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  • ओंकारेश्वर में अनोखी पहल: आटे के दीपकों से दीपदान, नर्मदा संरक्षण के साथ महिलाओं को मिल रहा रोजगार

    ओंकारेश्वर में अनोखी पहल: आटे के दीपकों से दीपदान, नर्मदा संरक्षण के साथ महिलाओं को मिल रहा रोजगार


    नई दिल्ली।  मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी के संरक्षण और स्वच्छता को लेकर एक अनूठी पहल शुरू की गई है। अब यहां नर्मदा महाआरती के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा प्लास्टिक या थर्माकोल के दीपों के बजाय आटे से बने पर्यावरण अनुकूल दीपकों से दीपदान किया जा रहा है। यह कदम नदी में प्रदूषण को रोकने और नर्मदा को स्वच्छ बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

     हर शाम होती है भव्य नर्मदा महाआरती, बढ़ रही श्रद्धालुओं की भागीदारी
    ओंकारेश्वर में हर शाम मां नर्मदा के तट पर भव्य महाआरती का आयोजन किया जा रहा है, जो अब हरिद्वार और ऋषिकेश की गंगा आरती की तर्ज पर प्रसिद्ध हो रहा है।
    देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु इस आध्यात्मिक आयोजन में शामिल होकर आस्था व्यक्त करते हैं और आटे के दीपकों से दीपदान करते हैं।

    आटे के दीपक बने पर्यावरण संरक्षण का माध्यम
    प्रशासन के अनुसार, आटे से बने दीपकों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि दीपक जलने के बाद उनका अवशेष पानी में घुल जाता है। इससे नदी में कोई प्रदूषण नहीं होता।
    इसके अलावा यह आटा जलीय जीवों के लिए भोजन का भी काम करता है, जिससे नर्मदा के पारिस्थितिकी तंत्र को भी लाभ मिलता है।

    महिलाओं को मिल रहा रोजगार, आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
    इस पहल का सामाजिक प्रभाव भी बेहद सकारात्मक है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्थानीय स्व-सहायता समूहों की महिलाएं इन आटे के दीपकों का निर्माण कर रही हैं। इससे न केवल उन्हें रोजगार मिल रहा है, बल्कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बन रही हैं।

    पर्यावरण और आस्था का संगम बना ओंकारेश्वर का प्रयास
    खंडवा कलेक्टर ऋषव गुप्ता के अनुसार, यह पहल धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम है। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं में स्वच्छता और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

    अन्य धार्मिक स्थलों के लिए बन सकता है मॉडल
    प्रशासन का मानना है कि ओंकारेश्वर में शुरू हुई यह पहल अन्य धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है, जहां बड़े पैमाने पर नदी प्रदूषण की समस्या देखी जाती है।

  • नर्मदा संरक्षण की अनोखी पहल ,आटे के दीपक से बदल रही महिलाओं की किस्मत

    नर्मदा संरक्षण की अनोखी पहल ,आटे के दीपक से बदल रही महिलाओं की किस्मत


    भोपाल । मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के ओंकारेश्वर क्षेत्र में महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह ने पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल की है। इस समूह ने आटे से बने दीपक का व्यवसाय शुरू कर न केवल नर्मदा नदी को प्रदूषण से बचाने का संकल्प लिया बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। यह पहल आज पूरे क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बन चुकी है।

    ग्राम मोरटक्का निवासी श्रीमती विजया जोशी ने मां नर्मदा आजीविका स्वयं सहायता समूह का गठन कर इस नवाचार की शुरुआत की। उनका उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ कमाना नहीं था बल्कि नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त रखना भी था। उन्होंने देखा कि परंपरागत रूप से प्लास्टिक के दोने और अन्य सामग्री में दीपदान किया जाता है जिससे नदी में प्रदूषण बढ़ता है और जलीय जीवों को नुकसान पहुंचता है। इसी चिंता के चलते उन्होंने एक नया और पर्यावरण अनुकूल विकल्प तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

    समूह की महिलाओं ने मिलकर आटे के दीपक बनाने का कार्य शुरू किया। यह दीपक पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री से तैयार किए जाते हैं और उपयोग के बाद पानी में घुल जाते हैं जिससे पर्यावरण को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता। इस पहल ने न केवल धार्मिक परंपराओं को सुरक्षित रखा है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

    इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से लगभग डेढ़ लाख रुपये का ऋण लेकर दीपक निर्माण की मशीन भी खरीदी। इससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई और महिलाओं को नियमित रोजगार मिलने लगा। धीरे धीरे यह कार्य उनके लिए स्थायी आय का स्रोत बन गया और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा।

    सरकार और ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से इन महिलाओं को बाजार भी उपलब्ध कराया गया जिससे उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ी और उन्हें नई पहचान मिली। आज यह समूह न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी अपने पर्यावरण अनुकूल दीपकों के लिए जाना जाता है।

    यह पहल इस बात का उदाहरण है कि यदि सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं भी बड़े बदलाव की वाहक बन सकती हैं। एक ओर जहां यह परियोजना नर्मदा नदी को स्वच्छ रखने में मदद कर रही है वहीं दूसरी ओर यह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी अहम भूमिका निभा रही है। ओंकारेश्वर की यह कहानी दर्शाती है कि छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। आटे के दीपक का यह नवाचार आज पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण दोनों के लिए प्रेरणा बन गया है।