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  • राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर मांगा जवाब, मार्च पर भी की टिप्पणी

    राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर मांगा जवाब, मार्च पर भी की टिप्पणी

    नई दिल्ली ।सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जवाब मांगा है। विपक्ष की इन याचिकाओं में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया और कथित तौर पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई है।

    विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। याचिकाओं में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित मुद्दे को उठाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की गई है। इन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अदालत ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजकर अपना पक्ष रखने को कहा है।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गांधी के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए विरोध मार्च का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कोई भी अदालत को डराने या धमकाने की कोशिश नहीं कर सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं और उन पर कोई ध्यान नहीं देता। मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।

    इस सुनवाई से पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने मामले को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने बताया कि 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया था। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के खिलाफ याचिकाएं दाखिल कीं। बैज के मुताबिक, अदालत ने इन याचिकाओं पर संज्ञान लिया और 15 अक्टूबर को सुनवाई हुई।

    दीपक बैज ने एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी होने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि वोटों की चोरी करके सत्ता हासिल की गई और चुनाव आयोग तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने इन आरोपों से जुड़े सबूत सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे हैं। बैज ने यह भी कहा कि विपक्ष को मामले में अपने पक्ष में फैसला आने की उम्मीद है। हालांकि, ये बातें कांग्रेस नेता की ओर से लगाए गए आरोप और व्यक्त किया गया विश्वास हैं।

    इस मामले में विपक्षी नेताओं ने अदालत से मुलाकात करने और ज्ञापन सौंपने के लिए पहले भी समय मांगा था। 11 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुलाकात का समय देने का अनुरोध किया था। वे अपनी मांगों और शिकायतों से संबंधित ज्ञापन सौंपना चाहते थे, लेकिन उन्हें मुलाकात का समय नहीं मिला।

    इसके अगले दिन, यानी 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इसके बाद उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और कथित तौर पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मुद्दे पर याचिकाएं दाखिल कीं। विपक्ष की ओर से इस कदम के जरिए चुनाव आयोग की प्रक्रिया को न्यायिक चुनौती दी गई है।

    15 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। अब इन याचिकाओं में उठाए गए सवालों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना है। मामले में आगे की कार्रवाई अदालत के समक्ष प्रस्तुत जवाब और सुनवाई के दौरान होने वाली कार्यवाही के आधार पर आगे बढ़ेगी।

  • SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    नई दिल्ली । मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों ने राजनीतिक विवाद को तेज कर दिया है। सामने आई जानकारी के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति दर्ज की। इनमें Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR से जुड़े फैसलों सहित कई मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

    विपक्षी दलों ने इन जानकारियों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने SIR और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वोट चोरी भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला है। उन्होंने इस मामले में न्याय मिलने की बात भी कही।

    तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव लाने की मांग की। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के फैसले अकेले कैसे लिए जा सकते हैं। वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पर गंभीरता से विचार करने की मांग की।

    विवाद का एक प्रमुख मुद्दा Form-6 में किया गया बदलाव है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें SIR से संबंधित एक अतिरिक्त सवाल शामिल किया गया था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव करने के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

    मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस और उसके सॉफ्टवेयर के नियंत्रण को लेकर भी चिंता सामने आई है। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी है, जिनके बारे में कहा गया कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पूरी जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाया गया।

    SIR से जुड़ी अपील प्रक्रिया और कुछ राज्यों में मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इन घटनाक्रमों के बीच चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर सामने आए मतभेद के दावों को अलग तरीके से स्पष्ट किया है। आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं।

    चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला किए जाने का प्रावधान है। ऐसे में SIR को लेकर सामने आई आपत्तियों और आयोग के स्पष्टीकरण के बीच विवाद का केंद्र चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता बन गया है।