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  • महुआ और तेंदू पत्ते बेचने से इको-टूरिज्म तक का सफर, मैथिली भुए की कहानी ने जीता पीएम मोदी का ध्यान; 50 महिलाओं को ट्रेनिंग

    महुआ और तेंदू पत्ते बेचने से इको-टूरिज्म तक का सफर, मैथिली भुए की कहानी ने जीता पीएम मोदी का ध्यान; 50 महिलाओं को ट्रेनिंग


    नई दिल्ली। ओडिशा के संबलपुर जिले के देबरीगढ़ की रहने वाली मैथिली भुए की मेहनत और हौसले को अब देशभर में पहचान मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात के 137वें एपिसोड में मैथिली भुए के काम का जिक्र करते हुए उनकी सराहना की। इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने जंगलों के संरक्षण में योगदान देने और स्थानीय महिलाओं को रोजगार से जोड़ने वाली मैथिली के लिए यह पल बेहद खास रहा। प्रधानमंत्री की ओर से अपने काम की तारीफ किए जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और इसे उनके जैसे ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए बड़ी प्रेरणा बताया।

    मैथिली भुए की कहानी आसान नहीं रही है। वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आती हैं और लंबे समय तक जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर रही हैं। तेंदू के पत्ते बांस महुआ कराडी और जलाऊ लकड़ी जैसे वन उत्पादों को इकट्ठा कर उन्हें बेचकर वह अपने परिवार का गुजारा करती थीं। सीमित संसाधनों के बीच जीवन आगे बढ़ रहा था लेकिन 2023 में देबरीगढ़ इको-टूरिज्म से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी को एक नई दिशा मिली।

    इको-टूरिज्म ने न केवल मैथिली को रोजगार का नया जरिया दिया बल्कि उन्हें अपने आसपास की दूसरी महिलाओं के लिए भी अवसर पैदा करने की प्रेरणा दी। धीरे धीरे क्षेत्र की महिलाएं इस पहल से जुड़ने लगीं और अब मैथिली करीब 40 से 50 महिलाओं को इको-टूरिज्म तथा हॉस्पिटैलिटी से जुड़े अलग अलग कामों की ट्रेनिंग दे रही हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ महिलाओं को नौकरी दिलाना नहीं बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वे अपने दम पर बेहतर आजीविका हासिल कर सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

    मैथिली के मार्गदर्शन में महिलाएं पर्यटकों के साथ व्यवहार करने उनकी जरूरतों को समझने और उन्हें बेहतर सेवाएं देने की ट्रेनिंग ले रही हैं। देबरीगढ़ में इको-टूरिज्म से जुड़े कई क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। इनमें स्मारिका की दुकानें चाय की दुकानें रेस्तरां नेचर कैंप और होमस्टे जैसे काम शामिल हैं। महिलाओं को उनकी जिम्मेदारी और काम की प्रकृति के अनुसार अलग अलग प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे पर्यटकों को बेहतर अनुभव दे सकें।

    मैथिली का मानना है कि पर्यटन के साथ स्थानीय समुदाय को जोड़ना क्षेत्र के विकास का मजबूत माध्यम बन सकता है। जब स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलता है तो उन्हें बेहतर आय का अवसर मिलता है और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की भावना भी मजबूत होती है। खास तौर पर महिलाओं के लिए इको-टूरिज्म आत्मनिर्भर बनने का प्रभावी रास्ता साबित हो सकता है।

    मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नाम लिए जाने के बाद मैथिली की कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। उन्होंने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके प्रयासों को पहचान मिलना बेहद खुशी की बात है। मैथिली चाहती हैं कि आने वाले समय में और अधिक महिलाएं इको-टूरिज्म से जुड़ें और अपनी आजीविका का मजबूत आधार तैयार करें।

    उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय अवसरों की पहचान मेहनत और दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ने की इच्छा किसी भी व्यक्ति की जिंदगी बदल सकती है। जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर रहने वाली मैथिली भुए आज उसी प्राकृतिक विरासत को बचाने और उसके जरिए महिलाओं को रोजगार देने की मुहिम का हिस्सा बन चुकी हैं। मन की बात में मिली पहचान उनके इस सफर को नई ऊर्जा देने के साथ देबरीगढ़ के इको-टूरिज्म मॉडल को भी देश के सामने एक प्रेरक उदाहरण के रूप में पेश करती है।

  • ‘टेक ए न्यू टर्न इन अरुणाचल’ से बदली पर्यटन की दिशा, नई पीढ़ी के यात्रियों को लुभाने की बड़ी पहल

    ‘टेक ए न्यू टर्न इन अरुणाचल’ से बदली पर्यटन की दिशा, नई पीढ़ी के यात्रियों को लुभाने की बड़ी पहल


    नई दिल्ली ।अरुणाचल प्रदेश को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिलाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा और दूरदर्शी कदम उठाया है। पर्यटन विभाग ने अपना नया ब्रांड अभियान टेक ए न्यू टर्न इन अरुणाचल लॉन्च किया है, जो अरुणाचल को पारंपरिक पहाड़ों और मठों की छवि से आगे ले जाकर अनुभव, संस्कृति और आत्मीयता की भारत की अंतिम खोज सीमा के रूप में प्रस्तुत करता है। इस अभियान का शुभारंभ नई दिल्ली स्थित अरुणाचल हाउस में पर्यटन, शिक्षा, आरडब्ल्यूडी, पुस्तकालय एवं संसदीय कार्य मंत्री पासांग दोरजी सोना ने किया।

    यह नया अभियान अरुणाचल की ब्रांड पहचान बियॉन्ड मिथ्स एंड माउंटेन्स के तहत तैयार किया गया है, जिसमें यात्रियों को केवल प्राकृतिक सुंदरता देखने के बजाय यहां की जीवनशैली, जनजातीय परंपराओं और स्थानीय लोगों से जुड़ने का आमंत्रण दिया गया है। सरकार का मानना है कि आज की नई पीढ़ी का यात्री केवल डेस्टिनेशन नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण और प्रामाणिक अनुभव चाहता है, और अरुणाचल इस अपेक्षा पर पूरी तरह खरा उतरता है।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री पासांग दोरजी सोना ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश हजारों वर्षों पुरानी विरासत, विविध जनजातीय संस्कृतियों, बौद्ध परंपराओं और अद्वितीय जैव-विविधता का जीवंत संगम है। उन्होंने कहा कि राज्य में साहसिक पर्यटन, आध्यात्मिक यात्राएं, वन्यजीवन, प्रकृति भ्रमण और सांस्कृतिक उत्सवों की असीम संभावनाएं हैं। मंत्री ने कहा, अरुणाचल की यात्रा केवल स्थलों तक सीमित नहीं रहती, यह एक ऐसा मानवीय अनुभव बन जाती है जो जीवनभर याद रहता है।

    पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कोविड महामारी के बाद अरुणाचल प्रदेश में पर्यटन ने उल्लेखनीय उछाल देखा है। वर्ष 2023 और 2024 में राज्य में हर साल 10 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे, जो महामारी-पूर्व स्तर से कहीं अधिक है। अधिकारियों का मानना है कि बेहतर सड़क और हवाई कनेक्टिविटी, आक्रामक ब्रांडिंग और अनुभव-आधारित पर्यटन मॉडल इस बढ़ोतरी के प्रमुख कारण हैं।नई पर्यटन नीति के तहत राज्य सरकार कनेक्टिविटी सुधारने, पर्यटक सुविधाओं के विस्तार और आवासीय क्षमता में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि पर काम कर रही है। साथ ही फार्म टूरिज्म, इको-टूरिज्म, जनजातीय पर्यटन, साहसिक पर्यटन, आध्यात्मिक पर्यटन और सीमावर्ती पर्यटन को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे स्थानीय समुदायों को भी सीधा लाभ मिल सके।

    टेक ए न्यू टर्न इन अरुणाचल अभियान में गंतव्यों को कहानी-आधारित अनुभवों के रूप में पेश किया गया है। तवांग को आध्यात्मिक विरासत और हिमालयी सौंदर्य के प्रतीक के रूप में, जीरो को स्वदेशी संस्कृति की धड़कन के रूप में, अनिनी को झीलों और झरनों की धरती के रूप में, नामसाई को आध्यात्मिकता और नदी संस्कृति के संगम के रूप में, डोंग को भारत में प्रथम सूर्योदय के स्थल के रूप में और मेचुका को रोमांच व शांति के अद्भुत मेल के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। अभियान की फिल्मों और प्रिंट विजुअल्स में स्थानीय लोग, वास्तविक क्षण और प्राकृतिक दृश्य केंद्र में हैं, जो अरुणाचल की प्रामाणिक छवि को उभारते हैं।मंत्री सोना ने बताया कि पिछले वर्ष राज्य ने अपना लोगो और ब्रांड आइडेंटिटी बदली थी और यह अभियान उसी दिशा में एक निर्णायक कदम है। सरकार को उम्मीद है कि यह पहल अरुणाचल को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटन बाजार में भी मजबूती से स्थापित करेगी।

  • भिंड में चंबल नदी किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत सस्ती कीमतों में ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थल होंगे दिखाए

    भिंड में चंबल नदी किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत सस्ती कीमतों में ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थल होंगे दिखाए


    भिंड । भिंड जिले के अटेर में वन विभाग ने चंबल नदी के किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत की है। इस सफारी के जरिए पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक स्थलों की सैर कर सकेंगे। सफारी का ट्रैक करीब 10 किमी लंबा है और इसमें अटेर किला चामुंडा देवी मंदिर और वन्य जीवों को दिखाया जा रहा है। इस सफारी के लिए पर्यटकों को 200 रुपये और 500 रुपये के टिकट मिल रहे हैं और यह सफारी सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक चलेगी।

    वन विभाग ने सफारी के संचालन के लिए एक विस्तृत योजना बनाई है। पर्यटक अटेर स्थित वन विभाग कार्यालय से आफलाइन टिकट प्राप्त कर सकते हैं। चंबल क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है और यह इको-टूरिज्म गतिविधियां क्षेत्र की जैव विविधता और पर्यावरणीय संरक्षण में योगदान करेंगी। इस पहल के तहत वन विभाग स्थानीय लोगों के लिए रोजगार सृजन के अवसर भी पैदा कर रहा है जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी।

    वन विभाग की रेंजर कृतिका शुक्ला ने बताया कि सफारी में स्थानीय व्यंजन पेश करने की योजना भी बनाई जा रही है। इसके जरिए स्थानीय समुदाय को आर्थिक लाभ मिलेगा। वर्तमान में 11 ऊंटों का उपयोग सफारी में किया जा रहा है और जैसे-जैसे सफारी की लोकप्रियता बढ़ेगी इस में और भी ऊंटों को शामिल किया जाएगा।

    सुरक्षा और पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए वन विभाग ने सफारी के मार्ग को विशेष रूप से तैयार किया है। सफारी में आने वाले पर्यटकों को चंबल क्षेत्र के इतिहास और वन्य जीवन के बारे में भी जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा विभाग उत्तराखंड के ऋषिकेश की तर्ज पर यहां कैंपिंग की सुविधा भी शुरू करने की योजना बना रहा है। इससे पर्यटकों को एक अलग अनुभव मिलेगा जो स्थानीय पर्यटन को और आकर्षक बना देगा।

    यह सफारी क्षेत्र में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और कारीगरी को भी प्रदर्शित करने का एक अवसर है। इसे वन्य जीवों की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है जो आने वाले समय में स्थानीय वन्य जीवन और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद करेगा।