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  • एमपी, यूपी और राजस्थान में पारा 47°C तक पहुंचने की आशंका, कई राज्यों में हीटवेव और बारिश दोनों के अलर्ट

    एमपी, यूपी और राजस्थान में पारा 47°C तक पहुंचने की आशंका, कई राज्यों में हीटवेव और बारिश दोनों के अलर्ट


    नई दिल्ली। मौसम विभाग के अनुसार इस बार मानसून सामान्य समय से पहले 26 मई के आसपास केरल पहुंच सकता है, लेकिन इसके बावजूद देश में मौसम का मिजाज चिंताजनक बना हुआ है। अमेरिकी एजेंसी NOAA की रिपोर्ट के अनुसार इस साल सुपर अल-नीनो की स्थिति बनने की संभावना है, जिससे मानसून कमजोर रह सकता है और देश के कई हिस्सों में सूखा व भीषण गर्मी बढ़ सकती है।

    अल-नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ने से मानसूनी हवाओं की दिशा प्रभावित होती है, जिससे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में बारिश कम होने और तापमान बढ़ने की आशंका रहती है। इसी कारण इस बार बारिश सामान्य से कम और गर्मी अधिक रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।

    मौसम विभाग के मुताबिक इस बार मानसून केरल से 1 जून के बजाय 26 मई के आसपास प्रवेश कर सकता है, लेकिन इसके बाद अलग-अलग राज्यों में इसकी गति अलग-अलग रहेगी। अनुमान के अनुसार राजस्थान में 20 जून, मध्य प्रदेश में 12 जून, उत्तर प्रदेश में 18 जून और बिहार में 8 से 10 जून के बीच मानसून पहुंच सकता है।

    फिलहाल देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी और लू का असर जारी है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और विदर्भ में हीटवेव का अलर्ट जारी किया गया है, जहां तापमान 46 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। कई इलाकों में रात के समय भी लू चलने की संभावना जताई गई है, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

    मध्य प्रदेश के भोपाल में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया, जिससे सड़कों का डामर तक पिघलने की स्थिति बन गई। वहीं राजस्थान के फलौदी में 44.8 डिग्री और महाराष्ट्र के अमरावती में 45.6 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया, जिससे कई क्षेत्रों में जनजीवन प्रभावित हुआ है।

    इसके साथ ही मौसम विभाग ने अलग-अलग राज्यों में बारिश और आंधी-तूफान के अलर्ट भी जारी किए हैं। झारखंड में ऑरेंज अलर्ट, बिहार और हरियाणा के कुछ जिलों में आंधी-बारिश की चेतावनी है, जबकि जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में ओलावृष्टि की संभावना जताई गई है।

    वहीं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र में हीटवेव का असर अगले एक सप्ताह तक जारी रहने की आशंका है। कई राज्यों में तापमान 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जिससे लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
     

  • गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग

    गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग


    नई दिल्ली।
    दुनिया (World) तेजी से एक ऐसे जलवायु संकट (Climate Crisis) की ओर बढ़ रही है, जहां भीषण गर्मी और सूखा (Extreme heat and Drought)मिलकर अभूतपूर्व खतरा पैदा कर रहे हैं। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक नई स्टडी के अनुसार अगर मौजूदा जलवायु नीतियों में ठोस बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक वैश्विक आबादी का करीब 28 फीसदी यानी लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में होंगे।

    अध्ययन के अनुसार इसका असर आज की तुलना में करीब पांच गुना तक बढ़ सकता है। अध्ययन के अनुसार 2001 से 2020 के बीच हर साल औसतन चार बार ऐसे हालात बने, जब भीषण गर्मी और सूखा एक साथ पड़े। यह आंकड़ा औद्योगिक काल 1850 से 1900 की तुलना में दोगुना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2090 तक ऐसी घटनाएं साल में करीब 10 बार तक हो सकती हैं और हर घटना करीब दो हफ्ते तक असर डाल सकती है।


    इसे कहते हैं कंपाउंड एक्सट्रीम

    जब कई चरम मौसम घटनाएं एक साथ मिलकर प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं तब इसे वैज्ञानिक भाषा में कंपाउंड एक्सट्रीम कहा जाता है। इससे फसलें तेजी से सूखती हैं, जल स्रोत सिकुड़ते हैं और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ खाद्य कीमतों में उछाल और लू से मौतों का जोखिम भी बढ़ता है। यह स्थिति वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा दबाव डाल सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो खुले में काम करते हैं।


    सही नीतियों से कम हो सकता है खतरा

    अगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने जलवायु वादों को प्रभावी ढंग से लागू करें तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि आने वाले दशकों में अरबों लोगों के जीवन को सुरक्षित या असुरक्षित बना सकते हैं।


    अध्ययन का आधार और वैज्ञानिक निष्कर्ष

    अध्ययन के अनुसार 8 जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का विश्लेषण किया गया, जिसमें जनसंख्या वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के विभिन्न परिदृश्यों को शामिल किया गया। ये परिदृश्य इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी वैज्ञानिक संस्था (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट पर आधारित हैं। इसके लिए 1961 से 1990 की अवधि को आधार बनाया गया।

  • देश में इस साल सामान्य से कम होगी मॉनसूनी बारिश….IMD ने जताई कई क्षेत्रों में सूखे की आशंका

    देश में इस साल सामान्य से कम होगी मॉनसूनी बारिश….IMD ने जताई कई क्षेत्रों में सूखे की आशंका


    नई दिल्ली।
    भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department- IMD) ने कहा है कि इस साल सामान्य से भी कम मॉनसूनी बारिश (Monsoon Rain) होगी। वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (Southwest Monsoon) को लेकर लंबी अवधि का पूर्वानुमान जारी करते हुए मौसम विभाग ने कहा कि इस साल देश में मॉनसूनी बारिश सामान्य से कम रहने की आशंका है, जिससे खेतीबाड़ी, पशुपालन और जल संसाधनों पर बुरा असर पड़ सकता है। मौसम विभाग के मुताबिक, जून से सितंबर के बीच होने वाली कुल मॉनसूनी बारिश सामान्य से कम यानी 92% (±5%) रह सकती है। यह लंबी अवधि यानी 1971 से 2020 तक के औसत 87 सेंटीमीटर के अनुमान पर आधारित है। इसका मतलब है कि बारिश सामान्य से थोड़ी कम हो सकती है।

    मौसम विभाग ने पूर्वानुमानों में कहा है कि इस साल अल नीनो का प्रभाव रह सकता है, जिसकी वजह से न केवल प्रचंड गर्मी पड़ेगी बल्कि बारिश भी कम होगी। विभाग ने कहा है कि अप्रैल से जून 2026 के दौरान अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) की तटस्थ स्थितियाँ रहने की सबसे अधिक संभावना है। इसके बाद, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के मौसम के दौरान अल नीनो की मजबूत स्थिति बनने की बहुत अधिक संभावना है। इस वजह से मॉनसून कमजोर रह सकता है और सामान्य से कम बारिश हो सकती है। IMD के मुताबिक, अप्रैल से जून तक स्थिति सामान्य रहेगी लेकिन इसके बाद मॉनसून के दौरान अल-नीनो बनने की संभावना अधिक है।


    किन इलाकों में सामान्य से ज्यादा बारिश

    IMD ने देश भर के लिए जारी लंबी अवधि के पूर्वामुमानों में कहा है कि भौगोलिक रूप से, देश के कई हिस्सों में मौसमी वर्षा सामान्य से कम रहने की अधिक संभावना है। हालांकि, IMD ने पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से ज्यादा बारिश की संभावना जताई है। मौसम विभाग ने ये भी बताया कि फिलहाल हिंद महासागर में तटस्थ हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की स्थितियाँ बनी हुई हैं। यानी दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं और समयपर मॉनसून के दस्तक देने की संभावना है।


    कहां-कहां सूखे के आसार?

    IMD ने कहा कि जनवरी से मार्च 2026 के दौरान उत्तरी गोलार्ध का हिम आवरण (Snow Cover) और साथ ही यूरेशिया का हिम आवरण भी सामान्य से थोड़ा ही कम रहा है, जो दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के विकसित होने और मॉनसूनी मौसमी वर्षा के लिए अनुकूल है। IMD के दीर्घ अवधि वाले इस पूर्वानुमान के दस्तावेज में फिलहाल सूखा घोषित होने वाली जगहों की सूची नहीं दी गई है, लेकिन जिन क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश/सूखे जैसे हालात बनने की आशंका ज्यादा बताई गई है, उनमें उत्तर भारत के कई हिस्से, खासकर गंगा के मैदानी और आसपास के पठारी क्षेत्र शामिल हैं।


    कुछ इलाकों में बेहतर बारिश की उम्मीद

    इसके अलावा मध्य भारत के बड़े हिस्से के सूखा से प्रभावित रहने की आशंका जताई गई है। ये वैसे इलाके हैं, जहां सामान्य से कम बारिश के अनुमान जताए गए हैं। पश्चिम भारत के कुछ हिस्से और आंतरिक क्षेत्रों में भी कम बारिश के संकेत दिए गए हैं। IMD के मैप में दिखाया गया है कि देश के बड़े हिस्से में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है, जबकि पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम के कुछ हिस्से और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्से जैसे कुछ इलाकों में बारिश इनके मुकाबले बेहतर स्थिति में रह सकता हैं।


    सामान्य से कम बारिश का क्या असर

    मौसम विभाग का कहना है कि मॉनसून के कमजोर रहने और सामान्य से कम बारिश होने की दशा में खेती पर दबाव बढ़ सकता है क्योंकि कम बारिश से बुवाई, फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है खेती की बढ़ सकती है। मॉनसूनी बारिश का खेतीबाड़ी पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा करते हुए IMD के वैज्ञानिकों ने बताया कि कम बारिश की मार आम आदमी तक को परेशान कर सकता है। इसकी वजह से सब्जी-दाल महंगी हो सकती है और कमजोर मॉनसून का असर फूड सप्लाई पर पड़ सकता है, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं।


    खेतीबाड़ी से लेकर ऑटो सेक्टर तक असर

    मौसम विज्ञानियों ने बताया कि खेतीबाड़ी बाधित होने की दशा में ग्रामीण आमदनी पर भी असर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, खेती कमजोर होने से गांवों में नकदी कम आएगी, जिसका असर ग्रामीण खर्च और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। कम बारिश से ट्रैक्टर और टू-व्हीलर की बिक्री भी प्रभावित हो सकती है और ग्रामीण मांग कमजोर होने से ऑटो कंपनियों की बिक्री पर असर पड़ सकता है।