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  • सोना-चांदी लगातार दूसरे दिन फिसले, मजबूत डॉलर के दबाव में कीमती धातुओं में 0.6% तक की गिरावट

    सोना-चांदी लगातार दूसरे दिन फिसले, मजबूत डॉलर के दबाव में कीमती धातुओं में 0.6% तक की गिरावट

    नई दिल्ली । घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में शुक्रवार को लगातार दूसरे कारोबारी दिन सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। मजबूत अमेरिकी डॉलर और वैश्विक बाजारों में बने दबाव के कारण दोनों कीमती धातुओं में कमजोरी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों और विदेशी मुद्रा बाजार में आए बदलाव का सीधा असर कीमती धातुओं की कीमतों पर पड़ रहा है। निवेशकों की सतर्कता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच फिलहाल बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के अगस्त डिलीवरी वाले वायदा अनुबंध की शुरुआत पिछले बंद भाव की तुलना में कमजोर स्तर पर हुई। कारोबार के दौरान सोने की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की गई और यह करीब 0.61 प्रतिशत टूटकर 1.42 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम से नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सोने ने दिन का निचला और ऊपरी स्तर भी दर्ज किया, जिससे बाजार में अस्थिरता का संकेत मिला। लगातार दूसरे दिन आई इस गिरावट ने अल्पकालिक निवेशकों को सतर्क कर दिया है।

    सोने के साथ-साथ चांदी की कीमतों में भी कमजोरी बनी रही। एमसीएक्स पर सितंबर डिलीवरी वाले चांदी के वायदा अनुबंध में शुरुआती कारोबार से ही दबाव देखा गया। कारोबार के दौरान चांदी की कीमत करीब 0.40 प्रतिशत तक फिसल गई। बाजार में खरीदारी सीमित रहने और वैश्विक संकेत कमजोर होने के कारण चांदी में भी गिरावट का रुख बना रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक मांग और निवेशकों की रणनीति दोनों का प्रभाव चांदी की कीमतों पर लगातार पड़ रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोना और चांदी दबाव में रहे। कॉमैक्स पर सोने और चांदी दोनों में गिरावट दर्ज की गई, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया। वैश्विक निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों को लेकर नई रणनीति अपनाई, जिससे कीमती धातुओं की कीमतों में नरमी बनी रही। विदेशी बाजारों की चाल का असर भारतीय वायदा बाजार पर तेजी से देखने को मिला और घरेलू कीमतें भी उसी दिशा में आगे बढ़ीं।

    विशेषज्ञों के अनुसार डॉलर इंडेक्स में मजबूती इस गिरावट की प्रमुख वजहों में शामिल है। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने पर सोने और चांदी जैसी धातुएं विदेशी निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत महंगी हो जाती हैं, जिससे उनकी मांग प्रभावित होती है। हाल के दिनों में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक घटनाक्रमों के कारण डॉलर में मजबूती देखने को मिली है। इसी का असर कीमती धातुओं के बाजार पर भी पड़ा है।

    बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, डॉलर की चाल और वैश्विक आर्थिक संकेतक सोने और चांदी की कीमतों की दिशा तय करेंगे। यदि डॉलर मजबूत बना रहता है तो कीमती धातुओं पर दबाव जारी रह सकता है, जबकि वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने की स्थिति में सुरक्षित निवेश की मांग फिर से बढ़ सकती है। फिलहाल निवेशकों को बाजार की बदलती परिस्थितियों पर नजर रखते हुए सोच-समझकर निवेश करने की सलाह दी जा रही है।

  • डॉलर की मजबूती के दबाव में रुपया, अमेरिकी ब्याज दर संकेतों से बढ़ी चिंता; विदेशी निवेश के बावजूद कमजोरी बरकरार

    डॉलर की मजबूती के दबाव में रुपया, अमेरिकी ब्याज दर संकेतों से बढ़ी चिंता; विदेशी निवेश के बावजूद कमजोरी बरकरार

    नई दिल्ली । भारतीय मुद्रा बाजार में गुरुवार को रुपये पर दबाव देखने को मिला और घरेलू मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर कारोबार की शुरुआत करती दिखाई दी। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, अमेरिकी केंद्रीय बैंक के सख्त संकेतों और निवेशकों की बदलती धारणा के बीच रुपया एक बार फिर दबाव में आ गया है। मुद्रा बाजार के जानकारों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का सीधा असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ रहा है।

    हाल ही में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति बैठक के बाद बाजार की धारणा में महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है। फेड अधिकारियों के बयानों से संकेत मिले हैं कि अमेरिका में ब्याज दरें अपेक्षा से अधिक समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं। महंगाई को नियंत्रित करने की प्राथमिकता के कारण अमेरिकी केंद्रीय बैंक फिलहाल नरम रुख अपनाने के मूड में नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि वैश्विक निवेशक डॉलर आधारित परिसंपत्तियों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं तो अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को वहां बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना दिखाई देती है। इसका परिणाम यह होता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी का प्रवाह प्रभावित हो सकता है और स्थानीय मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है। भारतीय रुपया भी इसी व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति का सामना कर रहा है।

    हालांकि पिछले कुछ दिनों में रुपये ने मजबूती के संकेत भी दिए थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ भू-राजनीतिक तनावों में कमी और पश्चिम एशिया से जुड़ी सकारात्मक खबरों के कारण निवेशकों का जोखिम लेने का रुझान बढ़ा था। इसके चलते रुपये में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया था। लेकिन अमेरिकी मौद्रिक नीति से जुड़े नए संकेतों ने बाजार की दिशा फिर बदल दी और डॉलर को मजबूती मिलने लगी।

    विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी रुपये की चाल को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं। हाल के महीनों में भारतीय ऋण बाजार में विदेशी निवेश बढ़ा है, जिससे घरेलू मुद्रा को कुछ हद तक समर्थन मिला है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी निवेश का प्रवाह लगातार बना रहता है तो रुपये को स्थिरता मिल सकती है और अत्यधिक उतार-चढ़ाव से राहत मिल सकती है।

    इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतें भी भारतीय मुद्रा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आती है तो इससे देश का आयात बिल घट सकता है और रुपये पर दबाव कम हो सकता है। वहीं तेल की कीमतों में तेजी आने पर मुद्रा बाजार में चिंता बढ़ सकती है।

    बाजार सहभागियों की नजर अब वैश्विक आर्थिक संकेतकों, अमेरिकी केंद्रीय बैंक की आगामी टिप्पणियों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बैठकों के नतीजों पर बनी हुई है। निवेशक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में ब्याज दरों की दिशा क्या होगी और इसका असर वैश्विक पूंजी प्रवाह पर किस प्रकार पड़ेगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में रुपये की दिशा काफी हद तक वैश्विक आर्थिक माहौल, विदेशी निवेश के रुझान और ऊर्जा बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं और निवेश प्रवाह मजबूत बना रहता है तो भारतीय मुद्रा को सहारा मिल सकता है। फिलहाल बाजार सतर्क नजर आ रहा है और निवेशक हर नए संकेत पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।