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  • 90 के दशक का ‘चंद्रकांता’ शो, जिसे देखने सुनसान हो जाती थीं सड़कें, इरफान खान भी थे अहम किरदारों में

    90 के दशक का ‘चंद्रकांता’ शो, जिसे देखने सुनसान हो जाती थीं सड़कें, इरफान खान भी थे अहम किरदारों में


    नई दिल्ली । 90 के दशक का दौर भारतीय टेलीविजन के लिए बेहद खास था। उस समय मनोरंजन के साधन सीमित थे और कुछ टीवी कार्यक्रम ऐसे थे, जिनका प्रसारण शुरू होते ही लोगों की दिनचर्या तक बदल जाती थी। इन्हीं लोकप्रिय धारावाहिकों में ‘चंद्रकांता’ का नाम भी शामिल है। यह शो रविवार की सुबह प्रसारित होता था और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग अपने जरूरी काम तक टाल देते थे। कहा जाता है कि इसके प्रसारण के दौरान कई जगहों पर सड़कें तक सुनसान नजर आती थीं।

    ‘चंद्रकांता’ का प्रसारण 1994 से 1996 के बीच रविवार सुबह 9 बजे हुआ करता था। अपने दौर में इस धारावाहिक ने दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई। इसकी कहानी, रहस्य, रोमांच और काल्पनिक दुनिया ने लोगों को टेलीविजन से जोड़े रखा। उस समय घरों में परिवार के लोग एक साथ बैठकर इस शो को देखा करते थे।

    इस धारावाहिक की कहानी देवकी नंदन खत्री के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चंद्रकांता’ पर आधारित थी। उपन्यास की काल्पनिक दुनिया को टेलीविजन पर प्रस्तुत करना उस समय एक बड़ी चुनौती थी। शो में अय्यारी और तिलिस्म जैसे तत्वों को प्रमुखता दी गई थी। अय्यारी में भेष बदलने और चालाकी से परिस्थितियों को प्रभावित करने की कला दिखाई जाती थी, जबकि तिलिस्म रहस्यमय और जादुई दुनिया से जुड़ा था।

    शो के कई किरदार दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए। चंद्रकांता, वीरेंद्र सिंह और क्रूर सिंह के साथ बद्रीनाथ और सोमनाथ जैसे किरदारों ने भी अपनी अलग पहचान बनाई। खास बात यह रही कि बाद में हिंदी सिनेमा के चर्चित अभिनेता इरफान खान भी इस धारावाहिक का हिस्सा रहे। उन्होंने बद्रीनाथ और सोमनाथ नाम के जुड़वां भाइयों की भूमिकाएं निभाईं। यह उनके शुरुआती टेलीविजन कामों में से एक था और इसने उनके अभिनय सफर में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

    ‘चंद्रकांता’ को उस समय की तकनीकी सीमाओं के बावजूद इसके दृश्य प्रभावों और काल्पनिक प्रस्तुति के लिए भी याद किया जाता है। अय्यारी, तिलिस्म और रहस्यमय घटनाओं को पर्दे पर दिखाने का तरीका दर्शकों के लिए नया अनुभव था। धारावाहिक की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि इसके किरदार और संवाद लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा में बने रहे।

    हालांकि, शो का सफर पूरी तरह आसान नहीं रहा। प्रसारण को लेकर दूरदर्शन के साथ विवाद और कानूनी लड़ाई की स्थिति बनी। इसी विवाद के चलते धारावाहिक को एक समय बीच में ही बंद करना पड़ा। अचानक प्रसारण रुकने से इसके प्रशंसकों में निराशा फैल गई। बाद में शो को दोबारा शुरू किया गया, लेकिन पहले जैसी लोकप्रियता कायम नहीं रह सकी।

    आज भी ‘चंद्रकांता’ को 90 के दशक के उन धारावाहिकों में याद किया जाता है, जिन्होंने भारतीय टेलीविजन दर्शकों के बीच फैंटेसी और रहस्य आधारित कहानियों के लिए मजबूत जगह बनाई। इसके साथ जुड़ी दर्शकों की यादें, लोकप्रिय किरदार और इरफान खान की मौजूदगी इसे उस दौर के चर्चित टीवी शो में शामिल करती है।

  • दूरदर्शन की रामायण ने रचा था कमाई का इतिहास, 78 एपिसोड से विज्ञापन बाजार में आया बड़ा बदलाव

    दूरदर्शन की रामायण ने रचा था कमाई का इतिहास, 78 एपिसोड से विज्ञापन बाजार में आया बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । टेलीविजन के शुरुआती दौर में कुछ ऐसे धारावाहिक आए, जिन्होंने केवल मनोरंजन तक अपनी पहचान सीमित नहीं रखी, बल्कि पूरे टीवी उद्योग के काम करने के तरीके को बदल दिया। रामानंद सागर की ‘रामायण’ भी ऐसा ही धारावाहिक था, जिसने प्रसारण के दौरान दर्शकों की जबरदस्त दिलचस्पी हासिल की और कमाई के मामले में भी नया रिकॉर्ड बनाया।

    दूरदर्शन पर प्रसारित इस धारावाहिक के कुल 78 एपिसोड थे। इसके प्रसारण के दौरान देशभर में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। उस समय टेलीविजन घरों में मनोरंजन का प्रमुख माध्यम बन रहा था और रामायण ने दर्शकों के बीच ऐसी जगह बनाई कि इसके प्रसारण के दौरान लोगों की दिनचर्या तक प्रभावित होने लगी थी।

    पुराने आंकड़ों के अनुसार, पहली बार प्रसारण के समय रामायण को करीब 4 करोड़ लोगों ने देखा था। इसकी लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। धारावाहिक को 53 देशों में प्रसारित किया गया और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी इसे बड़ी संख्या में दर्शक मिले।

    उपलब्ध आंकड़ों में बताया गया है कि दुनिया भर में रामायण को 65 करोड़ से अधिक दर्शकों ने देखा। इसी वजह से इसे अपने दौर के सबसे अधिक देखे जाने वाले पौराणिक टेलीविजन धारावाहिकों में शामिल किया जाता है। दोबारा प्रसारण के दौरान भी इसकी लोकप्रियता देखने को मिली और नई पीढ़ी के दर्शकों ने भी इसे काफी पसंद किया।

    रामायण की सफलता का असर इसकी कमाई पर भी दिखाई दिया। एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले टेलीकास्ट के दौरान इस धारावाहिक ने दूरदर्शन के लिए करीब 23 करोड़ रुपये की कमाई की थी। यह आंकड़ा उस दौर के टेलीविजन बाजार को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना गया।

    इस कमाई में विज्ञापनों की बड़ी भूमिका रही। धारावाहिक की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कई बड़े ब्रांड इससे जुड़े। कोलगेट, हिंदुस्तान लीवर और अरविंद मफतलाल जैसे ब्रांड्स ने इसके साथ विज्ञापन किए। रामायण के जरिए टेलीविजन कार्यक्रमों के साथ विज्ञापन जोड़ने की संभावनाएं भी तेजी से बढ़ीं।

    उस दौर में टेलीविजन धारावाहिकों के साथ विज्ञापनों का कारोबार आज की तरह व्यापक नहीं था। रामायण की लोकप्रियता ने कंपनियों को यह समझने का मौका दिया कि किसी लोकप्रिय कार्यक्रम के साथ जुड़कर बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुंच बनाई जा सकती है। इसके बाद टेलीविजन पर विज्ञापन बाजार के विस्तार का रास्ता और मजबूत हुआ।

    रामायण की सफलता इसलिए भी खास रही क्योंकि इसने एक साथ कहानी, धार्मिक आस्था, दर्शकों की भागीदारी और व्यावसायिक सफलता को जोड़ा। इसके पात्र और कलाकार घर-घर में पहचाने जाने लगे। आज भी इस धारावाहिक से जुड़ी यादें दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं।

    इसी वजह से रामानंद सागर की रामायण को भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। 78 एपिसोड वाले इस धारावाहिक ने न केवल बड़ी दर्शक संख्या हासिल की, बल्कि कमाई और विज्ञापन के क्षेत्र में भी ऐसा प्रभाव छोड़ा, जिसकी चर्चा दशकों बाद भी होती है।

  • भारतीय रेलवे के सहयोग से बनी 'यात्रा' ने 15 एपिसोड में देश की विविध संस्कृति और समाज को दिखाया

    भारतीय रेलवे के सहयोग से बनी 'यात्रा' ने 15 एपिसोड में देश की विविध संस्कृति और समाज को दिखाया

    नई दिल्ली । भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम दौर में दूरदर्शन ने ऐसे कई धारावाहिक दर्शकों को दिए, जिन्होंने केवल मनोरंजन ही नहीं किया बल्कि समाज को नई सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण भी प्रदान किया। इन्हीं यादगार कार्यक्रमों में वर्ष 1986 में प्रसारित धारावाहिक ‘यात्रा’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी इस श्रृंखला ने भारतीय रेल के लंबे सफर को आधार बनाकर देश के अलग-अलग हिस्सों, संस्कृतियों और आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाया। करीब चार दशक बाद भी यह धारावाहिक भारतीय टेलीविजन के सबसे अलग और प्रयोगधर्मी कार्यक्रमों में गिना जाता है।

    ‘यात्रा’ कुल 15 एपिसोड की श्रृंखला थी, जिसमें प्रत्येक कड़ी किसी न किसी रेल यात्रा के दौरान मिलने वाले यात्रियों और उनकी परिस्थितियों पर आधारित थी। ट्रेन यहां केवल परिवहन का माध्यम नहीं थी, बल्कि अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ने वाली एक जीवंत कड़ी के रूप में दिखाई गई। प्रत्येक एपिसोड में नई कहानी, नए पात्र और जीवन का अलग अनुभव दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता था।

    इस धारावाहिक की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे भारतीय रेलवे के सहयोग से तैयार किया गया था। पूरी टीम को विशेष ट्रेन उपलब्ध कराई गई, जिससे देश के विभिन्न हिस्सों में वास्तविक स्थानों पर जाकर शूटिंग की जा सकी। इस वजह से दर्शकों को भारत के अनेक शहरों, रेलवे स्टेशनों और प्राकृतिक दृश्यों की वास्तविक झलक देखने का अवसर मिला। कन्याकुमारी से जम्मू तवी और जैसलमेर से पूर्वोत्तर भारत तक फैले लंबे रेल मार्गों को श्रृंखला का हिस्सा बनाया गया, जिससे इसकी प्रस्तुति और भी प्रामाणिक बन गई।

    ‘यात्रा’ में उस दौर के कई प्रतिष्ठित कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। ओम पुरी, नीना गुप्ता, इला अरुण, मोहन गोखले और हरीश पटेल जैसे कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय से साधारण लोगों की असाधारण कहानियों को जीवंत रूप दिया। प्रत्येक पात्र अपने साथ एक नया अनुभव और सामाजिक संदेश लेकर आता था, जिससे दर्शक भावनात्मक रूप से भी कहानी से जुड़ जाते थे।

    धारावाहिक में केवल मनोरंजन पर ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि समाज के अनेक गंभीर विषयों को भी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया। लूटपाट, दुर्घटनाएं, महिलाओं की सुरक्षा, आत्महत्या की कोशिश, पारिवारिक संघर्ष, सामाजिक असमानता और मानवीय रिश्तों जैसे विषयों को कहानियों के माध्यम से सहज ढंग से दर्शाया गया। यही कारण था कि यह कार्यक्रम केवल एक रेल यात्रा नहीं, बल्कि समाज का चलता-फिरता आईना बन गया।

    हर एपिसोड की शुरुआत भारतीय रेलवे के इतिहास और उसके महत्व से जुड़े वॉइसओवर से होती थी। इसमें बताया जाता था कि रेलवे किस प्रकार देश के अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़ती है और करोड़ों लोगों के लिए सुलभ तथा किफायती यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण साधन बनी हुई है। इस प्रस्तुति ने कार्यक्रम को एक डॉक्यूमेंट्री जैसी गंभीरता और धारावाहिक जैसी रोचकता, दोनों प्रदान की।

    आज जब डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीक का दौर है, तब भी ‘यात्रा’ जैसे कार्यक्रम भारतीय टेलीविजन की रचनात्मकता और सामाजिक सरोकारों की मिसाल माने जाते हैं। यह धारावाहिक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि भारत की विविधता, मानवीय संबंधों और रेल यात्रा के अनुभवों को एक साथ प्रस्तुत करने वाला ऐसा प्रयास था, जिसे आज भी दूरदर्शन के सबसे यादगार कार्यक्रमों में शामिल किया जाता है।