBI ने विदेशी मुद्रा से जुड़े डेरिवेटिव सौदों पर भी सीमाएं सख्त की हैं। जिन सौदों के पीछे वास्तविक लेनदेन या जरूरत नहीं होती, उनमें डॉलर से जुड़ी पोजिशन लेने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है। इसके अलावा, रुपये से संबंधित कुछ रद्द किए गए विदेशी मुद्रा अनुबंधों को दोबारा बुक करने पर रोक लगाने का फैसला भी किया गया है। इन बदलावों का उद्देश्य बाजार में अनावश्यक गतिविधियों को सीमित करना है।

    विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव के कुछ सौदों के लिए बैंकों को 20 प्रतिशत राशि रिजर्व के रूप में रखने का नियम भी लागू किया गया है। यह व्यवस्था पात्र विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों पर लागू होगी। दो मिलियन डॉलर से अधिक के कुछ हेजिंग सौदे इससे प्रभावित हो सकते हैं। इससे कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचाव की लागत बढ़ने की आशंका है। स्टील, ऑटोमोबाइल, केमिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों की कंपनियों पर इसका असर पड़ सकता है।

    रुपये की आगे की चाल को लेकर कुछ बैंकर्स ने डॉलर के मुकाबले 95 से 95.50 के स्तर का अनुमान जताया है। हालांकि, यह बाजार का अनुमान है, निश्चित परिणाम नहीं। यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और डॉलर की मांग पर दबाव बना रह सकता है। इसी तरह, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने या वहां निवेश पर बेहतर रिटर्न मिलने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं। इसके विपरीत, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बढ़ने पर डॉलर की आवक को समर्थन मिल सकता है।

    RBI रुपये को स्थिर रखने के साथ आर्थिक विकास की रफ्तार पर भी प्रतिकूल असर नहीं पड़ने देना चाहता। ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी से होम लोन, कार लोन और कारोबारी कर्ज महंगे हो सकते हैं। इससे कंपनियों की लागत और लोगों के खर्च पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए केंद्रीय बैंक ने फिलहाल डॉलर की मांग और विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी को नियंत्रित करने वाले उपायों पर जोर दिया है। रुपये को स्थायी राहत कितनी मिलेगी, यह कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों के फैसलों पर निर्भर करेगा।

  • आरबीआई 12 अक्टूबर से सरकारी तेल कंपनियों के लिए खोलेगा विशेष डॉलर विंडो, रुपए को समर्थन देने के साथ विदेशी मुद्रा नियम भी सख्त

    आरबीआई 12 अक्टूबर से सरकारी तेल कंपनियों के लिए खोलेगा विशेष डॉलर विंडो, रुपए को समर्थन देने के साथ विदेशी मुद्रा नियम भी सख्त

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपए को समर्थन देने और सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष व्यवस्था शुरू करने की घोषणा की है। इसके तहत केंद्रीय बैंक 12 अक्टूबर 2026 से एक विशेष डॉलर विंडो खोलेगा। यह सुविधा अगले आदेश तक जारी रहेगी। आरबीआई ने मौजूदा बाजार परिस्थितियों का आकलन करने के बाद यह फैसला लिया है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सरकारी तेल विपणन कंपनियों को उनकी दैनिक जरूरत के अनुसार डॉलर उपलब्ध कराना है।

    इस विशेष सुविधा के तहत तीन सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को डॉलर की आपूर्ति की जाएगी। इनमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन शामिल हैं। आरबीआई निर्धारित बैंकों के माध्यम से इन कंपनियों को डॉलर बेचेगा। केंद्रीय बैंक ने यह कदम ऐसे समय उठाया है, जब विदेशी मुद्रा बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सरकारी तेल कंपनियों की दैनिक डॉलर जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई। हालांकि, इस सुविधा के तहत डॉलर की कुल मात्रा या प्रत्येक कंपनी के लिए निर्धारित सीमा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।

    विशेष डॉलर विंडो शुरू करने के साथ आरबीआई ने विदेशी मुद्रा हेजिंग सुविधाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी नियम कड़े किए हैं। केंद्रीय बैंक ने रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और एक ही जोखिम के लिए कई जगह हेजिंग करने की संभावना को रोकने के उद्देश्य से दस्तावेजीकरण संबंधी शर्तें लागू की हैं। नए नियमों के अनुसार, अधिकृत डीलरों को ऐसे उपयोगकर्ताओं से लिखित आश्वासन लेना होगा और उसे अपने रिकॉर्ड में सुरक्षित रखना होगा, जो भारतीय रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध करते हैं।

    इस लिखित आश्वासन में उपयोगकर्ता को पुष्टि करनी होगी कि संबंधित अंतर्निहित जोखिम के लिए किसी दूसरे अधिकृत डीलर के साथ हेजिंग नहीं की गई है। इस तरह एक ही जोखिम के आधार पर अलग-अलग अधिकृत डीलरों के माध्यम से हेजिंग करने पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यह दस्तावेजीकरण अधिकृत डीलरों की जिम्मेदारी होगी। उन्हें उपयोगकर्ता से आश्वासन प्राप्त करने के साथ उसे अपने पास सुरक्षित भी रखना होगा।

    विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित संचालन के लिए आरबीआई ने रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों को दोबारा बुक करने पर भी प्रतिबंध लगाया है। नए निर्देश जारी होने के बाद किसी अधिकृत डीलर के साथ रद्द किए गए रुपए से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंध को दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं होगी। यह प्रतिबंध डिलीवरेबल और नॉन-डिलीवरेबल, दोनों प्रकार के अनुबंधों पर लागू होगा। अधिकृत डीलरों को अपने ग्राहकों को ऐसे अनुबंध फिर से बुक करने की अनुमति नहीं देनी होगी।

    केंद्रीय बैंक ने बिना अंतर्निहित जोखिम के किए जाने वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन की सीमा भी घटा दी है। अब सभी अधिकृत डीलरों के लिए ऐसे लेनदेन की सीमा पांच मिलियन डॉलर के बराबर निर्धारित की गई है। इसके अतिरिक्त, दो मिलियन डॉलर से अधिक की नोशनल वैल्यू वाले रुपए से जुड़े सभी विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों के लिए विशेष वित्तीय प्रावधान लागू किया गया है।

    ऐसे अनुबंधों के मामले में अधिकृत डीलरों को आरबीआई के पास विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व बनाए रखना होगा। इस रिजर्व की राशि प्रत्येक लेनदेन की नोशनल वैल्यू के भारतीय रुपए में बराबर मूल्य का 20 प्रतिशत होगी। यह राशि नकद के रूप में रखनी होगी। इन उपायों के जरिए आरबीआई ने सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर जरूरतों को पूरा करने के साथ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार में हेजिंग और लेनदेन से जुड़े नियमों को अधिक सख्त बनाया है।

  • सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, शुरुआती कारोबार में चांदी 2.34 प्रतिशत और सोना 1.80 प्रतिशत तक टूटा

    सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, शुरुआती कारोबार में चांदी 2.34 प्रतिशत और सोना 1.80 प्रतिशत तक टूटा

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार, 28 सितंबर को गिरावट देखने को मिली। घरेलू वायदा बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान दोनों कीमती धातुओं के भाव में कमजोरी दर्ज की गई। कारोबार के शुरुआती दौर में सोना करीब 1.80 प्रतिशत और चांदी 2.34 प्रतिशत तक टूट गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों धातुओं की कीमतों में गिरावट रही।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने का 5 अक्टूबर 2026 का वायदा कॉन्ट्रैक्ट पिछले कारोबारी सत्र में 1,50,881 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 1,50,100 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। इसके बाद कीमत में और गिरावट दर्ज की गई।

    सुबह 9:50 बजे सोने का वायदा भाव 2,721 रुपये यानी 1.80 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 1,48,160 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था। कारोबारी सत्र के दौरान सोने ने 1,47,667 रुपये प्रति 10 ग्राम का न्यूनतम स्तर छुआ। वहीं, इसका उच्चतम स्तर 1,50,100 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया।

    सोने की तरह चांदी के भाव में भी गिरावट दर्ज की गई। एमसीएक्स पर चांदी का 4 दिसंबर 2026 का वायदा कॉन्ट्रैक्ट पिछले कारोबारी सत्र में 2,34,696 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 2,32,300 रुपये प्रति किलोग्राम पर खुला।

    सुबह 9:50 बजे चांदी 5,490 रुपये यानी 2.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,29,206 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रही थी। कारोबार के दौरान चांदी का न्यूनतम भाव 2,28,035 रुपये प्रति किलोग्राम और उच्चतम भाव 2,32,300 रुपये प्रति किलोग्राम रहा।

    घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में कमजोरी देखी गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 2.09 प्रतिशत गिरकर 4,230 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। वहीं, चांदी की कीमत 3.67 प्रतिशत की गिरावट के साथ 62.43 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

    बाजार के जानकारों के मुताबिक, कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरें बढ़ाए जाने की आशंका और डॉलर इंडेक्स में लगातार तेजी को प्रमुख वजह माना जा रहा है। डॉलर इंडेक्स बढ़कर 100.83 पर पहुंच गया है। डॉलर में मजबूती का असर सोने और चांदी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी देखने को मिल रहा है।

    डॉलर इंडेक्स के जरिए दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को मापा जाता है। इसमें यूरो, जापानी येन, पाउंड स्टर्लिंग, कनाडाई डॉलर, स्वीडिश क्रोना और स्विस फ्रैंक शामिल हैं। इन मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती या कमजोरी को दर्शाने वाला यह सूचकांक वैश्विक बाजार में डॉलर की स्थिति का संकेत देता है।

    सोमवार के शुरुआती कारोबार में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में सोने तथा चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, दिए गए कारोबारी आंकड़े सुबह 9:50 बजे तक के हैं और पूरे दिन के अंतिम भाव इनमें शामिल नहीं हैं।

  • सोने और चांदी में गिरावट, डॉलर की मजबूती के बीच अमेरिकी महंगाई आंकड़ों पर निवेशकों की नजर, जानें बाजार का हाल

    सोने और चांदी में गिरावट, डॉलर की मजबूती के बीच अमेरिकी महंगाई आंकड़ों पर निवेशकों की नजर, जानें बाजार का हाल

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में शुक्रवार को शुरुआती कारोबार के दौरान गिरावट दर्ज की गई। दोनों कीमती धातुओं में करीब 1.10 प्रतिशत तक की कमजोरी देखने को मिली। घरेलू बाजार में कीमतों में आई इस गिरावट के बीच निवेशकों की नजर अमेरिका से आने वाले महंगाई के आंकड़ों पर बनी हुई है, जो आने वाले समय में कीमती धातुओं की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स पर 5 अक्टूबर 2026 की डिलीवरी वाला सोने का कॉन्ट्रैक्ट पिछली क्लोजिंग 1,52,341 रुपये प्रति 10 ग्राम के मुकाबले 1,571 रुपये या 1.03 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,50,770 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। हालांकि, शुरुआती कारोबार में इसमें कुछ सुधार दिखाई दिया।

    सुबह 9:48 बजे सोना 867 रुपये यानी 0.57 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 1,51,474 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था। कारोबार के दौरान सोने ने 1,50,695 रुपये प्रति 10 ग्राम का निचला स्तर और 1,51,483 रुपये प्रति 10 ग्राम का ऊपरी स्तर छुआ।

    चांदी की कीमतों में भी शुक्रवार को दबाव देखा गया। एमसीएक्स पर 4 दिसंबर 2026 की डिलीवरी वाला चांदी का कॉन्ट्रैक्ट पिछली क्लोजिंग 2,34,099 रुपये प्रति किलोग्राम के मुकाबले 2,530 रुपये यानी 1.08 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,31,569 रुपये प्रति किलोग्राम पर खुला।

    कारोबार के दौरान चांदी ने 2,30,270 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम स्तर और 2,32,096 रुपये प्रति किलोग्राम का उच्चतम स्तर दर्ज किया। इस तरह घरेलू वायदा बाजार में सोने के साथ चांदी पर भी बिकवाली का दबाव बना रहा।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों कीमती धातुओं में कमजोरी दर्ज की गई। कॉमेक्स पर सोने की कीमत 1.29 प्रतिशत की गिरावट के साथ 4,350 डॉलर प्रति औंस पर थी। वहीं, चांदी 1.99 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 63.63 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही थी।

    जानकारों के मुताबिक, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डॉलर की मजबूती सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव डाल रही है। दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को दर्शाने वाला डॉलर इंडेक्स एक सप्ताह के उच्चतम स्तर 99.12 पर पहुंच गया है।

    बाजार में अब अमेरिका के महंगाई आंकड़ों का इंतजार किया जा रहा है। ये आंकड़े देर शाम जारी होने हैं और इनके बाद सोने तथा चांदी की कीमतों की दिशा को लेकर बाजार की तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकती है।

    महंगाई के आंकड़ों को लेकर निवेशकों में सतर्कता बनी हुई है। ऐसे में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में कीमती धातुओं की कीमतों पर आने वाले आंकड़ों और डॉलर की चाल का असर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • डॉलर पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी…. भारत-चीन-रूस ने बनाया नया पेमेंट प्लान!

    डॉलर पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी…. भारत-चीन-रूस ने बनाया नया पेमेंट प्लान!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) इस सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) की मेजबानी कर रहा है। नई दिल्ली में शनिवार से शुरू हो रहे इस सम्मेलन में 11 देशों के शीर्ष नेता जुटेंगे। इस बीच अब ब्रिक्स देशों (BRICS Nations) की डॉलर (Dollar) पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी वाली योजना पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। दरअसल भारत, चीन और रूस की अगुवाई वाला ब्रिक्स कई सालों से डॉलर का विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यह समूह अमेरिका से हमेशा खटकता रहा है। अब आगामी शिखर सम्मेलन से पहले भारत ने क्रॉस बॉर्डर भुगतान को आसान बनाने के लिए एक अहम प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इससे अमेरिका की बौखलाहट और बढ़ सकती है।

    दरअसल BRICS बीते कुछ समय से एक ऐसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहा है जिससे भारत, चीन और रूस जैसे देशों की डिजिटल करेंसियों को इंटीग्रेट किया जा सके। अब ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की वकालत करेगा।

    हालांकि भारत किसी ऐसे यूनिफाइड पेमेंट नेटवर्क का समर्थन नहीं कर रहा है जिसे अमेरिकी डॉलर या SWIFT के विकल्प के रूप में देखा जाए। इसकी वजह यह है कि भारत नहीं चाहता कि ब्रिक्स समूह को अमेरिका या पश्चिमी देशों के खिलाफ खड़े ब्लॉक के रूप में देखा जाए। यही कारण है कि भारत एक साझा ‘ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम’ बनाने के बजाय द्विपक्षीय डिजिटल करेंसी कनेक्टिविटी पर जोर दे रहा है।

    डिजिटल और स्थानीय करेंसी पर जोर
    रिपोर्ट के मुताबिक भारत का प्रस्ताव है कि ब्रिक्स देश अपनी-अपनी सेंट्रल बैंक की डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ें। इससे मध्यस्थ बैंकों पर निर्भरता कम होगी और लेनदेन की लागत में भारी गिरावट आएगी। आसान भाषा ने कहें तो भारत किसी तीसरे देश की करेंसी यानी डॉलर का उपयोग करने के बजाय सदस्य देशों की अपनी करेंसी में व्यापार करने की बात पर जोर दे रहा है।


    क्या है भारत का प्लान?

    जानकारी के मुताबिक इस सिस्टम में भारत के ई-रुपया, चीन की डिजिटल युआन और रूस की डिजिटल रूबल जैसी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। इसमें हर देश अपनी करेंसी पर पूरा कंट्रोल बनाए रखेगा। बदलाव सिर्फ इतना होगा कि इन करेंसी के जरिए आपसी लेनदेन आसान हो जाएगा। इस सिस्टम के जरिए ब्रिक्स देश आपस में होने वाले व्यापार का भुगतान सीधे अपनी डिजिटल करेंसी में कर सकेंगे। इसके लिए ना तो डॉलर की जरूरत होगी और न ही स्विफ्ट जैसे डॉलर आधारित सिस्टम से होकर भुगतान करना पड़ेगा।

    भारत इस पूरे मॉडल को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि करेंसी को मिलाने की बजाय सिस्टम को आपस में जोड़ना बेहतर रास्ता है। इसका आधार भारत का खुद का डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूपीआई है। UPI ने देश के अंदर डिजिटल पेमेंट को काफी आसान बनाया है और इसी मॉडल को अन्य देशों के साथ भी जोड़ा जा सकता है।


    काम कैसे करेगा ब्रिक्स का पेमेंट सिस्टम?

    ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सेटलमेंट साइकिल पर काम करेगा। इसका मतलब है कि हर लेनदेन का भुगतान तुरंत नहीं किया जाएगा। एक तय अवधि में आयात और निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा और आखिर में सिर्फ अंतर की रकम का भुगतान होगा। उदाहरण के लिए, अगर भारत एक महीने में चीन से 500 अरब रुपये का सामान खरीदता है और चीन भारत से 450 अरब रुपये का सामान लेता है, तो भारत को सिर्फ 50 अरब रुपये का ही भुगतान करना होगा। इससे ट्रांजेक्शन कॉस्ट भी कम होंगी।

  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । अमेरिकी डॉलर लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद और सीमा पार वित्तीय लेनदेन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और इसकी मजबूती को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता लाने के साथ सोने और दूसरी मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लंबे समय में कम हुई है। इसके बावजूद डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। इसलिए मौजूदा बदलाव को डॉलर के तत्काल अंत के तौर पर देखना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के बीच इसे धीरे-धीरे बढ़ती डीडॉलराइजेशन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    डॉलर की हालिया कमजोरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। अमेरिकी आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, आर्थिक विकास की संभावनाओं और बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंताओं का असर डॉलर की धारणा पर पड़ा है। अमेरिका का सरकारी कर्ज बढ़ने से भी लंबे समय में उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केंद्रीय बैंकों के रवैये में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। कई देश विदेशी मुद्रा भंडार को केवल एक मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांटना चाहते हैं। सोने की खरीद इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के अनुभव ने भी देशों को अपने विदेशी भंडार की सुरक्षा और विविधता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

    रूस के विदेशी भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों में यह चिंता बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव की स्थिति में विदेशी मुद्रा संपत्तियों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ केंद्रीय बैंक डॉलर के साथ सोने और अन्य मुद्राओं को भी रणनीतिक रूप से महत्व दे रहे हैं।

    तेल कारोबार में भी डॉलर की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि यह धारणा सही नहीं है कि सऊदी अरब के साथ अमेरिका का कोई ऐसा बाध्यकारी 50 साल का समझौता था जिसके तहत तेल की बिक्री केवल डॉलर में करना जरूरी था। फिर भी विभिन्न देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत जरूर देती हैं।

    भारत के लिए डॉलर में कमजोरी के कुछ फायदे हो सकते हैं। भारत कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है। यदि डॉलर कमजोर रहता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो आयात की लागत पर राहत मिल सकती है। विदेशी मशीनरी और कुछ अन्य आयातित वस्तुएं भी अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज की रुपये में लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य अवसर रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने का है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था मजबूत होने से भारत डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनती है।

    हालांकि कमजोर डॉलर का नुकसान भी हो सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, दवा, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों की कंपनियां विदेशों से बड़ी मात्रा में डॉलर कमाती हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने पर उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर कम रकम मिल सकती है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी मुद्रा संरचना में बदलाव का प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा डॉलर में अचानक और तेज गिरावट वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और निवेश प्रवाह पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल डॉलर की वैश्विक ताकत खत्म होने की बात कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक बदलाव यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने विदेशी भंडार और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रही है। डॉलर के साथ सोना और दूसरी मुद्राएं भी जगह बना रही हैं। भारत के लिए यह बदलाव आयात लागत और रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के अवसर खोल सकता है, लेकिन निर्यात और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।

  • तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच रुपया मजबूत, अगले सप्ताह वैश्विक घटनाक्रम और डॉलर की चाल से मिलेंगे अहम संकेत

    तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच रुपया मजबूत, अगले सप्ताह वैश्विक घटनाक्रम और डॉलर की चाल से मिलेंगे अहम संकेत

    नई दिल्ली । कमोडिटी बाजार के लिए आने वाला सप्ताह काफी अहम माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की चाल और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति बाजार की दिशा पर सीधा असर डाल सकती है। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम पर निवेशकों की नजर रहेगी, क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी बदलाव का असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।

    पिछले सप्ताह वैश्विक तेल बाजार में काफी अस्थिरता देखने को मिली। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 1.29 प्रतिशत बढ़कर 83.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। हालांकि, यह स्तर पिछले सप्ताह के 90.12 डॉलर प्रति बैरल के बंद भाव से अभी भी नीचे है। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई सितंबर डिलीवरी वाला क्रूड 78.18 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि पिछले सप्ताह इसका स्तर 84.67 डॉलर प्रति बैरल था।

    तेल बाजार में इस उतार चढ़ाव की प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी परिस्थितियां रही हैं। यह जलमार्ग दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां जहाजरानी को लेकर किसी संभावित समझौते की उम्मीद से बाजार में आपूर्ति सामान्य होने की संभावना बनी है। अगर जलमार्ग के संचालन को लेकर स्थायी समाधान सामने आता है तो तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    सप्ताह की शुरुआत में डब्ल्यूटीआई क्रूड में तेज गिरावट देखी गई थी। इसके पीछे अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को रोकने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के संकेतों को प्रमुख कारण माना गया। बाद में जलमार्ग संचालन से जुड़ी सकारात्मक खबरों के कारण कच्चे तेल में कुछ सुधार आया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगले सप्ताह तेल बाजार में दोनों दिशाओं में तेज गतिविधि देखने को मिल सकती है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने को लेकर औपचारिक समझौता होता है तो आपूर्ति संबंधी चिंताएं कम हो सकती हैं और कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी आ सकती है। इसके विपरीत क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर भू राजनीतिक जोखिम प्रीमियम वापस आ सकता है, जिससे तेल कीमतों में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है।

    घरेलू बाजार में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर कच्चे तेल की कीमत सप्ताह के दौरान करीब 7,100 रुपये प्रति बैरल तक गिर गई थी। बाद में इसमें सुधार हुआ और भाव लगभग 7,400 रुपये के आसपास बंद हुआ। तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक 7,500 से 7,550 रुपये का स्तर निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध बना हुआ है, जबकि 7,380 से 7,300 रुपये का दायरा अहम समर्थन क्षेत्र माना जा रहा है।

    यदि एमसीएक्स क्रूड इस समर्थन क्षेत्र से नीचे जाता है तो कीमत 7,250 रुपये तक फिसल सकती है। इसके बाद 7,100 से 7,000 रुपये के बीच मजबूत समर्थन मिलने की संभावना है। दूसरी ओर, 7,500 से 7,550 रुपये के ऊपर टिकने पर बाजार में तेजी का रुख मजबूत हो सकता है।

    इधर भारतीय रुपया भी पिछले सप्ताह अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दिया। डॉलर के मुकाबले यूएसडी/आईएनआर करीब 95.2 रुपये पर बंद हुआ, जबकि सप्ताह के दौरान यह लगभग 94.9 रुपये के निचले स्तर तक पहुंचा। तकनीकी संकेत फिलहाल रुपए के पक्ष में नजर आ रहे हैं। यदि विनिमय दर 94.9 रुपये से नीचे बनी रहती है तो रुपया 94.7 से 94.5 रुपये तक मजबूत हो सकता है।

    वहीं 95.2 से 95.4 रुपये का स्तर डॉलर के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोध क्षेत्र माना जा रहा है। इसके ऊपर जाने पर यूएसडी/आईएनआर 95.5 से 95.7 रुपये तक पहुंच सकता है और रुपए पर दबाव बढ़ सकता है। तकनीकी संकेतकों में आरएसआई के ऊंचे स्तरों से नीचे आने और एमएसीडी में डॉलर की तेजी की रफ्तार घटने के संकेत मिल रहे हैं।

    अगले सप्ताह बाजार की दिशा केवल तकनीकी स्तरों से तय नहीं होगी। अमेरिकी डॉलर की चाल, विदेशी निवेशकों का प्रवाह, कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति प्रमुख कारक रहेंगे। वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहने पर रुपए को मजबूती और तेल कीमतों में नरमी मिल सकती है, जबकि तनाव बढ़ने पर कमोडिटी बाजार में फिर से अस्थिरता बढ़ने की संभावना रहेगी।